गुरुवार, ५ नवम्बर २००९

उसका खुश चेहरा,और सात तालों में कैद चुप्पी बोलती है घोलती है --बेखबर, जलतरंग की झिलमिल / / -


एक छोर से आसमान ढह गया
धूल-धूसरित,
धरती भी थोडी सी डूबी,
और जम गई -इस बीच एक धुन्द सी
और ये कहते -कहते
रुंध गया है गले में ये जो ,कुछ
एक ही समय में ,
अगम राह में निर्जन
इकठ्ठा कोई संत्रास ,
भीतर-बाहर उफनता है
ये तो ..ठीक नहीं
धूप सर पर है
और नापना शून्य को है
अपने ही भीतर निमग्न होते
एक निमिष आकाश को
रंग उडे ख्यालों की अद्रश्य उदासी
नहीं, सबसे अलग खोजा उसने,
अभिमंत्रित एक शब्द
तुम्हारे होने ना होने की जगह
उस बबूल के पेड़ तले
ताजे,छोटे, गोल, पीले रेशमी फूलों की ,
महमहाती छावं में
वक़्त रुकता नहीं
जहाँ रूकती है दृष्टी
उसी वक़्त तुम सुनते हो
,मन्नाडे की पुरअसर आवाज
"हंसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है"
टूटा-फूटा वर्तमान छूट रहा है
एक भरा-पूरा भविष्य हो सकता है
इक्छाओं को टोह देती है ,
नेक नियत- सधे हुए ढंग से
रंग उडे ख्यालों को रंगना
बिसराए जाने से पहले
ताज़ी स्मृति बनना
और उन्हें देखना -देखते रह जाना
जहाँ से गुजरता है
''प्रेम '' प्रवासी पक्षी सा
एक नया सूर्योदय
भुरभुरी रौशनी के साथ उभरता है
एक निराकार अंधेरे के बाद
उसका खुश चेहरा,और
सात तालों में कैद
चुप्पी बोलती है
घोलती है --बेखबर,
जलतरंग की झिलमिल

आँखों में देखकर मिरी, तुफाने मौजे खूं... चढ़ने से पहले, वक़्त का दरिया उतर गया...
जो मौत के जवाब में रहता था, पेश-पेश, वो ज़िन्दगी के चंद सवालों से डर गया... (-नजीर फतेहपुरी)


गुरुवार, ८ अक्तूबर २००९

प्रेम से ऊर्जा ...उर्जा से क्रिया शीलता ,क्रिया शीलता से रौशनी और रौशनी से सुघड़ता ...//-


र साल दिवाली आती है मनो- कूढा-करकट हम घर से बाहर फ़ेंक देतें हें पर मन मस्तिष्क पर जमा थोडी भी धूल हम नहीं उतार पातें हें ... लाख गुनी ग्यानी कह गये की मन का मनका फेर .पर अब तो सब कुछ असंभव लगता है ..ये भी सच है की किसी के मन में हम चाहे जितना गहरा झाँक लें और चाहे जितनी पैनी हमारी खुर्दबीनी नजर हो, तो भी बहुत कुछ जान नहीं पाते, ऐसे कई लोग हमारे आस-पास ... बस एक फूहढ़ अंदाज में जिए जातें हें और उनकी उम्र'' दिन गिनती ना जाने कितनी दिवालियाँ पीछे ठेलती आगे बढती जाती है ...ना दिलों में रौशनी होती है ,ना घरों में ....ज़रा विस्तार से सोचें ..हमारी किताबों पर जमा धूल जिनका एक पेज भी ना खुला हो ,यदि गमलों में जमा घास -खरपतवार उग आई हो ,दीवारों का पलस्तर उखड गया हो ,कपडे की सीवन उधड जाए तो मन दुखता है रंग-रोगन सिलाई की जरूरत होती है रसोई के डिब्बे इधर-उधर हो जायें,प्याज की टोकरी में प्याज कम छिलके ज्यादा हों,अलमारी की सतह पर धूल हो उसके अन्दर कपडों की भरमार हो,प्रेस किये कपडें सलवटों से भरें हों अन्य उपकरणों वाशिंग मशीन, सिलाई मशीन,ए.सी में मेल दाग-धब्बे उभर आये,परदों से छन्न कर आती रौशनी फीकी लगने लगे,अचार मुरब्बों की बरनी के नीचे लगे कागज़-कपडों पर तेल मसाले के छींटेंलग जाए अच्छी सफाई ना होने के कारण ड्रेसिंग टेबिल पर बाल रह जाए मंहगे जूतों-चप्पल की तली से धूल मिटटी चिपक कर एक इंच तक उठ जाए शिफान जार्जेट की साडियों के पेटीकोट फाल से ऊपर होने के कारण साडी की किनारी घिस कर उधड जाए तो ऐसी मैली फूह्ढ़ता के लिए कौन जिमेदार होगा?क्या हर दिन या दो दिन में इन कामों पर फोकस करने की जरूरत नहीं? आप करें या नौकर से कहें ...क्या जरूरी है दिवाली पर ही सब कुछ किया जाए ,सारा कचरा घर से बाहर किया जाए...
हमारी एक परिचिता बरसों रद्दी इकठ्ठा करके उन्हें दिवाली पर बेचती रही पति सरकारी विभाग में पी. आर. ओ थे जाहिर सी बात है दुनिया भर के अखबार उनके यहाँ पहुँचते थे इस तरह दस-पन्द्रह तोला सोना उन्होंने बनाया ..लेकिन उस रद्दी को सहेजने में ,कीडो-काक्रोंचों से बचाने में उन्हें कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी ये भी सोचें , आप इसे सुघड़ता भी कह सकतें हें वाह रद्दी से सोना ...एक अन्य महिला पुराने कपडे सहेजे रहने में सुख पाती है बस यही कहती हें पति ने पहली वेडिंग एनिवर्सरी पर दी या माँ ने जनम दिन पर या की कालेज के दिनों की ये ड्रेस है जब दुबली -पतली थी बस मन को ऐसी ही फूह्ढ़ता से संतुष्ट करती है लेकिन किसी जरूरतमंद को नहीं देगी .....एक नव धनाड्य मेरी महिला मित्र ने बताया की उसके यहाँ कोई नौकर नहीं टिकता अब इसके कारण बहुत से हो या चाहे जो हो ,लेकिन साथ ही उसका ये भी कहना था की कोई त्यौहार हो या मेरे फार्म हाउस पर पार्टी हो ,या घर में कोई कथा हो में इन्हें कपडा खाना भरपूर देती हूँ मेरी समझ से मेंने जो जाना वो ये की ,गरीब नौकर मेरी इस मित्र का देना अपना अधिकार समझ रहे थे ,जो कपडा भोजन दक्षिणा उन्हें मिला ...वो किसी ना किसी को मिलता सो उन्हें मिल गया मित्र का कहना था की इतना देतें हें फिर भी नमकहरामी करतें हें ..क्या ये दिमागी फूह्ढ़ता है या चालाकी ?... मेरे आँगन में सौ -दो सौ फूल रोजाना खिलतें हें जिनकी लतरें बाहर सड़क की और फैली हुई है सुबह की सैर को जाने वाले बुजुर्ग और स्कूली बच्चे अधिकाँश फूल तोड़ लेतें हें पडोसी शिकायत करतें हें मुझे कोई शिकायत नहीं, जबकि में अक्सर अपने पडोसी को भी निर्लिप्त भाव से फूल तोड़ते देखती हूँ ..तब भी रोजाना कई फूल बच जातें हें हर बरसात में कलम बीज से तय्यार कुछ ख़ास पौधे बांटने में सुख मिलता है ये एक लंबा सिलसिला होता है कभी उनके घर जाओ पौधे बडे हुए और उनमे खिले हुए फूलों को देखना ...एक अव्यक्त ख़ुशी होती है देने बांटने की चीजें फूल पौधे कोई मांगे और उन्हें ना दिए जाए ऐसी फूह्ढ़ता कोई निभा सकता है भला ...
कुछ लोगों के पास शार्ट कट होतें हें जो अपने ही में एक सुखी संपन्न जीवन बिता कर दुनिया से अलविदा हो जातें हें और कुछ लोग तमाम काबलियत और ईमान दरी के बावजूद वो नहीं पा-पाते जिनके वो काबिल होते हें जिनकी उन्हे चाहना होती है फिर भी वो जिन्दगी जीतें हें अपनी कमियों और अच्छाइयों को नई व्यवस्था में किसी नए रूपक में बांधकर एक सुख में डूबकर और कुछ ठीक इन से उलट अपने ही ढर्रे पर चलने वाले ...पर जी ,इस दुनिया में सुघड़ता से जीने के लिए एक दिमागी प्रबंधन की भी जरूरत होती है की कब करें क्या करें कैसे करें और क्या ना करें और जब आप अपने को निर्देश देतें हें या दो टूक निर्णय सुनातें हें ..हाँ या नहीं ..... कुछ बातें क्या जायज हें? ...?आपका हमारे घर में प्रवेश मय जूतों चप्पलों से और हम आपके यहाँ नगें पैरों, आपके घर हम बिना इजाजत बिना प्रयोजन के बैठक से आगे ना जा पायें...हमारे घर में आप बेडरूम से बालकनी छत्त तक घूम आयें क्या ये फूह्ढ़ता है या सहजता?, आपको हम सादर आमंत्रित करे भोजन में अचार मुरब्बों से लेकर चटनी-पापड से लेकर जायके दार खाना खिलाएंऔर आपके घर में हमें फ्रिज का बासी खाना गर्म करके परोसा जाए ....कुछ रिश्ते जिन्दगी की कड़ी धूप में.. साए की तरह हो तो .जीना आसान हो जाता है कि .जब मिलो तब दिवाली सा आनंद मन उठा सके ...
एक और महिला हर दिवाली पर बड़ी और महंगी खरीददारी करती है ,साल भर वो चीजें उनके यहाँ इधर-उधर लुढ़कती दिखाई पड़ती है ..फिर अगली दिवाली तक वो बेवजह बाइयों में बंट जाती है ,ना वो नौकरी करती हें ना पति की कमाई में कोई इजाफा,सुबह बारह बजे तक अलसाए पड़े रहना ,दिन का खाना-नहाना चार बजे तक, रात बारह बजे तक अकारण जागना उनकी दिन चर्या है उनकी फूह्ढ़ता की अन्नत कथा है रौशनी कहाँ नहीं करने की जरूरत है बताना मुश्किल होगा ...एक और मेरी अच्छी दोस्त ...अच्छे पद पर खासा कमाती है मेरी पसंद की कायल जो मेरे पास हो वो सब उसके पास होना चाहिए ..साडी -कपडों से लेकर ना जाने क्या-क्या ..इसमें कोई हर्ज भी नहीं..में कहती भी हूँ मुझे साथ ले चलो खरीदो मेरी पसंद से,नहीं अपनी खरीददारी गुप्त रखेंगी मुझे वितृष्णा होती है ...मुझे ये भी लगता है कि.कामो का संधान व्यवस्था से ही तो हो सकता है बजाय नक़ल से?एक और स्त्री का घर हमेशा बैठक में गीला तौलिया गीलेपन की बदबू के साथ महंगे चमकीले कुशन के बीच सिमटा हुआ फैला हुआ मिलेगा किचिन में पैर रखने की जगह नहीं, कहीं कटी हुई सब्जी खुली हुई तो, कहीं सिंक में झूटे बर्तनों का ढेर फ्रिज में बासी खाने के ढेरों डिब्बें ...कहीं दूध खुला हुआ तो कही गैस पर दाल सब्जी पैर पसारे हुए उनके यहाँ हमेशा मिल जायेंगे..वे .खासा कमाती है नौकर भी है फिर भी.....अपने ही बनाए हुए नर्क में जीने मरने की अभ्यस्त ऐसे कूड़े करकट के साथ जिन्दगी बिताते लोग..मुझे आर्श्चय होता है ...अपने रोजमर्रा के दायित्वों को पूरा किये बिना कैसे बाहरी काम कर पातें होंगे ....बर्ट्रेंड रस्सेल की "कान्क्वेस्ट" का अनुवाद जब पढ़ा तो लगा सच.हांसिल करना... जीतना अपने को, अपने बलबूते पर आसान है ..कठिन नहीं ...और उस आसानी में घर का शामिल होना जरूरी है वो भी रौशनी से भरा और ये कहना बिलकुल सही होगा की............ एकरसता से उब पैदा होती है ,फूह्ढ़ता से वितृष्णा ...इससे बचना ही चाहिए....और प्रेम से ऊर्जा ...उर्जा से क्रिया शीलता ,क्रिया शीलता से रौशनी और रौशनी से सुघड़ता ...जो हमारी चेतना को लगातार बींधती है ताकि हम-आप एक साफ दिल- दिमाग से जी पायें और लोगों को भी जीने दें ...
बहुत भारी होता है जीवन का सार मित्र,बुलाती सी चमक सुदूर के सितारों की,अंधेरों में डूबे तुझ से मांगते जवाब है ..अंधेरों से...अन्जोरे में निकल चल [मुक्तिबोध] अँधेरा और उसका मिथकीय चित्रण मुक्तिबोध की सभी रचनाओं में मिल जता है ..अज्ञान का अँधेरा व्यवस्था जन्य अँधेरा,मन के भीतर छिपे बैठे अँधेरे, सब पर मुक्तिबोध की द्रष्टि है ..अंधेरों में ही भय होता है पहचान खोने का जीवन लक्ष्य से भटकने का [दीपावली कि अनंत शुभकामनाएं ]

शुक्रवार, २५ सितम्बर २००९

-एक पुरसुकून आसमान की तलाश ,मन खुश था अपने ही सवाल पर जो उसके जवाब की प्रति क्रिया से छूट गया था चलो अच्छा हुआ... एक कांट-छांट मन की सतह पर होती है ..//


लगातार बरसात की नीम ठंडक से चिढ होती है ,बहुत दिनों तक धूप ना निकले तो मन कुढ़ता है खैर बरसात को कभी ना कभी तो रुकना ही होता है बारिश ख़त्म भी होती है ,हलकी सी धूप के साथ मौसम में ठंडक की शुरुआत ,धूप वाली ठण्ड, मन को तसल्ली ...मिलती है इस सुकून के साथ की आगे के पांच..छ माह अच्छे गुजरेंगे --ना भी गुजरें तो भी ...अक्सर ही ऐसी बेमौसमी सोच निरर्थक ख्यालों के पुल पर इस पार से उस पार ,इधर से उधर आते जाते रहतें हें, किसी भी आकस्मिकता के लिए मन तैयार नहीं होता ..आशाएं पनपती है और घट भी सकती है ,एक धमक धमनी में होती है गर्म आंच से ज्यादा -अन्तश्चेतना में बार-बार कुछ घुमड़ता है स्मृति धुंधली नहीं होती,शब्दों के चेहरे धूसर होते जातें है ,सवाल सामने होतें हें ,कोई नई शुरुआत ...एक लिपिबद्ध दस्तावेज आँखों के आगे से गुजरता है ..वो थोडी देर के लिए गुडी-मुडी होजाती है ,संकुचित धूसर शब्दों के पीछे देर तक छिप जाना भी ना कोई देखेगा ना जानेगा ना समझेगा ..फिर कभी शब्दों के साथ डूबना भीतर बहुत भीतर अतल में ......वो वक़्त की परवाह करता है और वो वक़्त को जूती की नोक पर ---गर उसका साथ हो एक स्निग्ध सांत्वना मन को मिलती ...खिलाती है दरारों से झांकता है वक़्त का बदला हुआ चेहरा ..पुराना ...बदले हुए मिजाज में ,सुबह के धुले हुए बालों का एक गुच्छा दायें गाल पर फैल जाता है समय के अन्तराल में डूबा जाता और भीग कर बाहर लौटता सा मन..दस -नौ-सात -पांच-चार- तीन -...एक दस्तक ,उसके सवाल आसान नहीं और जवाब अलबत्ता बेसब्र से ....अक्सर शब्दों में इच्छाएं पंख फड फ्डाती है ..जवाब नहीं मिलता हमेशा एक निस्तब्धता और चौडा शून्य होता है वहां जिसका बहु उपयोग वक़्त जरूरत पर कर लेना बखूबी और दो-दो बातें एक साथ और या एक भी नहीं ,उसकी नजर एक खोजी शिरकत करती है ....किताबें ,चाय की ट्रे ,खाली कप ,कप पर हरे फूल ,उलझा सा मोबाइल चार्जर ,खिड़की के परदों से झांकता धूप का एक संतुष्ट टुकडा शीशे के परे नीम की पतली टहनियों पर थोडा कम-कम हिलती हुई हवा ,हवा से झुकते -टूटते डाल से बिछुड़ते कमजोर पीले पत्ते, उसे सतर्क होने का मौका मिल जाता है ...हाँ तो बात फिर से शुरू होना चाहती है ...बेफिक्र दिखने की चाहना -सहज होने की जद्दो -जहद ..अर्थ दीप्त होकर पसर जाती है , वहीँ आस-पास.. कुछ शब्द बमुश्किल जुड़ते हें ...अपनी तकलीफों को कम आंक कर उसकी आँखों में झाँक कर -थोडा नजदीक ----एक पुरसुकून आसमान की तलाश ,मन खुश था अपने ही सवाल पर जो उसके जवाब की प्रति क्रिया से छूट गया था चलो अच्छा हुआ... एक कांट-छांट मन की सतह पर होती है ..अपनों में कोई गैर तो निकला ..अगर होते सभी अपने तो ?..किसी पुराने गीत की पंक्तियाँ याद आ जाती है ..मन पाखी दूसरी दिशा में उड़ जाता है कोई हथेलियाँ थामता है ..तारों भरी दोपहरी उस अबूझ समय में बीत ही जाती है अँगुलियों में मुडी -फँसी हुई अंगुलियाँ अब तक ..डरती हो ,सवाल खुद से --एक भय उसे सताता है मामूली सी आहट पर चौंकते -सतर्कता में फैलते कानो में समुद्र की लहरों का शोर भर जाता है,दूर से आती बेगम अख्तर की आवाज़ में दादरा ...लहरों के साथ लौटती लय, विलग होती स्मृति .मरी हुई मछली की चमकीली आँखों से उसे टोहती है ...एक वितृष्ण रागात्मकता अन्दर फैलती है ...जल्दी-जल्दी एक आत्मीयता उसकी आँखों में भरने लगती है संकोच भी सुख भी ....थोडा समय स्थिर स्थिति में बीतता है ,थोडा और समय ...नीम के पत्ते तेजी से हवा में लहराते हुए नीचे जमीन पर गिरते हें उसकी सोच की कोई तार्किक परिणिति नहीं मिलती ...दूर से आती आवाज़ ,विपरीत दिशा में फैली दो बाहें ... ख़त्म होता हुआ तीसरा वाक्य..ये उदासी,.. बहुत से रेशमी धागे उलझे-उलझे -की वो वो दो कदम आगे फिर पीछे ---उसकी आँखों में नीली चमक है ..सीढियों में बहते पानी में नंगे पैर रख कर उतरने का सुख ..ऐसी आकस्मिकता के लिए वो तैयार नहीं होती ..बात फिर नए सिरेसे शुरू होना चाहती है बहुत से मुडे -तुडे शब्द सीधे होतें -खुलते हें ,वो शब्दों को निचोड़ती है ....गीले शब्दों से एक बूँद पानी नहीं ताजुब्ब ,है बहुत कुछ बीतता है ,संभावनाएं भी, प्रेम की वजहें भी, अनसुलझी इच्छाएं भी ,लरजती रौशनी भी, बहुत सी जागी रातें और सोये दिन भी .
और तुम उदास हो ,तुम्हारी उदासी में पढता हूँ में ...अंधेरे में जीने का सच विशिष्ट चेतना के कवि लाल्टू की कविता की पंक्तियाँ .

मंगलवार, १ सितम्बर २००९

माँ मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी... शब्द घुप्प अंधेरों में चले गये थे ,मां के अर्थों में शब्दों को ढूढना कितना मुश्किल ...//


शब्द घुप्प अंधेरों में चले गये थे ,मां के अर्थों में शब्दों को ढूढना कितना मुश्किल ...मां थी जब सूरज यूँ ही नियत स्थान से निकलता था लेकिन डूबता मां की आँखों में ही था ..कितने ही काम, ताजे-बासे ,कितनी आशाएं ,कितनी चिंताएं एक साथ संजोई दिखलाई पड़ती थी उनकी आँखों में, मां थी तो खुशहाल थी जिन्दगी और बेफिक्र भी और अब एक जमा हुआ सन्नाटा अन्दर- भीतर गहरे तक... मां से ही थी हमारी इच्छाएं -अकां छायें ,और बिन तुम्हारे इतने शुद्र -कातार ये मन -तन ..क्या कहूं किस्से कहूँ .सुनो मां मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी जैसे अपनी म्रत्यु से ठीक पहले सुना था तुमने ..विश्नुसह्स्त्र नाम,गणपति अथर्व शीर्ष पाठ ,बंद आँखों से और जर्जर काया में तकलीफों के साथ आती जाती साँसों के बीच ...वो एक साफ और उजली रात थी रात का अंतिम प्रहर जब मां ने साथ छोड़ दिया ..कभी ना भूलने वाले पल ...निरंतर नेह की नीड़ बुनती स्मृतियों में एकदम ताजा कभी न धुंधली पड़ने वाली मां ..मंत्रोचार सी पवित्र ,मेरी मां मुझे तुम कभी नहीं भूलती हर दिन तो याद करती हूँ हर पल तो परछाई सी साथ चलती हो धमनियों में गूंजती हो ,तुम्हारी आवाज और बेटा के साथ नाम का उच्चारण आज भी मन भर देता है एक तपी हुई स्नेहिल गंभीरता तुम्हारे चेहरे पर हमेशा बनी रहती,हम सभी की छोटी उपलब्धियों पर हमें विशिष्ट बना देने वाली मां ,हमें सर माथे पर रखने वाली तुम्हे कितना याद करूँ कितना भूलूँ ..मां मां ..हमें अपने घर-परिवार के स्वार्थ में गुम होते कभी सच कभी झूट बोलते देखती सब कुछ जान कर भी अजान बनी रहती तुम हमारी ख़ुशी में खुश और दुःख में दुखी होजाती तुम ----तुम्हारे अनमोल शब्द कुछ सीखें -सौगातें तुम्हारा दिया हुआ सूर्य मन्त्र आज भी जपती हूँ -रो पड़ती हूँ अचानक जब तुम उमड़ती हो अंतस में.. तो सब कहतें हें पागल है मां तुम्हारी याद आती है तो बस आती है तुम्हारी बातें पेड़ नहीं काटना ,बालों को छोटा नहीं रखना ,गुरुवार को हल्दी का उबटन करना केले के पेड़ की पूजा करना ,तुलसी में शाम पड़े दिया जलाना ,दुःख-सुख में इश्वर को सहभागी बनाना ,..भरसक कोशिश करती हूँ उन्हें निभाना ,मां तुम्हारे कई रंग यादों के जल में डूबते-उतराते रहतें हें ..तुम्हारे दुखों की गठरी तुम्हारे सुखों की गठरी से बड़ी थी माफ करना हमें दुख तो बाँट नहीं पाए तुम्हारे हिस्से का सुख भी नहीं दे पाये ..शर्मिन्दा हें ...तुम चली गई .बरस दिन बीते -पतझर वसंत भी आये ..सारे मौसमों में बीतती हो तुम ..जब साडियों के ढेर उलटती-पलटती हूँ तुम्हारी दी हुई-पहनी हुई साडियों में तुम्हारी देह गंध को सजीव पाती हूँ अपनी पीठ -माथे पर तुम्हारा ताजा स्पर्श महसूस कर सकती हूँ आज भी...
वो द्रश्य स्तब्ध कर देने वाला था तुम्हारी मृत देह सामने थी आवाज मानो छिल गई थी एक दिन पहले आर्शीवाद में उठा हाथ ...अध् मुंदी आँखों से विस्मृति के अथाह में तुम डूब-उतरा रही थी में महसूस कर सकती थी तुम्हारे स्मृति के बवंडरों को शायद हमारे बचपन ,अपनी खुशियों -दुखों और बिछोह को--फिर तुम्हे होश नहीं आया ,संसार की सर्व श्रेष्ठ मां मेरी तुम...चीजों के प्रति, इस दुनिया के प्रति कितनी निर्लिप्त...मैंने कभी तुम्हे अपने लिए बड़े चाव से कभी कुछ ना खरीदते देखा ना पहनते ...कैसे काबू पाती थी ,,,नहीं सीख पाई ..तुम्हारे हाथों की बनी मैथी-भाजी ,आम की लौंजी ,नीबू लहसन का अचार फिर कभी नहीं मिल पाया तुम थी तो हमारी जिन्दगी सौंधी सी महकती थी ...राह तक-तक बेटियों की बात जोहते तुम्हारे उदास जर्जर दिन बीतते रहे कितना सहा-कितना जिया तुमने ये हिसाब करने बैठती हूँ तो अपने को धिक्कारती हूँ ..जिन्दगी अब भी जा रही है ...छोटे से बड़े सुख दुःख में तुम याद आती हो तुम्हारे सारे आर्शीवाद फलीभूत हुए ..लेकिन तुम्हारे निष्टूर देवी-देवता जिनके लिए उम्र का एक हिस्सा गुजार दिया तुमने दूसरा हमारी खा.तिर,... इश्वर पर तुम्हारी अटूट आस्था ,अगाथ श्रधा .इस दुनिया में अपनों परायों से झेले गए मान-अपमान आवहेलनाएँ -चाहूँ तो भी नहीं भूल पाउंगी..बाद में दूसरी चीजों के साथ तुम्हारे पूजा घर के भगवानों का बंटवारा हुआ कुछ सस्कृत के श्लोक के साथ तुम्हारे उपन्यास और किताबें मेरे हिस्से आ गई ..उनमे वो किताबें और अखबारों की कटिंग भी थी जिनमे मेरी रचनाएं प्रकाशित हुई थी ..अपनी माँ जैसी कद-काठी -सुघड़ता नए और पुराने का अद्भूत मिश्रण मैंने आज तक किसी दूसरी स्त्री में नहीं देखा ..मान होता है अपने पर एक सादगी भरा जीवन जीकर अपनों से ज्यादा परायों के लिए हर तरह से तत्पर रहने वाली माँ तुम अब कहाँ मिलोगी , एक प्रसंग ज्यों का त्यों बना हुआ है स्मृति में मेरी ... जब मेरी बेटी होने वाली थी शाम सात बजे से सुबह तक तुम लेबर रूम के बाहर खडी रही मुझे तुम्हारे डॉक्टर को बोले शब्द आज भी याद है ...आपरेशन नहीं होगा वो मेरी बेटी है ..थोडी तकलीफ तो होगी बाद में तुम मेरे पास ही सिरहाने थी पसीने भरे सर पर तुम्हारा चुम्बकीय सुख भरा हाथ -स्पर्श कभी नहीं भूल पाती हूँ , ऊसके बाद तुम्हारा द्रढ़ विशवास --बेटी हुई उसके पहले जनम दिन पर लिखी आर्शीवाद चिठ्ठी ,वैसी की वैसी रखी है सहेजी ..अनेकों शुभकामना वाली ..वो इसी वर्ष पढने अमेरिका चली जायेगी जैसा तुमने लिखा और कहा था ;हमें ले जाना नहीं भूलना ..तुम तो हमेशा हमारे साथ हो ..इस कोलाहल में ,इस भीड़ में इतने अपनों-अजनबियों में ..तुम अलोप हो फिर भी शेष हो मुझमे मेरी इस दुनियादारी में .माँ... माँ मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी
अपनी माँ की पांचवी पुण्य स्मृति में [दो सितम्बर o5 ] सुनो माँ ,मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी ये एक लम्बी कविता लिखना चाहती थी लेकिन कभी पूरी ही नहीं कर पाई ...

शनिवार, २९ अगस्त २००९

/इच्छाओं की एक छूटी हुई अधूरी फेहरिशत में हमारे नमकअश्रु के प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में तुम चाहो तो भी ना चाहो तो भी

तुम नही चाहोगे तो भी
बदलेंगे .मौसम
घूमेगी..धरती
बरसेंगे बादल और आएँगे ,याद हम
और वे लौटेंगी तितलियाँ ..
बेहिचक तुम्हे छू कर,
जिनके पंखों पर लिक्खी
समय ने कदाचित्
एक इंद्रधनुषी इबारत
तुम नही चाहोगे --तो भी,
इस ब्रह्मांड के ख़त्म
होने से पहले देखोगे -निर्विकार
अपने को दोहराए जाते
वक़्त की तरल -सघन रफ़्तार में
तुम नही चाहोगे तो भी
पानी में घुली मिठास सा
पुरइतमीनान समय
करेगा निरस्त -सारी दलीलें को
निश्चित नतीजों की तरह
तुम नही चाहोगे तो भी
आदि- उत्सव की सुगंध सी प्रतिज्ञाएँ
रहेंगी हमारे साथ,
इच्छाओं की एक छूटी हुई
अधूरी फेहरिशत में
हमारे नमकअश्रु के
प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में
तुम चाहो तो भी
ना चाहो तो भी...

"एक ही शख्स था, एहसास के आईने में... कभी शबनम, कभी खुशबु, कभी पत्थर निकला..." - तालिब जैदी (अपनी डायरी की शायरी से...)