गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

गीत को उसके ही माध्यम से जानना और नमित हो जाना... विरक्ति के बाद अनुरक्त होना, फिर जीवन खपाना... जहाँ से हम फिर देखना शुरू करते हैं, तसल्ली से किसी इल्ली द्वारा खाया गया टेड़ा-मेढ़ा आधा -अधुरा पत्ता पूरे जीवन की मानिंद

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कुछ गीतों के पास हम जाते हेँ ,और कुछ हमें बुलातें हेँ ,जिनकी आद्रता हमारे मन प्राण और आँखों में बस जाती है उन गीतों की सच्चाई और संवेदना हमारी चेतना को छूती ही नहीं, हमारी आत्मा को थाम भी लेती है. दुःख जैसे शाश्वत सच को सुख में तब्दील करने वाला संगीत, ऐसे गीतों में किसी दुनिया को, उसके इंसान को, और इस दुनिया के अभिशप्त चरित्रों को बदलने का कोई दावा नहीं होता, एक गुज़ारिश होती है... एक धीमी दस्तक... और आहिस्ता से किसी गीत का बन जाना. इन गीतों के द्वारा न ज़िन्दगी के कोई नियम टूटते हैं, ना क्रांतियाँ होती हैं... बस कुछ स्वर लहरियां होती हैं, जिसमे बहुत कुछ हमारा भी घुला-मिला होता है. इन गीतों का सूनसान चाहे जितना हमें बोझिल करे, लेकिन कुछ अनसुनी पदचापें कई नए आयामों को रचती आहटें हमारे करीब होती हैं. देश काल से परे जहाँ कुछ भी हो सकता है, एक सम्मोहन; छूटे हुए प्रिय; प्रिय चीज़ों; घटनाओं; प्रिय शब्दों;प्रिय कविताओं; और इत्मीनान से की गयी, अचाही विदा के बाद लौटते - लौटाते कुछ सुर, कुछ गीले बिम्ब, दूसरों के द्वारा नहीं... गीत को उसके ही माध्यम से जानना और नमित हो जाना... विरक्ति के बाद अनुरक्त होना, फिर जीवन खपाना... जहाँ से हम फिर देखना शुरू करते हैं, तसल्ली से किसी इल्ली द्वारा खाया गया टेड़ा-मेढ़ा आधा -अधुरा पत्ता पूरे जीवन की मानिंद .

फिल्म "बेनजीर" - १७ जून १९६४ को रिलीज़ हुई थी, इसके प्रोडूसर- "विमल रॉय" और संगीतकार - "एस .डी.बर्मन", गीतकार - "शकील ब्दायुनी" जी हैं. फिल्म के मुख्या किरदार - मीना कुमारी, अशोक कुमार, शशि कपूर, तनूजा इत्यादि थे... इसमें एक गीत तनूजा पे फिल्माया गया था. ब्लैक एंड व्हाइट में बनी इस फिल्म में खासकर इस गीत में तनूजा ने कशिश्भरी अदाकारी की है... लता मंगेशकर द्वारा गाया ये गीत, राग तिलक कामोद केदार पर आधारित है... गीत के पहले अंतरे में "तू" पर जोर देकर, लय को तोड़कर आगे बढता स्वर और अंत में "आ sss मेरी राहों को जगमगा दे sss " (अवग्र के साथ). गीत के पैरा का अंत एक विनम्र गुज़ारिश के साथ आपको सम्मोहित किये बिना नहीं रहता.
इसी तरह दूसरे अंतरे में "जी चाहता है तुझपर सदके बहार कर दूँ " और अंत तक आते - आते एक आर्त चीत्कार.. एक ऐसा उदास भाव हठात आपमें घर करता है बावजूद एक अतिरिक्त उर्जा वातावरण में अनायास पनप उठती है... इस गीत में ऐसा ज़रूर है जो मंत्र मुग्ध करता है, सुख और दुःख को एकाकार भी... शास्त्रीय संगीत में थोड़ी भी रूचि रखने वालों ने तो इसे सुना होगा लेकिन जिन्होंने नहीं सुना उन्हें इसे सुनना चाहिए... लता जी के अद्भूत स्वर में इस गीत को सुनने के बाद. आप अपनी आत्मा; देह;और स्वर को एकसाथ चमत्कृत कर अनंत और शाश्वत को छूकर लौटते हैं...

"मिल जा रे, जाने जाना... मिल जा रे...
आँखों का नूर तू है, दिल का करार तू है...
अपमा तुझे बना लूँ, मेरी ये आरजू है...
आ मेरी ज़िन्दगी की राहों को जगमग दे,
वल्लाह कदम-कदम पर, तेरी ही जुस्तजू है...
मिल जा रे..."
"जी चाहता है तुझपर, सदके बहार कर दूँ...
तेरी खुशी पे अपनी, दुनिया निसार कर दूँ...
वो प्यार की घडी जो, तेरे हुज़ूर गुज़रे,
उसको कसम खुदा की, में याद गार कर दूँ...
मिल जा रे ...."

सोमवार, 23 नवंबर 2009

//-जो बार-बार मिलता-बिछड़ता है , -मन रूक सा जाता है.. उसका बोलना पानी के बीच घुलता जाता है.-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है...

लगातार होती बेमौसमी बारिश से आँगन की दीवारों से प्लास्टर छोटे-बड़े टुकड़ों की शक्ल में झड रहा-था,जिस दीवार से सटकर दोपहर की हलकी अप्रत्याशित धूप में थोड़ी देर बैठकर वो कुछ पढ़ना चाहती थी.लेकिन उसे इरादा बदलना पडा,खिड़की से आती मामूली धूप के लकीर नुमा टुकडे के साथ बाहर देखते हुए,---बारिश,धुंद,धूप,कोहरे की मिली-जुली ढलती दोपहर में पेड़ों के पत्ते नीले-नीले से दिखाई पड़ते हें ....अभी-अभी धूप थी ओर बस अभी बूंदा-बांदी शुरू ---पानी की हल्की बूंदों के पार खूबसूरत अंदाज में पिघलती कुछ सपाट आकृतियाँ आकार लेती है शाम की शुरुआत होना ही चाहती है,अध् पढ़ी कहानी का पृष्ट बिन मोड़े ही वो गोद में उलट देती है ..तुरंत ही गलती का अहसास ,अब फिर सिरा ढूँढना होगा दुबारा शुरू करने के पहले,-कहाँ छोड़ा था,क्या ये मुमकिन होगा शुरुआत से पहले छूटे हुए कथा सूत्र को पकड़ पाना,एक ख्याल गाथा नया सिरा पकड़ लेती है , उधेड़बुन के साथ -सच कुछ भ्रम भी जरूरी है अच्छे से जीने के लिए ..पर मन की तरह मौसम भी बेहद खराब है,यहाँ ..ओर वहां ?इस सवाल का जवाब उसे नहीं मिलना था जो नहीं होगा उस इक्छा की तरह ..मन की खिन्नता के बावजूद उसका इन्टेस चेहरा खिल उठा शायद मोबाईल के साइलेंट मोड़ में रौशनी जल-बुझ उठेगी बिन आहट सोचना ....लेकिन उम्मीद से थोड़ा ज्यादा किसी भी नतीजों पर ना पहुँचने वाले फैसले एक झिझके हुए दिन के साथ अनुनय करते समय के बरक्स .. उदास-निराश होकर रह जाते हेँ,ताज़ी यात्रा में देखे सागौन के पेड़ों पर कच्चे -हरे फल पिछली यात्रा की जरूरी घटनाओं की तरह याद आतें हेँ ...फिर नया कुछ ,पानी में निथरा हुआ -आधा तर -एक साफ चेहरा ओर कई रंगों की बे शुमार भीड़ में फबता सा उस पर काला रंग.. देखी -सोची चीजें आहिस्ता से करवटें लेती -धीरे-धीरे जागती है ,एक लम्बी खामोशी में पढ़ना- जीना ज्यादा सोचना ,कितना सजीव हो उठता है -जब परिंदे घर लौटने की तैयारी में होतें हेँ बिन भूले अपने ठौर -ठिकाने .ओर अपनी नन्ही आँखों से आकाश से नीचे छूटते घर ,पेड़ पत्तियां पहाड़ --चोंच में दबाये मूल्यवान स्मृतियाँ -ओर जोखिम भरी इक्छायें वैसी ही जो हमारी जरूरतों की तरह ठोस थी-सच थी,यकायक सुखों का फूलों में खिलना,दुखों का द्रश्य में तब्दील होना ...वो दायें हाथ को बाएं कंधे पर ओर बाएं हाथ को दायें कंधे पर रख ,दोनों को एक साथ मोड़कर उसमें अपना चेहरा धंसा लेती है वो समय कैसे तय हुआ वो समझ नहीं पाती ,कुछ जिद्दी पल कोहनी से टकराते हुए -झांकते से उसका चेहरा टटोलने की कोशिश करते हेँ ...बारिश की नमी वहां तब तक अपनी मौजूदगी दर्ज कर चुकी होती है, किसी खेल में सावधानी के बावजूद पिट जाना, भाग्य का खेल, नहीं...हानि -लाभ ,जीवन-मरण ,यश-अपयश ,जीत -हार,बिन बोला भी सच रह जाता है, ओर ज्यादा सच डायरी में दर्ज.प्रवंचनाये टूटती है ,समेटी खुशबू उड़ जाती है मौसम के रंग फीके पड जातें हेँ,स्मृतियाँ धुन्द में खोती जाती है ,चाँद से मन अघा जाता है गीतों का शौर कानो को रास नहीं आता, अविकल बहती हुई , किसी इबारत में ना समा पाने वाली इच्छाएं किसी अनासक्त लय का पीछा करती हेँ ओर निरंतर बदलती अपनी दुनिया के आकाश की निसीमता में नक्षत्रों के शब्द बनाना और मेहँदी भरी खुशबू की हथेलियों से उसका नाम लिखना ...दुखों के ढेर में एक बड़ा, असीम सुख ,एक अर्थ के करीब पहुँचते -पहुँचते दूसरे अर्थ का सामने आजाना --झुके -तने पेड़ों के बीच अवस्थित खपरैल के छत्त वाली झोपड़ियाँ काश की वहां दो क्षण सुस्ता पाते ,ओर नीले गुलाबी रेशमी बादलों के टुकड़े कार के शीशे के परे पीछे छूटते और इच्छाओं की प्रबलताओं ओर निर्बलताओं के के बीच बार-बार पढ़े गये दुर्लभ प्रसंग की तरह सामने आते हेँ जीवन के गाढे उन्माद - में रोज उग आने वाले नए दुखों के बीच ----जो नहीं कहा ,सुन लिया गया उधर ये क्या कम है, वो सर उठाती है बीच नर्मदा से महेश्वर घाट देखना ,घाट की सतह पर किला ,किले की सतह पर पत्थरों के बीच हरी नर्म घास ओर उसका चेहरा हर जगह यहाँ-वहां सुपर इम्पोज हो जाता है हमेशा यही चाहना क्यों जो सबसे अच्छा पल है सबसे मीठा -सबसे अधिक सुखद सबसे विस्मयकारी कोई और भी देखे ,सुने,संग संग ओर ये जो फूल दिन भर आँगन में गिरते रहते हेँ इनकी आहट भी,उनके रंगों के साथ पर ..-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है आजकल नवम्बर में भारी वर्षा ओर तूफान की चेतावनी ... अनेकों सुर्योदयों -सूर्यास्तों के बीच जो बार-बार मिलता-बिछड़ता है , -मन रूक सा जाता है उसका बोलना पानी के बीच घुलता जाता है.-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है आजकल नवम्बर में भारी वर्षा ओर तूफान की चेतावनी... बारिश में चेखव को पढ़ना ....ओर इस मौसम में जब ना ठंडक है ना गर्माहट - दुःख है ना सुख ,दोस्तोव्यस्की को ....दोस्तोव्यस्की की एक लम्बी कहानी ''दिल का कमजोर -कल ही ख़त्म की है वे कहतें हेँ जीवन की चेतना जीवन से बढ़कर है ओर सुख के नियमों की जानकारी सुखों से बढ़कर है ..शाम का अन्धेरा कमरे में इकठा होता है ,दरवाजे पर कुछ पल ठिठके हुए -एक धनात्मक उम्मीद के साथ ,गीतों किताबों ओर उनकी रौशनी में ......देर रात उसने न्यूज़ चेनल पर देखा समुद्र तटीय राज्यों महाराष्ट्र ओर गुजरात से फयान गुजार गया ,ख़तरा टल गया ..
कोई देता है दर -ए दिल से मुसल्सल आवाज,और फिर अपनी ही आवाज से घबराता है...अपने बदले हुए अंदाज का अहसास नहीं उसको ,मेरे बहके हुए अंदाज से घबराता है ..(- कैफी आजमी)

रविवार, 15 नवंबर 2009

मणिपुर की लोह स्त्री शर्मीला की कहानी - शर्मीला समय की उचाइयों पर...




मणिपुर की रहने वाली शर्मिला इरोम की ९ साल पहले एक सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार के रूप मैं पहचान थी ,वो स्थानीय समाचार पत्र मैं महिला मुद्दों पर बेबाक लिखा करती थी,लेकिन शर्मिला से जब मैं ७ मार्च २००९ को मिली तब वो एक कैदी थी और उसी दिन उसे मणिपुर के स्थानीय जवाहरलाल नेहरु अस्पताल के उच्च सुरक्षा वार्ड से रिहा किया जा रहा था दरअसल ११सितम्बर १९५८ मैं बने ए ऍफ़ एस पी ए [आर्म्स फोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट ]जिसे पूर्वोतर राज्यों अरुणाचल मेघालय असम मणिपुर नागालेंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों मैं सेना को विशेष ताकत देने के लिए पारित किया गया था ]शर्मिला ने इस एक्ट के खिलाफ अकेले आवाज उठाई ,वर्तमान मैं शर्मिला के हक और पक्ष मैं सैकडों आवाजें मणिपुर की घाटियों मैं लगातार गूंज रही हें ...अपने राज्य मैं ए ऍफ़ एस पी ए की क्रूरता ,भ्रष्टचार और अमानवीयता के खिलाफ और इस एक्ट को समाप्त करने एवं अपने राज्य मैं शान्ति स्थापित करने के लिए उसने पिछले तकरीबन .9 सालों से मुँह से पानी की ना तो एक बूँद ग्रहण की है ना भोजन किया है ...उसे जबरदस्ती नाक से नली [ट्यूब ]द्वारा भोजन -पानी दिया जाता है ,साल मैं वो एक बार रिहा होती है और दुसरे दिन पुनः गिरफ्तार कर ली जाती है उसके रिहा और गिरफ्तार होने का सिलसिला पिछले 9 वर्षों से लगातार बदस्तूर जारी है,शर्मिला आज बेशक समय की ऊँचाइयों पर है ,कोई मिसाल उस जैसी फिलवक्त देश भर मैं नहीं, लेकिन इन बीते वर्षों मैं उसकी आवाज केंद्र सरकार तक नहीं पहुँच पाई यह अफ़सोस जनक है..हाल ही मैं युवा सांसद अगाथा संगमा ने १८ जून को शर्मिला से जेल मैं मुलाक़ात कर उसकी मांग को सरकार के सामने रखने का आश्वासन दिया है और कहा की वो इस काले कानून को रद्द करने के लिए केंद्र सरकार से मांग करेंगी और इस मुद्दे को प्राथमिकता देंगी उन्होंने एक लिखित ज्ञापन देकर प्रधान मंत्री से इस मामले पर मुलाक़ात कर अनशन पर बैठी शर्मिला के जीवन को बचाने की अपील भी की है
शर्मिला का संघर्ष .9 वर्ष पूर्व 2 नवम्बर 2000 मैं तब शुरू हुआ जब वो इम्फाल से १५ किलोमीटर की दूरी पर सालोम नामक एक छोटे से गाँव मैं एक शान्ति मार्च की तैयारी कर रही थी ,उसी वक़्त आसाम रायफल्स द्वारा बेहद क्रूरता के साथ १० सिविलियंस को मार डाला गया,जिनमें एक ६५ वर्षीय बूढी औरत के साथ राष्ट्रीय बहादुरी पुरूस्कार प्राप्त बालक भी था शर्मिला ने उसी वक़्त निर्णय लिया,की कुछ अर्थ पूर्ण करना होगा अपनी माँ से आर्शीवाद लेकर उसने उसी जगह से भूख हस्ताल शुरू की जहाँ उन १० निर्दोषों को मारा गया था लेकिन दुसरे दिन ही अंडर क्रिमिनल लों-आई .पी सी ,की धारा ३०९ के तहत उसे गिरफ्तार कर लिया गया ....सबसे शर्मनाक पहलु ये है की इन 9 वर्षों मैं शर्मिला के रिहा और गिरफ्तार होने के बीच मणिपुर मैं कही कोई तबदीली नहीं हुई -लोग बेघर होते रहें बच्चे अनाथ,औरतें, विधवा, और निर्दोष मारे जाते रहें ...और ये सिलसिला आज भी जारी है ,इसी वर्ष जन-फरबरी के मध्य ९० लोगों को बेक़सूर मार डाला गया इस अंतहीन क्रूरता के कारण ही यहाँ [यु जी एस] अंडर ग्राउंड ग्रुप्स का दबदबा बढ़ता ही जारहा है एक अनुमान के अनुसार ५५ हजार सिक्युरिटी फोर्स ढाई करोड़ जनसंख्या के ऊपर है मिलेट्री का इतना बड़ा भाग शायद ही दुनिया के किसी हिस्से पर हो ...पिछले १० सालों में यहाँ मानव अधिकारों के लिए सक्रिय संगठन बढ़ते ही जा रहें हें इनलोगों के लिए ये एक मुश्किल भरी चुनौती भी है
शर्मिला इरोम के पक्ष मैं घाटियों मैं रहने वाला [शर्मिला कनबा लूप]..सेव शर्मिला कैम्पेन ...ने शर्मिला के पक्ष मैं संगठात्मक क्रमिक भूख हड़ताल के साथ गोष्ठी भी लागतार की हें यहाँ ये बता देना जरूरी है की शर्मिला कनबा लूप दरअसल मायरा पेबी ग्रुप का एक भाग है और मायरा पेबी ग्रुप औरतों का एक पारम्परिक जमीनी नेट वर्क है .ये औरतें माइती औरतें कहलाती हें ,जो गावों- शहरों और मणिपुर की घाटियों मैं कार्यरत हैं ,ये शराब-ड्रग्स और स्त्री के प्रति अमानवीयता के खिलाफ रैलियाँ निकालती हें इनके साथ नागा वूमेन यूनियन संगठन भी जुड़ा हुआ है ,जो की वहां की १६ जनजातियों को मिला कर बनाया गया है ये पहाडियों घाटियों मैं अथक काम कर रहें हें और इस वक़्त शर्मिला के संघर्ष मैं हमकदम होने के साथ-साथ ए ऍफ़ एस पी ए विरोध मैं भी है
ए ऍफ़ एस पी ए[स्पेशल आर्म्स फोर्स पॉवरएक्ट ]१९५८-से जमू कश्मीर और उतर पश्चिम राज्यों मैं कई सालों से लागू है ये एक्ट इंडियन मिलेट्री और पैरा मिलेट्री फोर्सेस को ये पॉवर देती है की वो कोई भी ढांचा नष्ट या ख़त्म कर सकती है चाहे कारण छोटा ही क्यों ना हो ,साथ ही किसी को भी शूट या गिरफ्तार भी जो की अपराधिक श्रेणी मैं नहीं आता. जिसके फलस्वरूप निर्दोषों को लगातार मारा जाता रहा है ..हालांकि इस एक्ट के खिलाफ री-अपील की जब मांग जोर शोर से उठी तब भारत सरकार ने एक कमेटी के प्रमुख के रूप मैं रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट के जज और फारमर चेयर ऑफ़ द ला कमीशन -जीवन रेड्डी को परिक्षण हेतु नियुक्त भी किया, बाद मैं अनेक मुश्किलों के चलते २००५ मैं एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमे अलग अलग राज्यों के लोगों और आर्म्स फोर्स के नजरिये से युक्ति-युक्त तरीके से इसे समझना था --ये रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर तो पेश नहीं की गई किन्तु एक नेशनल डेली-[द हिन्दू ]के जरिये सामने जरूर आई जिसमे इस री-अपील का समर्थन किया गया था
बाद मैं [स्पेशल आर्म्स फोर्स पॉवरएक्ट के जुल्मों के खिलाफ विश्व इतिहास मैं एक एसा मामला दर्ज हुआ जो रोंगटे खडे कर देने के लिए काफी था और ये सच भी है की कांगला फोर्ट के उस गुम्बद के नीचे से गुजरते हुए हम उन औरतों की मुश्किलों- मजबूरियों -उनके जज्बे -होंसले को अपने अन्दर भी जज्ब और महसूस कर पा रहे थे...वो काला किस्सा ये था की ११जुलाइ २००९ को जब थंगजम मनोरमा नामक एक युवा लड़की को उसके घर से उठाकर उससे बलात्कार और प्रताड़ना के बाद आसाम रायफल्स द्वारा मार डाला गया परिणाम स्वरूप मायरा पेबी संगठन की १२ औरतों [युवा इमा -माताओं ने आसाम रायफल्स हेड क्वाटर्स इम्फाल के एतिहासिक कांगला फोर्ट पर नग्न मार्च परेड निकाली उनके हाथों पर पर बैनर्स पर लिखा हुआ था "इंडियन आर्मी रेप अस" ,उस वक़्त मानव अधिकारों के लिए लड़ रहे कई औरतों के संगठनों ने अपने अपने तरीकों से विरोध
किया ये लोग वही थे जो शर्मिला को मजबूती से सहयोग कर रहे थे
अक्टूबर २००६ मैं शर्मिला जब रिहा हुई तब वो चुपचाप दो तीन संगठनों के साथ देहली आगई..देहली मैं जंतर-मंतर पार्लियामेन्ट स्ट्रीट पर उसने धरना दिया और अपनी आवाज बुलंद की पुनः उसे गिरफ्तार किया गया और एम्स मैं भर्ती कर दिया गया कुछ दिनों बाद फिर उसे मणिपुर जेल भेज दिया गया शर्मिला मणिपुर की जेल मैं आज भी जिंदा है उसका जीवन ख़त्म हो रहा है ,और उस जैसी सैकडों लड़कियों -औरतों आदमियों को अन्याय का शिकार होना पड रहा है, मणिपुर की स्थानीय पत्रकार अंजुलिका ..ने हमें ३० मिनिट की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बताई जिसमें अन्याय की शिकारविधवा और उनके परिवार महिलाओं की व्यथा दर्ज है.
जब ७मार्च २००९ को शर्मिला को रिहा किया जा रहा था तब अलग -अलग राज्यों से मौजूद महिला पत्रकारों की भारी तादाद मौजूद थी ..शर्मिला अपने समर्थकों और नेकेड प्रोटेस्ट की कुछ औरतों के साथ अस्पताल के भीतर ही बने एक किलोमीटर की दूरी पर बने शिविर तक पैदल चलकर पहुंची,उसका चेहरा शांत और झक्क सफेद था शर्मिला के पक्ष मैं १० दिसम्बर २००८ से मायरा पेबी की औरतें भूख हड़ताल पर हें शर्मिला साफ और धीमे बोलने वाली स्त्री है हर दिन योगा करती उसके भाई सिंघजीत इरोम ने बताया शर्मिला से हमें मिलने मैं दिक्कत आती है ... उसने मीडिया से चंदबातें मणिपुरी में जो कही थी वो यह की "आप लोगो ने जो यहाँ मेरा इंतज़ार किया उसके लिए धन्यवाद जैसे शब्द छोटे हैं, मेरी शक्ति द्विगुणित हुई है... मैं अपना ये कैम्पेन लगातार जारी रखूंगी, मेरे राज्य की घाटियों में सुन्दर फूल खिलते हैं, जल है और नैसर्गिक सुन्दरता है लेकिन जहाँ औरतों को कैद में रखा जाता है. मैं उम्मीद करती हूँ की सभी बहने मेरे राज्य की कहानी अपने साथ ले जाएँ, मेरी आवाज़ बने, मुझे जिंदा रखने में सरकार अपनी बोहोत सी शक्ति और धन खर्च कर रही है..." क्या ये ठीक है?
शर्मीला आश्वस्त है की सरकार इस तरफ देखेगी, इस अन्याय के खिलाफ उसके राज्य को न्याय मिलेगा. शर्मीला का कहना है की कमल के पत्ते पर ओस की बूंद की तरह वह हवा में नहीं बहना चाहती जिसका कोई उद्देश्य न हो.
(मणिपुर से लौटकर)
इसी वर्ष ७ मार्च को मेरी मुलाकात शर्मीला इरोम से इम्फाल में हुई थी, जब उसे इम्फाल के एक स्थानीय "जवाहरलाल नेहरु" अस्पताल के उच्च सुरक्षा वार्ड से रिहा किया जा रहा था, तब मैंने उसे बेहद नज़दीक से देखा जाना और सुना था... उसके साथ उसके समर्थकों की भारी भीड़ थी. मणिपुर की यह लोह स्त्री - iron women, सही मायनो में इस बात को सच साबित करती है.
शर्मीला की यह कथा वैसे तो देश के एक बड़े हिन्दी अखबार में प्रकाशित होनी थी जो मुझे ना छपने पर लौटाई नहीं गयी, जिसे मैंने CD (compact disk) में दिया था, अतः उसे मुझे ज्यों का त्यों अपने ब्लॉग पर देना पड रहा है, जिसे आज से आठ माह पहले लिख चुकी हूँ... और आज प्रकाशित कर रही हूँ. जैसा की मैंने पूर्व में प्रकाशित अपने लेख "इम्फाल में मानवीय अधिकारों के हनन का सिलसिला जारी" में उल्लेख किया है... (औरत संगठन फॉर पावर सोसायटी की ओर से...)
शर्मीला इरोम के पक्ष में सारी दुनिया से अपील करते हुए,..... इसी नवम्बर में जिसे 9 साल पूरे हो गए हैं, जेल की सीखचों के पीछे...

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

उसका खुश चेहरा,और सात तालों में कैद चुप्पी बोलती है घोलती है --बेखबर, जलतरंग की झिलमिल / / -


एक छोर से आसमान ढह गया
धूल-धूसरित,
धरती भी थोडी सी डूबी,
और जम गई -इस बीच एक धुन्द सी
और ये कहते -कहते
रुंध गया है गले में ये जो ,कुछ
एक ही समय में ,
अगम राह में निर्जन
इकठ्ठा कोई संत्रास ,
भीतर-बाहर उफनता है
ये तो ..ठीक नहीं
धूप सर पर है
और नापना शून्य को है
अपने ही भीतर निमग्न होते
एक निमिष आकाश को
रंग उडे ख्यालों की अद्रश्य उदासी
नहीं, सबसे अलग खोजा उसने,
अभिमंत्रित एक शब्द
तुम्हारे होने ना होने की जगह
उस बबूल के पेड़ तले
ताजे,छोटे, गोल, पीले रेशमी फूलों की ,
महमहाती छावं में
वक़्त रुकता नहीं
जहाँ रूकती है दृष्टी
उसी वक़्त तुम सुनते हो
,मन्नाडे की पुरअसर आवाज
"हंसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है"
टूटा-फूटा वर्तमान छूट रहा है
एक भरा-पूरा भविष्य हो सकता है
इक्छाओं को टोह देती है ,
नेक नियत- सधे हुए ढंग से
रंग उडे ख्यालों को रंगना
बिसराए जाने से पहले
ताज़ी स्मृति बनना
और उन्हें देखना -देखते रह जाना
जहाँ से गुजरता है
''प्रेम '' प्रवासी पक्षी सा
एक नया सूर्योदय
भुरभुरी रौशनी के साथ उभरता है
एक निराकार अंधेरे के बाद
उसका खुश चेहरा,और
सात तालों में कैद
चुप्पी बोलती है
घोलती है --बेखबर,
जलतरंग की झिलमिल

आँखों में देखकर मिरी, तुफाने मौजे खूं... चढ़ने से पहले, वक़्त का दरिया उतर गया...
जो मौत के जवाब में रहता था, पेश-पेश, वो ज़िन्दगी के चंद सवालों से डर गया... (-नजीर फतेहपुरी)


गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

प्रेम से ऊर्जा ...उर्जा से क्रिया शीलता ,क्रिया शीलता से रौशनी और रौशनी से सुघड़ता ...//-


र साल दिवाली आती है मनो- कूढा-करकट हम घर से बाहर फ़ेंक देतें हें पर मन मस्तिष्क पर जमा थोडी भी धूल हम नहीं उतार पातें हें ... लाख गुनी ग्यानी कह गये की मन का मनका फेर .पर अब तो सब कुछ असंभव लगता है ..ये भी सच है की किसी के मन में हम चाहे जितना गहरा झाँक लें और चाहे जितनी पैनी हमारी खुर्दबीनी नजर हो, तो भी बहुत कुछ जान नहीं पाते, ऐसे कई लोग हमारे आस-पास ... बस एक फूहढ़ अंदाज में जिए जातें हें और उनकी उम्र'' दिन गिनती ना जाने कितनी दिवालियाँ पीछे ठेलती आगे बढती जाती है ...ना दिलों में रौशनी होती है ,ना घरों में ....ज़रा विस्तार से सोचें ..हमारी किताबों पर जमा धूल जिनका एक पेज भी ना खुला हो ,यदि गमलों में जमा घास -खरपतवार उग आई हो ,दीवारों का पलस्तर उखड गया हो ,कपडे की सीवन उधड जाए तो मन दुखता है रंग-रोगन सिलाई की जरूरत होती है रसोई के डिब्बे इधर-उधर हो जायें,प्याज की टोकरी में प्याज कम छिलके ज्यादा हों,अलमारी की सतह पर धूल हो उसके अन्दर कपडों की भरमार हो,प्रेस किये कपडें सलवटों से भरें हों अन्य उपकरणों वाशिंग मशीन, सिलाई मशीन,ए.सी में मेल दाग-धब्बे उभर आये,परदों से छन्न कर आती रौशनी फीकी लगने लगे,अचार मुरब्बों की बरनी के नीचे लगे कागज़-कपडों पर तेल मसाले के छींटेंलग जाए अच्छी सफाई ना होने के कारण ड्रेसिंग टेबिल पर बाल रह जाए मंहगे जूतों-चप्पल की तली से धूल मिटटी चिपक कर एक इंच तक उठ जाए शिफान जार्जेट की साडियों के पेटीकोट फाल से ऊपर होने के कारण साडी की किनारी घिस कर उधड जाए तो ऐसी मैली फूह्ढ़ता के लिए कौन जिमेदार होगा?क्या हर दिन या दो दिन में इन कामों पर फोकस करने की जरूरत नहीं? आप करें या नौकर से कहें ...क्या जरूरी है दिवाली पर ही सब कुछ किया जाए ,सारा कचरा घर से बाहर किया जाए...
हमारी एक परिचिता बरसों रद्दी इकठ्ठा करके उन्हें दिवाली पर बेचती रही पति सरकारी विभाग में पी. आर. ओ थे जाहिर सी बात है दुनिया भर के अखबार उनके यहाँ पहुँचते थे इस तरह दस-पन्द्रह तोला सोना उन्होंने बनाया ..लेकिन उस रद्दी को सहेजने में ,कीडो-काक्रोंचों से बचाने में उन्हें कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी ये भी सोचें , आप इसे सुघड़ता भी कह सकतें हें वाह रद्दी से सोना ...एक अन्य महिला पुराने कपडे सहेजे रहने में सुख पाती है बस यही कहती हें पति ने पहली वेडिंग एनिवर्सरी पर दी या माँ ने जनम दिन पर या की कालेज के दिनों की ये ड्रेस है जब दुबली -पतली थी बस मन को ऐसी ही फूह्ढ़ता से संतुष्ट करती है लेकिन किसी जरूरतमंद को नहीं देगी .....एक नव धनाड्य मेरी महिला मित्र ने बताया की उसके यहाँ कोई नौकर नहीं टिकता अब इसके कारण बहुत से हो या चाहे जो हो ,लेकिन साथ ही उसका ये भी कहना था की कोई त्यौहार हो या मेरे फार्म हाउस पर पार्टी हो ,या घर में कोई कथा हो में इन्हें कपडा खाना भरपूर देती हूँ मेरी समझ से मेंने जो जाना वो ये की ,गरीब नौकर मेरी इस मित्र का देना अपना अधिकार समझ रहे थे ,जो कपडा भोजन दक्षिणा उन्हें मिला ...वो किसी ना किसी को मिलता सो उन्हें मिल गया मित्र का कहना था की इतना देतें हें फिर भी नमकहरामी करतें हें ..क्या ये दिमागी फूह्ढ़ता है या चालाकी ?... मेरे आँगन में सौ -दो सौ फूल रोजाना खिलतें हें जिनकी लतरें बाहर सड़क की और फैली हुई है सुबह की सैर को जाने वाले बुजुर्ग और स्कूली बच्चे अधिकाँश फूल तोड़ लेतें हें पडोसी शिकायत करतें हें मुझे कोई शिकायत नहीं, जबकि में अक्सर अपने पडोसी को भी निर्लिप्त भाव से फूल तोड़ते देखती हूँ ..तब भी रोजाना कई फूल बच जातें हें हर बरसात में कलम बीज से तय्यार कुछ ख़ास पौधे बांटने में सुख मिलता है ये एक लंबा सिलसिला होता है कभी उनके घर जाओ पौधे बडे हुए और उनमे खिले हुए फूलों को देखना ...एक अव्यक्त ख़ुशी होती है देने बांटने की चीजें फूल पौधे कोई मांगे और उन्हें ना दिए जाए ऐसी फूह्ढ़ता कोई निभा सकता है भला ...
कुछ लोगों के पास शार्ट कट होतें हें जो अपने ही में एक सुखी संपन्न जीवन बिता कर दुनिया से अलविदा हो जातें हें और कुछ लोग तमाम काबलियत और ईमान दरी के बावजूद वो नहीं पा-पाते जिनके वो काबिल होते हें जिनकी उन्हे चाहना होती है फिर भी वो जिन्दगी जीतें हें अपनी कमियों और अच्छाइयों को नई व्यवस्था में किसी नए रूपक में बांधकर एक सुख में डूबकर और कुछ ठीक इन से उलट अपने ही ढर्रे पर चलने वाले ...पर जी ,इस दुनिया में सुघड़ता से जीने के लिए एक दिमागी प्रबंधन की भी जरूरत होती है की कब करें क्या करें कैसे करें और क्या ना करें और जब आप अपने को निर्देश देतें हें या दो टूक निर्णय सुनातें हें ..हाँ या नहीं ..... कुछ बातें क्या जायज हें? ...?आपका हमारे घर में प्रवेश मय जूतों चप्पलों से और हम आपके यहाँ नगें पैरों, आपके घर हम बिना इजाजत बिना प्रयोजन के बैठक से आगे ना जा पायें...हमारे घर में आप बेडरूम से बालकनी छत्त तक घूम आयें क्या ये फूह्ढ़ता है या सहजता?, आपको हम सादर आमंत्रित करे भोजन में अचार मुरब्बों से लेकर चटनी-पापड से लेकर जायके दार खाना खिलाएंऔर आपके घर में हमें फ्रिज का बासी खाना गर्म करके परोसा जाए ....कुछ रिश्ते जिन्दगी की कड़ी धूप में.. साए की तरह हो तो .जीना आसान हो जाता है कि .जब मिलो तब दिवाली सा आनंद मन उठा सके ...
एक और महिला हर दिवाली पर बड़ी और महंगी खरीददारी करती है ,साल भर वो चीजें उनके यहाँ इधर-उधर लुढ़कती दिखाई पड़ती है ..फिर अगली दिवाली तक वो बेवजह बाइयों में बंट जाती है ,ना वो नौकरी करती हें ना पति की कमाई में कोई इजाफा,सुबह बारह बजे तक अलसाए पड़े रहना ,दिन का खाना-नहाना चार बजे तक, रात बारह बजे तक अकारण जागना उनकी दिन चर्या है उनकी फूह्ढ़ता की अन्नत कथा है रौशनी कहाँ नहीं करने की जरूरत है बताना मुश्किल होगा ...एक और मेरी अच्छी दोस्त ...अच्छे पद पर खासा कमाती है मेरी पसंद की कायल जो मेरे पास हो वो सब उसके पास होना चाहिए ..साडी -कपडों से लेकर ना जाने क्या-क्या ..इसमें कोई हर्ज भी नहीं..में कहती भी हूँ मुझे साथ ले चलो खरीदो मेरी पसंद से,नहीं अपनी खरीददारी गुप्त रखेंगी मुझे वितृष्णा होती है ...मुझे ये भी लगता है कि.कामो का संधान व्यवस्था से ही तो हो सकता है बजाय नक़ल से?एक और स्त्री का घर हमेशा बैठक में गीला तौलिया गीलेपन की बदबू के साथ महंगे चमकीले कुशन के बीच सिमटा हुआ फैला हुआ मिलेगा किचिन में पैर रखने की जगह नहीं, कहीं कटी हुई सब्जी खुली हुई तो, कहीं सिंक में झूटे बर्तनों का ढेर फ्रिज में बासी खाने के ढेरों डिब्बें ...कहीं दूध खुला हुआ तो कही गैस पर दाल सब्जी पैर पसारे हुए उनके यहाँ हमेशा मिल जायेंगे..वे .खासा कमाती है नौकर भी है फिर भी.....अपने ही बनाए हुए नर्क में जीने मरने की अभ्यस्त ऐसे कूड़े करकट के साथ जिन्दगी बिताते लोग..मुझे आर्श्चय होता है ...अपने रोजमर्रा के दायित्वों को पूरा किये बिना कैसे बाहरी काम कर पातें होंगे ....बर्ट्रेंड रस्सेल की "कान्क्वेस्ट" का अनुवाद जब पढ़ा तो लगा सच.हांसिल करना... जीतना अपने को, अपने बलबूते पर आसान है ..कठिन नहीं ...और उस आसानी में घर का शामिल होना जरूरी है वो भी रौशनी से भरा और ये कहना बिलकुल सही होगा की............ एकरसता से उब पैदा होती है ,फूह्ढ़ता से वितृष्णा ...इससे बचना ही चाहिए....और प्रेम से ऊर्जा ...उर्जा से क्रिया शीलता ,क्रिया शीलता से रौशनी और रौशनी से सुघड़ता ...जो हमारी चेतना को लगातार बींधती है ताकि हम-आप एक साफ दिल- दिमाग से जी पायें और लोगों को भी जीने दें ...
बहुत भारी होता है जीवन का सार मित्र,बुलाती सी चमक सुदूर के सितारों की,अंधेरों में डूबे तुझ से मांगते जवाब है ..अंधेरों से...अन्जोरे में निकल चल [मुक्तिबोध] अँधेरा और उसका मिथकीय चित्रण मुक्तिबोध की सभी रचनाओं में मिल जता है ..अज्ञान का अँधेरा व्यवस्था जन्य अँधेरा,मन के भीतर छिपे बैठे अँधेरे, सब पर मुक्तिबोध की द्रष्टि है ..अंधेरों में ही भय होता है पहचान खोने का जीवन लक्ष्य से भटकने का [दीपावली कि अनंत शुभकामनाएं ]

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

-एक पुरसुकून आसमान की तलाश ,मन खुश था अपने ही सवाल पर जो उसके जवाब की प्रति क्रिया से छूट गया था चलो अच्छा हुआ... एक कांट-छांट मन की सतह पर होती है ..//


लगातार बरसात की नीम ठंडक से चिढ होती है ,बहुत दिनों तक धूप ना निकले तो मन कुढ़ता है खैर बरसात को कभी ना कभी तो रुकना ही होता है बारिश ख़त्म भी होती है ,हलकी सी धूप के साथ मौसम में ठंडक की शुरुआत ,धूप वाली ठण्ड, मन को तसल्ली ...मिलती है इस सुकून के साथ की आगे के पांच..छ माह अच्छे गुजरेंगे --ना भी गुजरें तो भी ...अक्सर ही ऐसी बेमौसमी सोच निरर्थक ख्यालों के पुल पर इस पार से उस पार ,इधर से उधर आते जाते रहतें हें, किसी भी आकस्मिकता के लिए मन तैयार नहीं होता ..आशाएं पनपती है और घट भी सकती है ,एक धमक धमनी में होती है गर्म आंच से ज्यादा -अन्तश्चेतना में बार-बार कुछ घुमड़ता है स्मृति धुंधली नहीं होती,शब्दों के चेहरे धूसर होते जातें है ,सवाल सामने होतें हें ,कोई नई शुरुआत ...एक लिपिबद्ध दस्तावेज आँखों के आगे से गुजरता है ..वो थोडी देर के लिए गुडी-मुडी होजाती है ,संकुचित धूसर शब्दों के पीछे देर तक छिप जाना भी ना कोई देखेगा ना जानेगा ना समझेगा ..फिर कभी शब्दों के साथ डूबना भीतर बहुत भीतर अतल में ......वो वक़्त की परवाह करता है और वो वक़्त को जूती की नोक पर ---गर उसका साथ हो एक स्निग्ध सांत्वना मन को मिलती ...खिलाती है दरारों से झांकता है वक़्त का बदला हुआ चेहरा ..पुराना ...बदले हुए मिजाज में ,सुबह के धुले हुए बालों का एक गुच्छा दायें गाल पर फैल जाता है समय के अन्तराल में डूबा जाता और भीग कर बाहर लौटता सा मन..दस -नौ-सात -पांच-चार- तीन -...एक दस्तक ,उसके सवाल आसान नहीं और जवाब अलबत्ता बेसब्र से ....अक्सर शब्दों में इच्छाएं पंख फड फ्डाती है ..जवाब नहीं मिलता हमेशा एक निस्तब्धता और चौडा शून्य होता है वहां जिसका बहु उपयोग वक़्त जरूरत पर कर लेना बखूबी और दो-दो बातें एक साथ और या एक भी नहीं ,उसकी नजर एक खोजी शिरकत करती है ....किताबें ,चाय की ट्रे ,खाली कप ,कप पर हरे फूल ,उलझा सा मोबाइल चार्जर ,खिड़की के परदों से झांकता धूप का एक संतुष्ट टुकडा शीशे के परे नीम की पतली टहनियों पर थोडा कम-कम हिलती हुई हवा ,हवा से झुकते -टूटते डाल से बिछुड़ते कमजोर पीले पत्ते, उसे सतर्क होने का मौका मिल जाता है ...हाँ तो बात फिर से शुरू होना चाहती है ...बेफिक्र दिखने की चाहना -सहज होने की जद्दो -जहद ..अर्थ दीप्त होकर पसर जाती है , वहीँ आस-पास.. कुछ शब्द बमुश्किल जुड़ते हें ...अपनी तकलीफों को कम आंक कर उसकी आँखों में झाँक कर -थोडा नजदीक ----एक पुरसुकून आसमान की तलाश ,मन खुश था अपने ही सवाल पर जो उसके जवाब की प्रति क्रिया से छूट गया था चलो अच्छा हुआ... एक कांट-छांट मन की सतह पर होती है ..अपनों में कोई गैर तो निकला ..अगर होते सभी अपने तो ?..किसी पुराने गीत की पंक्तियाँ याद आ जाती है ..मन पाखी दूसरी दिशा में उड़ जाता है कोई हथेलियाँ थामता है ..तारों भरी दोपहरी उस अबूझ समय में बीत ही जाती है अँगुलियों में मुडी -फँसी हुई अंगुलियाँ अब तक ..डरती हो ,सवाल खुद से --एक भय उसे सताता है मामूली सी आहट पर चौंकते -सतर्कता में फैलते कानो में समुद्र की लहरों का शोर भर जाता है,दूर से आती बेगम अख्तर की आवाज़ में दादरा ...लहरों के साथ लौटती लय, विलग होती स्मृति .मरी हुई मछली की चमकीली आँखों से उसे टोहती है ...एक वितृष्ण रागात्मकता अन्दर फैलती है ...जल्दी-जल्दी एक आत्मीयता उसकी आँखों में भरने लगती है संकोच भी सुख भी ....थोडा समय स्थिर स्थिति में बीतता है ,थोडा और समय ...नीम के पत्ते तेजी से हवा में लहराते हुए नीचे जमीन पर गिरते हें उसकी सोच की कोई तार्किक परिणिति नहीं मिलती ...दूर से आती आवाज़ ,विपरीत दिशा में फैली दो बाहें ... ख़त्म होता हुआ तीसरा वाक्य..ये उदासी,.. बहुत से रेशमी धागे उलझे-उलझे -की वो वो दो कदम आगे फिर पीछे ---उसकी आँखों में नीली चमक है ..सीढियों में बहते पानी में नंगे पैर रख कर उतरने का सुख ..ऐसी आकस्मिकता के लिए वो तैयार नहीं होती ..बात फिर नए सिरेसे शुरू होना चाहती है बहुत से मुडे -तुडे शब्द सीधे होतें -खुलते हें ,वो शब्दों को निचोड़ती है ....गीले शब्दों से एक बूँद पानी नहीं ताजुब्ब ,है बहुत कुछ बीतता है ,संभावनाएं भी, प्रेम की वजहें भी, अनसुलझी इच्छाएं भी ,लरजती रौशनी भी, बहुत सी जागी रातें और सोये दिन भी .
और तुम उदास हो ,तुम्हारी उदासी में पढता हूँ में ...अंधेरे में जीने का सच विशिष्ट चेतना के कवि लाल्टू की कविता की पंक्तियाँ .

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

माँ मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी... शब्द घुप्प अंधेरों में चले गये थे ,मां के अर्थों में शब्दों को ढूढना कितना मुश्किल ...//


शब्द घुप्प अंधेरों में चले गये थे ,मां के अर्थों में शब्दों को ढूढना कितना मुश्किल ...मां थी जब सूरज यूँ ही नियत स्थान से निकलता था लेकिन डूबता मां की आँखों में ही था ..कितने ही काम, ताजे-बासे ,कितनी आशाएं ,कितनी चिंताएं एक साथ संजोई दिखलाई पड़ती थी उनकी आँखों में, मां थी तो खुशहाल थी जिन्दगी और बेफिक्र भी और अब एक जमा हुआ सन्नाटा अन्दर- भीतर गहरे तक... मां से ही थी हमारी इच्छाएं -अकां छायें ,और बिन तुम्हारे इतने शुद्र -कातार ये मन -तन ..क्या कहूं किस्से कहूँ .सुनो मां मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी जैसे अपनी म्रत्यु से ठीक पहले सुना था तुमने ..विश्नुसह्स्त्र नाम,गणपति अथर्व शीर्ष पाठ ,बंद आँखों से और जर्जर काया में तकलीफों के साथ आती जाती साँसों के बीच ...वो एक साफ और उजली रात थी रात का अंतिम प्रहर जब मां ने साथ छोड़ दिया ..कभी ना भूलने वाले पल ...निरंतर नेह की नीड़ बुनती स्मृतियों में एकदम ताजा कभी न धुंधली पड़ने वाली मां ..मंत्रोचार सी पवित्र ,मेरी मां मुझे तुम कभी नहीं भूलती हर दिन तो याद करती हूँ हर पल तो परछाई सी साथ चलती हो धमनियों में गूंजती हो ,तुम्हारी आवाज और बेटा के साथ नाम का उच्चारण आज भी मन भर देता है एक तपी हुई स्नेहिल गंभीरता तुम्हारे चेहरे पर हमेशा बनी रहती,हम सभी की छोटी उपलब्धियों पर हमें विशिष्ट बना देने वाली मां ,हमें सर माथे पर रखने वाली तुम्हे कितना याद करूँ कितना भूलूँ ..मां मां ..हमें अपने घर-परिवार के स्वार्थ में गुम होते कभी सच कभी झूट बोलते देखती सब कुछ जान कर भी अजान बनी रहती तुम हमारी ख़ुशी में खुश और दुःख में दुखी होजाती तुम ----तुम्हारे अनमोल शब्द कुछ सीखें -सौगातें तुम्हारा दिया हुआ सूर्य मन्त्र आज भी जपती हूँ -रो पड़ती हूँ अचानक जब तुम उमड़ती हो अंतस में.. तो सब कहतें हें पागल है मां तुम्हारी याद आती है तो बस आती है तुम्हारी बातें पेड़ नहीं काटना ,बालों को छोटा नहीं रखना ,गुरुवार को हल्दी का उबटन करना केले के पेड़ की पूजा करना ,तुलसी में शाम पड़े दिया जलाना ,दुःख-सुख में इश्वर को सहभागी बनाना ,..भरसक कोशिश करती हूँ उन्हें निभाना ,मां तुम्हारे कई रंग यादों के जल में डूबते-उतराते रहतें हें ..तुम्हारे दुखों की गठरी तुम्हारे सुखों की गठरी से बड़ी थी माफ करना हमें दुख तो बाँट नहीं पाए तुम्हारे हिस्से का सुख भी नहीं दे पाये ..शर्मिन्दा हें ...तुम चली गई .बरस दिन बीते -पतझर वसंत भी आये ..सारे मौसमों में बीतती हो तुम ..जब साडियों के ढेर उलटती-पलटती हूँ तुम्हारी दी हुई-पहनी हुई साडियों में तुम्हारी देह गंध को सजीव पाती हूँ अपनी पीठ -माथे पर तुम्हारा ताजा स्पर्श महसूस कर सकती हूँ आज भी...
वो द्रश्य स्तब्ध कर देने वाला था तुम्हारी मृत देह सामने थी आवाज मानो छिल गई थी एक दिन पहले आर्शीवाद में उठा हाथ ...अध् मुंदी आँखों से विस्मृति के अथाह में तुम डूब-उतरा रही थी में महसूस कर सकती थी तुम्हारे स्मृति के बवंडरों को शायद हमारे बचपन ,अपनी खुशियों -दुखों और बिछोह को--फिर तुम्हे होश नहीं आया ,संसार की सर्व श्रेष्ठ मां मेरी तुम...चीजों के प्रति, इस दुनिया के प्रति कितनी निर्लिप्त...मैंने कभी तुम्हे अपने लिए बड़े चाव से कभी कुछ ना खरीदते देखा ना पहनते ...कैसे काबू पाती थी ,,,नहीं सीख पाई ..तुम्हारे हाथों की बनी मैथी-भाजी ,आम की लौंजी ,नीबू लहसन का अचार फिर कभी नहीं मिल पाया तुम थी तो हमारी जिन्दगी सौंधी सी महकती थी ...राह तक-तक बेटियों की बात जोहते तुम्हारे उदास जर्जर दिन बीतते रहे कितना सहा-कितना जिया तुमने ये हिसाब करने बैठती हूँ तो अपने को धिक्कारती हूँ ..जिन्दगी अब भी जा रही है ...छोटे से बड़े सुख दुःख में तुम याद आती हो तुम्हारे सारे आर्शीवाद फलीभूत हुए ..लेकिन तुम्हारे निष्टूर देवी-देवता जिनके लिए उम्र का एक हिस्सा गुजार दिया तुमने दूसरा हमारी खा.तिर,... इश्वर पर तुम्हारी अटूट आस्था ,अगाथ श्रधा .इस दुनिया में अपनों परायों से झेले गए मान-अपमान आवहेलनाएँ -चाहूँ तो भी नहीं भूल पाउंगी..बाद में दूसरी चीजों के साथ तुम्हारे पूजा घर के भगवानों का बंटवारा हुआ कुछ सस्कृत के श्लोक के साथ तुम्हारे उपन्यास और किताबें मेरे हिस्से आ गई ..उनमे वो किताबें और अखबारों की कटिंग भी थी जिनमे मेरी रचनाएं प्रकाशित हुई थी ..अपनी माँ जैसी कद-काठी -सुघड़ता नए और पुराने का अद्भूत मिश्रण मैंने आज तक किसी दूसरी स्त्री में नहीं देखा ..मान होता है अपने पर एक सादगी भरा जीवन जीकर अपनों से ज्यादा परायों के लिए हर तरह से तत्पर रहने वाली माँ तुम अब कहाँ मिलोगी , एक प्रसंग ज्यों का त्यों बना हुआ है स्मृति में मेरी ... जब मेरी बेटी होने वाली थी शाम सात बजे से सुबह तक तुम लेबर रूम के बाहर खडी रही मुझे तुम्हारे डॉक्टर को बोले शब्द आज भी याद है ...आपरेशन नहीं होगा वो मेरी बेटी है ..थोडी तकलीफ तो होगी बाद में तुम मेरे पास ही सिरहाने थी पसीने भरे सर पर तुम्हारा चुम्बकीय सुख भरा हाथ -स्पर्श कभी नहीं भूल पाती हूँ , ऊसके बाद तुम्हारा द्रढ़ विशवास --बेटी हुई उसके पहले जनम दिन पर लिखी आर्शीवाद चिठ्ठी ,वैसी की वैसी रखी है सहेजी ..अनेकों शुभकामना वाली ..वो इसी वर्ष पढने अमेरिका चली जायेगी जैसा तुमने लिखा और कहा था ;हमें ले जाना नहीं भूलना ..तुम तो हमेशा हमारे साथ हो ..इस कोलाहल में ,इस भीड़ में इतने अपनों-अजनबियों में ..तुम अलोप हो फिर भी शेष हो मुझमे मेरी इस दुनियादारी में .माँ... माँ मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी
अपनी माँ की पांचवी पुण्य स्मृति में [दो सितम्बर o5 ] सुनो माँ ,मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी ये एक लम्बी कविता लिखना चाहती थी लेकिन कभी पूरी ही नहीं कर पाई ...

शनिवार, 29 अगस्त 2009

/इच्छाओं की एक छूटी हुई अधूरी फेहरिशत में हमारे नमकअश्रु के प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में तुम चाहो तो भी ना चाहो तो भी

तुम नही चाहोगे तो भी
बदलेंगे .मौसम
घूमेगी..धरती
बरसेंगे बादल और आएँगे ,याद हम
और वे लौटेंगी तितलियाँ ..
बेहिचक तुम्हे छू कर,
जिनके पंखों पर लिक्खी
समय ने कदाचित्
एक इंद्रधनुषी इबारत
तुम नही चाहोगे --तो भी,
इस ब्रह्मांड के ख़त्म
होने से पहले देखोगे -निर्विकार
अपने को दोहराए जाते
वक़्त की तरल -सघन रफ़्तार में
तुम नही चाहोगे तो भी
पानी में घुली मिठास सा
पुरइतमीनान समय
करेगा निरस्त -सारी दलीलें को
निश्चित नतीजों की तरह
तुम नही चाहोगे तो भी
आदि- उत्सव की सुगंध सी प्रतिज्ञाएँ
रहेंगी हमारे साथ,
इच्छाओं की एक छूटी हुई
अधूरी फेहरिशत में
हमारे नमकअश्रु के
प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में
तुम चाहो तो भी
ना चाहो तो भी...

"एक ही शख्स था, एहसास के आईने में... कभी शबनम, कभी खुशबु, कभी पत्थर निकला..." - तालिब जैदी (अपनी डायरी की शायरी से...)

सोमवार, 17 अगस्त 2009

एक तपिश थी शब्दों को जलना था,वहीँ म्रत्यु की पदचाप थी, चमत्कार था ,अनेक नामो में समाई उसकी उष्मा थी... //

क्या वो इक्छाओं का परिविस्तार था .उच्चारित स्वरों में ,ना कह कर भी कितने गहरे उतर गई एक उम्र वसंत मेरे भीतर था ,वर्षा और शीत भी आग की लपट भी और उमस भी थी, साथ जीने की जीवनेछा धुंधले पृष्टों में दबी थी बीते कई मौसमों की पदचाप थी घर के जिस कोने में दिया जलता था धुंआ था जिसमे बनती-बिगडती आकृतियाँ थी सपने बागी थे बंद दरवाजों पर दस्तक थी .घुप्प अंधेरों के बावजूद दूर कहीं झिलमिल थी पास आती आवाजें थी, अचीन्ही राहों में फलित प्रार्थनाए थी रेशा-रेशा चित्रित था,बगीचें की घांस पर ठंडी ओस थी ,खिले फूलों की महक थी ,एक सफेद लिफाफे पर अगरबत्ती का पीलाजला हुआ कडुवा निशान था, में आउंगा तुम्हारे पास मन्त्र की मानिंद दोहराव था इन्द्रधनुष उस वक़्त उपस्थित था,समय ने आगाह किया था .यू ही हंसते-हंसते उदासी थी, नील स्वप्न्जल में हरी काई थी,पानी की सतह पर इक्छाओं के गले पंख थे तल में सीप से मोती नदारत था ,फिर भी प्रेम दीप्त समय में डूबती तृप्ति का अथाह था, तलघर की आखरी सीढ़ी थी ,तभी बसता था घर, जहाँ सुख की दोपहरी थी ,एक किस्सा था, जिसने छुआ था,एक घटना का समारंभ था,करवट बदलती सदी थी, और जुट पाया तभी तो जीने का प्रपंच था ,सलवटों भरी उदासी थी, भय की जड़ता थी, पत्ते खडकते थे,सप्तरिशियों से भरा आकाश था,कई हंसते सितारे थे कोई पुकारता था ,लय थी ,प्रेम करना जटिल था ,गरुडपुराण में कैद अगला-पिछला जनम था,चीजें साफ थी, पलते सपने थे ,निरापद थे , एक लम्बी चुप्पी थी ,दुर्दांत अभिलाषा थी ,तकलीफों से छिले निर्वासित दिन-रात थे ,एक सख्तशिला थी सीने में जमा थी ,कोशिशे बेकार थी बारिशों में यू ही भटकते थे जन्म दर जनम,कहा भी अनकहा था ,समय को निशेष देखती दो आँखें थी ,रिश्ते कागज़ के थे ,आग की लपटें थी ,चीजों को ढहना था ,एक तपिश थी शब्दों को जलना था,वहीँ म्रत्यु की पदचाप थी, चमत्कार था ,अनेक नामो में समाई उसकी उष्मा थी.
एक गध्य दृश्य गीत :- बहुत दिनों से, बहुत से शब्द बेठिकाने थे...इस ब्रह्माण्ड की धुल धक्कड़ में...

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

//कच्चे कचनार के नीचे खड़े भाई खूब याद आते हैं... उस छोटी दुनिया में बड़ी खुशियाँ हासिल थी जहाँ हमे..//

किसी छोटे बच्चे की गुल्लक मैं रखी ,सहेजी और जतन से जोड़ी गई निधि की तरह , उसके भीतर छोटे बड़े सिक्कों और मुडे-तुडे नए पुराने नोटों की शक्ल मैं जब स्मृतियों को जोड़ती हूँ ...वक़्त जरूरत तोड़ती हूँ --फिर सोचती हूँ ,यदि स्मृतियों को जीवन से हटा दें या उसमें से घटा दें तो आत्मा मैं क्या बचेगा? सिर्फ मुह चिढाता सा ...शेष समय ही नहीं क्या?
बचपन मैं हमारे घर मैं वर्ष भर उत्सव का वातावरण बना रहता था,दो भाई- चार बहने सबसे छोटे हम ,बड़े भाई से हमारी हमेशा अघोषित फर्माइशे रहती वो खूब मेहनत करते खूब कमाते वो जिस मुकाम पर थे उनसे घर खुशहाल था कोई बड़ी इक्छा ना उनकी थी ना हमारी जो थी वो सब पूरी होती थी ..मुझे लिखते हुए वास्तव में गर्व होता है की हमारे भाई मैं कोई ऐसी आदत ना थी जिसे व्यसन कहतें हें ..शांत स्वभाव के धीर गंभीर व्यक्तितव वाले रूप मैं ही उन्हें देखा ...जाना घर के हर सदस्य के परिचित दोस्तों के वो दोस्त हुआ करते हम अंदरूनी तौर पर एक आदरणीय भाव के साथ उनसे डरा करते हमारी छोटी सी दुनिया में बड़ी खुशियाँ हांसिल थी हमें भाई और मां की हुकूमत में रहना सभी की आदत बन गई थी उनकी अवहेलना करना, ये सोच तक हमारे भीतर कभी नहीं बनी.. नाते रिश्तेदारों का आना -जाना बना रहता, गर्मियों की छुट्टियों और अन्य मौकों पर बहने आती उनके पति- बच्चे मां एक अज्ञात सुख से भर जाती, सोचती हूँ तो लगता है मां की दुनिया कितनी सरल थी.. फिर घूमना मौज मस्ती फिल्मे देखना खरीददारी नए कपडे .. संग त्यौहार ,.रूठना मनाना सब कुछ पढाई के साथ चलता रहता..रात मैं महफिल जमती... भाई बहुत अच्छा गाते एक कशिश थी उनकी आवाज में मोहम्मद रफी से उनकी आवाज उन्नीस ही होगी , घर के हर सदस्य और मेहमान को गाना अनिवार्य होता मां हमेशा जज होती और ..भाई हमेशा अव्वल आते मैं दूसरे नंबर पर बाद में भाई के कहने पर ही बी ए मैं एक सब्जेक्ट के तौर पर मैंने संगीत को चुना. कुछ गाने जैसे "ओ दूर .. के मुसाफिर[उड़न खटोला]", "सुहानी रात ढल चुकी [दुलारी]", "टूटे हुए ख़्वाबों ने [मधुमती]", "सीने में सुलगतें हें अरमां[संगदिल]".आदि दिल दिमाग की स्मृतियों में गहरे खजाने की तरह बसे हैं उनकी आवाज़ में, जब तक गर्मियों की छुट्टियां और मेहमान -रिश्तेदार रहते एक हलवाई हमारे यहाँ मुकरर रहता जिसे भाई और मेरी फरमाइश पर ताजा आलू चिप्स,हींग वाली मूंगदाल के पकौडे ,दही बड़े , बेसन की मोटी सेंव ,बड़ी इलायची के दाने डली बड़ी बूंदी [नुकती] बनती जिसे मेहमानों के चले जाने के बाद भी हम खाया करते...टोकरी भर-भर आम आते ..आम रस के साथ कुर डाई[एक तरह के गेहूं के आटे के पापड] तली जाती. पूरण पोई [चने के दाल की मीठी रोटी ]और भी एसा बहुत कुछ जिन्हें खाए बरस बीत चुकें हैं .. हंसी भी आती है दुःख भी होता है ..हम भाई बहनों का प्रेम भी सच्चा और लड़ाई दोनों ही सच्ची हुआ करती थी ,धीरे-धीरे सबके ठौर ठिकाने अलग होते चले गये,अपना घर अपने बच्चे ,अपनी दुनिया और इस दुनिया के स्वार्थ और उसी में जीते-मरते हम दूर होते चले गए ..यादों में एक कच्चा हरा कचनार का पेड़ अब भी आँगन में है जिसमे ढेर से गुलाबी फूल साल भर खिलते जब भी हम जाते और लौटते भाई हमेशा बाहर तक छोड़ने आते थोडा और रुकने खाना खाकर जाने की मनुहार करते ...ये वही शहर यहाँ वही पेड़, वही सड़कें वही लोग वही आबो-हवा ,जहाँ हम संग रहे जिए चले ...लेकिन कल जहाँ हम खिलखिलाते थे रूठते थे संग तीज-त्यौहार मनाते थे आज उन घरों में उनके बच्चों की हूकमतें चलती है रिश्तों की नरमाई नहीं है वहां ,कोई शिकायत भी नहीं,भाई भी नहीं ...पांच साल पहले खो गए वो दिसम्बर की एक कडाके की रात में ...और दूसरे दिन एम्बुलेंस से भाई को उतारते लोग ..आँगन में उनका लेटा हुआ शांत चेहरा ,भुलाने से क्या भूलेगा ?कचनार के मुरझाये फूल तब भी बिखरे थे वहां एक हफ्ते पहले ही तो कहा था उन्होंने फ़ोन पर तुम्हे एक बढिया मोबाईल दिलवाना है, हमारे सुख-दुःख में हमेशा साथ खडे रहने वाले वाले भाई नहीं लौटे....फिर दिन भी बीते ७ माह गुजर गए एक दिन दैनिक भास्कर में एक सूचना थी ,अपने भाई के नाम सन्देश भेजें ...सर्वश्रेष्ठ को पुरूस्कार दिया जाएगा ..पुरूस्कार की तो कोई चाह ना थी ..बिना कुछ कहे, सुने, मिले बिना ,जाने वाले भाई से बात करे बिना दम घुट रहाथा ..मैंने लिखा था वो छपा भी और नोकिया का एक मोबाइल फ़ोन भी, यकीनन वो मेरे भाई के कहने पर ही दिया गया था..उनके बिना राखी का त्यौहार कितना फीका होगा मेरे लिए कौन समझ सकता है...
भीगे शब्दों सूखे आंसुओं, पहाड़ सी यादों रूखे मौसमों,
रूठे पलों पर, लपेट मन का धागा भेजती हूँ,
अनन्त से झांको देखो -सुनो- स्वीकारो
मैंने चांदनी खुशबू और हवाओं से की है प्रार्थना
की ले जाएँ वो मेरी असीम शुभकामनाये
की खुश रहो जहाँ रहो तुम
यूँ चले जाने से ख़त्म नहीं होगा
किसी भी जनम ये रिश्ता...

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

कुछ चीजों के साथ समय का फेरा था /औरइतिहास के जीवाश्म मैं परिवर्तित होने से /बचा हुआ समय ही है-/ और था /हमारे पास


कुछ चीजों के साथ समय का फेरा था /औरइतिहास के जीवाश्म मैं परिवर्तित होने से /बचा हुआ समय ही है-/ और था /हमारे पास / तुम कभी नही जान पाओगे /पानी मैं घुलती/मौसमों मैं डूबती/एक सघन सात्विक मौन शाम/तुम्हारे ओझल होने तक /किस कदर निरंतर पीछे छूटती है/लौटती है/और इस छूटे के साथ /किस तरह और कितना कुछ भरता जाता है/ये भी कभी जान पाओ या नही / नही जानती /लेकिन सच कहती हूँ, चाहती हूँ / सारे प्रतीक अपनी रहस्यता छोड़ /प्रतिध्वनित होने लगे, /ध्वनित बार-बार /शहर से दूर/बहुत दूर-दूर तक फैले /खामोश तालाब /किनारे खडे अलसाए खजूर /और उनकी सतही थरथराती परछाई यां/स्याह पत्ते /जंगली मेहँदी की खुशबू /बे शब्द करती हुई /जिसके सहारे ना जाने कितने शब्द सांत्वना देते हें/ कुछ सवाल निरस्त होतें हें/ हों भी तो?/जानती हूँ तुम अनुत्तरित रहोगे/मुमकिन सम्भव खोज लोगे /मेरे लिए कोई विकल्प/और मैं दूर सही /आकाश का नीलापन /देखूंगी तुम्हारी आंखों मैं /या शायद ये भी सम्भव हो /हम तुम इस बरसात मैं /किसी दिन -किसी पुल के नीचे भीगते,/मटमैले पानी मैं पैर डाले /तिनके-घांस ,फूल -पत्तियों -डोंगियों को /देखें एक साथ बहते हुए
[कई बार जो मन, कहना चाहता है ..उसके लिए शब्द दुर्लभ हो जाते हें ,भाषा नही मिलती सिफर होकर भाव गुम हो `जातें हें जो लिखा होता है उस हर लिखे शब्दों के चेहरों पर सफेदी पुत जाती है साक्षी भी कोई नही,कुछ नही ...मनचेतना की गहराई से -नए सिरे से सोचती हूँ -जतन से फिर लिखे को छूना -जीना ,वो ही सामने आता है]

शनिवार, 11 जुलाई 2009

'प्रेम एक ऐसा दृढ़ निश्चय है ,जो हमारी आत्मा के साथ रहता है और जो वतमान को अतीत तथा भावी युगों से जोड़ता है ,


खलील जिब्रान की एक पुस्तक ''दी अर्थ गोड्स का हिन्दी मैं अनुवाद धरती के देवता नाम से ..माई दयाल जैन ने किया था और इसका चौथा सस्करण [१९८९] मैं सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन द्वारा हुआ था जिसकी कीमत केवल रूपये मात्र है जो मुझे देहली के फूटपाथ से मिली ,हो सकता है जिब्रान बहुतों को नापसंद हो लेकिन जो उन्हें पढ़ते रहें होंगे वे जानते हैं ...जीवन संदेश,पागल,बटोही,शैतान ,तूफान और विद्रोही आत्माए आदि उनकी ऐसी कृतियाँ हें जो कभी पुरानी नही होगी धरती के देवता जिब्रान की अन्तिम रचना है जो उनकी म्रत्यु के दो सप्ताह पूर्व प्रकाशित हुई थी इनमे उनके कुछ गध्य गीत भी हें जिसमे संगीत और लय का अलौकिक सौन्दर्य है, जिन्हें बारम्बार पढने पर भी तृप्ति नही होती ....उसी से एक अंश....प्रेम क्या है .......
जिसे हम प्रेम कहतें हैं,वो महान मुक्ति क्या है जो समस्त परिणामों का कारण है और सब कारणों का परिणाम वो क्या शक्ति है जो मौत और जिन्दगी को एक करती है और फिर उनमे एक ऐसा स्वप्न पैदा करती है जो जीवन से भी अधिक विचित्र और मौत से भी अधिक गहरा है
अभी कल ही मैं मन्दिर के द्वार पर खडा था और पास से जाने वाले सभी व्यक्तियों से प्रेम के रहस्यों और लाभों के बारे मैं पूछ रहा था ....एक अधेड़ आयु का व्यक्ति जिसकी शक्ति क्षीण हो चली थी और त्योरियां चढी हुई थी वो कहने लगा ....प्रेम एक जन्म जात दुर्बलता है,जिसे हमने आदि पुरूष से उतराधिकार मैं प्राप्त किया है ...फिर एक नवयुवक जिसका शरीर और भुजाएं सुद्रढ़ थी उसने कहा ...''प्रे एक ऐसा दृढ़ निश्चय है ,जो हमारी आत्मा के साथ रहता है और जो वर्तमान को अतीत तथा भावी युगों से जोड़ता है ,...उसके बाद एक शौकातुर स्त्री गुजरी वो बोली प्रेम एक घातक विष है जिसे पाताल वासी भुजधर सारे लोक मैं फैलातें हें आत्मा उसके प्रभाव मैं नशे से मस्त हो बाद मैं नष्ट हो जाती है ,..एक गुलाबी चेहरे वाली सुंदर लड़की का कहना था कि.....प्रेम एक अमृत है जिसे प्रभात कि वधुएँ बलवान पुरुषों के लिए बरसाती है जिससे वे समस्त आनंद का भोग कर सकें फिर एक काले वस्त्रों मैं लम्बी दाढी वाले व्यक्ति ने कहा कि ....प्रेम एक मुर्खता है जो जवानी के प्रभात के साथ प्रगट होती है और संध्या बेला मैं विदा हो जाती है ,....उसके बाद एक तेजपूर्ण चेहरे वाले आदमी ने शांत और प्रसन्न मुख से कहा प्रेम एक दैवी ग्यान है जो हमारे अन्तरंग और बाहर कि आंखों को प्रकाश प्रदान करता है जिस से हम समस्त वस्तुओं को देवताओं के समान देखने लागतें हैं ,...बाद मैं एक अंधे आदमी ने रोते हुए कहा प्रेम एक गहरी धुंद है जो आत्मा को ढंक देती है जिसमे आदमी अपनी इक्छाओं की प्रति छाया मैं अपनी ही आवाज की प्रति ध्वनी सुनता रहता है फिर एक नवयुवक वीणा बजाते हुए आया और बोला प्रेम एक स्वर्गिक ज्योति है जो सूक्ष्म ग्राही आत्मा की तरंग से चमक कर अपने आस-पास की समस्त वस्तुओं को प्रकाशमान कर देती है ,...फिर एक बूढे ने कहा प्रेम एक दुखी शरीर की विश्रांति है ,जो उसे कब्र मैं प्राप्त होती है फिर पाँच वर्ष का एक बालक दौड़ते हुए आया और उसने कहा ..प्रेम मेरा बाप है प्रेम मेरे माँ-बाप के सिवा कोई नही जानता कि प्रेम क्या है ...
और जब शाम हो चली सभी प्रेम के विषय मैं अपने विचार प्रगट कर चुके ..सन्नाटा होगया तब मैंने मन्दिर मैं एक आवाज सुनी ..जीवन दो चीजों का नाम है -एक जमी हुई नदी और दूसरी धधकती हुई ज्वाला .और धधकती हुई ज्वाला ही प्रेम है ...और मैंने घुटने टेक इश्वर से मन से प्रार्थना की,हे प्रभु मुझे इस धधकती हुई ज्वाला का भोग बना दे और इस पवित्र अग्नि की आहुति बना......
.मैं तुम्हे जिस भी कोण से देखता हूँ ,हर कोण द्रष्टि कोण बन जाता है ...शिव मंगल सिंह सुमन

शुक्रवार, 26 जून 2009

//वक्त के पार -अव्यक्त .उस वक्त की तरह

तुमने
एक बहुत उंचा-नीचा
उबड़-खाबड़,कंटीला-पथरीला
,पहाड़ गढा मेरे लिए
और कहा -जा रहो और
करो इन्तजार ताउम्र
ये आजमाने की कोशिश थी ,या
दूर बहुत दूर रहने की कवायद
नही जान पाई ...फिर एक पुल बुना मैंने ,
अपनी संवेदनाओं के छोटे बहुत छोटे टुकड़े जोड़कर,
ढलान से थोडा ऊपर ,
चट्टानी गहरी खाई के ठीक ऊपर ,
बना पुल तुम्हारे लिए था ...
जहाँ खुला आसमान था ,
और थी जंगली वन्स्पतियों की खुशबू
और एक अनगूंज ...लगातार,
तुम्हे अपना कह सकने के पहले और बाद में,
कोई नाम जैसे ....निर्विकार -नीलाभ
सूर्य ..संदल..शुभम ..या सनातन ,
आदि गौत्र सा बजता है आधी रात शिराओं में ..
.मन है की उदासी नही छोड़ता,
ना जोड़ता है ,ना जुड़ता है,कहीं ओर,
क्या कोई आंसू इस लिखे पर गिरे
ओर कोई शब्द ..वक्त की तरह
धुंदला जाए तभी यकीन करोगे.?
जबकि में
वक्त के पार -अव्यक्त .उस वक्त की तरह
इस समय के साथ
गुमशुदा देहरियाँ ..तलाशती ...
इस बारिशी मौसम के शोर में भी सुन सकती हूँ तुम्हे ,
शुक्रिया दोस्त ,
जिसकी चौखट पर हाथों से पकड़े गए ,संग सितारे ,
ओर आंखों से समेटे गये ..उजाले,
हथेलियों पर स्पर्शों में ..अब भी दर्ज है ,
जब हमारी असंभव इक्षाओं का सम्भव भविष्य लिखा गया
बेमानी सा ....

बाकी सब जो झूट है ....अपनी नई-पुरानी कविताओं के संग्रह से

मंगलवार, 23 जून 2009

//बलात्कार एक स्त्री का अवमूल्यन है,उसके मौलिक अधिकारों का उलंघन,न्यायविदों के हाथ मैं सिर्फ कलम है, कोई मिसाल, नही कोई मशाल नही जिसे बतौर पथ प्रदर्शक


कुछ वर्ष पूर्व मुंबई की एक चलती ट्रेन मैं ,एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार हुआ ,उस कम्पार्टमेंट मैं करीब सात-आठ लोग थे जिनमे एक बडे अखबार का संवाददाता भी था ...उस वक्त टी वी चैनल्स ,अखबारों मैं ये ख़बर प्रमुखता से आई ,और चली गई ...बाद के वर्षों मैं भी देश भर मैं बलात्कार होते रहे ,खबरें बनती रही ,छपती रही और उन्हें टेलीविजन पर दिखाया जाता रहा ....हम आजाद हुए हें तब से अब तक ना जाने कितने बलात्कार के प्रकरण हुए होंगे इसका पूरा ब्योरा राष्ट्रीयअपराध ब्यूरो ही दे सकता है ...पिछले दिनों दिल्ली मैं चलती कार मैं गेंग रेप और फिर भोपाल मैं मुंबई की एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार ......

दरअसल बलात्कार को कानूनन गंभीर अपराध की श्रेणी मैं रखा गया है इंडियन पेनल कोड की धारा ४९८ ऐ मैं औरतों पर हो रहे उत्पीडन को रोकने मैं ये सहायक है ...इसमें अभियुक्त को जमानत पर छोड़ने का प्रावधान भी नही है ,इस सन्दर्भ मैं न्याय मूर्ति कृष्णन अय्यर के एक एतिहासिक फैसले मैं कहा गया था की बलात्कार की शिकार महिला का बयान अभियुक्त को सजा देने के लिए काफी होगा ...लेकिन मासूम -नाबालिग़ लड़कियों के मामलें मैं ये कैसे सम्भव होगा इस बारे मैं कुछ नही कहा गया .राष्ट्रीय रिकार्ड ब्यूरो के १९९० के अनुसार १९९६ तक ८६.७९१ब्लात्कार हुए जिनमे नाबालिग़ लड़कियों -१० वर्ष से कम उमर का प्रतिशत २० हजार ११४.[२३.३] प्रतिशत था और १० से १६ वर्ष की किशोरियों के साथ .४८.९१८[५६.७] प्रतिशत औए १६ से ३० वर्ष की महिलाओं के साथ १२५११[१४.५]प्रतिशत रहा ...,इसमें भी ३० तक की आयु की महिलाएं सर्वाधिक बलात्कार की शिकार हुई ,जबकि ८० प्रतिशत मामले मैं बच्चियों की उम्र १० वर्ष से कम हें एक अनुमान तो ये भी है की बच्चों के साथ किए गये १०० से अधिक यौन कुकर्म मैं से एकाध की ही सूचना या रिपोर्ट मिलती है और जो भी जानकारी सामने आती है वो दिलदहला देने के लिए काफी है अपराध रिकार्ड ब्यूरो भी आख़िर थानों न्यायलयों, एजेंसियों के आधार पर ही तो अपराध का डेटाऔर प्रतिशत निकालता है । सपना सा लगता है क्या हम आजाद देश मैं हैं ,और क्या येवही देश है जहाँ भगत सुखदेव,राजदेव जैसे क्रान्ति कारियों ने अपना बलिदान कर हमें आजाद कराया और उस आजादी का एसा हश्र ?असल मैं हम आत्मा और मन से इतने असुरक्षित और नपुंसक हो गये हैं की दूसरो के लिए कुछ करना ही नही चाहते ...हमने अपनी मान मर्यादा दूसरो के दुःख मैं दुखी होने वाले सहज गुणों को इतने ऊपर ताक पर रख दिया है कि वो अब हमारी अपनी ही पहुँच से दूर हो गएँ है ....ऐसे मैं ,एड्स अवेयरनेस प्रोग्राम, लिंग भेद समानता जैसे नारों-वादों घोषणाओं का कोई अर्थ नही रह जाता जब तक की हम उन तमाम ताकतों को चुनौती नही दे देते जिनकी वजह से औरतों की हैसियत कमतर होती है और उनकी मान-मर्यादा को ठेस लगती है ....यूँ संवेदन हीन होकर लिखने सोचने या कार्य की परिणिति तक पहुँचने से तात्कालिक लाभ चाहे हो जाए, लेकिन दूरगामी परिणाम शून्य होंगे ---और आजाद भारत मैं औरतों के जीवन यूँ ही स्याह अंधेरों मैं तब्दील होते रहेंगे ,---हमारी न्याय व्यवस्था लचर है ..क़ानून अंधा...न्यायविदों के हाथ मैं सिर्फ कलम है ....कोई मिसाल ऐसी नही ,...कोई मशाल ऐसी नही जिसे पथ प्रदर्शक बतौर [रिफरेन्स ]बताया जा सके ....हमारे देखने सोचने ,महसूस करने और फिर लिखने से कितना फर्क पड़ता है.समाज के प्रति विशेष कर औरतों के लिए हमारी नैतिक जिममेदारी की दावेदारी अन्तत ऐसे हादसों के बाद खोखली हो कर रह जाती है ।
किसी स्त्री को सतीत्व भंग की क्षति के साथ जिस गहन भावनात्मक दुःख भय मानसिक दवाब को जीवन पर्यंत तक सहना पड़ता होगा क्या पुलिस ,प्रशासन और अपराधी या सामान्यजन इसे समझ सकतें हैं ...ऐ आई आर १९८० सुप्रीम कोर्ट ५५९ ने कहा भी की स्त्री के लिए बलात्कार म्रत्यु जनक शर्म है ,और जब पीडिता न्याय के लिए गुहार लगाती है तो न्याय[परिणाम]भी उसके हक मैं अक्सर नही आते ---होता तो यही है की अक्सर समाज और परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए बलात्कार के मामले दबा दिए जाते हें चाहे न्याय व्यवस्था कितनीही कड़ी और सच्ची क्यों ना हो ,और बलात्कार होने से अधिक बलात्कार होने का अहसास, कोर्ट मैं विरोधी वकीलों का सामना उनके सवालों के जवाब अन्तत एक बलत्कृत महिला का मनोबल गिरा देतें हैं। १९८३ मैं हुए संशोधनों के बावजूद बलात्कार के संदर्भ मैं किय गये संशोधनों के अनुसार धारा ११४[ऐ ]की उपधारा ऐ बी सी डी औए जी के अंतर्गत बलात्कार के मामले में यदि महिला अदालत मैं ये कहती की उसकी सहमती नही थी तो अदालत को यह मानना पडेगा,लेकिन ये प्रावधान सिर्फ पुलिस,सार्वजनिक सेवा, मैं रत व्यक्ति जेल प्रबंधक डॉ द्वारा बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या महिला के गर्भवती होने की स्थिति मैं हो तो प्रभावी माना जाएगा मगर इस हालत मैं भी मर्जी या सहमती के आधार पर अपराधी के बच निकलने के रास्ते मौजूद है।
बलात्कार एक सर्वाधिक घृणास्पद कार्य है--बलात्कार वास्तव मैं एक स्त्री का अवमूल्यन है इन मामलों मैं वैसे तो दिनाक २८ जनवरी २००० मैं सुप्रीम कोर्ट ने एक एतिहासिक निर्णय मैं कहा था की किसी भी स्त्री के साथ बलात्कार ,उसके मौलिक अधिकारों का उलंघन है,सरकारी कर्मचारियों द्वारा कए गए दुष्कर्म के लिए केन्द्र सरकार को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है विशेषकर हर्जाना अदा करने के लिए .भारतीय सविंधान के अनुछेद २१ के अंतर्गत भारतीय ही नही विदेशी नागरिकों को भी जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है ...अपराध ब्यूरो द्वारा प्राप्त आंकडों की सच्चाई पर भरोसा करना ही पड़ता है यौन हिंसा का आंकडा एक आइना है जिसमें हम औरतों की मुश्किलों को गहराई से देख सकते हैं....
फिर भी महिलाओं की अस्मिता उनके सुख चैन को छीनने वाली ताकतों के खिलाफ देश ही नही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला संगठनों ने अहम् भूमिका निभाई है ,तेजी से बढ़ते सामाजिक सरोकारों अंतर्विरोधों के कारण गरीब-अमीरशिक्षित -अशिक्षित ,ग्रामीण-शहरी,महिलाओं ने अपनी अस्मिता-अस्तित्व और अधिकार की लड़ाई लड़ी है और सफल भी हुई है,अंतत संयुक्त राष्ट्र संघ को ७० का दशक अंतर्राष्ट्रीय महिला दशक के रूप मैं मनाना पढा था ,इसी के बाद महिला आन्दोलन जोर पकड़ते गये कहीं यौन हिंसा मुद्दा बनकर उभरा कही भ्रूण हत्या का विरोध हुआ कही दहेज़ प्रथा जैसी समस्या के लिए मोर्चा बंदी हुई कहीं कामगार की लड़ाई, कहीं स्त्री बिरादरी ने शराब बंद मुहीम छेडी... लेकिन वो बलात्कार के मामलों पर विवश हो कर रह गई है ....दरअसल बलात्कार जैसे अपराध की व्यापकता और उसकी भरपाई क्या इतनी ही है की पीडिता को पुनर्वास और हर्जाना मिले उसके छोभ ,ग्लानी ,उसकी मानसिक स्थिति और उसे तवरित न्याय मिले इसके लिए ---कुछ अन्य मुद्दे भी तय होने चाहिए ,लेकिन सबसे बड़ा सवाल बेमानी होकर रह जाता है की असुरक्षा का जो ये वातावरण है जिसमे औरत जी रहीहै ...उसे कैसे ख़तम किया जाय और वे कारक तत्व जो औरत के सम्मान को नीचा करते हें, जिनसे अपराध को बढावा मिलता है उन पर कैसे काबू पाया जाय .......
...इस लेख के लिए संदर्भ पुस्तक न्याय क्षेत्रे -अन्याय क्षेत्रे ...लेख अरविन्द जैन,एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट,मेरे प्रिय लेखक ..स्त्री के हक मैं उनकी -पुस्तक औरत होने की सजा -एक बेबाक पुस्तक है जिसे उन्होंने लिखा ही नही, महसूस भी किया है ....

रविवार, 14 जून 2009

इच्छाएं, सेकेण्ड की सुई की तरह अन्दर ही अन्दर एक ही वृत में गोल घूमती है... समुद्र किनारे फ़िर जंगल एक नए सिरे से जलता है, पीछे काली ज़मीन छोड़ता...

एक अशिष्ट बदलाव था अध् चटके फूल चटकीली धुप मैं खिले बिना ही सिरे से काले हो सूख कर झड़ रहे थे गर्म बजती हुई हवा सन्नाटे को चीरती, भरी दोपहरी अजीब तर्क जुटाती,...गले ना उतरने वाले ,एक पुर इत्मीनान समय का कोने मैं दुबके बैठे रहना ..किसी विस्मृत नाद का हवा मैं तैरना...कानो तक पहुंचना .किसी शहर मैं अपने को अधूरा छोड़ आना --जहाँ उसकी गिरफ्त से हाथ छूट गया एक निर्वासित नदी ने मूड कर पीछे देखा ,रास्ता बदल गया ..कोई अपना सलीब यू भी ढोताहै ..जैसे तुम?उसके सामने बहुत से सवाल ख़ुद अपने जवाब ढूँढ लेते मौन अनुभवों की अभिव्यक्ति और शब्दों की बेचारगी भी थी...तभी किसी फूल का नाम याद करना उसके रंग खुशबू से अपने को सराबोर करना और एक संभावना के बीच ना ख़त्म होने वाली भीतर की यात्रा करना .जिसका गंतव्य ना था ,कहाँ जीना-मरना होगा ये भी अनिश्चित था बहुत कुछ खोया हुआ छूटा हुआ पाने की भी जद्दो-जहद ना थी -बस बचे हुए हम मैं हमी ...मन की वृतियों और इच्छाओं से संचालित एक सुखद अभ्यास था,उनदिनो-हर दिन एक निर्णायक उतार -चढाव से भरा हुआ... बाद मैं कई दिन बीते -दिनों के भीतर बहुत भीतर उन दुखों के साथ जो सिर्फ अपने सहने और भोगने के लिए थे । ऐसे मैं हर दिन बेसब्र और झुंझलाए दिन की शुरुआत होती मन को भी आख़िर खुश रहने का कोई कारण तलाशना ही पड़ता ,मुख्य द्वार पर आकाश चमेली का पौधा एकदम से बड़ा दिखलाई पड़ता है पिछली बारिश मैं रौपा था--इस बारिश मैं फूल खिल उठे उसमें ..अद्भूत भीनी खुशबू वाले जिसकी लम्बी और नुकीली डंठल को क्रॉस स्टिच की तरह एक दुसरे पर रख कर वेणी गुंथी जा सके -बहुत कुछ बुना-गुना गया असीमित सोच के पार जो बस सोचा ही जा सकता था,सुबह के अखबार के साथ ताजा ठंडी हवा, चाय की केतली ,जामुनी रंगों के गुच्छे के गुच्छे खिले फूल कुछ अलग अंदाज से सम्मोहित करते ....फिर भी समय सोच और समझ के खुरदुरे तल पर बहुत सा काई सा फिसलन भरा जमा हो जाता है ...उचाट मन तिनका रेशा तक साफ कर देना चाहता है ताकि रचे गये सुख के साथ आने वाली सुबह नए दृश्य देखें जा सके ...लेकिन कल शाम मौसम की पहली बारिश मैं गर्मी के मारे झुलसे- मुरझाये पेड़ पत्तियों और सड़कों से धूल बहकर किनारे जा लगी सब कुछ साफ-चमकदार हो गया. रह गया हरियाली के बीच एक हैरान करता एक पत्ता ...जो कहने से बच गया याद रह गया एक तार वाली फेंस के पार से उसकी कविताओं के सन्दर्भ कभी रिक्त तो कभी तिक्त करते -तय से ठीक उलट -निपट अकेली मुफलिसी पर पर रुलाते ..हंसा भी तो नही जाता ..राग द्वेष से परे परमहंस सा जीना क्या सबके बूते की बात है ऐसा भी नही था समंदर भी तैरे थे,और परिंदों से ऊँची उड़ान भी, एक ही साँस मैं खो गया फिर भी जो सच में सच से ज्यादा था ...स्लेटी शाम मुँह ढँक कर सो जाती है -एक उदास जुगनू मुठ्ठी को उजाले से भर जाता है हाथ की नसों में रौशनी की लहर दौडती है मुठ्ठी खुलती है रौशनी आंखों की पकड़ से दूर भागती गायब होती जाती है ...अंधेर भरी टोने-टोटके सी रात डराती है कहीं दूर एक आत्मीयता ढाढस बंधाती है डर नही भागता ...बहुत कुछ स्वीकार ,बहुत कुछ के साथ डूबता है ,डूबने की अपनी दुश्वारियों के साथ डूबने के अपने अंदाज और आवाज के साथ-आपकी काबलियत यही तो नही ना की कब तक बगैर साँस के जी सकते हो ..सतह पर लौटे बिना और लौटना पड़ता है दुबई में होटल अल-कसर और सामने समुद्र... पैरों के नीचे धंसती रेत के साथ हवा में घुलता कोई सपना लहरों के साथ अपने में समेट लेने को बेकाबू उसकी तरफ़ तेज़ी से आता है...वो पीछे पलटती है,एक मात्र बचाने लायक सच बच जाता है... इच्छाएं, सेकेण्ड की सुई की तरह अन्दर ही अन्दर एक ही वृत में गोल घूमती है... समुद्र किनारे फ़िर जंगल एक नए सिरे से जलता है, पीछे काली ज़मीन छोड़ता...एक पत्ते का अरण्यरोदन नहीं रुकता।
"बचना था तुम्हे सपनो से/प्रेम से, एकांत से / तुममे जो एक झरना छिपा था/बचना था उसके शोर से/बचना थे आषाढ़, फाल्गुन और आश्विन से..." (मेरे प्रिय कवि *अलोक श्रीवास्तव* की कविता का अंश)