बुधवार, 4 अप्रैल 2012

मुख्त्सिर सी बात है




मुख्त्सिर सी बात है वो गर्दन को थोड़ा उंचा करके ओर आँखों को कुछ ज्यादा ही सिकोड़कर फिर पलकों को जोड़कर थोड़ा खुला रखकर पूरे चेहरे का मुआयना करता है उसकी आँख नाक माथा ठुड्डी होंठ  ओर होंठों के बायीं तरफ गोल तिल फिर गर्दन को छोटे-छोटे टुकड़ों  में फोकस करता है अपनी पनीली नजरों से वो चेहरे के हर अक्स को दिल में उतार लेना चाहता है उसकी डायरी में दर्ज वक्त समानांतर नहीं चलता उसकी कोहनी के ऊपर खरोंच का निशान, वो रूकता है..जाने क्या सोचता होगा अपनी नजरों को वो निशान पर ले जाती है पूछे तो बताऊँ कैसे मोबाईल की रिंग बजते हुए वो दौड़ी थी उस दिन इस उम्मीद में के उसका  ही फ़ोन होगा ओर दरवाजे से कोहनी जा टक राई सीधे- -सीधे कोहनी की हड्डी में चोट ओर घसीटते हुए अपने को बचाने में ये खरोंच लम्बी सी ओर फोन भी अननोन उसका भी होता तो चोट सार्थक हो जाती ,वो असहज होती है... जाने क्या दिल में उतरता है ..ओर फिर आहिस्ता नजर उसके हाथों ,उसकी अँगुलियों पर जाते हुए डायमंड रिंग पर ठहरती है ..अनामिका में मोती पर ओर यहीं उसकी नजरें यकायक रूक जाती है ओर अपना हाथ वो उसकी अँगुलियों में फंसा देता है...आसमान में उडती उडती कोई पतंग स्थिर हो गई हो  जैसे ,अब उसकी आँखें मुस्कराती है वो यकीन कर लेना चाहता है अपनी खुशी का लेकिन उसकी चुप्पी से एक कोफ्त महसूस होती है वो, वो सब कहना चाहती है पर नहीं कह पाती..क्योंकि कहे का कोई फायदा भी नहीं  उसका बहुत कुछ जाने बिना भी काम चल जाता है, पर वो ऐसा नहीं कर पाती..चाह कर भी ..वो अपनी काली टी शर्ट की कॉलर को उंचा उठाकर अंगूठे ओर तर्जनी से मोड़ देकर छोड़ देता है ..हाथ से हाथ छूट जाता हैउसकी सुनहरी  हथेलियाँ आँखों में बस जाती है, आँखे फिर जाने क्या खोजती सी अब उसका ध्यान शायद रंगों की तरफ है.एक सरसरी तौर से  वो रंग चुनता है.. नजरें बचाकर, हम दोनों के बीच कोई नहीं.. ब्लेक-रेड प्रिंटेड शिफोन साडी पर उसकी सतही नजर दौडती है- लेकिन दिल में उतरती है ब्लेक कोफी  की एक चुस्की रेड ब्लाउज  के भीतर तक नर्म थोड़े गर्म  अहसास की तरह फैल जाती है ....
 ओर बाहरी दुनिया से टूटा ये रिश्ता अकथ की गहरे के दो छोर बन जाते हेँ, सहसा लगता है वो अकेला पड गया है .सामने दो लड़के काफी की चुस्कियों के साथ लगातार बहस करते हुए ..एक उडती सी नजर उस लड़के से मिलती है ..एक अनजाना भाव ..शीशे के पास कोने की दीवार के वो सामने हेँ कैफे काफी में दोपहर की धूप शाम की धूप में तब्दील हो रही है लड़के की पीठ पर टी शर्ट पर लिखा सेव वाटर ...पढ़ना ओर उस पर  नजरें दौडाना मजबूरी बन जाता है पानी से याद आता है उसके लिखें में पानी की सूरत कितनी अलग कितनी जुदा कितनी मीठी..उसकी कविता याद आती है जिसमें पानी का ज़िक्र है यकीन करना मुश्किल होता जाता है की वो ऐसा भी लिख सकता है ...शीशे के दूसरी ओर एक खूबसूरत कम उम्र  लड़की अपने बॉय फ्रेंड के साथ चहकती ही जाती है कभी ख़त्म ना होने वाली हंसी. वो भी कहना चाहती है,चहकना चाहती..हंसना चाहती है उसके स्पेस में ..पर ये मुमकिन नहीं ..उसके मूड पर डिपेंड करेगा ...ओर उसका मूड जान पाना कोई आसान नहीं  उस लड़की की तरह..हंसना... लेकिन एक मुहाने पर आकर रूक जाता  है एक  वाक्य, जिन्दगी के सारे रास्ते उस तक आकर ही क्यों ख़त्म हो गये एक अनवरत अनुभव अपने सपने तोड़ने का ...वो निश्चल निगाहें गडाए उसे देखता है मानो कहेगा  अभी वो सारी उम्र प्रतीक्षा करेगा .लेकिन कहता नहीं ..वो आँखों में उभर  आये पानी को रोक लेना चाहती है अब कहाँ देखूं ,उसकी तरफ या सडक पर गाड़ियों की आवा-जाही, वो गाड़ियों पर भी ज्यादा से ज्यादा फोकस नहीं कर पाती अब उसका ओर मेरा साथ अधिक से अधिक दस मिनिट का ही है ...उंह ठीक है जो वक्त जो साथ मिला है वही सही ..वो मोबाइल की जलती बुझती रौशनी में कहीं गुम है..मोबाईल को थोड़ा झुकाकर बात करना प्रायवेसी रखना उसकी आदत है जब तक ना पूछो जवाब नहीं मिलेगा उसे पसंद भी नहीं कोई दखलंदाजी  .क्या बात करूँ ..बातों का सिरा फिर से पकड़ने की कोशिश --पूछती हूँ --जवाब मिलता है ..हाँ लेकिन इतनी जल्दी नहीं ..तो आधा घंटा वो साथ को सूकून से बिताना चाहता है और वो रोना चाहती है ..लगातार जमते हुए तलछत्त में जमते ही  जाना..अँधेरे का काला घोल उसकी आवाज में जम जाता है शब्दों में धवनि  भी नहीं बस पल-पल बीतता है अपने पूरे पन के साथ क्या यहूदियों की कहावत कारगार साबित होगी इश्वर के सामने रोओ ओर मनुष्य के सामने हंसो पर कैसे -किस तरतीब से ...सोचते ही एक गहरी ऊब से उसका मन भर जाता है ओर छोटे-छोटे सूत्रात्मक संवाद उनके बीच शुरू फिर --ख़त्म होते जाते हेँ अब फिर उसकी आँखें छोटी होती जाती है ..वो कुछ खोजता है -जोगी से उसके चेहरे में क्या है ? नहीं मालूम लेकिन कुछ जरूरहै.. जो  उसकी समझ से परे ..लगा मानो वो झुका ओर झुक कर पानी की सतह पर झांका .उसका  ये झांकना ही तो अजीब सा है 
त्वचा के भीतर तक..उत्फुल्ल आवाज में'' कोशिश करता हूँ कल मिलतें हेँ'' .जो वो कहता है कितना सच होगा कौन जाने ...लेकिन हर सच, सच कहाँ हो पाता है .रगों में भरती...जाती आवाज.लेकिन .फिर भी  वो सोचता होगा इस पर विश्वास करूँ ,ये मासूम है या बस यूँ ही... फिर वो अपनी सोच  को आधा-अधूरा छोड़कर कांच से  परे गौसिप  करती कमसिन लड़कियों की ओर लौटा लाता है --लेकिन नहीं, ये वो कतई नहीं सोच रहा शाम का प्रोग्राम..अब  उसके होंठ  स्थिर से लगते हेँ .जो पहले बुदबुदाते से थे ..सडक की तरफ से एक कार तेजी से निकलती है उसके खुले से शीशों से शाम का उदास गीत बजता हुआ सुनाई देता..एक शोर  सा गायब हो जाता है ''मुख्त्सिर सी बात है'' ... राग भरी पीड़ा हवा में फैल जाती है उस पीड़ा से उस गीत से, कार चालक को कोई लेना देना नहीं लगता ..एक उचटी सी नजर उसपर ..उसने सुना ही नहीं यकीन हो जाता है. उसी एक ही समय में ढ़ेरसी चीजों-वीजों..का एक साथ भीतर-बाहर होना अटपटे पन  की हद में --कुछ कहने के पहले का सोचना ओर भीग जाना खाली पन में खाली मन का दौड़ पडना..जब याद आयें तुम्हे हम --नहीं-नहीं  कौन याद करता है..एक बार छूट जाने के बाद किसे फुरसत है इस आपा -धापी वाले समय में, वो नाराज ना हो जाए ये डर भी तो अक्सर साथ ही रहता है उसके पूर्व अनुभव चेताते हेँ ..नहीं ये मत बोलो ,वो नहीं,ऐसे नहीं.वैसे नहीं --वो रूक जाती है  
वो हर जगह कुछ खोजता है एकदम बे- मतलबी ..खोज लगती है उसकी ..अरे यार कितना वक्त कम है हमारे पास ये क्या कहाँ  ध्यान है तुम्हारा...कहना चाहती है वो  नहीं कह पाती ...कैसे शब्द ठूठ हो जाते हेँ एक सर्द ना गर्म हवा का झोंका रोक लेता है टोक देता है ..पल्लू को सीधे हाथ से बाँई ओर  बेवजह कन्धों की ओर तरतीब से ठीक करना ..सब कुछ ठीक-ठाक है बस एक आदत के तहत हाथ वहीँ पहुँच जाता है ...जो जरूरी भी नहीं ..जरूरी तो ये शाम भी नहीं थी जो गुजर रही है उनके बीच ...ओर उसकी उपस्थिति दर्ज हो रही है सालों में...वो लेवेंडर कलर के एक फूल को याद करती है ...जो उन दोनों की आँखों ने देखा था एक साथ  क्या वो दिन वो फूल वो वक्त याद आयेगा उसे ..इस शाम के साथ ...यादों की फेहरिश्त  में जुड़ेगा उसकी क्या?ये लम्हा ...उसकी जिद्द उसकी आँखों से  झांकती है ओर हाथ से छूटी अंगुलियाँ सिगरेट थाम लेती है..सिगरेट से कुछ चिंतित कश वो लेता है होटों को गोल करके उसकी वो शक्ल जीरोक्स हो जाती है अन्दर ओर हर दिन उसकी कमसकम बीस पचीस कापियां बाहर आती जाती है ना चाहते हुए भी जीरोक्स तो ओर भी बहुत कुछ हुआ था किस-किस का हिसाब दूं  उसका हाथ , हाथों में था ओर नजरे झुकी हुई .एक साहसी पल कंपकपाता हुआ ..
.कितना धुआं फैल रहा है.. वो आँखों ही आँखों से लापरवाह बने  रहने का भ्रम फैलाना चाहता है ..ओर वो ..वो अन्दर ही अन्दर सतर्क रह कर अपने समर्थन में बुलंद होना चाहती है ..नाउमीदी की सूरत में उसने उसी वक्त सोच लिया था जो नहीं कह पाई वो एक लम्बी चिठ्ठी में कह देगी... इतिफाकन उसकी आवाज उस दिन सर्द थी. ओर उसे अपने हिस्से की पीड़ा मिली थी, कुछ सालों पहले तक अपनी जड़हीनता  में वो कितना ख़ुश थी ...शाम हो चली है सपाट सा लगता जागता वक्त दौड़ रहा है चुप्पी कड़े -गहरे अँधेरे से भी ज्यादा कड़ी लग रही थी उस वक्त उसका  दिल  डूब जाता है ..अक्सर होता यही है की एक से, दूसरा नाखुश नाराज़ होने का अधिकारी हो जाता है एक सुबकी मन से बाहर आते आते रूक जाती है ..उसे रोकना ही होता है ...रोने से उसे नफरत है ओर रुलाने के सारे उपक्रम उसे आते हेँ ..जीवन से विरक्त ग्यानी की तरह किसी  टूटन को मन ही मन छुपाते हुए .वो मुस्कराता है आस -पास की तमाम चीजों में अपने को खपाते ..आने वाले दिन का दवाब वो शायद महसूस कर रहा हो ओर चाक हुआ जाता सारा वक्त ..बेरहम हो छूट जाता है... ओर वो क्या करे? निरुपाय .चाहती है .धीरे-धीरे बटोर लेना उसकी दुनिया,संभावना ख़त्म और  घंटे भर में रात उतर आएगी ..उस दिन उसकी हथेलियाँ पनीली थी ओर आँखों में एक जंगल ,बातों में एक बेतरतीब उंचा-नीचा पहाड़. लगा उसकी हथेलियों पर हाथ रख कर कोई वादा ले ले, या रोक ले ..या अपने उमड़े हुए आंसुओं से उसकी हथेलियाँ भर दे ..पर सोच ओर चाह में कोई ताल-मेल नहीं हो पाता... मन में उसके  ...किसी बात को लेकर लगातार जिद्द थी हवा चुप,रौशनी चुप,पेड़ चुप सिर्फ उतरती धूप के साथ कॉफी  की कड़क महक अपनी उपस्थिति के साथ मौन ओर हतप्रभ थी ...अडतालीस महीने बीस दिन बाद.. मुसीबत जदा वक्त से बाहर आने में कितनी मुश्किल हुई होगी अब उसे कौन बताये...भीतर कोई शीशा चकनाचूर होता है उसे आवाज तक सुनाई नहीं देती ...उसकी कॉफी  ख़त्म वो अपनी दोनों बाहों को समेट कर एक दूसरे में लपेट कर इत्मीनान से बैठ जाता है ...एक खालीपन की पूर्ति सी करता हुआ , सामने कोई हडबड़ी नहीं वो अब अपने पांवों को भी फैला लेता है ...मानो जिन्दगी यही गुजार देगा संग .बसा लेगा एक घर... हवा पानी रौशनी से भरा ..स्मृति के गलियारे से गुजर कर बारह साल गुजर जाते हेँ खोजना पाना खोना ,,साँसों के अन्दर तक उसका नाम धूप  छाँव सा झिलमिल होता जाता रहा ..क्या वो जान पायेगा कभी ?शायद नहीं, समय का फैसला मन तो करता है कह दूं  तुम ही  जीते क्या हांसिल हुआ इतने साल यूं बेखबर रह कर.. पर इतना छोटा समय था इतना कम की कोई ओर गुंजाइश ही नहीं थी ...आत्मा के पार तक उससे मिलकर हर बार पुनर्जनम हुआ हो ऐसा ही तो लगता  रहा .लगता है उससे कह दिया जाय पर ये एक कोरा ओर लिजलिजा वाक्य बन कर रह जाएगा उसके लिए वो जानती है ..कुछ बातें रुकते-रुकते भी हो जाती है..लेकिन इस छोटी सी बची खुची जिन्दगी में कुछ बातें ..ना रुके हुए ..होते-होते ही  हो जाये तो ..लेकिन हो तो सही अब कॉफी  ख़त्म...अलसाया सा वो उठता है ..अब आप क्या कर सकतें हेँ ..उठना ही होगा वो अपनी कार की तरफ सिर्फ दस कदम . कैफे काओफी  के .आहते में एक ताजा सा हरा पत्ता  शाख से बिछुड़ा  गुडी-मुड़ी होकर उसके क़दमों तले लहराता हुआ दिखता है लेकिन वो देख भी नहीं पाता बेखबर सा ..ओर लगातार मोबाईल पर उसकी आवाज़, अपना हाथ हवा में,मेरी ओर  फैला कर वो  गेट बंद कर लेता है  
ओर ..एक गुब्बार सा सड़क पर .है ,ड्रायवर  की आवाज़ भी दूर से आती सुनाई देती हेँ ..किस तरफ गाडी लूं ...कोई जवाब तक देने का मन नहीं..विपरीत दिशा में  दूर तक उसकी कार की पीछे की लाईट ओझल होते-होते आँखों में रह जाती  है . ध्यानाकर्षण की सूचना गुप चुप सी रह जाती है 

....,उसकी सोच बस किसी नदी के गहरे जीवन में उतर जाने की मानिंद ...उतरती ही जाती है ..तारांकित प्रश्नों के जवाब भी नहीं मिलते उसका कसूर नहीं .. जो उसके संज्ञान में ही नहीं ...दिल्ली की वो शाम दिल में उतरती है ...
''.वो अपनी आँखों में समुद्र भरकर आती है..ओर हँसते हुए बूँद भर रोती है [ बसंत त्रिपाठी  ]
[कहानी की शक्ल में ये कहानी .कितनी मुख्त्सिर है ..नहीं मालूम ..] 

9 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छी है...

डॉ .अनुराग ने कहा…

डूबा हूँ उतरा हूँ कई शब्दों को चाहा फ्रीज़ कर दूँ....हाईलाईट कर दूँ ...बोल्ड भी पर कितने
"बाहरी दुनिया से टूटा ये रिश्ता अकथ की गहरे के दो छोर बन जाते हेँ, "
या ये
कभी ख़त्म ना होने वाली हंसी. वो भी कहना चाहती है,चहकना चाहती..हंसना चाहती है .उस लड़की की तरह..हंसना... लेकिन एक मुहाने पर आकर रूक जाता है

ओर ये मुझे जैसे किसी की चीख सा मालूम पड़ता है
"..लगातार जमते हुए तलछत्त में जमते ही जाना..अँधेरे का काला घोल उसकी आवाज में जम जाता है शब्दों में धवनि भी नहीं बस पल-पल बीतता है अपने पूरे पन के साथ क्या यहूदियों की कहावत कारगार साबित होगी इश्वर के सामने रोओ ओर मनुष्य के सामने हंसो पर कैसे -किस तरतीब से ..."
कितने सूत्र छिपे है इस कहानी में
वो आँखों ही आँखों से लापरवाह बने रहने का भ्रम फैलाना चाहता है ..ओर वो ..वो अन्दर ही अन्दर सतर्क रह कर अपने समर्थन में बुलंद होना चाहती है
ओर ये मुझे कहानी नहीं लगता ,लगता है किसी जाने पहचाने ने कहा है
''.वो अपनी आँखों में समुद्र भरकर आती है..ओर हँसते हुए बूँद भर रोती है

Vidhu ने कहा…

ये सही है अनुराग जी जीवन में बहुत कुछ अकथ ही रह जाता है कभी गहरा ओर कभी उथला..ओर हंसी भी आंसू भी ...बहुत पहले एक कहानी लिखी थी हिन्दुस्तान में
''अपरिमेय शीर्षक से ..ये उसी की अगली कड़ी के रूप में है ...चाहे हुए की सोच ओर सोचे हुए की चाह में में बुनियादी फर्क नहीं पर
ये भी सही है की सब कुछ आपकी गिरफ्त में नहीं होता समय तो बिलकुल नहीं ..हवा पानी आग मिटटी से बना ये शरीर कितने ओर कहाँ-कहाँ नहीं देता दुःख ...ओर आत्मा कितने सारे ताप झेल जाती है एक ही समय में ...खैर आपकी टिप्पणी सुकून देती है ...लिखा सार्थक लगता है धन्यवाद

पारुल "पुखराज" ने कहा…

मुसीबत जदा वक्त से बाहर आने में कितनी मुश्किल हुई होगी अब उसे कौन बताये...भीतर कोई शीशा चकनाचूर होता है उसे आवाज तक सुनाई नहीं देती ...

bahut mushkil..bahut vaqt lagta hay..

वो अपनी आँखों में समुद्र भरकर आती है..ओर हँसते हुए बूँद भर रोती है

phir padhungi laut kar ise..

vikram7 ने कहा…

..,उसकी सोच बस किसी नदी के गहरे जीवन में उतर जाने की मानिंद ...उतरती ही जाती है ..तारांकित प्रश्नों के जवाब भी नहीं मिलते उसका कसूर नहीं .. जो उसके संज्ञान में ही नहीं ...दिल्ली की वो शाम दिल में उतरती है ... ''.वो अपनी आँखों में समुद्र भरकर आती है..ओर हँसते हुए बूँद भर रोती है
behatariin prastuti

dheerendra ने कहा…

वाह !!!!!! बहुत बढ़िया प्रभावित करती सुंदर प्रस्तुति,..विधु जी

MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...:गजल...

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

यहूदियों की कहावत कारगार साबित होगी ईश्वर के सामने रोओ ओर मनुष्य के सामने हंसो पर कैसे -किस तरतीब से ..."आपका लिखा हुआ हमेशा दिल को झंझोर जाता है ...लाजवाब ....

neera ने कहा…

इस पोस्ट को दोबारा पढ़ रही हूं दो सप्ताह पहले कुछः कहते नहीं बना था सिर्फ सोचती रही थी तहों से निकलने की कोशिश करती हुई और आज भी यही हुआ गहराइयों में डूब कर निकलते नहीं बन रहा... आँखों से नहीं आपको फुर्सत और भीतर से पढ़ा जाता है....

Vidhu ने कहा…

aap sabhi kaa dhanyvaad