गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

किसी मुकम्मल स्पर्श से जीवित होती देह --फिर छूट जाने से डरती है तेज गले से रुलाई का भरभराना रोने से बदत्तर --कितना दम घुटता है कोई माप नहीं, एक तपिश देह में उतरती है --

दो आवाजों को अलगाना मुश्किल हो जाता है जब एक ही समय में एक ही सुर में वो सुनाई दे ---ठीक वैसे ही भीतर के दृश्य धूप  से छनकर बाहर की ओर एक बड़े से सेमल के पेड़ की झुकी हुई शाखाओं को भेद जमीन पर आते हैं, उनका दिखना ही अद्भुत है --सेमल की बड़ी बड़ी हरी गदबदी नरम रूई वाली कच्ची फलियों में अब दरारें पढ़ना ही चाहती हैं --इन्तजार तो धूप  को भी है, फलियों की छोटी बड़ी परछाइयाँ हवा संग संग जमीन पर पड़े आड़े तिरछे दृश्यों को दुलराती हुई अलसाई दिखलाई पड़ती है धूप  लम्बी शाखों पे चढ़ते -उतराते एक पतली कांच की लकीर की मानिंद लचीली डोलती है ---हतवाक'' समय में सब कुछ साफ होता है कुछ आवाजें भी, में तो कहीं गया ही नहीं था सच कहीं जाने के लिए ---तुम्ही बताओ तथागत  ऐसा कैसे चलेगा --एक सिरे पर आवाज कंपकपाती तो दूसरे सिरे पर स्थिर हो रह जाती है कबूतर का एक जोड़ा भरी दोपहर क्लॉक वाइज़ ,एंटी क्लॉकवाइज घूमता हुआ सोच को फिर वहीँ लौटाता  हुआ चकित करता है --कुछ चीजें जीते जी अश्मीभूत होती जाती हैं तो दूसरी तरफ फूलों की शिराओं में प्रतिध्वनियों की शक्ल में जी उठती है --सन्नाटे वाली दोपहर में दबी दबी हंसी वाली धूप थोड़ा आगे सरकती है ,बीतती  है आहिस्ता -पहुँचती है शाम तक सुस्त चाल से --लेकिन शाम देर नहीं करती  चुस्त चाल से लम्बूतरी हो पहुँच ही जाती है अँधेरे के निकट --अँधेरे में सुझाई नहीं देता कहाँ सुख है और कहाँ पीड़ा --
कोई उदासी कोई ,कोई कुंठा ,कोई याद कोई मोह ,कोई मुक्ति -और ऐसा ही कोई निश्छल दिन कोई रात में गड़मड़ होता है कोई ठौर नहीं ,बेस्वाद और तूरा सा  दिन दूर से नजदीक की चीजों को देखता हुआ ख़त्म होता है और रात पास आकर दूर सोचती है --हरमोड़ पर भटकाव --हर भटकाव में ढेर से रास्ते --ठिठक जाओ या एक चुन लो या लौट जाओ सब कुछ आपकी सोच पर निर्भर करेगा ---लौटो तो दस पांच खिड़कियों वाला घर भी अंदर से रोशन नहीं करता, लेकिन  क्या जरूरी है हर खिड़की से रौशनी भीतर आये --लेकिन इन्ही में से किसी दिन या रात तयशुदा मृत्यु  जरूर आएगी --मृत्यु  का भय घेरता है ---'कौन हो तुम ''पूछते ही वह धूप की परछाई में गुम  होता है किसी मुकम्मल स्पर्श से जीवित होती देह --फिर छूट जाने से डरती है तेज गले से रुलाई का भरभराना रोने से बदत्तर --कितना  दम घुटता  है कोई माप नहीं, एक तपिश देह में उतरती है --जल में उँगलियाँ डूबा देना एक सुकून एक ठंडक एक राहत --लेकिन कब तक ?  एक चुप्प सी रात भी बीत जाती है -बहुत उदास किया एक उदास दिन -रात ने जो बीत गया अभी अभी, डब डब  सी आवाज़ करता पानी में--
उसे डूबते देखना भी कितना अजीब है चलो रास्ता दिखाओ कोई आदेश सर माथे चढ़कर देता है -कहीं जाने के लिए नहीं -बस ज़रा टहलते हैं -वो रात ख़त्म होती है जिसका कोई जायज अंत नहीं होता 
कोई तो है, कोई सपर्श अब भी बचा है, कोई प्रेम में पगा बैठा है- कैसा दुःख -अँधेरा या डर ये एक आश्चर्य समय होता है जिसमें रहने का सुख -दुःख सपर्श राग विराग --सारे कुछ को मुठ्ठी में दबाये रहना और इसी सच बीच जीना --पंख ऊग आये तो कौन ना चाहेगा  उड़ना उसे तो वैसे भी पसंद नहीं, ठहर जाना गति से बचकर --अपनी ही इक्षाओं की नजर कैद से स्वाभाविक मुक्ति खुश भी तो करती है --कब लौटोगे ? लौटोगे तो जरूर --सवाल के जवाब का इन्तजार कौन करे --तुम्ही बताओ हे तथागत उस उजल और साफ दिन में जैसा आज यहाँ है ये दिन तब जब एक समरस समय में तालाब जल बीच में एक सौ आठ रक्त-चम्पा के फूलों से शिव का अभिषेक करुँगी --''एका दिवशी ये होणार'' --एक दिन ये होगा जरूर 
[समय और धीरे चलो --बुझ गई राह से छाँव --दूर है पि का गाँव --धीरे चलो ]

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

बचपन के डर हमेशा कमजोर नहीं होने देते समय के साथ वो आपके व्यक्तित्व को जिम्मेदार और मजबूत बनाते

व्हाट्स एप्प पर कुछ दिन पहले एक मैसेज कुछ इस शक्ल में था ,म sssssssssम -मी ईईईईईईई''सुनोsssनाsss  -वो एक लम्बी बात थी,बेटी ने जो  कहना चाहा,वो बाद में, इस संस्मरण के बाद ---
चार साल की बेटी को शाम अक्सर सामने वाले पार्क में जूते मोज़े फ्राक पहनाकर  घुमाने ले जाती थी वो भोपाल का पांच नंबर बस स्टॉप कहलाता है  उस पार्क में एक छोटा सा तालाब था जो आज भी है,जिसमें तब भी, आज भी ढेर से सुन्दर कमलफूल खिले रहते हैं, लगता था की बस उन्हें एक टक  देखते ही रहो, पार्क में ही एक साइड में मंदिर और दूसरी तरफ बच्चों के खेलने के लिए छोटे झूले और करीब छह फूट ऊँची एक फिसल पट्टी थी --मेरी बेटी आहिस्ता  अपने नन्हे क़दमों से ऊपर चढ़कर बैठ तो जाती थी लेकिन ऊपर से नीचे फिसल कर आने में उसे डर लगता था, तब ऊपर से नीचे आने में उसे मेरे सपोर्ट  की जरूरत होती और में उसका होंसला आफजाई करती उसे पुश करती और वो धीरे धीरे फिसलते हुए नीचे आती फिर उसके पैर रेत के ढेर में धंस जाते --वो जोर से हंसती मानो अपने ही बल पर कोई जंग जीत ली वो  समझ ही नहीं पाती कि उसकी इस बहादुरी में, माँ का कितना बड़ा सहारा है --वो रेत भरी हथेलियों को फ्राक से पोंछते हुए फिर से दुगने उत्साह से पीछे सीढ़ियों की तरफ दौड़ जाती,लेकिन हर बार ऊपर जाकर उसे माँ  के सहारे की जरूरत पड़ती ---एक बार मैंने उसे ऊपर चढ़ते हुए देखा, फिर मेरा ध्यान बंट गया में भूल गई की ऊपर जाकर उसे फिर मेरे सहारे की जरूरत होगी,  में तालाब के किनारे खिले कमल के फूलों को देखने में मग्न थी - तभी एक चीख सुनाई दी -म sssssमी ssईईइ  लगा जान निकल गई मैंने पलटे बिना ही बेटी के लहूलुहान होने की कल्पना कर डाली ---और उसकी  तरफ तकरीबन भागते हए देखा बेटी उसी पॉइंट पर ऊंचाई पर अटकी हुई थी --करीब पहुंची तो वो डरी हुई सी साफ साफ आवाज में बोली मम्मी आप उधर फूल देख रही हो मुझे देख ही नहीं रही हो --वो-रुआंसी सी-- थी मुझे यहाँ ऊपर से डर लग रहा है मम्मी  मैंने उसे आहिस्ता से ऊपर से नीचे की ओर फिसलने में मदद की --वाकई में,मैं उस दिन बेहद  शर्मिंदा थी --फिर मैंने कभी उसकी तरफ से इस जिंदगी में कभी  गफलत नहीं की ---सोचकर ही डर  जाती हूँ की ऊपर से वो गिर जाती तो ---?आज वो करोड़ों मील मुझसे दूर है लेकिन उसे मेरी ऐसी ही अब भी मानसिक सम्बल की जरूरत वक़्त -बेवक़्त पढ़ जाती है  समझती हूँ वो कहती नहीं लेकिन में जानती हूँ --उस वाक्यात के बाद  फिर मैंने कभी आज तक उसमें गिर जाने का भय तक पैदा नहीं होने दिया ना ही कहीं गिरने दिया ना डरने दिया वक़्त जरूरत जहाँ जरूरत हुई उसके लिए न्यायोचित लड़ाई भी लड़ी उसे बुलंद होना उसकी प्रिंसपल के सामने बोलना, सच और झूट में फर्क करना सिखाया दूसरों को अपनी मदद से ऊपर उठाना भी --हर हाल में जीना लेकिन मजबूर होकर नहीं थोड़ी मुश्किलें तो अब भी आती हैं लेकिन  वो खुश है और में भी
वाहट्स एप्प पर जो चार - पांच दिन पहले उसका[बुलबुल] जो मैसेज था वो ही बचपन वाली आवाज में, वो इस लिए की उस दिन सुबह से उसके कई मेसैजेस थे ,दो चार मिस्ड काल भी,, अमूमन मोबाईल मेरे आस पास ही रहता है लेकिन उसी दिन बैटरी डाउन थी चार्जर पर लगा कर में बाई के साथ घर की साप्ताहिक सफाई में लग गई --दोपहर में जब देखा तो वही मम्मी वाली लम्बी टोन में लिखा -हुआ --में परेशान हो गई कई फोन और मैसेजेस दिए लेकिन कुछ उत्तर नहीं मिला आखिरकार रात उसने फोन किया -बोली एग्जाम था ,आपकी याद आ रही थी सोचा आपसे बात कर लूँ -  लेकिन आप का तो फुरसत ही नहीं,मुझे उसका बचपन याद आया, ना बचपन के डर हमेशा कमजोर नहीं होने देते समय के साथ वो आपके व्यक्तित्व को जिम्मेदार और मजबूत बनाते [मेरी बेटी बुलबुल इस वक़्त कोलोराडो यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग के फोर्थ सेमेस्टर की पढाई कर रही है  और मुझे आज उसकी जोरदार याद आ रही है ]

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

उसका एक अव्यक्त दुःख , एक आर्तनाद रोजाना मुझे सुनाई देता है --मुझे रूकना पड़ता है उसके पास,सांत्वना देती हूँ - कहती हूँ कब तक ठूँठ रहोगे एक दिन यहीं से कोंपले फूटेंगी तब तुम चारों तरफ से लहराती शाखाओं वाले सुन्दर वृक्ष बन जाओगे --तब देखना किसी को भी याद ना रहेगा की तुम कभी इतने निरीह रहे होगे



  1. हमारी कालोनी के पार्क में  एक पलाश के पेड़  ने ,आज फिर दिल दुखाया पार्क के एक सिरे से, थोड़े पहले ये  टेसू का पेड़ अपने  सहोदरों से बिछड़ा महसूस होता है मेरे ख्याल से --न्यू भोपाल की बस्ती बनने के क्रम  में छोटे जंगलों को काटा छांटा  गया होगा --कुछ पेड़ काटे गए होंगे --कुछ को जड़ से उखाड़ा गया होगा, पता नहीं ये किस  कर्मचारी की दयालुता की वजह से बच गया  या अपनी  कमसिन फूलों की खिली हुई  डालियों की वजह से, ये तो पता नहीं ,किन्तु ये पार्क की हद में है लेकिन इसका आधा तना सड़क के बहार तक फैला  हुआ है जो बाउंड्री वाल के सहारे बहार की ओर सड़क तक अपनी शाखाओं के साथ फूलों से लदे - फदे  होने के बावजूद ,उदास नजर आता है 
  2. इसके  ढेरों पत्तों और उनकी उपयोगिता को भी आज भुला दिया गया है कभी जन्म मरण आयोजनो कथा पाठ तो प्रसाद में इसके बने दोनों पत्तलों के बिना काम ही नहीं चलता था और आज किसी को जरूरत ही नहीं ,मनुष्य ने सभ्य होकर हर चीज का विक्लप ढूंढ लिया है हाँ बस कहावतों में याद रखा है --फिर वही  ढाक के तीन पात ---
  3. --जमीन से थोड़ा  ऊपर ही इसकी  दो विभाजित भुजाओं में से किसी ने एक भुजा को काट दिया है लगता है जैसे कोई हादसा हुआ है --पलाश वहीँ से ठूँठ नजर आता है --विकलांग भी दुःख होता है उसे यूं देख कर , नजदीक जाने पर --लगता है इस हादसे के जिमेदार लोगों की शिकायत करना चाहता है -लेकिन  कोई सुने तब ना -किसे फुरसत क्षण भर रुके उसके पास। -अपनी एक ही भुजा से ऊपर की और जाता हुआ ये टेसू मुझे निरीह युवा पुत्र  की तरह दिखाई पड़ता है ---
  4. उसका एक अव्यक्त दुःख , एक आर्तनाद रोजाना मुझे सुनाई देता है --मुझे रूकना पड़ता है उसके पास,सांत्वना देती हूँ -  कहती हूँ कब तक ठूँठ रहोगे एक दिन यहीं से कोंपले फूटेंगी तब तुम चारों तरफ से लहराती शाखाओं वाले सुन्दर वृक्ष बन जाओगे --तब देखना किसी को भी याद ना रहेगा की तुम कभी इतने निरीह रहे होगे बस खुश् रहा  करो और इन्तजार करो उस दिन का जब लोग ठिठक कर तुम्हारे पास रूकेंगे तुम्हे निहारेंगे तब तुम अपनी डाल  पर खिले सैकड़ों फूलों संग दुलार प्यार में ही व्यस्त होगे 
  5. टेसू  के खुरदुरे तने पर काली चीटियों की कतार ऊपर तक जाती दिखाई पड़ती है जो फूलों के गुच्छों के पास जाकर खो जाती है ---चीटियों की मीठी प्यास बुझाता --खुद टेसू कितना प्यासा है, कौन जनता है --उदासी में भी मुस्कुराता हुआ , इसके ठीक सामने --डा मित्रा का बँगला  है जो आजकल अपनी चमचमाती बड़ी सी  सफेद गाडी  को इसकी शाखाओं के नीचे  खड़ा कर देते हैं --सुबह देखो तो लगता है किसी युवती के सफेद दुपट्टे पर रेशमी  सिंदूरी टेसू फूल कढ़े  हो --यहाँ वहां ये एक अद्भुत नजारा होता है --लेकिन कारवाश वाला बड़ी बेरहमी से उन्हें बुहारता हुआ यहाँ  वहां बिखेर देता है --फूल गिरते हुए टायरों के नीचे  बिखरते -कुचलने को अभिशप्त होते जाते हैं, डा मित्राका  परिवार शायद ही कभी इसको अपनी प्यार दुलार भरी नजरों से देख पाया हो ---काश ये मेरे घर के सामने होता  --इसके दहकते फूलों में कितनी ऊर्जा है इसके रंगों में कितनी प्रियता है वो समझ पाते --जिंदगी में वो सब आपके पास नहीं होता जिसकी आपको दरकार होती है ---देवताओं  के प्यार से अभिशप्त टेसू के फूलों को इन दिनों मंदिर में देवी देवताओं की मूर्ति पर भी अर्पित कर आती हूँ शायद कभीये शाप मुक्त हों और इन्हे भी चौतीस करोड़ देवी देवताओं का पवित्र और असीम दुलार -प्रेम मिल सके अन्य फूलों की तरह और इसके पेड़ को भी वो ही मान्यता मिले जो बरगद और नीम पीपल की है --कोशिष्टो कर ही सकती हूँ 

  6. [व्यक्ति एवं अन्य द्वारा निर्मित ऐसी कई स्थितियों के अलावा भी संसार में बहुत कुछ है जिनके अस्तित्व से  जुड़कर हमारे विचार नवीन ऊर्जा से भर जाते हैं --जैसे वृक्ष नदी पर्वत पहाड़ पशु पक्षी --जो जीवन की गहरी जड़ों तक ले जाते हैं हमारी स्मृतियाँ ताज़ी करते हैं  और सबसे ज्यादा आसानी से याद रखने वाली बात को याद रखने और भूल जाने वाली बात को भूल जाने में सहायक बनते हैं --मेरा अनुभव तो यही है ---]

शनिवार, 7 मार्च 2015

सोचते ही पहुँच जाना भीतरी हदों तक --बेछोर आसमान में ,बियाबान जंगलों में पुराने अस्त्रों से बार बार मुश्किलों को, काट छांट कर पहुंचना तुम तक, एक राग, एक प्रियता का बुलाना।

जब तुम्हारी लय टूटती है,असंगत होती जाती है -अच्छा नहीं लगता एक छोटी सी जगह में छोटे-छोटे शब्द अनुत्तरित हो घायल कबूतरों की तरह लौटते हैं,--सुरमई शाम में, अपने मौन में अपनी यात्रा से ऊबा हुआ  थोड़ा- थका सा ,दिन डूब ही जाता है ,तारीखें बदलती जाती हैं लेकिन कुछ चिन्हित पल रूक रूक दस्तक देते ही जाते हैं उस तरफ से कोई आहट  ही नहीं जैसे कोई बीहड़ शुरू हो -दूर तक- देखो तो कुछ सुझाई नहीं देता -किसी पल को तो सन्नाटा अपनी जद  में लेने की जिद्द भी करता है निजी वजहों से बिछुड़ते पल धूसर हो रह जाते हैं यकीन जानो दिल भी दुखता है बेहद तकलीफ भी होती है ये टोकरी भर लोग मेरे तुम्हारे बीच मन भर पहाड़ कैसे बन जाते हैं, नहीं जान पाती --ये तो मानोगे मुझे सब रंग अच्छे लगते हैं --बस यही धूसर रंग नहीं, सन्नाटे का चुप्पी का ये रंग, हद दर्जे तक इससे मुझे नफ़रत है --बाकी सब रंग मुझे लुभाते हैं-अपने खुश रंग में --फिर भी रंगो से मुझे डर  लगता है--तुम भी जानते हो -सफेद सुबह जीवन से भरा और शाम काला श्याम सा बस ये दो रंग ही अपनी सपाट बयानी में ज्यादा आकर्षित करते हैं-हालाँकि रंगो को ढोंगी होना नहीं आता,तुम्हारी कविताओं के रंगों को तो बिलकुल भी नहीं, कितनी सरलता से लिपट जाते हैं मुझसे-फिर दिनों हफ़्तों महीनो लिपटे लिपटे ही मुझमें समा जाते हैं।   लेकिन पिछले कई सालों से जबसे तुम्हे जाना है --कच्चे पीले फूलों से लदा -फदा एक प्रौढ़ टेबुआइन मेरे सिरहाने वाली खिड़की की चौखट  तक आकर अपनी भव्यता के साथ खिल-खिल करता,खुश करता है उसके रूई जैसे नर्म गोलगोल फूल  हवा चलते ही अंदर सिरहाने तक फैल  जाते हैं 

 सिरहाने खुशियां हो तो भरपूर नींद का आना लाज़िमी है--किन्तु  हर दिन तो ऐसा नहीं होता -खुशियों और उदासियों के सामानांतर स्मृतियाँ चलती है मन को मथती  हुई. उस दिन तुम्हारी हथेलियों में कच्चे आम्रबौर की खुशबू थी वो हथेलियाँ मेरे हाथों में थी और उड़ती ख़ुश्बू आँखों से भर एक दूसरे पर उलीचते हुए हम दोनों -तुम्हे जाना था,मैंने बस जाते हुए महसूस किया तुम्हे,देखा नहीं,देख ही नहीं सकती थी दर्द आँखों में घुलता है बहता नहीं - उस शाम के बाद देर तक रात भी जागी रही संग-घर से लगे उजाड़ पार्क को नगर निगम वाले देर रात तक रेट गिट्टी, मिटटी से-पूरते रहे स्मृतियों की आवाजें भी आती रही --भरती  रही सुबह तक , कहते हैं, जिस साल आम्र ज्यादा फलता है , वो साल शुभ शुभ होता है एक हठ भरी कोशिश --अब ना छूटेगी ना घटेगी वो शुभ महक ,दिन बढ़ते हैं तपे हुए दिनों के साथ  धत्त'' हठात ये सोचना की ऐसा भी होता है --और सोचते ही पहुँच जाना भीतरी हदों तक --बेछोर आसमान में ,बियाबान जंगलों में पुराने अस्त्रों से बार बार मुश्किलों को, काट छांट कर पहुंचना तुम तक, एक राग, एक प्रियता का बुलाना। सजीव स्मृतियों का चलना कोई समृति भूलती नहीं कोई सपर्श छूटता नहीं ---बिना सलवटों वाला शांत समुद्री हरा हरा रंग - मन को सजल बनाय रखता है --लेकिन सृष्टि का क्रम टूटता है एक दुनियादार औरत अंदर बैठी डराती है अपनी जिरह मुश्किल में डालती है सच और सच के सिवा कुछ नहीं वर्जित क्षेत्र में अपनी पहचान मत खोना ?--उसकी बातों से दूर निर्भीक बन सोचती हूँ तुम्हे, बस तुम्हे सोचना ही तो जिलाता है भीतरी कोई अभाव, जिसे लबालब भरता है अपने एकांत और बाहरी शोर से उपजी एक तरंग एक घटना जिसके तारतम्य में विनिर्माण को गूंथना और फिर देखना देर तक उजालों में दर्ज होती तुम्हारी उपस्थिति --एक नैतिक अन्वेषण की मानिंद जिसे में आखिर खोज ही लेती हूँ अपनी पनीली खोजी आँखों से एक कच्ची महक बजती है --डूब जाने को आतुर 
 
[तनहा उसे अपने दिले तंग में पहचान हर बाग़ में हर दश्त में हर संग  में पहचान 
हर आन में हर बात में हर डग में पहचान,आशिक़ है तो दिलबर को हर रंग में पहचान ]


[नज़ीर]  

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

-देह अद्भुत शान्ति की खोज में अपने से ही नितांत अलग थलग चल पड़ती है ---चरम उपलब्धि से कुछ कदम पीछे ही, राग -विराग ,आसक्ति -अनासक्ति ,मिलन--बिछोह और समय की क्रूरताओं में हमारी समिल्लित अनुभूतियों के बीच आकार लेता

में कहना चाहती थी,और नहीं कह पाई,उस दिन --उसका मिलना मतलब अक्सर कुछ ना कुछ छूट जाना--और चले जाने के बाद सैकड़ों बातों से मन भर लेना --येभी- वोभी जाने क्या क्या कहना, रह जाना   
दो चीजें ही हमें एक जुट,जुड़े हुए और एक रखती है --तुम्हारा शिद्दत से लौटना और मेरा इन्तजार --भीतरी  और बाहरी-और फिर लौटकर --मेरा पुकारा गया नाम, जब --आवाज फकत आवाज नहीं होती है उस वक्त वो --एक आख्यान होता है - 
समय के  अजनबी रंगो ,रोशनियों  शब्दों की बाढ़ में --बहुत भटकन और अंतराल के बाद मिलने वाला चेहरा सचमुच अपना है, संशय से मन कुलबुलाता है ---तुम्हारे चेहरे पर टिकी मेरी आँखें बस मूंद सकती है ----उधेड़बुन में भटकते शब्द कुछ अर्थ बुन पाते तभी ये सोच कि - जानती हूँ भटकाव जिंदगी को गहराई देते हैं -कितना अच्छा होता --आदमी किताब की तरह खुल  तो  पाता। 
अक्सर  दुःख निराशाओं के मायने ढूँढ़ते हैं --मेरे प्रयत्नो में मुक्ति की कामना नहीं होती वहां -कारण और परिणामों का विश्लेषण भी नहीं होता --इसलिए दुःख भी नहीं , 

जानते हो- जिस समय में तुम नहीं होते, भीतरी अनुभव संसार खाली सा अपने अधूरे आपे के साथ विकलांग हो कर रह जाता है --एक बेसुरी चुप्पी -जिसमें -फरियाद की कोई लय  नहीं रूखा सूखा सा-- 
एक ध्यानाकर्षण की सूचना की तरह --दूसरे छोर के शोर गुल में अनसुनी -गुम हो रह जाती है --क्या कहूँ बस अपना वास्ता ही दे सकती हूँ कितनी जकड़न -सिहरन एक रात बिन सोये बीतने की थकान -भरम हो जाता है --इस सत्य के साथ की में बस वो हिस्सा हूँ --जहां  भय और इक्षा का एक सा चेहरा है, जिसे तुम्हारी भीतर वाली आवाज पहचानती है ये --सोच कि  -तुम्हारे लिए इस कदर जरूरी क्यों है  दुःख का अपने साथ बनाय रखना  ? दूर दराज के ठिकानो में ढूंढ  आना फिर  बेहाल होना ---और नहीं मिलना खोई हुई चीजों की तरह एक बैचैनी --थोड़े संदेह की तरह की, मिलोगे भी या नहीं शंका-कुशंका के कुहासे में चीजें साफ नहीं होती एक अहसास की, इतनी आवाजों में से कौनसी पद चाप देर तक सुनाई देती रहेगी ,सुख तो सापेक्ष है --वसंत आते आते रूक जाता है एक हद के बाद -
-देह अद्भुत शान्ति की खोज में अपने से ही नितांत अलग थलग चल पड़ती है ---चरम उपलब्धि से कुछ कदम पीछे ही, राग -विराग ,आसक्ति -अनासक्ति ,मिलन--बिछोह और समय की क्रूरताओं में हमारी समिल्लित अनुभूतियों के बीच आकार लेता --हमारा बचा हुआ प्रेम,इसी उम्मीद पर तो बाढ़ को तैर कर --तूफान को पार कर --इस दुनिया को तुम्हारी ही आँखों से देखते हुए,कोई अगर बची हो उन अधूरी इक्षाओं को पूरा करना, जीना चाहती हूँ, असंभव में कुछ संभव जोड़ते हुए -उन -सारे सपर्शों को गंध में लपेट--झिलमिलाते हुए 
अधीर दिन की तरह,  दो शब्दों में बोला गया एक शब्द, शहद में गूंथा हुआ नाम , देह की परिचित भाषा में - दिनों हफ़्तों महीनो सालों जिसमें तुम उजाले की शक्ल में दिखाई देते रहते हो हरदम , अपने लिए, तुम्हारे लिए बचाये गए जीवन में, अपने वासन्ती आँचल के बालूचरि ताने- बाने में,एक भरा पूरा सच, जिसे  इस जीवन में  तुम्हारे सिवा कोई कुछ नहीं जानता
 [''एक संभव दिन'' ---अपनी एक लम्बी कहानी का अंश ]

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

शब्द उसे ढाढ़स बांधते हैं ---वो उस आवाज की धुंध से बहार आती है -चुनी हुई नियति को तो एकबारगी स्वीकार किया जा सकता है थोंपी हुई को नहीं

कभी  तो क्या, अक्सर ही- निचाट दुपहरी को --खुमरी --की तरह सर पर ओढ़ लेना मजबूरी हो जाती  है 
अच्छा भी लगता है लेकिन बोझ भी लगता है ऐसी बिन बुलाई बरसात में चौक चौरस्ते लहराती गीली हवा से शहर को भिगोते हुए दौड़ लगाते हैं--तेज आंधी कड़क बिजली कलेजा फटता तो नहीं डर  से बैठ  जरूर जाता है इस लम्बे चौड़े जीवन में कई शब्द सीखें --कई बिना अर्थ के शब्द, खिलौने की तरह खूब जुटाए --मुझे प्यार आता है ऐसी ही निचाट दुपहरी में जब बारिश गुजर जाती है और हर तरफ वनस्पतियों --वाली खुशबू के साथ यही गीली हवा थोड़ा थोड़ा रूक रूक कर ठिठुरती है --याद आती है वो शाम --जायज अंत था उसदिन की उस  शाम का शब्द मोहताज थे जिसे जहाँ तर्कों और इक्षाओं के बल पर नहीं परम्पराओं और संस्कारों  के बल पर सोचा गया था, समय की किल्लत थी ---ना ट्रेन के लिए कोई अनाउसमेंट  था की फलाँ अपने निर्धारित समय से दो घंटा विलम्ब से पहुंचेगी या पहुँच रही है ,अक्सर तो मुठ्ठी भर सपने भी मुठ्ठी में ही चकना चूर हो जाते हैं ----कई सवालों से खीज़ पैदा होती है कई के जवाबों से सुकून मिलता है मगर वो अधूरे रह जाते हैं ---कॉफी की  गर्म भाप में सपनीली आँखों का विस्तार रेतीला हो रह जाता है ----उसका उठना गहरी आँखों से झांकना बिछी हुई बिसात पर सधे  क़दमों से चलते हुए चले जाना ---कल्पना से बाहर  हो,छूट  जाता है समीकरण ना गड़बड़ायें -चलो फिर मिलते हैं ---शब्द उसे ढाढ़स बांधते हैं ---वो उस आवाज की धुंध से बहार आती है -चुनी हुई नियति को तो एकबारगी स्वीकार किया जा सकता है थोंपी हुई को नहीं --वक़्त नहीं रूकता कई बातों  चीजों से ---सोच का सिरा फिर रेंगता सा आगे दिशा में बढ़ जाता है ---और बहुत कुछ आँखों में उतरता है ,भरम नहीं मुझे साथ का विश्वास चाहिए वसंत चाहिए -आँखें फिर मूँदती है थक कर एक दुपहरी सन्नाटा पेड़ों पर लटका आँखों के अंधेरों में अटक जाता है ---ज़रा सब्र करो --अपने को समझाती  हूँ --वो पुराना शहर तुम्हारे सपनो में आएगा ---तुम ये सोच के तिल से --ताड़-पहाड़ क्यों बना डालती हो ---ऐसा कुछ नहीं होगा अपने से आश्वस्त होना सबसे अच्छी स्थिति है --अक्सर उसके लिए सर झटक कर कई दृश्यों को विछिन्न कर देना   भी उसी के बूते की बात है वरना तो 
कल परसों और आज जो अच्छी खासी बारिश हुई --शाम इंद्रधनुष निकल आया, रंगो संग विशवास के शब्दों ,रिश्तों और जीवन साथ उसकी दैनिक कार्यसूची में शामिल था उसे सोचना --देर रात सितारों की बातें सुनना  अंतरिक्ष में विचरना --वो तो रास्तों की निश्चिंतता रहती है --कभी कभार हताश  खाली हाथ भी घर वापसी होती है --देर रात नींद नहीं आती --आती है तो --आँखे  जागी रहती है --अपनी ही धड़कन प्रत्यारोपित दिल सी अजनबी सी --एक धुकधुकी अक्सर कलेजें में --हथेलियाँ थाम  लेती है --नाप लेती है धड़कनो में बसी आवाजों को ---नदियों बियाबानो पहाड़ों  कचरों में घूम घूम कर अपने अर्थ खोजो तो अर्थ भरे रंग मिल ही जाते हैं ----जी लेते हैं --अपनी मिटटी अपनी वनस्पति से भर लेते हैं खुद को, शुक्रगुजार हो जाती हूँ तुम्हारे साथ जाने किस किस की, धूप  हवा पानी आकाश इस उदासी इस प्रेम की भी ऐसे जीना कि  दिन महीना साल दर साल प्रेम की अबोध प्रार्थनाओं  में --बीत जाना फिर याद आता है छीजना भी --अपना आप ---जैसे कोई   पोखर गर्मियां आते आते कैसे छीजता  जाता है 
 किनारों की मिटटी से सूखता दरकता वैसे ही --और वहीँ किनारे पीले पड़ते पत्तों  से लदे  अमरक के
पेड़ों से  कुछ पत्ते गिरते सूखी जमीन की दरारों में धंसते  ही जाते हैं  आगे आकर चीजें पीछे रहती हैं --पीछा नहीं छोड़ती---बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती है अपनी उपस्थिति दर्ज करने से बाज नहीं आती  टूटकर गिरते पत्तों की उदासी में से एक पल ख़ुशी  का जब एक नाम उभरता हैमोबाईल की  नियॉन लाइट में ,एक साधारण से दिन और  निरुपाय दिन में, खोई ख़ुशी  मिलने की ख़ुशी शामिल हो जाती है 

  •    उम्रे     --रफ़्त --पे  अश्कबार     न  हो 
  • अह्दे -गम  की हिकायतें मत पूछ [फ़ैज़ ]            

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014



एक बूढ़े 'टेबुआइन 'का आर्तनाद -----

एक बूढा टेबुआइन  जो रोजाना मेरी राह तकता है --घर के नजदीक बने जंगलनुमा पार्क में ---वक़्त ने उसकी कमर झुका दी   वरना वो भी कभी अपनी  सीधी -ऊँची पूरी लम्बाई पर इतराता फिरता था तेज बारिश हो ,सर्द शामे हों या गर्मियों की झूमती पुरवाई पिछले आठ सालों से उसे वहीँ पार्क के एक कोने में पाती हूँ ---जहाँ उसे हर दिन छोड़कर आती हूँ ---लेकिन पिछले  एक हफ्ते से वो ज्यादा बूढा दिखाई  देने लगा है -----वैसे तो उस पर से कई मौसम गुजरते ---वो फिर भी बड़ी हिम्मत से खड़ा दिखाई देता और गर्मियां आते ना आते उसकी मुस्कराहट चौगुनी हो झरझराती --फिर सैकड़ों पीले गुच्छों में खिलना ---उन्हें खिले हुए कई कई दिनों तक अपनी जीवटता में बचाये रखना -उसका  पहला काम होता -फिर एक दिन वो भी आता जब उसके सारे  फूल एक एक कर जमीन पर झड़ते चले जाते --वो अपनी छरहरी गर्दन को थोड़ा मोड़कर असहाय हो नीचे  देखता, मानो  उसी के पैरों तले  किसी ने पीला दुशाला बिछा दिया हो 
इन दिनों उसकी नम  आँखे --आद्र पुकार मुझे खूब सुनाई -दिखाई देती है ---इसी बारिशमें अंधड़ और   तेजमार को वो सह नहीं पाया और पार्क के अंदर ही रेलिंग्स में जा धंसा ---धड़ पार्क के भीतर --और -ऊपरी सिरा सामने वाले घर की सड़क पर, उसकी ऊपरी मजबूत शाखाओं -बाहों को  नगर निगम वालों ने काट डाला कई दिनों तक शालभंजिका  की तरह वो पड़े रहने पर मजबूर रहा ---में तब भी उसके आस-पास टहलती रही -उसके हाल चाल पूछती रही फिर  कुछ दिनों बाद --उसकी कटी फटी बाहों के सिरे पर कुछ नई  कोंपल फूटी ---थोड़ा आश्वस्ति भाव -आया -सोचा जी जाएगा ---लेकिन वो तो अंदर से टूट रहा था ---देर बाद समझ आया ---बारिश बीत गई ---अब मोहल्ले के बच्चे क्रिकेट खेलते ,उसकी झुकी कमर पर आसानी से चढ़ बैठते ----दिन में पचासों बार टेबुआइन दूर से आती गेंद की मार को महसूस करते  --हुए अपनी आँख को मिचमिचाता ---अंतत पीठ पर एक जोरदार मार सहता ----रोजाना की इस कवायद में उसकी पीठ सतह से किंचित चिकनी हो गई है -अपनी लम्बी सख्त यूकेलिप्टस सी नुकीली पत्तियों पर उसे गर्व है जो जायज भी है ----दो पल  उसके पास रूकती हूँ उसकी पीठ को  सहलाना सांत्वना देना --उससे सहोदरों से बिछड़ने का दुःख सुनना, दिन भर में किस गिलहरी ने उसकी लम्बी पीठ पर लहराते दौड़ते उसे कुतरा कितनी चींटियों ने जड़ तले राशन पानी इकठ्ठा किया ,किन दो औरतों ने अपने घर की दुःख- सुख को उसके नजदीक बतियाया, कितने झरते पत्तों ने उसकी दोपहर की नींद में खलल डाला-उसे सुन लेना जरूरी हो जाता है जो -बस सुबह की सैर में शामिल है 
 नगर निगम की मंजूरी के बाद -नए डेव्लपमेंट में कौन जाने ये भी कितना बच पायेगा लेकिन टेबुआइन मेरी स्मृति में हमेशा खिलता -खिलखिलाता रहेगा ---आमीन 
दुःख से भरपूर दिन तमाम हुए ---और कल की खबर किसे मालूम [फैज़ ]

गुरुवार, 5 जून 2014

मौसम के चेहरे पर इन दिनों तांबई ताप है ,एक खनक बावजूद भीतरी द्वन्द को ठेलती है विपरीत दिशाओं में इधर-उधर ,बल्कि उधर ज्यादा जहाँ कुछ छूट जाता है --चीजें इससे ज्यादा विस्तारित नहीं होती

क्या अब भी लौटा जा सकता है ,आज ये प्र्शन अपने आप  से नहीं ----अँधेरे में वो एक पसंदीदा जगह गढ़ लेती है ---कभी कभी जब सब कुछ ठोस हो जाता है ---तो किसी से सवाल करने  का मन करता है ---सवालों के टोहने से भी नहीं पिघलता --स्मृतियाँ भी तुम कौन हो कह आलोप हो जाती है और भीतर ही भीतर कोई बेखटके आवाज़ लगाता है --कोई कैसे देखे एक निर्णय अनिर्णय बैचैन करता जाता है हर  अगला क्षण मुल्तवी होता जाता है --नहीं लौटा जा सकता ,प्रश्न किसी और से  और उत्तर अपने आप को देना,आगत वक़्त की इक्षाएं धुंधलाती है --इसमें एक हैरानी है इक्षाओं के द्वीप पर अथाह रेतीला  चमकीला विस्तार गुंजाइशों  को बेठौर करता, भागती हुई लालसाओं को भारी हुई सांसों के साथ फेफड़ों को थका देता है --जो नया नहीं है ---कोई पूछे उससे --अनुपस्थित होकर उपस्थित होना क्या होता है --कई मोड़,वो छूटना वो जुड़ना वो टूटना सागौन वन में उसके पत्तों सा   खड़खड़ होना ---स्थिर पैरों से मन की परिक्रमा चकराती  है ,एक चट्टान को सीने  पे रक्खे  गोल घूमते हुए देखते रहना तकलीफ़देह है ----मौसम के चेहरे पर इन दिनों तांबई ताप  है ,एक खनक बावजूद भीतरी द्वन्द को ठेलती है विपरीत दिशाओं में इधर-उधर ,बल्कि उधर ज्यादा जहाँ कुछ छूट जाता है --चीजें इससे ज्यादा विस्तारित नहीं होती ,एक बिंदु पर जाकर सिकुड़ने लगती है तमाम प्रयास बेअसर होते हैं ---इसे किस्मत की सितमगिरी ही कहेंगे ----एक अन एक्सेप्टेड सिचुएशन को नरमी से कबूल करना --एक जादु असर  सर चढ़ बैठता है -----ये क्या तभी एक शाख से बिछुड़ा लंबा नुकीला हरा कंच पत्ता अपना हरापन खोता तेजी से सिकुड़ता जाता है बकौल खलील जिब्रान द्वन्द के उस पार होगा मन -मन के उस पार होंगे आत्मा के जगमगाते शिखर ---------कोई अपूर्व  निजता मन को घेरती है ,एक अलभ्य मुस्कान --इतनी निष्ठुरता बरतना जरूरी है दरअसल वहीँ प्रारब्ध है जहाँ- जहाँ जब-जब छूट जाते हैं वो ,एक निनाद प्रभुजी तुम चन्दन ---तर करता है तभी एक खानाबदोश हवा तेजी से गालों  को सहलाती निकल जाती  है थोड़ी सी खुमारी थोड़ी सी राहत ---फिर सोचना आखिर बेतरतीब चीजों रंगो को समेटने के लिए भी तो वक़्त और साथ की परसुकून दरकार है,-------उस दिन शाम ज्यादा ही  सर्द थी और उसकी आवाज़ भी  इत्तिफ़ाक़न दोनों के बीच शब्द भी  ना सुनाई देने वाली बिलख की तरह थे ---वो जगह ,वो सपने वो घुमड़ वो सन्देश --स्मृति घर के किसी ईशान कोण में बेहद-मूलयवान  खजाने की तरह रख देने का मन था,समय कम  था इक्षाएं मनभर अफ़सोस कितनी बातें/ चीजें छूट गई ----शहर  में पहला कदम --और बारिश ने स्वागत किया --शाम सारे ओफिशियलि---काम ख़त्म करके जनपथ से  उसने एक ट्रांसपेरेंट चाटा खरीदा ताकि बदल और बारिश एक साथ देखी  जा सके ,---लेकिन पता नहीं कैसे घंटा भर मार्किट में घूमने के बाद पसंद-आया छाता टेक्सी की सीट पर ही रह गया --दूसरे दिन विक्टोरिया  सिक्रेट का  परफ्यूम और सफेद फूलों का रजनीगंधा का गुच्छा --सरदार जी की गाडी में -और पहले दिन ही रूम के शीशों से छन कर  आती रौशनी से बचने की खातिर -अमेरिकन डायमंड वाले  हेयर क्लच को उसने सी ग्रीन पर्दों को समेट कर उसमें लगा दिया था ---अब सोचो तो हसी आती है बाकी चीजों का क्या हुआ नहीं मालूम लेकिन वो किलिप तो कूड़े के ढेर में जरूर बदस्तूर जंग खा रहा होगा ---यूं  अजीब है अपने को कभी-कभार बदत्तर और नकारात्मक सोचना जो ज्यादा देर नहीं ठहरता फिर लौटना यहीं -लौटकर हलकी आहट  के साथ नरम रौशनी में जमुनी फूलों का आँगन में निरंतर झड़ना अद्भुत दिखाई देता है जिसे अपनी आँखों से उन आँखों को दिखाना -चाहना इत्मीनान से भरी-सुलगती  - आँखों को ---फिर-सोचना-उस-आकाश-चमेली-के लम्बे  पेड़ को  जो झुका हुआ अपनी ही परछाई देखने में गुम रहता है ,सोचना ये भी की भूल जाना कितना अच्छा होता होगा एक दिन वो होगा-जब  वो सब जो सोचा है --भूल जानाहोगा  सब कुछ हमेशा के लिए अपनी चेतना में इस सोचे को सुनना और धूप छाहीं   हरियाली को आँखों में भर एक दूसरे पे उलीच देना उस दिन लगा जिंदगी इसी क्षण में सिमट गई है हम अगले क्षणों में साथ होंगे या सैकड़ों मील दूर दोनों को पता नहीं उस दिन शाम देर से आई और जल्दी लौट गई ---जैसे वो भी नाराज हो --कहना तो चाहती थी जिंदगी के सवालों का सामना करो --पर कहना आसान नहीं था ---


बीते तीन  दिनों से सूरज अपने पूरे तेवर के साथ तप रहा है जाने किसे जला-झुलसा देने की मंशा है कनेर के बोनसाई में पीले फूल शाखों पे खिलने के पहले ही   किनारों से स्याह हो झड़े जा रहे हैं --इक्षाएं उधर्वगति हो आकाश में घुल जाना चाहती है डूबता सूरज शाखों के बीच विरक्त भाव से डूबता ही जाता है --डूबता सूरज नहीं देखना चाहिए --अपनों से बिछुड़ना होता है थोड़ी देर में गाढ़े अँधेरे में पत्तों पर अभ्रक धातु सा कोई किस्सा चमकता रोशन होता जाता है दुनिया भर के शोर से अपने को बचने की खातिर एक छोटी कोशिश में एक हलकी मुस्कान चेहरे पर झुकती सी कांपती  हुई तेज दौड़ लगा जाती है एक केरेबियन गीत जोर से कानो में थर्राता है ---पता नहीं थोड़ी ही दूरी से ---उसकी धुन  शब्द अर्थ कुछ भी समझ नहीं आता -----
अब के गर तू मिले तो हम तुझसे ऐसे लिपटें तेरी काबा हो जाएँ [अहमद फ़राज़                   

बुधवार, 22 जनवरी 2014

मखमली ठंडक को छूते ही उदासी अक्सर पूछ लेती है ये क्या हाल बना लिया है तुमने अपना --मुझे आजाद करो तुम्हारे साथ सब कुछ अजनबी है ----खैर तसल्ली यही है दृश्यों में पहले सा सन्नाटा नहीं है


उसका चेहरा यकायक अब याद नहीं आता ना वो ना उसकी वो बातें और आता भी  है तो कहीं भी कभी भी फिर चाहे तालाब पर  फैलती सिकुड़ती रौशनी की  परछाई ही क्यों ना हो --उनमें भी --बस इस सोच के साथ एक अजब भाव उस पर तारी हो जाता  है  ---एक लम्बी सांस के साथ रूकना पड़ता है और देखना  तालाब की शेडेड रोशनियां कुछ नीली काली सी -- उसके ड्राइंग रूम के पर्दों की  तरह -जिन्हे रस्सी की  तरह बल देकर कभी पकडे पकडे वो उस तरफ देखती है-- कालबेल पर रखा  उसका हाथ -याद आता है  तो  लगता है कुछ था जो रोशनियों से भरा था  लेकिन क्या --सोचना पड़ता है और देर तक सुझाई नहीं देता --बल खाया पर्दा जोर से छोड़ देना पड़ता है जो खिड़की के एक हिस्से के टूटे कांच की  तिरछी दरार नुमा लकीर से होकर बेतरतीब हो फैल जाता है और पल भर को शीशों से छन कर अंदर आती रौशनी उसके चेहरे पर लहराती हुई जमीन पर फैल जाती है   अंदर की भटकन भी एक झटके के साथ कोने में जा सहम बैठ जाती है  ---मिल जाए वो शायद --सब कुछ नहीं बस उतना ही जो उसके हिस्से का था, एक निर्जन सपने में निमग्न होना और हर रात ये प्रार्थना करते हुए सो जाना हे ईश्वर आज कोई सपना मत भेजना ऐसा दुःसह --जैसा कोई नहीं एक सचेतन पूर्व ज्ञान समय की  गर्द - गुबार हटाकर स्पंदित होता है बहुत कुछ किसी रंग में ,किसी शब्द में ,किसी वक़्त में किसी मिलती जुलती शक्ल में और कभी तिनके-रेशे भर की  समानता में भी--- उसकी निगहबानी चाहे-अचाहे होती ही जाती है फैली हुई हवा 
की  शक्ल का बनना टूट जाता है -डूबते को तिनके-रेशे का सहारा वाली तरतीब भी साथ नहीं देती --एक मारक अहसास चाबूक की  तरह बे आवाज़ कुछ घटित करता है कोई ऐसा  दुःख जो ना घटता है ना हटता  है सिर्फ-एक निशान बनाता  है ----उसे एक सीधे रस्ते की दरकार थी, एक साफ उत्तर ----जहाँ कोई उलझन ना हो ----सोच की  एक लहर दिल दिमाग पर चढ़ने लगती है ----स्मृतियों का दरवाजा  बेवक़्त खुल ही जाता है एक कोलाज रास्ता रोकता है --जो मेरा था वो वक़्त दूर जाकर चिढ़ाता सा दिखाई पड़ता है तेज गति वाली किसी ट्रेन की  खिड़की से हिलते हाथ में रुमाल का धब्बे की  शक्ल में होते-होते आलोप हो जाना  ---एक क्षण के जादू का ताउम्र उसकी गिरफ्त में जीना ---देर रात तक कई बार नींद नहीं आती ---कांपती ठण्ड में नीले मखमली  कम्बल में  कुड़मुड़ाते बस पड़े रहो उस  मखमली ठंडक को छूते ही उदासी अक्सर पूछ लेती है ये क्या हाल बना लिया है तुमने अपना --मुझे आजाद करो तुम्हारे साथ सब कुछ अजनबी है ----खैर तसल्ली यही है दृश्यों में पहले सा सन्नाटा नहीं है बेडरूम से सटा हुआ बड़े बड़े भूरे लाल पत्तों वाला पेड़ खड़खड़ करता ---जागते रहो की  गुहार लगाता चेताता  रहता है, क्यों छूटता चला गया सब कुछ एक अव्यक्त भीतर ही भीतर बदलता है --अजब भाव से उन- इन चीजों को देखना अपनी पीड़ा में दूसरे की  पीड़ा को देखना उसकी --अपनी समझ की समय सीमा तय कर-लेना की  बस इससे आगे ना जानना ना समझना ---फिर भी भीतर का अकेलापन लहलहाता ही जाता  है कहीं भी जाओ ---हर कहीं साथ ----डोलता सा पीछे पीछे 
इस साल मौसम सर्द है अप्रत्याशित रूप से ज्यादा --इतने सर्द की  आदत ना हो तो क्या कीजिये ---नीले नीले अनमने दिनों में बजती हुई हवाओं के साथ पतझड़ का इन्तजार ---दुःख देता है और इन दिनों को हर साल ऐसे ही मुड़ते हुए देखना भी दुखी कर जाता  है --मन की  बैचेनी बारिश के बाद खिल आये जामुन- अमरुद के ताजे पत्तियों की  खुशबू में घुमड़ती ही जाती है तंग दिनों की  शुरुआत ---अब राहत देती है ---देखो अब हम कितना बदल गए हें --रोते नहीं--एक दूसरे तरह का हुनर अपने में विकसित कर लेना -- एक पेड़ का निर्लिप्त भाव स्मृतियों की  निरंतरता को बरकरार रखता है  अँधेरे में खड़ा अपने धड़ से कटा  पेड़ अपनी दो टहनियों के साथ विपरीत दिशाओं में फैला  एक काले  बिजूके की तरह  ठहाका लगता है --इतनी लाचारी इतनी असहायता एक प्र्शन खड़ा करती है-- लेकिन उस वक़्त वो बात ख़ास थी ---बिना तय किये ही तय की  जा चुकी शर्तें टूटती हें इतनी छोटी दुनिया में बहुत कुछ छूट जाता है स्मृतियाँ भी --अक्सर वो जुदा --दुनिया खफा --तुमने कुछ कहा शायद--मैंने कुछ सुना   हमारे अच्छे -सच्चे दिनों--का लौटना मुमकिन होगा-- कभी सोच में कभी सपनो में उम्मीद से अधिक उम्मीद आखिर क्यों --सड़क, दुकाने, आवाजें ,शहर --किसी शहर के  खूबसूरत नाम वाला वो मार्ग एक गंध कि तरह व्यक्त होता है --क्या सचमुच कोई उधर इन्तजार कर रहा है छूटा हुआ कुछ मिल जायेगा ये भी तय नहीं है बाहर कोहरा है बेहद ठण्ड है --हर वक़्त स्मृतियों की  यात्राएं बेठौर कर देती है कोई ठिकाना नहीं बचता ---एक घर बनता है जरूर लेकिन तुरंत धवस्त भी हो जाता  है और लौटना उसी टूटे फूटे में नियति बन जाती है --और  हर यात्रा को पीछे मुड़कर देखना अजीब है एक सीझा हुआ  सा  दिन, उन दिनों के पतझड़ के लिए प्रेम करने और भुलाने के लिए.मजबूर करता है  जीने के लिए आप कौन सी प्रक्रिया अपनाते हें आप पर निर्भर है और मुक्ति सम्पूर्ण जीने में शायद हो --वो जी कर ही अनुभूत की  जा सकती है ---हमारा समय कहाँ दर्ज है जिसमें किसी पत्ती  तक के गिरने की आहट  नहीं है ---तुम्हारा चेहरा कुछ कुछ याद आ चला है-तुमने फिर अपना कहा अच्छा लगा एक नदी -पहाड़ों के नीचे कछारों में - बहती हुई बढ़ती है ,गीले तिनको घास कागज सीपी शंख को ठेलते हुए उस तक, इस साल बारिश भी
ज्यादा हुई और इस मौसम में भी लगातार बारिश हो रही है --नदियों के उफान पर आने के साथ ही ----ये भी बीत जायेगा ---लेकिन कितना बचा रहेगा ये कौन जानता है -
--[होना है मेरा क़त्ल ये मालूम है मुझे --लेकिन खबर नहीं कि में किसकी नजर में हूँ ]

बुधवार, 24 जुलाई 2013

चंपा -----अपने सलोनेपन के साथ अपनी खुशबू बिखेरने और संजोये रखने में माहिर--

उस मोड़ पर जाकर छोड़ दो --मरे जिए की गाथा ---एक दोहराव,एक तिहराव में सिमटता है और उस मोड़ से आगे मूडकर दस कदम की दूरी पर चलकर एक छोटी सी पुलिया के किनारे आलीशान बने घर के रोड साइड बनी बाउंड्रीवाल में लहराता लाल चंपा का अधेड़ सा पेड़ --देखकर लगता तो है घर मालिक से उपेक्षित है ,टहनियां दिवार से टकरा कर जमीन की ओर बेतरतीब सी फैली दिखाई देती है --लगभग हर दिन सुबह -सुबह गुजरना होता है चंपा के उस पेड़ के करीब से ---बीच बीच में समय के अंतराल को भेदकर ढेर सी हंसी लाल चंपा के हर शाखा पर अलग-अलग गुच्छों में खिले फूलों पर हरदम खिलखिलाती सी नजर आती है ---रात में झड चुके जमीन पर पसरे फूलों को  चुनना और सुबह को खिले ताजे फूलों की डालियों को- आहिस्ता से अपनी और झुकाना फिर  पैरों को  थोडा ऊपर की और उठाकर हाथों से उन्हें तोड़ना,तभी चम्पा के नन्हे फूल शरारत से बेतहाशा खिलखिलाते अपनी पंखुड़ियों की सतह पर ठहरी ढेर सी ओस की बूंदों को चेहरे पर बिखेर देते हें वो ठंडक एक सुकून देती है उन्हें यू तोड़ना --दुःख तो होता है लेकिन फिर भी जमीन पर गिर कर मिटटी में मिल जाने से बेहतर है की वो मेरे साथ रहें और इस तरह उन्हें चुनकर साथ घर ले आना सुबह की सैर से लौटने के क्रम में निश्चित है 
हर दिन वो साथ आते हें --ड्राइंगरूम में चीनी मिटटी के गुलदान में उन्हें बड़ी तरतीब से सहेज लेना फिर दिन भर आते जाते उन्हें निहारते -उनकी खुशबू को आत्मसात कर लेना भी जीवन क्रम में शामिल  है ड्राइंगरूम की खिडकियों के शीशों पर काईरंग [बाटल ग्रीन ] के पर्दों से इस बारिशी मौसम में भी छानकर आती धूप में चंपा के फूल उन्मत्त हो उठते हें ---साल भर उदास रहने वाले चम्पा फूल बारिश में जीवंत हो उठते हें ,एक मौसम घर में पसर जाता है मानो --सुरमई पहाड़ों से उतरती -इतराती शाम हलकी धुप संग घर लौटने की ख़ुशी में हो ---पर शाश्वत का सुख कुछ  नहीं और अनंत भी कहाँ?---लौट जाओ उस तक --जिद्द ना करो प्रतीक्षारत हो जो तुम्हारे लिए --उसका प्रेम बनाएगा तुम्हे एक पूरा मनुष्य ---और लौटना ही होता है उस तक 
चम्पा कान में गुनगुनाती है मेरा भरोसा हांसिल करो और देखो मेरी और बेहद निस्संग और उदास दिनों को छोड़ दो पीछे ---जैसे फ़ेंक देते हो तुम सूखे मुरझाये चंपा के फूलों को बागीचे के किसी गमले में या कचरे के ढेर पर -और देखते हो उसमें अपना कल ---उम्मीद से ज्यादा उम्मीद सच बुरी आदत है ---चंपा के ढेर से फूल सन्नाटे के स्वर में घुलते हें एक बंसी की टेर में वो ---लेकिन वो चीजों को समझता ही नहीं ---मुखातिब हो जाती हूँ अक्सर यू ही चंपा से --तुम समझ जाओ शायद जुड़ाव का धागा बीच-बीच में टूटता है फिर जुड़ता है --पूर्णता के पहले टूटे हुए आलाप की तरह --देखो ना सुबह तक तुम्हारा साथ भी छूट जाएगा अब कोई एस मुकाम नहीं जहाँ तसल्ली मिले --बोलो क्या एक कतरा सुख हांसिल करना इस ब्रह्मांड में इतना मुश्किल है ----कैसे इतना खिलखिलाते हो चम्पा ---थोडा रुकना होता है शायद जवाब मिले ---जाओ सफेद चम्पा के पास तुम्हे वहां चम्पई शांति मिलेगी और संतोष भी --एक मन्त्र मुग्ध स्थिति और आँखें मूँद जाती है ....इस खालीपन में कितनी कोमल प्रतिध्वनित है तुम्हारी खुशबू 
उसे याद आता है एकांत पार्क में खडा एक कम शाखा वाला लोहे की बेंच के पीछे खडा इतराता सा  सफेद चम्पा --नानी के रसोई के बाड़े में खडा अनगढ़ चम्पा ,एक छोटे बोनसाईं पॉट में मजबूती से खडा मेरा पंद्रह साला सुगठित चम्पा,डा सुनीता शर्मा के लान में उदास खडा चम्पा --मां के कमरे की खिड़की से लगा खुशनुमा चम्पा -यूनीसेफ़ की कार  पार्किंग में खडा बूढा -छोटे छोटे फूलों वाला चंपा पेड़ ---अपने सलोनेपन के साथ अपनी खुशबू बिखेरने और संजोये रखने में माहिर --लेकिन पिता के हाथों सौ बिलपत्र के साथ शिवलिंग पर रखा  हायब्रीड चम्पा का वो दुधिया फूल आंखों में टंका  रह जाता है कहीं खुश तो कहीं उदास अपनी अपनी नियति में --एक तटस्थ भाव लिए गहरे हरे और लम्बे नुकीले चुस्त-दुरुस्त पत्तों में अन्दर के रिश्तों को बखूबी जीवित रखे हुए हें एक निरपेक्ष भाव से स्थितियों में सापेक्ष हो चम्पा खिलता ही रहता है ---भूल जाना और याद रखना अलस्सुबह लाल -सफेद चम्पा के फूलों को समेटना और नए दिन की शुरूआत  करना कितना सुखद है ---और अपनी अंश भर डाली से पुन एक भरा पूरा वृक्ष बन जाना --अपने जीवट लेक्टोजन [दूध ]से किसी भी मिटटी में आसानी से पनप जाना --जहाँ से टूटना [ कट जाना ] वहीं से फिर जीवन शुरू कर पाना बस तुम्हारे ही बस की बात है यूं अपनी खासियत की वजह से तुम ख़ास हो मेरे पसंदीदा भी ---तुम्हे गूगल सर्च करके तुम्हारे नामों और किस्मों के बारे में तो जाना जा सकता है पर तुम्हारी आत्मा और तासीर [प्रवृत्ति ] तक पहुंचना कठीन  है ---सिर्फ प्यार और नेक नियति से तय किया  जा सकता है कि चम्पा आखिर तुम कैसे हो --------

प्यार करते हुए
अपनी आत्मा को गवाह बनाना
और याद रखना
उगती पत्ती तुम्हें और झरती
तुम्हारे प्यार को बना रही है[अज्ञात]

रविवार, 19 मई 2013

सुनो माँ ----माँ माँ माँ अनहद नाद की तरह ,गूंजती हो ---यकीन है तुम मुझे सुन रही हो




सुनो माँ 
तुम थी, तो थी हरियाली 
और कोई जलन मालूम ना थी 
बीच यात्रा में छूटा  सा ----
तुम्हारा मौन ,अब भी आवाज़ लगाता  है ''बेटा ''
ढेर से शब्दों के बावजूद अवाक -हूँ 
माँ माँ माँ अनहद नाद की तरह ,गूंजती हो 
भीतर  -बाहर,उत्सव में दुःख में सुख में 
आस-पास ,हरदम नेह का नीड़ बुनती सी तुम 
महसूस होती हो 
तुम पास हो ,ये अहसास है 
इस कोलाहल में /इस शून्य में अपनों -अजनबियों में 
फिर भी शेष हो ,मुझमें  
मेरी इस दुनिया में 

माँ मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही हो 
स्मृति जल में डूबते-उतराते ,बीते कई सालों में 
सारे मौसमों में बीतती रही तुम 
तुम्हारे ना होने पर कई दुःख आये और चले गए 
कई सुख आये और -रह गये 
तुम्हारी देह गंध -अब भी साढ़ीयों के ढेर में ताजा है 
और उस चौड़े जरी के पाट  वाली हरी साढी में तो तुम  ज्यादा ही याद आती हो 
पहनती हूँ जब-जब तुम्हारा स्पर्श जीवंत हो उठता है 
इसके अलावा भी 
दाल के छौंके में ,आम की मैथी लौंजी में 
लाल मिर्च की चटनी में ,आटे  बेसन के लड्डुओं में 
खट्टी -मीठी सी तुम मौजूद हो 
हर पल परछाई सी होती हो पास,
हमारी छोटी उपलब्धियों पर हमें विशिष्ट बना देने वाली माँ 
तुम्हारे कुछ अनमोल शब्द /कुछ सीखें /सौगातें 
तुम याद आती हो ता बस आती हो 
पेड़ नहीं काटना /बाल नहीं काटना/गुरूवार को हल्दी का उबटन करना /केले के पेड़ को  पूजना 
सूर्य उपासना करना ---
मंत्रोचार की ध्वनि में 
तुम्हारे निष्ठूर देवी देवताओं को पूजती हूँ आज भी 
भरसक कोशिश करती हूँ उन्हें निभाना  तुम्हारी खातिर 
अक्सर रातों में जब नींद नहीं आती 
आसमान से एक तारा चुन लेती हूँ -मान लेती हूँ तुम्हे 
आँख भर आती है तब 
इससे पहले की कोई आंसू इस लिखे पर गिरे 
उससे पहले थाम लेती हो 
मुझे यकीन है
सुनो माँ 
तुम मुझे सुन रही हो 
 
[अपनी माँ की स्मृति में आज अभी सुबह[
May 12 -2013]
 अभी ये शब्द ...जो छोड़ गई हमें सात  साल पहले ]

रविवार, 3 मार्च 2013

सच में बावजूद हंसना फिर भी स्थगित रहता है -विक्टोरियन उपन्यास की तर्ज पर कभी कभी अभिभूत होना ...सर्वेश्वर की कविता का याद आना उसकी सौ कविताओं के साथ उनके बाद ....कितना चौड़ा पाट नदी का कितनी गहरी शाम'' वसंत में शुरू और ख़त्म हुए किस्से का वजूद बचा रहता है

  • मेन गेट खोलते ही मोबाईल ओन करना,समय देखना और फिर चलना शुरू करना ...तब से ठीक एक घंटा होता है उसके पास .अपने आप से कहना ,झुक कर शूज़ को एक बार पैरों में ठीक से महसूस करना -फिर चलना ,,रोजाना की आदत में शुमार है पाँव चलतें हें देह चलती है और मन तो जैसे पूरे बर्ह्माण्ड का फेरा लगा -लगा कर लौटता है कतारबद्ध डुप्लेक्स मकानों की की नेम प्लेट पढ़ते जाना ..सरस्वती शिशु मंदिर के आहते में बच्चों की समवेत प्रार्थना के स्वर,डा वसंती साहू गायनाकोलाजिस्ट  जेपी  हॉस्पिटल,आशीष जैन कार्डियोलाजिस्ट ,दीपेश यादव एडवोकेट अनिल सोनी मेकेनिकल इंजीनियर ..बीच में एक बड़ा सा मटमैला मकान बदरंग जंग खाए गेट पर बड़ा सा ताला ----ये मकान बेचना है आगे मोबाईल नंबर बीएस एन एल का ...सारे दर्शय नाम का पहाड़ों की तरह रटते जाना ..बेमकसद सडक पार करते ही सरकारी मकानों की लाइन .बस स्टॉप पर इस्कूली बच्चों के हाथ थामे मा-बाप।।एक हलकी उसांस के साथ तभी अपने को लुक आफ्टर करना पुरानी आदतों जैसा ..सब कुछ वैसा ही है कुछ नहीं बदला और शायद बदले भी नहीं ..अपने साथ ही किसी चीज को देखने फिर समझने की समझ को सहेज लेना ---स्मृति की दृष्टि का धुंधला जाना ,अपने को पकड़ने की कोशिश करना ,थोडा आगे बढना ..लेकिन कुछ चीजें रह गई,,लगता तो है उन्हें छुए बिना निकल जाना और हैरान होकर पलटना ,उन्हें फिर देखना -अन्दर कुछ रिश्ते अभी तक बने हुए हें  ताजा-तरीन -एक अतीत राग का छिड जाना ,दुनिया भर की ख़बरें अनगिन हलचलें -एक फेहरिश्त में कुछ कुछ कभी एडिट तो कभी हायलाईट और कभी अंडर लाइन होता रहता है पर क्या करें आसमान कितना नीला है दिखाई देकर भी अंदाजा नहीं होता  सच अविश्वास ही आदमी को पराया बनाता है रंगों को बदरंग सामने शाहपुरा झील है उस पार छोटी पहाड़ी जिसके नीचे  खूबसूरत मकानों,पहाड़ी के ठीक पीछे  से  सूरज निकलना ही चाहता है कुछ छोटे मोड़ और दूर तक जाकर बड़े घुमाव ..बेतरतीब पेड़ों पर धुप उतरती है एक आवाज़ हवा में तैरती है कैसा है जीवन इन दिनों ..और बेख्याली में कहना ठीक बिलकुल ठीक .टूटे हुए आलाप की एक शक्ल बन जाती है एक खालीपन ..एक बदली हुई तमीज के साथ एक बदली हुई दुनिया ..और एक ठोकर ---पिछले दिनों हुई बेमौसमी बारिश में भीग कर आधी  बोरी  पत्थर हुई सीमेंट ,ठीक वैसी ही ठोकर ,गिरते-गिरते बच  जाना और संभल जाना ,गिर जाने के अहसास से कमतर नहीं होता ,सांसों का तेज होना फिर मोबाइल देखना ओह पैंतीस मिनिट गुजर गए ठोकर का एक हल्का अहसास पेरों  में अभी भी बना हुआ है --कमबख्त लोगों को जाने क्या सूझता है खासे मकान को तुडवा कर फिर बनवाना ईंट फर्श कांच प्लास्टर का मलबा सड़कों पर पटक देना ,कितनी बातें कितनी यादें कोई कैसे ऐसे ही बीच सड़क पर छोड़ सकता है ,अपने से मुखातिब होना अब वो घर से करीब दो ढाई किलोमीटर दूर है कालोनी का ये एक्सटेंशन एरिया है कई नए अधूरे बने मकान ...स्मृतियों का भी एक्सटेंशन ..अगले मोड़ से लौटना ,तुम ठीक तो हो?ये कोई सवाल है पूछने वाला ..है तो सही ..बस अब लौटो घर ..देखो अपना चेहरा देखो आईने से हाल पूछो सही जवाब तो उसी के पास होगा ,पर आइना भी सवाल ना कर बैठे उस काल खंड में जिसे कुछ साल पहले उम्र के एक हिस्से में जिया गया हो कोई मुकम्मल जवाब  नहीं उसके पास कोई अफसोस नहीं ....घर के नजदीकी वाला मिल्क पार्लर दिखाई पड़ता है और वहीँ से मुड़ना होता है .मोड़ से आठवां मकान मेरा अपना एक वो ही तो है इन दिनों भी बाकी दिनों की तरह ढेर से जामुनी फूलों की लतरों  से सजा में गेट पर हरदम स्वागत के लिए आतुर ...अन्दर दाखिले के साथ ही सीढियों के ठीक नीचे वाशबेसिन के उपरी रैक से केटाफिल क्लीनसिंग लोशन को चेहरे पर फैलाना जामुनी नेप्किंस से चेहरा पोंछना ..आह अब चेहरा साफ है ..आईने के भीतर से खुश चेहरा दुहाई देता है हंसती रहे तू हंसती रहे ....मनसे किसी परत का उतर जाना किवाड़ों  को ठेलकर  वो लौटे वसंत सा इस बार भी कुछ लरजता है इत्मीनान की लहर सा कुछ ठहरता है एक उम्मीद की सूरत ...तब जरूरत से ज्यादा सोचना ,ये सोचना कि सुरक्षित रह कर धीरे-धीरे मरना कैसा होता होगा और फिर अधिक सुरक्षित होने की फिक्र छोड़ कर बेफिक्र हो जाना --पसीजी हथेलियाँ पीठ पर एक आद्र  भाव लिए  ---रुको रुको प्लीज़ डोंट बी इमोशनल ,तर्कों के जरिये अपनी इमानदारी से अपनी काबलियत की दाद दो ..वाकई तुम अलग हो सबसे,, खुशकिस्मती कहें इसे या?गायब हुई तिलिस्मी  चीजें कैसे बार बार लौटती हें ...सच में बावजूद हंसना फिर भी स्थगित रहता है -विक्टोरियन उपन्यास की तर्ज पर कभी कभी अभिभूत होना ...सर्वेश्वर की कविता का याद आना उसकी सौ कविताओं के साथ  उनके बाद ....कितना चौड़ा पाट   नदी का कितनी गहरी शाम'' वसंत में शुरू और ख़त्म हुए किस्से का वजूद बचा रहता है सर्दियों की शामे और रातें तो वक्त ही नहीं देती यूं  आती हें यूं  जाती हें कि बस उनका मुड़कर ओझल होना ही याद भर रह जता है फिलहाल दिन बड़े हें और राहत है लेकिन ऐसे कैसे दिन आये भी नहीं ,बीते भी नहीं,भूले भी नहीं,और खो गए किसी अक्षांश -देशांतर में दिक्काल के किसी कोण पर ना मालूम कहाँ ...वसंत का आना सेमल का दहकना बर्फ में दबी कविताओं वाले दिनों का पिघलना टहनी से बिछड़ी पत्तियों का नवजीवन बनना फिर सेमल के फूलों से फलियाँ बनना फिर उनमे गद बदी  रुई का भरना .हवा में एक गंध का फैलना धुंद और धुप के बीच चिड़ियों की उड़ानों का स्थगित रहना शाम का जाना रात का आना ...और छोटे-छोटे  सफेद सेल्फ  प्रिंटेड फूलों की ए लाइनसफेद  नाईटी में बहुत दिनों बाद खुद को हल्का महसूस करना ..तारों भरे आसमान के नीचे  छत्त  पर सुकून में मोबाईल के मेसेजेबोक्स में झांकना ,डिलीट करना बकवास ख़बरें ..दुनिया से बेखबर एक कतरा सुख की खातिर  आखिर कोई नाम तो चमके उसकी खातिर ...
  • हकीकतों का लाये तखय्युल के बाहर 
    मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाये [शमशेर ]

बुधवार, 7 नवंबर 2012

बहुत कुछ छूट जाता हैअक्सर,जैसे कुछ भले लोग, और बेरहमी से छूट जाता है बरसों का साथ


बहुत कुछ छूट जाता हैअक्सर  
जैसे बचपन ,जैसे जवानी ,जैसे कुछ भले लोग,
और बेरहमी से छूट जाता है बरसों का साथ 
वक्त से पहलेटूटकर गिर जाती है हंसी 
सन्दर्भों के बदलते ही प्राथमिकताओं की सूचि में कहाँ से कहाँ पहुंचा दिए जाते हें लोग 
कुछ लोगों से अपने गाँव की मिटटी छूट जाती है 
छूट जाते हें खेत खलिहान अमराई कुआं बावड़ी 
हाथों से हाथ ,नाते रिश्तेदार ,यात्रा के बीच पेड़ फूल पहाड़ 
बहुत से लोग जाते हें यात्राओं पर सभी कहाँ पहुँच पाते  हें
कुछ बीच में ही हो जाते हें दुर्घटना ग्रस्त 
तमाम शुभकामनाओं के बावजूद .
.कुछ चीजें छूट जाती अकस्मात और कुछ आहिस्ता आहिस्ता
 कुछ पहले और कुछ बाद में 
एक दिन खुद से ही छूट जाती अपनी मिटटी सी देह 
और अपनी ही आँखों में भरे जल को देखना
 अपनी ही आँखों से देखना भी नहीं रहता शेष
 लेकिन इससे पहले कभी कभी या अक्सर
 ये  छूटना अखरता है बेहद ...
लेकिन जो छूटता है वो छूटता तो है ही  


आज पहली दफे महसूस हुआ शब्दों के पार जाने मे सहायक होते हें शब्द ही  [ कैलाश पचौरी ] 

सोमवार, 10 सितंबर 2012

एक सफेद कनेर का फूल उसके नाम ..जीत लेना खुद को उसके लिए..खैरियत ओर राजी ख़ुशी का सम्बन्ध वक्त ओर मेरे- उसके बीच वजह बन जाता है .


  •  फिर से लिखा है आज हरे कागज़ के टुकड़े पर ,साथ,ख़ुशी,ओर भरोसा ,  अरसे बाद इक्का - दुक्का विस्मृत कोनो को,वो भरोसा जो मिला था, बिना मांगे ओर याद किया एक नीला सा धुंआ छाया हुआ बेवजही चुप्पी पर   एक गुलदाउदी चेहरा ..फिर से बादल, बारिश ओर उदासी.. ओर लौट कर जाती हुई....ना आती हुई बमुश्किल चंद सांसे. उसका चेहरा कभी कभी यूँ ही उचाट नजर आने लगता है आइना भी अक्सर झूट बोल जाता है, पर आईने से कोई  शिकायत नहीं जब दुनिया की हर चीज मनमानी पर उतारू हो जाये ...कुछ दुश्वारियां थी ..एक लम्बी फेहरिश्त थी,तेजी से गुजरती उम्र थी, संसार की इस आवाजाही में बसी स्मृतियाँ ,क्या सब कुछ याद रख पाऊं बस इसलिए भूल जाना होगा लेकिन कितना ओर क्या ...अपने हरेपन में मौसम की मन मर्जी के आगे हार जाना होता है ..खैरियत ओर राजी ख़ुशी का सम्बन्ध वक्त ओर मेरे- उसके बीच वजह बन जाता है ..आश्रम रोड पर ट्रेफिक में फँसी कार के शीशे को थपथपाते दो हाथ ...पानी की बूंदों से भीगी दो रजनी गंधा की टहनियां,जाने क्या सोच कर ले लेती हूँ,उस रात खूब महकी रजनीगंधा,ओर देर रात तक माय एफ एम पर ''जाने क्या बात है नींद नहीं आती.. गीत बजता रहा...मानों पांच साल से यूँ ही बज रहा हो .. .शायद इसी में बेहतरी होगी लेकिन ..क्या बेहतर होगा ओर क्या नहीं आपकी बेहतरी इश्वर से ज्यादा कौन सोच सकता है ..कनाटप्लेस के मंदिर समूह में बनी ब्लेक मार्बल की गणपति की मूर्ति के  आगे सर झुकता है एक आत्मीय  सूची में उसका नाम नए सिरे से फिर जुड़ जाता है, मंदिर की परिक्रमा एक गुच्छा फूलों का हाथ में लिए, एक सफेद कनेर का फूल उसके नाम ..जीत लेना खुद को उसके लिए ..कुछ चीजें ओर पसंद नहीं बदलती शाम हो आई थी, हर बार मेसेज अलर्ट ने निराश किया लेकिन उस  शाम का रवा डोसा बेहद लजीज था तो दूसरी ओर .शाम के समाचार में बारिश बाबत हाय अलर्ट ...
  •  उसने  ऐसा तो नहीं चाहा था,  आसमान स्लेटी अंधेरों में गुमसुम हो जाता है तमाम साजिशें यकीन को पुख्ता करती हेँ  .आज फिर लिखा है लौटकर अपने शहर में  तुम्हारे शहर के बादल को बारिश के लिए, पहाड़ों को नदिया के लिए, इन थरथराते शब्दों को चुम्बन के लिए ...सच उस रात सुबह तक नींद नहीं आई सुबह बारिश की नमीओर ठंडक थी दो घंटे यूँ ही एक ही जगह लेटे रहने का अपना सूकून था .कोई दुःख कोई ताप कोई खालीपन भी नहीं था...पूरा शहर पानी पानी था..मेरी जमीन भी डूब में थी ओर मुडे -तुडे सपने भी,,सीने में धडकते हुए  बस इक नाम भीगने से बच गया था ..दूसरे दिन हल्की धूप थी बड़ी उम्मीदों से नाउम्मीद होना तय था दिल ने कहा था ये  सच नहीं होगा वो जैसा तुमने चाहा ओर वही हुआ वैसा ही खैर .... उसे नहीं मालूम था,उसके  किस हथेली में धूप  थी ओर किसमें चांदनी ..जाने किसमें में कौन सा सपना रख दिया ..जल गया ...76 घंटे बाद दोपहर का सुनहरा ओर डूबती शाम की हल्की नीलाई- आसमानी मिलकर धूप-छाहीं हो जाते हेँ उसे बाएं हाथ की बीच वाली अंगुली पर भरपूर लपेट लेती हूँ ,थोड़ी ठंडक की उम्मीद ..राहत मिले ..शायद ..पहले ही दिन .कार के गेट में जल्दी बाजी में फँसी रह गई अंगुली .एक नीला सा दर्द ..आँख झिलमिला जाती है लोधी स्टेट की उस बिल्डिंग की नौवीं मंजिल तक लिफ्ट .बर्लिन के चार्ली स्कवेयर में तब्दील हो जाती है उस दिन भी यही हुआ था ..लापरवाही की भी हद है ...अपने को कोसने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं ..तब पचास हजार मील की दूरी भी तय हो गई थी ओर आज  महज पचास मील पर कोई विस्थापित हो  कर  रह  जाता  है ...उसकी डायरी में दर्ज ओर फाड़ दिए गए दिन ओर तारीखों में संयोगों से  सिमट जाते हेँ..कल -परसों आज -कल ...  जो उस तक नहीं पहुंचे ...ओर आज भी निश्चिंत नहीं हूँ कि लड़ने सुलह करने हंसने -रोने या राजी ख़ुशी जीने या डूब कर मर जाने के लिए क्या बचेगा मेरे पास ..आज फिर लिखने का मन है... कि एक छिला हुआ दिन, नील पड़ी वो अंगुली वो धूप छाहीं.. वो मौसम, वो शहर उसका, उनमें से गुजरते दिन रात उसके,  ओर बारिश में भीगा सफेद दुपट्टे का वो कोना ओर उसमें अटका बारिश में  रेशा-रेशा हुआ टूटा ओर उधड़ा सा  एक पीपल का पत्ता उसके शहर का देखो ना, साथ चला आया है अनायास एक जिद्द में ..जिसमें हम थे ओर जिसमें उलझी हमारी एक पूरी दुनिया ...कोई इस्तरी कोई शब्द कोई  लगन ओर जतन से .इन उलझनों पर करूँ .....वो पत्ता सफर करता है एक रात का सफर महज दो घंटों में आश्चर्य एयरपोर्ट से घर तक...मुझे सुनते देखते चुपचाप ..जिसने मुझे एक बूँद तक रोने ना दिया ..एक अकेलेपन में अपने आप से कठोर होना ..वाकई एक दूसरी ही तरह की नरमी में घुलमिल जाना भी था 

  • अजनबी शहर के अजनबी रास्ते मेरी तन्हाई पर मुस्कराते रहे 
  • में अकेला बहुत देर चलता रहा तुम याद बहुत देर तक आते रहे 
  • [राही मासूम रजा ]



 




मंगलवार, 14 अगस्त 2012

..सब कुछ उंचाई से नीचे की ओर धंसता ही जाता है ,९० डिग्री के कोण से नीचे देखना देह को थरथरा जाता है हवा के साथ बजते हुए कुछ शब्द दिल में घुसपैठ करते हेँ, बुध्धम शरणम गच्छामि

  • देर रात की अंतिम सौ  ख़बरों की आखरी खबर में मौसम विशेषज्ञों ने फिर तेज बारिश ओर तूफान की घोषणा की थी -हालाँकि झूटा निकला मौसम विभाग का अनुमान ,पिछले महीने ओर हफ्ते भर से मूसलाधार बारिश की वजह से अब कोई फर्क नहीं पड रहा था इस तरह के वेदर फॉर कास्ट से ..ओर मौसम की मासूमियत में घुली थी हर चीज रेशा-रेशा ,उसे मानों पता ही नहीं था की कितनी तबाही ओर तूफान आकर चले गये थे इस बीच ..फिर धूप भी निकली बड़ी मिन्नतों ओर मन्नतों के बाद, साथ ही उमीदों की खुली खिड़कियाँ से  सोच का गुब्बार बह निकला बाहर के मटमैले पानी संग ओर अन्दर सब कुछ पारदर्शी हो गया ..ऐसे में आसमान खुलता है पर लगता है ये सब थोड़े समय के लिए ही है ..ओर फिर एक मनमौजी बादल के साथ सफर की शुरुआत ,ख़ुश हो जाओ ..आश्वस्त करना अपने को ...जहाँ हम हेँ वहाँ से रौशनी कुछ ऐसे ही आएगी लगता है पीछे एक गरीब सूनापन ,पसरी हुई जड़ता एक बेगानापन अपने से निजात पाना चाहता है मुक्त होने का सवाल ही नहीं ,कोई दुःख है जो छीजता ही जाता है तुम्ही  बताओ? नहीं तो लिखो एक कागज़ पर लार्ज साइज़ में उसकी नाव बनाओ ओर छोड़ दो पानी की तरलता में कोई ठौर तो लगेगी, ना हो तो रफ्ता-रफ्ता गलते दुःख शायद राहत दे ...बस सोच ही काफी है, बेचैनियों की तरल छूअन उसे छू कर लौट आती है तब तक अस्सी करोड़ से ज्यादा बार उसे सोचा जा सकता है ..बहुत कुछ ऐसा था जिसे नहीं समझा जा सका ,कितनी आहटें ओर दस्तकें थी पर वही नहीं था, जो उसके लिए था किसी ओर के लिए संभव ही नहीं था एक ऐसा सच जो पानी में घुल मिल गये की तरह था ,इस बार भी लगा वह लौट आयेगा कई बार की तरह...बीते सालों में उसका इन्तजार मौसमों की तरह ही तो किया था  ओर सोचा  जियेगा बीते कल को फिर से ..एक छोटे से जीवन में नामालूम से रंग भी बुरे मौसम की आशंका से फीके हुए जाते हेँ एक धूसर दुःख चुप्पी साध लेता है जिसके पीछे का सुख एक धनात्मक उम्मीद जगाता है ..बेहद निस्संग ओर उदास शाम भी आखिर खींच-तान के, दिन के साथ बीत ही जाती है, इस बारिशी नमी में भी कुछ शब्दों को सुखा लेने का सुख अन्दर ही अन्दर शोर बरपाता है ,कतई नहीं हो सकता  --क्या? वो ,जो तुम सोचती हो, वैसा -हाँ क्यों नहीं ...अपने को भरमाने के अलावा हो ही क्या सकता है फिर भी सब कुछ उंचाई से नीचे की ओर धंसता ही जाता है ,९० डिग्री के कोण से नीचे देखना देह को थरथरा जाता है हवा के साथ  बजते हुए कुछ शब्द दिल में घुसपैठ करते हेँ, बुध्धम शरणम गच्छामि ...की आवाज..कानो से टकराकर लौटती है    शरीर  के साथ उंचाई से नीचे का डर,ओर डर के साथ धडाम से नीचे  गिर जाने  वाला डर होता है ,वरना तो ऐसा कुछ भी नहीं है ..ओर फिर आँखें मुंद जाती है,बजाय सामना करने का,  मुंदी आँखों से एक ठंडी साँस के साथ फिर से जीने की कोशिश --बस बचा लिया उसने वरना तो मर ही जाती --थैंक्स ,एक दिली थकान जुबां से बहार निकलती है उबड़-खाबड़ पहाड़ों से, दुःख से उबरना ,हमें लौटना होगा अपनी आबो- हवा में जहाँ हमारी चुप्पियाँ रहती हेँ जिनके बेहद करीब उसकी नर्म अँगुलियों ने खोज ली थी [लामायुरु]की सफेद पगडंडियाँ बस संग साथ की सोच से  उमीदों को  बल मिलता था,ओर कोशिशों से ,जहाँ अनाम  जंगली पेड़ों  की कंटीली गीली ओर चमकदार पत्तियों में धंसी धूप खिलखिल करती अचंभित करती है अब भी ...
  • लामायुरु लदाख की समृद्ध विरासत का सबसे प्राचीन ओर सर्वाधिक महत्वपूर्ण बौद्ध मठ....

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

.है ना हैरानी? तेज रफ्तार वक्त का, गति निरपेक्ष हो जाना ..इस समय में पिछले समय का ठहर जाना स्लेटी शाम का हँसते ही जाना. बाहरी अँधेरे में एक सनातन भिक्षु मन की बंटी हुई दुनिया में डोलता है


  • उसकी आवाज़ पिघल कर बारबार  गीली होती जाती है.लेकिन कोई सुनने वाला नहीं अपनी ही आवाज़ उसे छिली हुई लगती है .यूकेलिप्टस की नुकीली पत्तियों से छनकर आती लहराती गीली हवा राहत देती है विक्स वेपोरब सी ठंडक ओर खुशबू दोनों . लगातार  होती हुई बारिश में पत्ते जमीन पर फैली काई  के साथ सड़ जाते हेँ ओर उनकी मामूली कसैली गंध जुबान की सतह से होती हुई  दिमाग पर छा जाती है पूरे घर में इन दिनों गीलापन है दीवारों की नमी दिमाग पर भी निशान छोडती है,चीजों में वो बात नहीं जो अक्सर खुशक मौसम में हुआ करती है एक तो मौसम की मार दूसरे वैसे भी इन दिनों दिल दिमाग का सुकून छीना हुआ है ...लगता है मेरे शहर की बारिश उसके शहर पहुँच जाए दिल से दुआ करती हूँ आजकल वहाँ वैसे भी सूखा है एक चमकीला चेहरा दिमाग पर असर करता है टैरेस पर  खड़े होकर देखो दूर तक जहाँ नजर जाती है एक शमी का पेड़ झूम झूम कर लहराता ख़ुशी जाहिर करता दिखाई देता है रात हुई मुसलाधार बारिश के बाद पत्ता-पत्ता धुला ओर साफ.. उन के सर से काले सिलेटी बादल गुर्राते गुजरते हेँ तेजी से... उनका शोर कानो को दुखाता है, डराता भी है. बारिश की बूंदे चेहरे पर पड़ती है आंसू ओर रोना मानों पानी के साथ घुल-मिल जाते हेँ चलो कोई जवाब तलब नहीं करेगा  नीचे की तरफ देखो पानी की मोटी सी लहर दूसरे किनारे से बहती हुई सड़क पार करती दिखाई देती है ..जिसमे तेजी से घास  तिनके मरे हुए पत्ते एक दूसरे से उलझते से बहते ओझल होते जाते हेँ, ये कल्पना ही तो है ...कुछ किसी बड़े से पेड़ के तने- तले  वहीँ खाद हो जाने को मजबूर हो जायेंगे ओर कुछ किसी बड़े नाले या तालाब के मुहाने पर जाकर ठिठक कर पीछे मूड कर सोचेंगे ...एक जीवन था,जो  कैसे बीता ...साथ छोडती लहर सी टूटती इक्षाएं मुंडेर पर इधर-उधर फैल जाती है शाम उतरने को है दोपहर से लगातार हुई बारिश शाम होते होते अपने पीछे एक गीली उदासी का इंतजाम कर जाती है ..कोई अन्दर के धुंधलके को पछारता है,ओर बाहर की ओर बुहारता है शाम को आखिर बीतना है ओर वो बीत जाती है यूं कुछ ना कुछ को तो बीतना ही है बस एक मुकम्मिल स्मर्ति ठहरी रहती है रात शुरू होना चाहती है ...नींद में डूबे शहर के अँधेरे में जहाँ पिछले आठ घंटे से बिजली गुल है ,एक कोने में सिमटा सिकुड़ा रौशनी का टुकडा पानी में सराबोर चमकता है .
  •  .है ना हैरानी? तेज रफ्तार वक्त का, गति निरपेक्ष हो जाना ..इस समय में पिछले समय का ठहर जाना स्लेटी शाम का हँसते ही  जाना. बाहरी अँधेरे में एक सनातन भिक्षु मन की बंटी हुई दुनिया में डोलता है  कई डर सताते हेँ  एक साथ .दरवाजों पर नीले परदे कांपते हेँ सचमुच सच सा लगता था वो साथ अब छूट जाता है ओर फिर ..इस घटाटोप में कोई हाथ थाम लेता है .कहने को बहुत कुछ था तब भी अब भी दरअसल एक पूरा भाषा विज्ञान था ओर कहने के खतरे भी नहीं थे, उँगलियों में गंध का टुकडा लिए, लेकिन हम सोचते रहे संबंधों की बड़ी डोर से धरती ओर आकाश को बाँध लेना एक ही संवाद को दुहराते जाना ओर यह सोचते जाना की डूबने से पहले पानी के बीच किसी स्निग्ध  फूल की तरह खिला था वो वक्त.. वो पानी पर घर उसकी ख्वाहिशों का घर था ....बारिश फिर बरसना शुरू करती है कुछ बूंदे बालों पर कुछ गालों पर हथेलियों से उन्हें रगड़ कर वो चेहरे पर फैला देती है एक ठंडक स्पर्श से दिल में पहुँचती है  पार्क के दूसरी ओर की कालोनी में स्ट्रीट लाईट जल उठी है ....यहाँ भी पल दो पल में सब कुछ रोशन हो जाएगा पर लेकिन चमकदार पानी का चेहरा फिर भी स्याह ही रहेगा धूप निकलेगी कई दिनों की बारिश के बाद ..शायद कल 
नदी नहीं पीती अपना जल ,पहाड़  नहीं खाते कभी अपनी हरियाली,कोयल नहीं कूकती कभी अपने लिए तब हम किसके लिए जीते हें[रमेश अनुपम ] 

सोमवार, 14 मई 2012

.जैसे बीच यात्रा में छूटा हुआ मौन ,जैसे किसी निगूढ राह से मानों बीती हुई एक शाम ,बीत गई माँ ...हर दिन मुझमें शेष रह जाती हो ''माँ''

इंद्र धनुष के जितने रंग माँ के उतने शेड्स ,जब माँ थी तो जीवन में जल की तरह घुली हुई थी ...तब कोई जलन ना थी,वर्षों पीछे छूटे हुए समय को देखती हूँ तो इस समय से कुट्टी कर लेने को जी चाहता है --जहाँ तक पंख ले जाएँ बचपन से तब तक, जब तक माँ साथ थी ,लौट जाने को भी मन करता है ,माँ के साथ  बीता जीवन ..पल पल को शब्द देने का भी मन, कितनी बातें हेँ याद करूँ तो जीवन कम पड जाए ,,,माँ थी तो हरियाली अपने हरियाली पन में उनका प्रेम अपने प्रेमपन में उत्कट था ओर जिसकी कोई सानी नहीं.. तुम्हारी चिठ्ठी, लिखावट आवाज इश्वर से मांगी हुई प्रार्थनाएं हमारी  खातिर मांगी हुई शुभकामनाएं सब ज्यों की त्यों सुरक्षित है मुझमें लेकिन शर्मिन्दा हूँ जब तुम थी तो अपने संसार में गुम थे हम तुम हंसती थी, कहती थी.. संसार ऐसे ही चलता है ओर अब  ...अब तुम अपने संसार में हो  लेकिन सन्नाटे के स्वर में ..जैसे बीच यात्रा में छूटा हुआ मौन ,जैसे किसी निगूढ राह से मानों बीती हुई एक शाम ,बीत गई माँ ...हर दिन मुझमें शेष रह जाती हो ''माँ''यूं तुम्हारी स्मृति ताज़ी ही बनी रहती है रास्तों के उंच-नीच से आगाह करती ऐसा नहीं वैसा करो यूं नहीं ऐसा, रूको -चलो ---कितनी बातें कितने आदेश कितनी डांटें-फटकार ..कितना दुलार कितना प्यार माँ के ''बेटा '' बोले हुए शब्द का कोई मोल नहीं जब भी ठोकरें खाती हूँ इस उबड़-खाबड़ में तुम्हारी अनमोल सौगातें सीखें कानों में गूंजती हेँ बस लगता है यहीं पास ही तो हो कभी सपनो में तो कभी किसी अन्य की शक्ल में कभी किसी की आवाज में ओर कभी कच्ची कैरी की सुगंध में तुम अटी पड़ी रहती हो .माँ तुम्हारी देह गंध अक्सर दाल के छोंके में, तो कभी आम की लौंजी में, मेथीभाजी में. पोंड्स क्रीम में, बेडशीट्स के फूलों के तारों  में गमकती है. ढेर से शब्दों के बावजूद में अवाक हूँ अपनी पूरी रागात्मकता पूरी लय के साथ बात करना चाहती हूँ.. तुमसे ..ओ इन दिनों तो मोगरा बहुत खिला है उसकी खुशबू में तुम याद से भर जाती हो तुम्हे पसंद था मोगरा माँ बस इस लिए इन दिनों गाहे -बगाहे टांक लेती हूँ में भी बालों में मोगरे का गजरा ...तुम्हारी याद आती है तो बस आती ही चली जाती है, कितने ही दिन बीतते जाते हेँ रास्तों से गुजरते हेँ, मोड़ आते ...मुड़ते हेँ हर सुख में हर उपलब्धि पर ..पीठ पर तो माथे पर तो अक्सर ही सीने पर तुम्हारे  स्पर्श जीवंत हो उठते हेँ 
 हर ठोकर पर हर दुःख में बस, माँ माँ माँ अनहद नाद की तरह एक आवाज बजती है भीतर-बाहर ..कुछ नहीं अच्छा लगता माँ जब तुम याद आती हो .ये .टी वी ना बक झक करते रेडियो ना संगीत ,ना सारी दुनिया से जोड़कर रखने वाला कंप्यूटर ....काश तुम्हारी दुनिया से भी जोड़ देता, ना मिलती तुम कोई बात नहीं..एक क्लिक पर  तुमसे बातें ही हो जाती. कोई ऐसी लिस्ट होती जिसमें तुम्हे ढूँढ ही लेती ..समय के साथ बदलती चीजों ,रिश्तों, प्रेम से भी तब कहाँ फर्क पड़ता ..देखो माँ- में तो तुम्हे बेहद याद करती हूँ ओर आज सुबह अखबारों में, कंप्यूटर में, मोबाईल में आये  ढेरों मेंसेजेस में ...''माँ'' शब्द दुखी कर गया तुम ज्यादा शिद्दत से याद आती गई ...माँ तुम याद आती हो तो बस आती हो ..सुनो माँ मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही हो.. एक लड़की के लिए माँ क्या होती है  माँ ही जान सकती है ..आज तुम्हारे जैसा पोटली पुलाव बनाया देसी घी में भुने हुए चांवलों की खीर पूरे घर की डस्टिंग की, धूल से तुम्हे नफरत थी ,तुम्हारी दी हुई सुनहरी पाट की जामुनी हरी जामदानी  साढ़ी पहनी तुमने उसे पहना था जब ओर मुझे अच्छी लगी तो, तुमने उसे मुझे दे दी थी यह कह कर बहुत भारी है ...तुम पहनो बहुत जतन से संभाल कर रखा है उसे . तुम्हारी देह गंध अब तक ज्यों की त्यों उसमें बसी है .माँ तुम जैसा ही बनने की कोशिश करती हूँ पर नहीं बन पाती अब अपनी कामनाओं भरे संसार में अपने ही भीतर निमग्न होते आकाश में तुम दिखलाई पड़ती हो जहाँ बीच में खड़ा चतुर्थी का गोल चाँद टोक देता है, रोक लेता है.. रूको आज तुमसे बात करने को जी चाहता है.आज उपवास है तुम्हारा वो पूछता है पूजा ठीक से की .कोई गलती ती नहीं की ...वो प्रतिनिधितत्व करता है तुम्हारा ..उत्सव से हफ्ता दस दिन पहले शुरू हो जाते थे उत्सव घर में ओर अब कितने फीके-फीके से हेँ सब त्यौहार. कितना व्यापक उत्साह था तुममें माँ,ना कभी थकती ना रूकती ना शिकायत,बस दौड़ी दौड़ी हम लोगों की खातिर कुछ भी तो नहीं लौटा पाए तुम्हे .....आज का दिन उदास ओर चुपचाप है रात बीतने में वक्त है तुम्हारी आहटें इस भीढ़ में भी सुन पाती हूँ तुम्हे कौन ले गया हमसे दूर ...ओर छोड़ गया यहाँ एक निर्मम तटस्थता...बुक शेल्फ में तुम्हारा फोटो रखा है तुम्हे किताबें पसंद थी ,देखती हूँ जब जब तुम्हे, यकीन हो जाता है तुम पास ही हो ...बीते कितने बरस तुम्हारी देह के चारों ओर समवेत प्रार्थना के वे शब्द कानो में गूंजते हेँ साँसे रूक रूक कर चलती है .मोमबत्ती की लो की तरह जलती-पिघलती देह हमारे सामने देखते-देखते ही गुम हो गई 
दो सितम्बर २००५ की वो दोपहर गणपति अथर्व शीर्ष ओर  विष्णु सह्श्त्र नाम का पाठ करते करते आवाज छिल गईथी उस दिन,  तुम्हारा चेहरा ओर मुंदी आँखें ओर काया रह रह कर काँप उठती थी तुम्हारे निष्ठुर देवी देवता ..ओर हम बस देखते रह गये बीच रात माँ तुम चली गई ...तुम्हारे सामने उस दुनिया के बहुत से जरूरी  काम थे शायद,...तुम्हारे जाने के बाद कई दुःख आये -गए, कई सुख आये ओर रह गये पास... ओर अब उन्ही शेष सुखों में शेष हो मेरे भीतर,[अभी भी रह गई हेँ कई बातें.].

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

मुख्त्सिर सी बात है




मुख्त्सिर सी बात है वो गर्दन को थोड़ा उंचा करके ओर आँखों को कुछ ज्यादा ही सिकोड़कर फिर पलकों को जोड़कर थोड़ा खुला रखकर पूरे चेहरे का मुआयना करता है उसकी आँख नाक माथा ठुड्डी होंठ  ओर होंठों के बायीं तरफ गोल तिल फिर गर्दन को छोटे-छोटे टुकड़ों  में फोकस करता है अपनी पनीली नजरों से वो चेहरे के हर अक्स को दिल में उतार लेना चाहता है उसकी डायरी में दर्ज वक्त समानांतर नहीं चलता उसकी कोहनी के ऊपर खरोंच का निशान, वो रूकता है..जाने क्या सोचता होगा अपनी नजरों को वो निशान पर ले जाती है पूछे तो बताऊँ कैसे मोबाईल की रिंग बजते हुए वो दौड़ी थी उस दिन इस उम्मीद में के उसका  ही फ़ोन होगा ओर दरवाजे से कोहनी जा टक राई सीधे- -सीधे कोहनी की हड्डी में चोट ओर घसीटते हुए अपने को बचाने में ये खरोंच लम्बी सी ओर फोन भी अननोन उसका भी होता तो चोट सार्थक हो जाती ,वो असहज होती है... जाने क्या दिल में उतरता है ..ओर फिर आहिस्ता नजर उसके हाथों ,उसकी अँगुलियों पर जाते हुए डायमंड रिंग पर ठहरती है ..अनामिका में मोती पर ओर यहीं उसकी नजरें यकायक रूक जाती है ओर अपना हाथ वो उसकी अँगुलियों में फंसा देता है...आसमान में उडती उडती कोई पतंग स्थिर हो गई हो  जैसे ,अब उसकी आँखें मुस्कराती है वो यकीन कर लेना चाहता है अपनी खुशी का लेकिन उसकी चुप्पी से एक कोफ्त महसूस होती है वो, वो सब कहना चाहती है पर नहीं कह पाती..क्योंकि कहे का कोई फायदा भी नहीं  उसका बहुत कुछ जाने बिना भी काम चल जाता है, पर वो ऐसा नहीं कर पाती..चाह कर भी ..वो अपनी काली टी शर्ट की कॉलर को उंचा उठाकर अंगूठे ओर तर्जनी से मोड़ देकर छोड़ देता है ..हाथ से हाथ छूट जाता हैउसकी सुनहरी  हथेलियाँ आँखों में बस जाती है, आँखे फिर जाने क्या खोजती सी अब उसका ध्यान शायद रंगों की तरफ है.एक सरसरी तौर से  वो रंग चुनता है.. नजरें बचाकर, हम दोनों के बीच कोई नहीं.. ब्लेक-रेड प्रिंटेड शिफोन साडी पर उसकी सतही नजर दौडती है- लेकिन दिल में उतरती है ब्लेक कोफी  की एक चुस्की रेड ब्लाउज  के भीतर तक नर्म थोड़े गर्म  अहसास की तरह फैल जाती है ....
 ओर बाहरी दुनिया से टूटा ये रिश्ता अकथ की गहरे के दो छोर बन जाते हेँ, सहसा लगता है वो अकेला पड गया है .सामने दो लड़के काफी की चुस्कियों के साथ लगातार बहस करते हुए ..एक उडती सी नजर उस लड़के से मिलती है ..एक अनजाना भाव ..शीशे के पास कोने की दीवार के वो सामने हेँ कैफे काफी में दोपहर की धूप शाम की धूप में तब्दील हो रही है लड़के की पीठ पर टी शर्ट पर लिखा सेव वाटर ...पढ़ना ओर उस पर  नजरें दौडाना मजबूरी बन जाता है पानी से याद आता है उसके लिखें में पानी की सूरत कितनी अलग कितनी जुदा कितनी मीठी..उसकी कविता याद आती है जिसमें पानी का ज़िक्र है यकीन करना मुश्किल होता जाता है की वो ऐसा भी लिख सकता है ...शीशे के दूसरी ओर एक खूबसूरत कम उम्र  लड़की अपने बॉय फ्रेंड के साथ चहकती ही जाती है कभी ख़त्म ना होने वाली हंसी. वो भी कहना चाहती है,चहकना चाहती..हंसना चाहती है उसके स्पेस में ..पर ये मुमकिन नहीं ..उसके मूड पर डिपेंड करेगा ...ओर उसका मूड जान पाना कोई आसान नहीं  उस लड़की की तरह..हंसना... लेकिन एक मुहाने पर आकर रूक जाता  है एक  वाक्य, जिन्दगी के सारे रास्ते उस तक आकर ही क्यों ख़त्म हो गये एक अनवरत अनुभव अपने सपने तोड़ने का ...वो निश्चल निगाहें गडाए उसे देखता है मानो कहेगा  अभी वो सारी उम्र प्रतीक्षा करेगा .लेकिन कहता नहीं ..वो आँखों में उभर  आये पानी को रोक लेना चाहती है अब कहाँ देखूं ,उसकी तरफ या सडक पर गाड़ियों की आवा-जाही, वो गाड़ियों पर भी ज्यादा से ज्यादा फोकस नहीं कर पाती अब उसका ओर मेरा साथ अधिक से अधिक दस मिनिट का ही है ...उंह ठीक है जो वक्त जो साथ मिला है वही सही ..वो मोबाइल की जलती बुझती रौशनी में कहीं गुम है..मोबाईल को थोड़ा झुकाकर बात करना प्रायवेसी रखना उसकी आदत है जब तक ना पूछो जवाब नहीं मिलेगा उसे पसंद भी नहीं कोई दखलंदाजी  .क्या बात करूँ ..बातों का सिरा फिर से पकड़ने की कोशिश --पूछती हूँ --जवाब मिलता है ..हाँ लेकिन इतनी जल्दी नहीं ..तो आधा घंटा वो साथ को सूकून से बिताना चाहता है और वो रोना चाहती है ..लगातार जमते हुए तलछत्त में जमते ही  जाना..अँधेरे का काला घोल उसकी आवाज में जम जाता है शब्दों में धवनि  भी नहीं बस पल-पल बीतता है अपने पूरे पन के साथ क्या यहूदियों की कहावत कारगार साबित होगी इश्वर के सामने रोओ ओर मनुष्य के सामने हंसो पर कैसे -किस तरतीब से ...सोचते ही एक गहरी ऊब से उसका मन भर जाता है ओर छोटे-छोटे सूत्रात्मक संवाद उनके बीच शुरू फिर --ख़त्म होते जाते हेँ अब फिर उसकी आँखें छोटी होती जाती है ..वो कुछ खोजता है -जोगी से उसके चेहरे में क्या है ? नहीं मालूम लेकिन कुछ जरूरहै.. जो  उसकी समझ से परे ..लगा मानो वो झुका ओर झुक कर पानी की सतह पर झांका .उसका  ये झांकना ही तो अजीब सा है 
त्वचा के भीतर तक..उत्फुल्ल आवाज में'' कोशिश करता हूँ कल मिलतें हेँ'' .जो वो कहता है कितना सच होगा कौन जाने ...लेकिन हर सच, सच कहाँ हो पाता है .रगों में भरती...जाती आवाज.लेकिन .फिर भी  वो सोचता होगा इस पर विश्वास करूँ ,ये मासूम है या बस यूँ ही... फिर वो अपनी सोच  को आधा-अधूरा छोड़कर कांच से  परे गौसिप  करती कमसिन लड़कियों की ओर लौटा लाता है --लेकिन नहीं, ये वो कतई नहीं सोच रहा शाम का प्रोग्राम..अब  उसके होंठ  स्थिर से लगते हेँ .जो पहले बुदबुदाते से थे ..सडक की तरफ से एक कार तेजी से निकलती है उसके खुले से शीशों से शाम का उदास गीत बजता हुआ सुनाई देता..एक शोर  सा गायब हो जाता है ''मुख्त्सिर सी बात है'' ... राग भरी पीड़ा हवा में फैल जाती है उस पीड़ा से उस गीत से, कार चालक को कोई लेना देना नहीं लगता ..एक उचटी सी नजर उसपर ..उसने सुना ही नहीं यकीन हो जाता है. उसी एक ही समय में ढ़ेरसी चीजों-वीजों..का एक साथ भीतर-बाहर होना अटपटे पन  की हद में --कुछ कहने के पहले का सोचना ओर भीग जाना खाली पन में खाली मन का दौड़ पडना..जब याद आयें तुम्हे हम --नहीं-नहीं  कौन याद करता है..एक बार छूट जाने के बाद किसे फुरसत है इस आपा -धापी वाले समय में, वो नाराज ना हो जाए ये डर भी तो अक्सर साथ ही रहता है उसके पूर्व अनुभव चेताते हेँ ..नहीं ये मत बोलो ,वो नहीं,ऐसे नहीं.वैसे नहीं --वो रूक जाती है  
वो हर जगह कुछ खोजता है एकदम बे- मतलबी ..खोज लगती है उसकी ..अरे यार कितना वक्त कम है हमारे पास ये क्या कहाँ  ध्यान है तुम्हारा...कहना चाहती है वो  नहीं कह पाती ...कैसे शब्द ठूठ हो जाते हेँ एक सर्द ना गर्म हवा का झोंका रोक लेता है टोक देता है ..पल्लू को सीधे हाथ से बाँई ओर  बेवजह कन्धों की ओर तरतीब से ठीक करना ..सब कुछ ठीक-ठाक है बस एक आदत के तहत हाथ वहीँ पहुँच जाता है ...जो जरूरी भी नहीं ..जरूरी तो ये शाम भी नहीं थी जो गुजर रही है उनके बीच ...ओर उसकी उपस्थिति दर्ज हो रही है सालों में...वो लेवेंडर कलर के एक फूल को याद करती है ...जो उन दोनों की आँखों ने देखा था एक साथ  क्या वो दिन वो फूल वो वक्त याद आयेगा उसे ..इस शाम के साथ ...यादों की फेहरिश्त  में जुड़ेगा उसकी क्या?ये लम्हा ...उसकी जिद्द उसकी आँखों से  झांकती है ओर हाथ से छूटी अंगुलियाँ सिगरेट थाम लेती है..सिगरेट से कुछ चिंतित कश वो लेता है होटों को गोल करके उसकी वो शक्ल जीरोक्स हो जाती है अन्दर ओर हर दिन उसकी कमसकम बीस पचीस कापियां बाहर आती जाती है ना चाहते हुए भी जीरोक्स तो ओर भी बहुत कुछ हुआ था किस-किस का हिसाब दूं  उसका हाथ , हाथों में था ओर नजरे झुकी हुई .एक साहसी पल कंपकपाता हुआ ..
.कितना धुआं फैल रहा है.. वो आँखों ही आँखों से लापरवाह बने  रहने का भ्रम फैलाना चाहता है ..ओर वो ..वो अन्दर ही अन्दर सतर्क रह कर अपने समर्थन में बुलंद होना चाहती है ..नाउमीदी की सूरत में उसने उसी वक्त सोच लिया था जो नहीं कह पाई वो एक लम्बी चिठ्ठी में कह देगी... इतिफाकन उसकी आवाज उस दिन सर्द थी. ओर उसे अपने हिस्से की पीड़ा मिली थी, कुछ सालों पहले तक अपनी जड़हीनता  में वो कितना ख़ुश थी ...शाम हो चली है सपाट सा लगता जागता वक्त दौड़ रहा है चुप्पी कड़े -गहरे अँधेरे से भी ज्यादा कड़ी लग रही थी उस वक्त उसका  दिल  डूब जाता है ..अक्सर होता यही है की एक से, दूसरा नाखुश नाराज़ होने का अधिकारी हो जाता है एक सुबकी मन से बाहर आते आते रूक जाती है ..उसे रोकना ही होता है ...रोने से उसे नफरत है ओर रुलाने के सारे उपक्रम उसे आते हेँ ..जीवन से विरक्त ग्यानी की तरह किसी  टूटन को मन ही मन छुपाते हुए .वो मुस्कराता है आस -पास की तमाम चीजों में अपने को खपाते ..आने वाले दिन का दवाब वो शायद महसूस कर रहा हो ओर चाक हुआ जाता सारा वक्त ..बेरहम हो छूट जाता है... ओर वो क्या करे? निरुपाय .चाहती है .धीरे-धीरे बटोर लेना उसकी दुनिया,संभावना ख़त्म और  घंटे भर में रात उतर आएगी ..उस दिन उसकी हथेलियाँ पनीली थी ओर आँखों में एक जंगल ,बातों में एक बेतरतीब उंचा-नीचा पहाड़. लगा उसकी हथेलियों पर हाथ रख कर कोई वादा ले ले, या रोक ले ..या अपने उमड़े हुए आंसुओं से उसकी हथेलियाँ भर दे ..पर सोच ओर चाह में कोई ताल-मेल नहीं हो पाता... मन में उसके  ...किसी बात को लेकर लगातार जिद्द थी हवा चुप,रौशनी चुप,पेड़ चुप सिर्फ उतरती धूप के साथ कॉफी  की कड़क महक अपनी उपस्थिति के साथ मौन ओर हतप्रभ थी ...अडतालीस महीने बीस दिन बाद.. मुसीबत जदा वक्त से बाहर आने में कितनी मुश्किल हुई होगी अब उसे कौन बताये...भीतर कोई शीशा चकनाचूर होता है उसे आवाज तक सुनाई नहीं देती ...उसकी कॉफी  ख़त्म वो अपनी दोनों बाहों को समेट कर एक दूसरे में लपेट कर इत्मीनान से बैठ जाता है ...एक खालीपन की पूर्ति सी करता हुआ , सामने कोई हडबड़ी नहीं वो अब अपने पांवों को भी फैला लेता है ...मानो जिन्दगी यही गुजार देगा संग .बसा लेगा एक घर... हवा पानी रौशनी से भरा ..स्मृति के गलियारे से गुजर कर बारह साल गुजर जाते हेँ खोजना पाना खोना ,,साँसों के अन्दर तक उसका नाम धूप  छाँव सा झिलमिल होता जाता रहा ..क्या वो जान पायेगा कभी ?शायद नहीं, समय का फैसला मन तो करता है कह दूं  तुम ही  जीते क्या हांसिल हुआ इतने साल यूं बेखबर रह कर.. पर इतना छोटा समय था इतना कम की कोई ओर गुंजाइश ही नहीं थी ...आत्मा के पार तक उससे मिलकर हर बार पुनर्जनम हुआ हो ऐसा ही तो लगता  रहा .लगता है उससे कह दिया जाय पर ये एक कोरा ओर लिजलिजा वाक्य बन कर रह जाएगा उसके लिए वो जानती है ..कुछ बातें रुकते-रुकते भी हो जाती है..लेकिन इस छोटी सी बची खुची जिन्दगी में कुछ बातें ..ना रुके हुए ..होते-होते ही  हो जाये तो ..लेकिन हो तो सही अब कॉफी  ख़त्म...अलसाया सा वो उठता है ..अब आप क्या कर सकतें हेँ ..उठना ही होगा वो अपनी कार की तरफ सिर्फ दस कदम . कैफे काओफी  के .आहते में एक ताजा सा हरा पत्ता  शाख से बिछुड़ा  गुडी-मुड़ी होकर उसके क़दमों तले लहराता हुआ दिखता है लेकिन वो देख भी नहीं पाता बेखबर सा ..ओर लगातार मोबाईल पर उसकी आवाज़, अपना हाथ हवा में,मेरी ओर  फैला कर वो  गेट बंद कर लेता है  
ओर ..एक गुब्बार सा सड़क पर .है ,ड्रायवर  की आवाज़ भी दूर से आती सुनाई देती हेँ ..किस तरफ गाडी लूं ...कोई जवाब तक देने का मन नहीं..विपरीत दिशा में  दूर तक उसकी कार की पीछे की लाईट ओझल होते-होते आँखों में रह जाती  है . ध्यानाकर्षण की सूचना गुप चुप सी रह जाती है 

....,उसकी सोच बस किसी नदी के गहरे जीवन में उतर जाने की मानिंद ...उतरती ही जाती है ..तारांकित प्रश्नों के जवाब भी नहीं मिलते उसका कसूर नहीं .. जो उसके संज्ञान में ही नहीं ...दिल्ली की वो शाम दिल में उतरती है ...
''.वो अपनी आँखों में समुद्र भरकर आती है..ओर हँसते हुए बूँद भर रोती है [ बसंत त्रिपाठी  ]
[कहानी की शक्ल में ये कहानी .कितनी मुख्त्सिर है ..नहीं मालूम ..]