Friday, June 26, 2009

//वक्त के पार -अव्यक्त .उस वक्त की तरह

तुमने
एक बहुत उंचा-नीचा
उबड़-खाबड़,कंटीला-पथरीला
,पहाड़ गढा मेरे लिए
और कहा -जा रहो और
करो इन्तजार ताउम्र
ये आजमाने की कोशिश थी ,या
दूर बहुत दूर रहने की कवायद
नही जान पाई ...फिर एक पुल बुना मैंने ,
अपनी संवेदनाओं के छोटे बहुत छोटे टुकड़े जोड़कर,
ढलान से थोडा ऊपर ,
चट्टानी गहरी खाई के ठीक ऊपर ,
बना पुल तुम्हारे लिए था ...
जहाँ खुला आसमान था ,
और थी जंगली वन्स्पतियों की खुशबू
और एक अनगूंज ...लगातार,
तुम्हे अपना कह सकने के पहले और बाद में,
कोई नाम जैसे ....निर्विकार -नीलाभ
सूर्य ..संदल..शुभम ..या सनातन ,
आदि गौत्र सा बजता है आधी रात शिराओं में ..
.मन है की उदासी नही छोड़ता,
ना जोड़ता है ,ना जुड़ता है,कहीं ओर,
क्या कोई आंसू इस लिखे पर गिरे
ओर कोई शब्द ..वक्त की तरह
धुंदला जाए तभी यकीन करोगे.?
जबकि में
वक्त के पार -अव्यक्त .उस वक्त की तरह
इस समय के साथ
गुमशुदा देहरियाँ ..तलाशती ...
इस बारिशी मौसम के शोर में भी सुन सकती हूँ तुम्हे ,
शुक्रिया दोस्त ,
जिसकी चौखट पर हाथों से पकड़े गए ,संग सितारे ,
ओर आंखों से समेटे गये ..उजाले,
हथेलियों पर स्पर्शों में ..अब भी दर्ज है ,
जब हमारी असंभव इक्षाओं का सम्भव भविष्य लिखा गया
बेमानी सा ....

बाकी सब जो झूट है ....अपनी नई-पुरानी कविताओं के संग्रह से

Tuesday, June 23, 2009

//बलात्कार एक स्त्री का अवमूल्यन है,उसके मौलिक अधिकारों का उलंघन,न्यायविदों के हाथ मैं सिर्फ कलम है, कोई मिसाल, नही कोई मशाल नही जिसे बतौर पथ प्रदर्शक


कुछ वर्ष पूर्व मुंबई की एक चलती ट्रेन मैं ,एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार हुआ ,उस कम्पार्टमेंट मैं करीब सात-आठ लोग थे जिनमे एक बडे अखबार का संवाददाता भी था ...उस वक्त टी वी चैनल्स ,अखबारों मैं ये ख़बर प्रमुखता से आई ,और चली गई ...बाद के वर्षों मैं भी देश भर मैं बलात्कार होते रहे ,खबरें बनती रही ,छपती रही और उन्हें टेलीविजन पर दिखाया जाता रहा ....हम आजाद हुए हें तब से अब तक ना जाने कितने बलात्कार के प्रकरण हुए होंगे इसका पूरा ब्योरा राष्ट्रीयअपराध ब्यूरो ही दे सकता है ...पिछले दिनों दिल्ली मैं चलती कार मैं गेंग रेप और फिर भोपाल मैं मुंबई की एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार ......

दरअसल बलात्कार को कानूनन गंभीर अपराध की श्रेणी मैं रखा गया है इंडियन पेनल कोड की धारा ४९८ ऐ मैं औरतों पर हो रहे उत्पीडन को रोकने मैं ये सहायक है ...इसमें अभियुक्त को जमानत पर छोड़ने का प्रावधान भी नही है ,इस सन्दर्भ मैं न्याय मूर्ति कृष्णन अय्यर के एक एतिहासिक फैसले मैं कहा गया था की बलात्कार की शिकार महिला का बयान अभियुक्त को सजा देने के लिए काफी होगा ...लेकिन मासूम -नाबालिग़ लड़कियों के मामलें मैं ये कैसे सम्भव होगा इस बारे मैं कुछ नही कहा गया .राष्ट्रीय रिकार्ड ब्यूरो के १९९० के अनुसार १९९६ तक ८६.७९१ब्लात्कार हुए जिनमे नाबालिग़ लड़कियों -१० वर्ष से कम उमर का प्रतिशत २० हजार ११४.[२३.३] प्रतिशत था और १० से १६ वर्ष की किशोरियों के साथ .४८.९१८[५६.७] प्रतिशत औए १६ से ३० वर्ष की महिलाओं के साथ १२५११[१४.५]प्रतिशत रहा ...,इसमें भी ३० तक की आयु की महिलाएं सर्वाधिक बलात्कार की शिकार हुई ,जबकि ८० प्रतिशत मामले मैं बच्चियों की उम्र १० वर्ष से कम हें एक अनुमान तो ये भी है की बच्चों के साथ किए गये १०० से अधिक यौन कुकर्म मैं से एकाध की ही सूचना या रिपोर्ट मिलती है और जो भी जानकारी सामने आती है वो दिलदहला देने के लिए काफी है अपराध रिकार्ड ब्यूरो भी आख़िर थानों न्यायलयों, एजेंसियों के आधार पर ही तो अपराध का डेटाऔर प्रतिशत निकालता है । सपना सा लगता है क्या हम आजाद देश मैं हैं ,और क्या येवही देश है जहाँ भगत सुखदेव,राजदेव जैसे क्रान्ति कारियों ने अपना बलिदान कर हमें आजाद कराया और उस आजादी का एसा हश्र ?असल मैं हम आत्मा और मन से इतने असुरक्षित और नपुंसक हो गये हैं की दूसरो के लिए कुछ करना ही नही चाहते ...हमने अपनी मान मर्यादा दूसरो के दुःख मैं दुखी होने वाले सहज गुणों को इतने ऊपर ताक पर रख दिया है कि वो अब हमारी अपनी ही पहुँच से दूर हो गएँ है ....ऐसे मैं ,एड्स अवेयरनेस प्रोग्राम, लिंग भेद समानता जैसे नारों-वादों घोषणाओं का कोई अर्थ नही रह जाता जब तक की हम उन तमाम ताकतों को चुनौती नही दे देते जिनकी वजह से औरतों की हैसियत कमतर होती है और उनकी मान-मर्यादा को ठेस लगती है ....यूँ संवेदन हीन होकर लिखने सोचने या कार्य की परिणिति तक पहुँचने से तात्कालिक लाभ चाहे हो जाए, लेकिन दूरगामी परिणाम शून्य होंगे ---और आजाद भारत मैं औरतों के जीवन यूँ ही स्याह अंधेरों मैं तब्दील होते रहेंगे ,---हमारी न्याय व्यवस्था लचर है ..क़ानून अंधा...न्यायविदों के हाथ मैं सिर्फ कलम है ....कोई मिसाल ऐसी नही ,...कोई मशाल ऐसी नही जिसे पथ प्रदर्शक बतौर [रिफरेन्स ]बताया जा सके ....हमारे देखने सोचने ,महसूस करने और फिर लिखने से कितना फर्क पड़ता है.समाज के प्रति विशेष कर औरतों के लिए हमारी नैतिक जिममेदारी की दावेदारी अन्तत ऐसे हादसों के बाद खोखली हो कर रह जाती है ।
किसी स्त्री को सतीत्व भंग की क्षति के साथ जिस गहन भावनात्मक दुःख भय मानसिक दवाब को जीवन पर्यंत तक सहना पड़ता होगा क्या पुलिस ,प्रशासन और अपराधी या सामान्यजन इसे समझ सकतें हैं ...ऐ आई आर १९८० सुप्रीम कोर्ट ५५९ ने कहा भी की स्त्री के लिए बलात्कार म्रत्यु जनक शर्म है ,और जब पीडिता न्याय के लिए गुहार लगाती है तो न्याय[परिणाम]भी उसके हक मैं अक्सर नही आते ---होता तो यही है की अक्सर समाज और परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए बलात्कार के मामले दबा दिए जाते हें चाहे न्याय व्यवस्था कितनीही कड़ी और सच्ची क्यों ना हो ,और बलात्कार होने से अधिक बलात्कार होने का अहसास, कोर्ट मैं विरोधी वकीलों का सामना उनके सवालों के जवाब अन्तत एक बलत्कृत महिला का मनोबल गिरा देतें हैं। १९८३ मैं हुए संशोधनों के बावजूद बलात्कार के संदर्भ मैं किय गये संशोधनों के अनुसार धारा ११४[ऐ ]की उपधारा ऐ बी सी डी औए जी के अंतर्गत बलात्कार के मामले में यदि महिला अदालत मैं ये कहती की उसकी सहमती नही थी तो अदालत को यह मानना पडेगा,लेकिन ये प्रावधान सिर्फ पुलिस,सार्वजनिक सेवा, मैं रत व्यक्ति जेल प्रबंधक डॉ द्वारा बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या महिला के गर्भवती होने की स्थिति मैं हो तो प्रभावी माना जाएगा मगर इस हालत मैं भी मर्जी या सहमती के आधार पर अपराधी के बच निकलने के रास्ते मौजूद है।
बलात्कार एक सर्वाधिक घृणास्पद कार्य है--बलात्कार वास्तव मैं एक स्त्री का अवमूल्यन है इन मामलों मैं वैसे तो दिनाक २८ जनवरी २००० मैं सुप्रीम कोर्ट ने एक एतिहासिक निर्णय मैं कहा था की किसी भी स्त्री के साथ बलात्कार ,उसके मौलिक अधिकारों का उलंघन है,सरकारी कर्मचारियों द्वारा कए गए दुष्कर्म के लिए केन्द्र सरकार को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है विशेषकर हर्जाना अदा करने के लिए .भारतीय सविंधान के अनुछेद २१ के अंतर्गत भारतीय ही नही विदेशी नागरिकों को भी जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है ...अपराध ब्यूरो द्वारा प्राप्त आंकडों की सच्चाई पर भरोसा करना ही पड़ता है यौन हिंसा का आंकडा एक आइना है जिसमें हम औरतों की मुश्किलों को गहराई से देख सकते हैं....
फिर भी महिलाओं की अस्मिता उनके सुख चैन को छीनने वाली ताकतों के खिलाफ देश ही नही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला संगठनों ने अहम् भूमिका निभाई है ,तेजी से बढ़ते सामाजिक सरोकारों अंतर्विरोधों के कारण गरीब-अमीरशिक्षित -अशिक्षित ,ग्रामीण-शहरी,महिलाओं ने अपनी अस्मिता-अस्तित्व और अधिकार की लड़ाई लड़ी है और सफल भी हुई है,अंतत संयुक्त राष्ट्र संघ को ७० का दशक अंतर्राष्ट्रीय महिला दशक के रूप मैं मनाना पढा था ,इसी के बाद महिला आन्दोलन जोर पकड़ते गये कहीं यौन हिंसा मुद्दा बनकर उभरा कही भ्रूण हत्या का विरोध हुआ कही दहेज़ प्रथा जैसी समस्या के लिए मोर्चा बंदी हुई कहीं कामगार की लड़ाई, कहीं स्त्री बिरादरी ने शराब बंद मुहीम छेडी... लेकिन वो बलात्कार के मामलों पर विवश हो कर रह गई है ....दरअसल बलात्कार जैसे अपराध की व्यापकता और उसकी भरपाई क्या इतनी ही है की पीडिता को पुनर्वास और हर्जाना मिले उसके छोभ ,ग्लानी ,उसकी मानसिक स्थिति और उसे तवरित न्याय मिले इसके लिए ---कुछ अन्य मुद्दे भी तय होने चाहिए ,लेकिन सबसे बड़ा सवाल बेमानी होकर रह जाता है की असुरक्षा का जो ये वातावरण है जिसमे औरत जी रहीहै ...उसे कैसे ख़तम किया जाय और वे कारक तत्व जो औरत के सम्मान को नीचा करते हें, जिनसे अपराध को बढावा मिलता है उन पर कैसे काबू पाया जाय .......
...इस लेख के लिए संदर्भ पुस्तक न्याय क्षेत्रे -अन्याय क्षेत्रे ...लेख अरविन्द जैन,एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट,मेरे प्रिय लेखक ..स्त्री के हक मैं उनकी -पुस्तक औरत होने की सजा -एक बेबाक पुस्तक है जिसे उन्होंने लिखा ही नही, महसूस भी किया है ....

Sunday, June 14, 2009

इच्छाएं, सेकेण्ड की सुई की तरह अन्दर ही अन्दर एक ही वृत में गोल घूमती है... समुद्र किनारे फ़िर जंगल एक नए सिरे से जलता है, पीछे काली ज़मीन छोड़ता...

एक अशिष्ट बदलाव था अध् चटके फूल चटकीली धुप मैं खिले बिना ही सिरे से काले हो सूख कर झड़ रहे थे गर्म बजती हुई हवा सन्नाटे को चीरती, भरी दोपहरी अजीब तर्क जुटाती,...गले ना उतरने वाले ,एक पुर इत्मीनान समय का कोने मैं दुबके बैठे रहना ..किसी विस्मृत नाद का हवा मैं तैरना...कानो तक पहुंचना .किसी शहर मैं अपने को अधूरा छोड़ आना --जहाँ उसकी गिरफ्त से हाथ छूट गया एक निर्वासित नदी ने मूड कर पीछे देखा ,रास्ता बदल गया ..कोई अपना सलीब यू भी ढोताहै ..जैसे तुम?उसके सामने बहुत से सवाल ख़ुद अपने जवाब ढूँढ लेते मौन अनुभवों की अभिव्यक्ति और शब्दों की बेचारगी भी थी...तभी किसी फूल का नाम याद करना उसके रंग खुशबू से अपने को सराबोर करना और एक संभावना के बीच ना ख़त्म होने वाली भीतर की यात्रा करना .जिसका गंतव्य ना था ,कहाँ जीना-मरना होगा ये भी अनिश्चित था बहुत कुछ खोया हुआ छूटा हुआ पाने की भी जद्दो-जहद ना थी -बस बचे हुए हम मैं हमी ...मन की वृतियों और इच्छाओं से संचालित एक सुखद अभ्यास था,उनदिनो-हर दिन एक निर्णायक उतार -चढाव से भरा हुआ... बाद मैं कई दिन बीते -दिनों के भीतर बहुत भीतर उन दुखों के साथ जो सिर्फ अपने सहने और भोगने के लिए थे । ऐसे मैं हर दिन बेसब्र और झुंझलाए दिन की शुरुआत होती मन को भी आख़िर खुश रहने का कोई कारण तलाशना ही पड़ता ,मुख्य द्वार पर आकाश चमेली का पौधा एकदम से बड़ा दिखलाई पड़ता है पिछली बारिश मैं रौपा था--इस बारिश मैं फूल खिल उठे उसमें ..अद्भूत भीनी खुशबू वाले जिसकी लम्बी और नुकीली डंठल को क्रॉस स्टिच की तरह एक दुसरे पर रख कर वेणी गुंथी जा सके -बहुत कुछ बुना-गुना गया असीमित सोच के पार जो बस सोचा ही जा सकता था,सुबह के अखबार के साथ ताजा ठंडी हवा, चाय की केतली ,जामुनी रंगों के गुच्छे के गुच्छे खिले फूल कुछ अलग अंदाज से सम्मोहित करते ....फिर भी समय सोच और समझ के खुरदुरे तल पर बहुत सा काई सा फिसलन भरा जमा हो जाता है ...उचाट मन तिनका रेशा तक साफ कर देना चाहता है ताकि रचे गये सुख के साथ आने वाली सुबह नए दृश्य देखें जा सके ...लेकिन कल शाम मौसम की पहली बारिश मैं गर्मी के मारे झुलसे- मुरझाये पेड़ पत्तियों और सड़कों से धूल बहकर किनारे जा लगी सब कुछ साफ-चमकदार हो गया. रह गया हरियाली के बीच एक हैरान करता एक पत्ता ...जो कहने से बच गया याद रह गया एक तार वाली फेंस के पार से उसकी कविताओं के सन्दर्भ कभी रिक्त तो कभी तिक्त करते -तय से ठीक उलट -निपट अकेली मुफलिसी पर पर रुलाते ..हंसा भी तो नही जाता ..राग द्वेष से परे परमहंस सा जीना क्या सबके बूते की बात है ऐसा भी नही था समंदर भी तैरे थे,और परिंदों से ऊँची उड़ान भी, एक ही साँस मैं खो गया फिर भी जो सच में सच से ज्यादा था ...स्लेटी शाम मुँह ढँक कर सो जाती है -एक उदास जुगनू मुठ्ठी को उजाले से भर जाता है हाथ की नसों में रौशनी की लहर दौडती है मुठ्ठी खुलती है रौशनी आंखों की पकड़ से दूर भागती गायब होती जाती है ...अंधेर भरी टोने-टोटके सी रात डराती है कहीं दूर एक आत्मीयता ढाढस बंधाती है डर नही भागता ...बहुत कुछ स्वीकार ,बहुत कुछ के साथ डूबता है ,डूबने की अपनी दुश्वारियों के साथ डूबने के अपने अंदाज और आवाज के साथ-आपकी काबलियत यही तो नही ना की कब तक बगैर साँस के जी सकते हो ..सतह पर लौटे बिना और लौटना पड़ता है दुबई में होटल अल-कसर और सामने समुद्र... पैरों के नीचे धंसती रेत के साथ हवा में घुलता कोई सपना लहरों के साथ अपने में समेट लेने को बेकाबू उसकी तरफ़ तेज़ी से आता है...वो पीछे पलटती है,एक मात्र बचाने लायक सच बच जाता है... इच्छाएं, सेकेण्ड की सुई की तरह अन्दर ही अन्दर एक ही वृत में गोल घूमती है... समुद्र किनारे फ़िर जंगल एक नए सिरे से जलता है, पीछे काली ज़मीन छोड़ता...एक पत्ते का अरण्यरोदन नहीं रुकता।
"बचना था तुम्हे सपनो से/प्रेम से, एकांत से / तुममे जो एक झरना छिपा था/बचना था उसके शोर से/बचना थे आषाढ़, फाल्गुन और आश्विन से..." (मेरे प्रिय कवि *अलोक श्रीवास्तव* की कविता का अंश)

Wednesday, May 20, 2009

एक चौकन्नी चिडिया की तरह मन आसन्न खतरे को भांप लेता है ओर एक खीज भरे रास्ते से गुजर जाता है... क्या मांगू उससे वो सब कुछ दे सकता है.

वो जितना आगे बढ़ी थी ,उतना ही पीछे लौटना था ..उस मुकाम से जहाँ वो थी आदेश पहले था और नियति बाद मैं ..गिने चुने क़दमों के साथ बिल्कुल आगे देखते हुए ..लौटना पीछे की ओर नियत दूरी को पैरों से साधते हुए .बचपन मैं ये खेल भाई-बहन दोस्तों के साथ खेलते हुए वो हर दम हार जाती आगे बढ़ना तो ठीक था लेकिन लौटना क्या इतना आसन था,एक बार जीत की आशा औरजोश मैं वो पाँच छह कदम पीछे लौटी और चकरा -कर गिर गई ..मामूली चोटें आई भाई ने डांटा आँखे क्यों मूँद लेती हो ..बस यही गलती है ..बाद मैं उसने गौर किया खुली आंखों चीजें देखने महसूस करने से उसे मुश्किल होती सुख-दुःख दोनों मैं सामान्यत वो खेल फिर ता- बचपन उसके लिए मुश्किल ही बना रहा जिसमें वो फिर कभी शामिल ना हो सकी बुद्धि सुलगती है,और सारे जतन हत बुद्धि होकर बैठ जाते हैं ऐसे मौकों पर अपने को निरीह लगना-सोचना भी तो ठीक नही था कुछ नया था जो जिन्दगी मैं घट रहा था ,कुछ भुला कर -कुछ ओर याद रखना अपने मैं समेटे रहना -अतल मैं उमड़ता -घुमड़ता चंदन जल सुगंधी ..फिर भी रंग-बिरंगे मोतियों की माला टूटती है धागा गलता जाता है बिखरे मोती हाथ नही आते ओर एक चौकन्नी चिडिया की तरह मन आसन्न खतरे को भांप लेता है ओर एक खीज भरे रास्ते से गुजर जाता है पुराना सम्मोहन आत्मा को जकड़ता है एक घबराहट मैं मुंदी आंखों पीछे लौटना जरूरी हो जाता है ... क्या मांगू उससे वो सब कुछ दे सकता है ..फिर भी मेरे लेने की सीमाएं हैं ओर उसका गुमान असीम उसकी अनिश्चितता एकदम से उसे हमसफर-ओर अजनबी बना जाती, एक चाबुक सा दिमाग को थरथराता है वो समेटना चाहती है ..सब कुछ बिखरा हुआ .गली गलियारों से लौटते ताजगी-खुशबू भरे दिन एक-एक शब्द सेमल के फूलों की तरह सुर्ख-सुंदर दिल-दिमाग पर टंगते जातें हैं समुद्र की लहरें उसे तेजी से भिगोतीं हैं अपनी ही देह मैं दुःख की आद्रता उसके शब्द सुनते बेआवाज ..वो बस सोच ही तो सकती है क्या वो दोस्ती किसी चुक गए रिश्ते की असफलता की भरपाई थी या कुछ ओर ,या ये, या वो, बस-बस बहस ना करने का इरादा टोकता है .पिघला हुआ सब कुछ पहले सा आकार ना ले पायें लेकिन पहले से बेहतर तो हो ही सकता है बिना कष्ट के लौटना उन रास्तों पर जिन्हें विश्वास के साथ अपनाया था जिसे एक ईमान दारी ओर सम्मान के साथ पाया जा सके बस यही तो इक्छा थी लेकिन उमीदों का बदरंग होना बचे-खुचे रंगों का अन्दर से झांकना -निरर्थक -अर्थों मैं कुछ खोजने जैसा ..जो की एक तरफा बेवकूफी भरी खोज थी बीच उनके ..एक ऐसे सच की तरह जिसके आगे सब कुछ झूटा ओर बौना हो गया था .बस मन के पीछे मन को धकेल कर बैठा जा सकता था ..जो हो ना सका, अँधेरा गाढा था -इधर ओर उसकी गिरफ्त मैं इक्छाओं का कतारबध्ध होकर रह जाना ...कोई चाहता तो हाथ खींच कर रौशनी मैं शामिल कर सकता था अपनी रौशनी मैं ..आसमान अब भी खुला था समुद्र नीला ओर धरती हरी ...पर स्म्रतियों का विसर्जन कर देने पर जिन्दगी राजी खुशी बीत जायेगी क्या ...किसी के हिस्से के दुःख.अपने हिस्से के सुख स्थांतरण कर दिए जाएँ तब भी क्या ...निष्ठा भी क्या लौटाने की चीज है ...जोड़ी घटाई गई इक्छायें ..अपना ही पोस्ट मार्टेम ओर कुछ हांसिल ना होना अपने को मरते -जीते देखना ..आधे चाँद का साक्षी होना ..किसी बियाँबान से गुजर कर हजारों बार पूरी रात का असुविधा जनक सफर ...एक सिरे से शुरूआत अंत के पहले बीच मैं अंत. एक आद्रता मन मैं फैलती है आंखों की कोरों मैं उलझ जाती है चांदी सा झिलमिलाता कोई आंसुओं मैं घुलता जाता है गलती कहाँ हुई ...मुश्किलें शब्दों से हल हो जाएँ जरूरी तो नही ....
जैसे की समय को मेरी याद आई हो ऐसे बेवक्त ,जब कोई मुझे याद आता है भूले हुए समय मैं से, मैं आ जाता हूँ उसकी समुद्रों ओर पहाडों से घिरी हुई हथेली पर ,कभी-कभी,ओर कभी कभी अपनी आंखों के पलकों जितने करीब ओर अपने लिए अद्रश्य हो जाता हूँ (मेरे प्रिय कवि लीलाधर जगूडी की कविता का अंश )

Saturday, May 9, 2009

// लाल कृष्ण आडवाणी के सितारें गर्दिश मैं...हार की संभावना ..सुनिश्चित

लगभग साढे पन्द्रह लाख आबादी वाले अहमदाबाद की गांधी नगर संसदीय सीट पर इस बार लालकृष्ण आडवाणी का मुकाबला कांग्रेस के सुरेश पटेल से है...भा.जा .पा के घोषित प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी जी ने इस क्षेत्र मैं १५ सालों से लगातार जीत हांसिल की है .और हर चुनावी - जीत के बाद उनके दो -ढाई लाख वोट बढ़ जाते हें.गांधी नगर सीट का इतिहास गवाह हे की उनके सामने अच्छे और बढे ,नामी-गिरामी दिग्ज्जों की भी बुरी हार हुई है ...गाँधी नगर क्रीम एरिया है ,यहाँ अधिकाँश पढेलिखे और लब्ध-प्रतिष्ठीत लोगों की आबादी है और वे जानतें हैं की उन्हें क्या करना होगा -किसे चुनना होगा ...की जो उनके हित मैं होगा. इस बार आडवाणी के भाग्य का फैसला वे कर चुके हें,अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ज्योतिषों की गणना -भविष्यवाणी और जनता ने भी अपने नेता का चुनाव कर लिया है ...और अब मुश्किल से सात दिन मैं चुनाव परिणाम आ भी जायेंगे ...इस बार आडवाणी जी की हार सुनिक्षित है यदि जीत जातें हैं तो भी प्रधान मंत्री बन ने के कोई आसार नही . ..उनके सितारें गर्दिश मैं हैं भले ही वो अपने को देश भर मैं एक उदारवादी नेता के रूप मैं पेश कर रहें हों ...बतौर युवाओं का नेता भी---बतलाने-जतलाने मैं कोई कोर-कसरनही छोड़ रहें हों ...अब इस बात से कोई फर्क नही पड़ता की उन्होंने देश के लिए कुछ किया या नही ..फिलवक्त वे २१ वीं शाताब्दी को भारत की शताब्दी बनाने,गरीबों को कंप्यूटर शिक्षा देने,लड़कियों को अनिवार्य शिक्षा...और शिक्षा के समुचित अवसर देने का वादा कर चुकें हें ......तो क्या भारत को आडवाणी जैसे बूढे बनाम युवा या युवा बनाम बूढे प्रधान मंत्री की जरूरत होगी चुनाव बाद निशिचित ही कुछ और मुद्दे उठेंगे ...इस नए अवतार [एक बड़ी राजनैतिक पत्रिका मैं अति रंजना शब्द शैली मैं उनका व्यख्यान किया गया है ]को परिणाम के बाद संन्यास लेते .हताश होते हुए भी देखा जा सकेगा ...मराठी मैं एक कहावत है ..दिसतो तसा नसतो...जैसा दिखाई देता है वैसा नही होता ..तो क्या आडवाणी के सन्दर्भ मैं कहा जा सकता है की वो जितना और जैसा जाने जाते हैं क्या उतने और वैसे हें जितना की उन्हें पेश्तर किया जारहा है, ---या नही ..चुनाव परिणाम के बाद ज्यादा ठीक से समझे जा सकेंगे ....फिलहाल उनका सामना कर रहें सुरेश पटेल ..कलोल तालुका के दस साल से एम् एल ऐ हें उनकी छवि साफ-सुथरी है इस क्षेत्र मैं तीन लाख लोग पाटीदार समाज के हें और इस वक्त वे सभी आडवाणी के विरोध मैं हें यदि सुरेश पटेल जीततें हें तो इस अमूल्य जीत के बाद उनका कद तो बढेगा ही साथ ही वो पार्टी मैं सिरमौर की हेसियत वाले नेता भी बन जायेंगें ...जीत के बाद सुरेश पटेल की प्राथमिकताओं मैं अहमदाबाद को जोड़ने वाले सभी गावों मैं सड़क -पानी प्राथमिक शिक्षा ,स्कूलों मैं सुधार की रहेगी.. जैसा उन्होंने बताया ....इस समाज के वर्तमान मैं तीन लाख परिवार अमेरिका मैं हैं, चुनाव प्रचार अभियान के दौरान १०० से ज्यादा लोगों ने भारत आकर सुरेश पटेल का होंसला आफजाई की थी...पटेल समाज के अध्यक्ष और जबरदस्त राजनैतिक हस्तक्षेप रखने वाले स्थानीय रहवासी डॉ। मफत लाल पटेल ने बताया ...दर- असल अधिकाँश लोगों की नापसंदगी लालकृष्ण आडवाणी के लिए क्यों है ?...पहली तो बीते पन्द्रह वर्षों मैं आडवाणी अपने क्षेत्र मैं ना तो कभी आए ना अपने क्षेत्र के लिए कुछ उल्लेखनिय किया --ना अपने क्षेत्र की जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरे ...दूसरे गुजरात मैं हुए अन्याय के खिलाफ लोकसभा सदस्य होने के नाते ना तो कुछ कहा -ना किया ....तीसरे हाल ही मैं आशाराम बापू के आश्रम मैं दो बालकों की ह्त्या के मामले मैं [तंत्र-मन्त्र हेतु ]उनके प्रति मिली भगत होने का संदेह ....जो भी हो इन चुनावों मैं जो भी तस्वीर उभरे लेकिन ...देश भर के पत्र-पत्रिकाओं मैं जो उनकी तस्वीरें प्रकाशित हुई हें वो एक हताशा और उत्साह के अतिरेक भरा ..मिला -जुला चेहरा है ...आत्म विशवास की झलक वहां हल्की है अन्यथा सन्यासी क्या यूँ ही कोई हो जाना चाहेगा .....
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ज्योतिष जगदीश मोदी,डॉ मफत लाल पटेल स्थानीय रहवासी यों से बात चीत के आधार पर ....अहमदाबाद से लौटकर