बुधवार, 25 जनवरी 2012

..,तमाम शोरगुल में एक सिरा जो बीच-बीच में छूट या खो जाता है ,,,, तब ''मिलारेपा ''के शब्दों से बनती कविताओं में उसे ढूँढना दुधिया रौशनी में भी मुश्किल होगा ....

कुछ चीजों तक हम बार-बार पहुँचते हें कब कैसे और ये भी नहीं जानते कि वो हमारी खुशियों भरी  नियति क्यों बनती जाती है ..और हमेशा उन खुशियों का अकेलापन ---एक बनी बनाई चौखट से आर-पार आता-लेजाता रहता है चकित करता सा,शामे ढलती हें सुबहें होती हें दिल-दिमाग पर जमा सोच कि परतें उतरती हें कुछ तो ऐसी कि  ताउम्र नहीं उतरे तमाम कोशिशों के बाद भी  और कुछ...तेजी से पीछा छुड़ाने के अंदाज में भारी गडगडाहट के साथ भागती हें  मानो बरसों पुराने किसी पुल से ट्रेन गुजरती जा रही हो .एसे में   साथ-साथ -पीछे अपने पत्थरों ,पहाड़ों ,ऊँचे गठीले टेढ़े-मेढ़े पेड़ों जंगलों हरी सुखी झाड़ियों को विपरीत दिशा में भागते देखना होता है ओझल होने तक ...कभी-कभार किसी लम्बी अँधेरी सुरंग से गुजरना जहाँ काले गाढे घोल में घटनाओं का एक दुसरे पर तेजी से गिरना,सुख में सिझना,दुःख में भीगना अपने अटपटेपन की हद तक और फिर हलकी रौशनी के साथ जंगल शुरू जो  छोटी मोटी चीजों तक तो रुकता ही नहीं ये सिलसिला....एसा ही एक जंगल मुझे अपनी छत्त से दिखाई पड़ता है ..पिछले पांच-सात सालों से अपना सब कुछ साझा करता स्थिर सा एक छोटा सा जंगलनुमा पार्क हमेशा अपनी उदासी में मुझे खुश नजर आता है ...लेकिन पिछले सात दिनों से वहां से आती कुदाली-फावड़ों कि ठक-ठक  की आवाजें मेरे दिल को परेशान करती हें ..इस पार्क के चारों ओर मजबूत फेंस के लिए बनाए गए गढ्ढे, कटे पेड़ों की टहनियां छोटे-छोटे जड़ से उखड़े पेड़ सूखे मुरझाये सड़क पर दम तोड़ते नजर आते हें जाहिर सी बात है इस जंगल का काया-कल्प किया जारहा है ,ओर ये काम जोर शोर से अपने पूरे अंजाम पर है..एक दिन इसका स्वरूप बदलेगा जरूर ...किसे पता कितने दावे ,दलीलें ऊब खीज,सुलझन-उलझनों का गवाह रहा है मेरा ये छोटा सा जंगल जिसके दोनों ओर जंग लगे टूटे फूटे दरवाजे अन्दर टूटी हुई सीमेंट उखड़ी बेंच, बेतरतीब अनगिन जातियों-प्रजातियों के पेड़ पौधे मेरी अलसाई शामों में सराहते से लगते रहें हें.... सूखी हरी पत्तियों-पक्षियों गिलहरियों की फूदकन से हरदम चौकन्ना ओर गर्मियों में सदा सुसताता सा  लगता है ये जंगल थोड़ा हरा थोड़ा सूखा बरस भर रहता है इसके तकरीबन सभी कोनो में लम्बे ओर बड़े-बड़े उम्रदराज  तेबूआइन साक्षात दंडवत मुद्रा में सड़क पर  झुक आयें हें मानो उनकी अरज सुनली जाये,जो वासंती पीले गुच्छों में अब फूलने ही वाले हें हाँ उत्तर दिशा में जंगल जलेबी का काँटों भरा तने वाला पेड़ थोड़ी गुलाबी हरी फलियों की हलकी ख्श्बू में मगन लहराता सा रहता है जिसके नीचे सलोनी शाम की दूर से आती  गमक में एक सूत्र शब्द- संवाद अपने पूरेपन के साथ दोहराता है ''जब  तुम्हे याद आये हम ''घरों से छन कर आती मद्धम रौशनी में पेड़ पार्क बेंच जंगली घास रात की ठिठूरण अलबत्ता सब कुछ अच्छा लगता है यहाँ हमेशा बने रहने वाला कौतूहल हमेशा एक संभावना बने रहने की तर्ज पर महसूस होता है ...जैसे में आज सुनती हूँ दूर तक देखती हूँ टाइटन आई से जंगल से तैर कर आती मेरी छत्त तक मोईनुद्दीन डागर की शिष्या का ध्रुपद अँधेरे की हवा में अँधेरे की ख्श्बू की तरह ना सुझाई देने वाले घुप्प में शब्दों की धवन्या से परे ....एक समय में चीजें एक साथ भीतर-बाहर होती हें तब हमारे हंसने -रोने से फर्क नहीं पड़ता ..गहरी ऊब-तो कभी गहरी खुशफहमी के साथ सर उठाकर देखो तो निरभ्र आकाश बेताबी ओर बेचैनी से चक्कर लगाता नजर आता है उसे फर्क भी  नहीं पड़ता उसके दुपट्टे में कढ़े हुए बेंगनी-गुलाबी फूलों को हँसते हुए देखते ...क्या होगा बेनकाबी के बाद का मंजर ..इस छत्त इस जंगल, इस आसमान ,इस ठंडी शाम ओर रात  के बीच के समय का ..मन कई-कई पोस्टर चस्पां करना चाहता है बेतरतीब से दो करीब-करीब पेड़ पर,सिंदूरी फूल वाले एक ऊँचे पेड़ की खोह में कि- यहीं कहीं आम रास्ता हुआ करता था''  जंगल एक पेंटिंग में तब्दील हो जाएगा जिसमे एक काठ का पुल होगा जिसके आस-पास हरी पीली घास होगी जहाँ अंखुआते बीज तरतीब से फूटेंगे तितलियाँ उडती दिखेंगी एक जंगली पक्षी आसमान में स्यापा करता सा होगा मोबाइल हाथों में लिए इसका एक लंबा चक्कर भी नहीं लिया जा सकेगा,,,तमाम शोरगुल में एक सिरा जो बीच-बीच में छूट या खो जाता है ,,,, तब ''मिलारेपा ''के शब्दों से बनती कविताओं में उसे ढूँढना दुधिया रौशनी में भी मुश्किल होगा .......[''मिलारेपा'' बारहवीं सदी के तिब्बत के लामा कवि]      

बृहस्पतिवार, 15 दिसम्बर 2011

.कुछ खुले से मौसमों को उनकी देहरी से छुडा लाने और अपनी परधि में शामिल करने की कोशिश करना उस मोसम के साथ वो असामायिक जुदाई थी. उसका पसंदीदा मौसम शायद पतझड़

सब कुछ तय था जैसे ये भी वो भी,लेकिन कच्ची थी ..उसकी पकड़,रेशमी धागों पर परछाई के जरिये बुनी गई रंग-बिरंगे अहसासों तले,.. ऐसे में हरदम कई-कई सवालों के जवाब अपने होने का सबूत बनकर एक अकाट्य तर्क गढ़ लेते हेँ,आँखें बंद किये एक ही करवट लिए एक घंटे में सात साल बीत जाते हेँ ,कानो के पीछे दर्द की लहर उठती है ..शायद चाय पी लेने से दर्द कम हो जाए...वो उठती है  डूबती शाम में ,अलमारी बंद करते-करते उसके पल्ले से जड़ा शीशा और उसमे उभरता अपना अक्स अनजाने दिखाई पड  जाता है,दो क्षण वो वैसी ही ठगी सी रह जाती है ..कौन हूँ में? कमरा लगातार अँधेरे में डूबता जाता है शाम ख़त्म रात शुरू होना ही चाहती है ,और रौशनी का होना लाजिमी था. शीशे में उसे अपनी सूरत कुछ अच्छी नहीं लगती सिवाय आँखों के माथे और भावों के बीच छोटी लाल बिंदी थोड़ा सरक कर दाहिने और हो गई थी,हल्दी और कुमकुम जो सुबह पूजा के बाद ठीक बिंदी के नीचे लगाया था फैलकर धुंधला गया था बुझा सा मन चेहरे पर भी उदासी सी पोत चुका था,कुछ दुहराता सा दिल ओह ये क्या हो रहा है मौसम एकदम सर्द है,कई सालों की तरह ये मौसम भी अटपटा ही बीतेगा ,,पिछले मौसम में छूटा हुआ ...कोई भरपाई नहीं वही होगा फिर वहीँ से सोचना होगा कहीं फैलाव कहीं सिकुडन कहीं ख़त्म होने की सूरत में सब कुछ का बदल जाना ,,,,चीजें बंटती है लगता है उन्हें छोड़ दिया जाय या की समेटा जाय ..कुछ खुले से मौसमों को उनकी देहरी से छुडा लाने और अपनी परधि में शामिल करने की कोशिश करना उस मोसम के साथ वो असामायिक जुदाई थी. उसका पसंदीदा मौसम शायद पतझड़ ,एक दुर्लभ आत्मीयता में जीना उन दिनों अपने अनुभवों के आत्मसात होने और फिर अभिव्यक्त होने तक के अपने तर्कों के साथ---सुबह होने तक कुछ और भी गुजरेगा सुबह से पहले जहाँ बहुत सी चीजें खो जाने की अनिवार्य किन्तु तकलीफ देह स्थिति थी तो वहीँ कुछ ख़ुश हो जाने के कारण भी .....लम्बे रागात्मक अभ्यास के बाद  शब्दों को ठीक जगहें मिल ही जाती है,साथ ही लेकिन एक स्थाई अंतरा का आलाप जो जहाँ है वैसा ही की शर्त पर रूक सा जाता है ...सारा क्रम टूटता है ना जाने और क्या-क्या किस किस का हिसाब रखूँ,  सतर्क आँखे थोड़ा तेजी से अंधेरे में चीजों पर नजर दौडाती हुई  अपनी पकड़ को क्रमश मद्धम कर देती है,मानो अँधेरे में ही घूल जाना चाहती है ...अन्धेरा उनींदी शाम को रात तक घसीट ही लाता है ,आखिर तब्दीलियाँ क्यों नहीं चाहता ये मन ,देर रात तक रोकर हंस पढ़ना ,समय का एक हिस्सा उस सड़क से गुजरता है वो शहर वो ढलान वो इमारत जहाँ से सड़क गायब हो जाती है दुखों को निचोड़ने का प्रयास ,सुखों को झटक कर धूप में सुखा लेने की चाहत ,,,कचनार के गुलाबी फूलों का  खिलकर सिकुड़कर बेतरतीब हो मुरझा कर, सड़क पर फैल जाना ,,,मौसम की एक दुर्ष्टि उन्हें बुहारती सी लगती है,उनकी देह पर ठंडी  हवा निरंतर पछाड़ खाती है उन्हें इधर-उधर अलग-अलग दिशाओं में ठेलती  हुई,यहाँ सब कुछ ठीक है ,फिर भी एक झूटा सच सोचते हुए ,उसका दिल डूब सा जाता है भुरभुरी रौशनी में कुछ एक परछाई छत्त से टेढ़ी-आढी सीधी होती दिखाई देती है ,दूर अलग सी ,कांपती  सी तेजी से नीचे गिरती हुई..... मुझे उन परछाइयों की आवाज तक सुनाई  नहीं देती.  [शाख से टूटकर गिरते कुछ पत्तों के लिए रचे अपने शब्दों के संताप और हर मिटटी के हिस्से की वनस्पतियों के लिए ]           

बृहस्पतिवार, 31 मार्च 2011

खेद सहित ढेर से फूलों के खिलने के दिनों का अद्रश्य हो जाना ,मुक्त होते-होते गहरी आसक्ति में बांध जाना .चीजों का बदल जाना और कुछ का वैसा ही रह जाना ..//-

कोई कैसे  देख सकता है आने वाले वक़्त की शक्ल ये किसी की इक्छा पर नही निर्भर नहीं हो सकता की वो शक्ल वैसी ही हो जैसी वो चाहे, रिल्के की कविता याद आती है ...टूटे पंख वाला समय -फिर भी अपनी पुरजोर चाल से दौड़ता है समय यूं मानो अंतिम दौड़ हो सुस्ताने का कोई क्षण मोहलत नहीं देता जहाँ बैठकर ये सब होता है वहाँ की सफेद दीवारें पसीजती है,और उनके पीछे एक दूसरी दुनिया खुली-खुली सी ..आपकी पकड़ से बाहर ,मौसम के निशान चस्पां हें यहाँ-वहाँ... हवाएं भी सुस्त हें उस  समय में चुप सी ....सवाल नहीं जवाब सूझे तो बताना ना  सूझे  तो कोशिश करना,एक चेहरा एक बार  स्पष्ट होता है, दूसरी बार दिमाग से बेदखल होता है ..गाढे अँधेरे में एक चकमक मुठ्ठी में बंद है जब चाहा जो चाहा  चमका लिया खुद के किसी पसंदीदा कोने में बैठ जाना और वहाँ बैठ इत्मीनान से बुनना अपने को एक गहरी तन्मयता में --ऐसे में ख़ास ये होता है की चीजें तब दूसरे ढंग से होती हें सिमट-सिमट कर फैलती सी ..सामने आकर अद्रश्य होती सी एक कोशिश लगातार उन्हें एक जुट करने की ..मगर ऐसा होता नहीं ,आत्मा पर मढ़ी खोल कभी भी उसे तार्किक परिणिति तक पहुँचने नहीं देती ..खैर इन दिनों मौसम में उमस की शुरुआत  हो चुकी है बावजूद शामें अभी चिपचिपी नहीं हुई है,अभी कुछ और दिन  सुबह शामे ठंडी रहेंगी बाद  में  जो होगा देखा जाएगा ......आगत गर्मी का आतंक उसकी आँखों के चौकन्नेपन में भर जाता है सहजता से पुराना छूटता है जो नया महसूस होता है होता, दरअसल वो भी पुराना ही होता है कोई विकल्प नहीं .... एक लम्बी टहनी पर आगे- पीछे स्मृतियाँ गौरय्यों की शक्ल  में चहकती है कुछ उडती जाती और कुछ बैठी बतियाती है.घर के बाजू वाली एक मंजिला बिल्डिंग की छाया लगातार छोटी होती जाती है,दूसरी तरफ कालोनी के उजाड़ से पार्क में खड़े लम्बे-लम्बे तेबुआइन के खुरदरे तने लिए ऊँचे पेड़ों पर फैली अधपत्तों वाली शाखाओं पर छलकती धूप जमीन पर इठलाती पड़ी मुस्कुराती है इन्ही पेड़ों से अभी कुछ दिन पहले ही कच्चे पीले नर्म फूल झड कर हवा के साथ यहाँ -वहाँ जाने कहाँ उड कर चले गये ...दिन भर की थकी धूप थोड़ी स्थिर हो जाती है.....खेद सहित ढेर से फूलों के खिलने के दिनों का अद्रश्य हो जाना ,मुक्त होते-होते गहरी आसक्ति में बांध जाना .चीजों का बदल जाना और कुछ का वैसा ही रह जाना ..संभावनाओं को अपनी पूरी ताकत से खंगालना मेहँदी हसन को सुनते हुए.. की धुन पर उन दिनों की छाप लिए श्यामला हिल्स की पहाड़ियों से देखना वहाँ ...जहाँ मीलों दूर हवा कुछ रोशनियों को अब भी रोक लेती है..

कैसे-कैसे मरहले सर तेरी खातिर से किये,
कैसे-कैसे लोग तेरे नाम पर अच्छे लगे ..
(- नजीर अहमद) 
       
     

रविवार, 23 जनवरी 2011

-//बीच रात संशय भरी आँखें कभी मुंदती- खुलती छोटी बड़ी होती जाती है,इससे आगे भी सोचना की अगले मोड़ के बाद फिर बचा रहेगा समूचा दिन पूरा दिन ओर दोपहर.


उस दिन ठण्ड कम थी पारा ना जाने कितना कम या ऊपर होगा नहीं मालूम लेकिन ये सच है कि ताप मापक यंत्रों ने हर स्थिति में यंत्रणा को  --ठण्ड हो या वर्षा या तेज गर्मी बर्दाश्त करना सीखा दिया ...सूरज को सर चढ़ते- चढ़ते थोड़ा वक़्त जरूर लगा लेकिन ओर दिनों के मुकाबले थोड़ी कम धुंध के  बीच किसी छोटे बच्चे कि तरह आकाश में थोड़ा तिरछा सर करके बादलों के बीच से वह निकल ही आया, एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर झुकती सी कांपती है, ओर किसी परदेसी सी भाग जाती है ...थोड़ी हलचल ओह ये कौन? कठिन  सवाल सा, गुमसुम सा -कुछ सुलगता है थोड़ा सुलझता भी है लेकिन उलझन का पता नहीं चलता ,धूप की तपिश पीठ पर भली लगती है ,इसी दिसंबर सात्र को ठीक से पढ़ना शुरू किया है ''शब्द '' के शब्द -शब्द को पढ़ना मानो अचेतन में कई रंगों की लकीरें घुलती -मिलती है ,अफसोस कैसे छूट गया ..ये सब ख़ास पैरा पेन्सिल से अंडर लाइन होते जाते हें हर दोपहर थोड़ा  फ्री होकर सात्र के साथ बीतती है ..इन दिनों, जाने कितने दिनों ओर ये सिलसिला कायम रह पायेगा कुछ पता नहीं ,फिर गर्मियों की दोपहर में सब कुछ अधूरा रह जाएगा --क्या अब भी लौटा जा सकता है 'हाँ'' के साथ अपने ही सवाल के  जवाब में एक निश्चित निर्णय लगातार अगले क्षण को मुल्तवी करता है फिर भी हैरानी नहीं होती ..बरामदे में रखी कांच की गोल टेबिल पर बिखरी किताबों पर कांच के छोटे टुकड़ों से बनी विंड चाइम हल्की हवा के साथ हिलती है धूप कांच के टुकड़ों से  टकराती छोटे-छोटे गोलों में बंटती हुई शब्दों पर हाय लाईट होती जाती है ...सब कुछ ठीक है हवा उसके धुले -खुले बालों में ठंडक पहुंचाती है ओर धूप नर्म-गर्म गर्मी.ये एक अजीब सा अहसास होता है लेकिन मनचाहा कोई पल रुकता नहीं पल भर को साँसे शून्य के हवाले होती हुई अपनी पूरी ताकत से दौड़ने की कोशिश करती है कई क्षण कई बंधन,-पीडाएं -यातनाएं और खुशियाँ   एक साथ दौडती है लेकिन विंड चाइम यकायक स्थिर  होजाती है,और उसमे लगे कांच से आती रौशनी भी ..  धूप थोड़ा आगे जाकर जामुनी फूलों की लतर पर चिढाती सी पसर जाती है ...एक थकान  और हांफ के साथ रुकना होता है,सब कुछ वहीँ छोड़ते  हुए अंदर की हवा को जोर से साँस लेकर बाहर छोड़ना पड़ता है ,हवा भी अब तक थमने लगती है ...थकी आँखें ठहर -ठहर कर पूरे आँगन का मुआयना करती है ,जिस धूप भरे आँगन में पूरी सर्दियां गुजरती है पतझड़ आते ना आते वो बेगाना बन रह जाता है .थोड़ी गर्म थोड़ी सुनहरी धूप क्रमश मटमैली और ज्यादा गर्म होती जाती है ....जतन से पाले पोसे पौधों का  मुरझाना और कुछ एक का मर जाना तय है,शाम स्थिर  चाल से आगे बढती है अनजाना भय मन में कुड़ मुडाता है ,थोड़े दिन पहले ही तो गमलों की मिटटी बदली गई है,एक बोनसाई की सतह पर पीपल का पत्ता तार-तार हुआ आधी मिटटी और जड़ में दबा अपनी हल्की आवाज में फडफडाता शिकायती नजरों से ताकता है ..हर दिन उसे देखते सुनते पिछला हफ्ता गुजर गया बारिश में जाने कहाँ से उड़ कर  चला आया था,हर दिन तय होता है  कि आज जरूर उसे मिटटी से आहिस्ता से निकाल कर साफ कर और सुखा कर टेबिल के कांच के नीचे रख दूंगी ..मगर वैसा हो नहीं पाता -पत्ता रोजाना कातार-लाचार वहीँ पडा-पडा खुद ही बाहर आने की कोशिश करता है और अपनी इसी नाकाम कोशिश में एक तरफा थोड़ा  ज्यादा ही  जर्जर हो चला है ..देखो तो लगता है मानो किसी बुनकर के अड्डे पर टंका हुआ बुनाई के बुनियादी स्तर पर आधा-अधूरा जिसे  और रंग और धागों से काता जाना शेष हो,,,धूप,टेबिल,कांच,पत्ता, सात्र सब कुछ  वक्त की नजर से नजर अंदाज होते हें, एक पेज पलटता है शाम की जाती धूप कांच के गोलों से रिफ्लेक्ट होकर अंतिम बार अंडर लाइन  हुए शब्दों पर  रूकती है ''में एक बेईमान बन गया और बना रहा हालांकि जो भी कुछ में हाथ में लेता हूँ उसमें पूरी तरह से जुट जाता हूँ चाहे  कोई काम हो ,गुस्सा हो दोस्ती हो ,दूसरे  ही क्षण में उससे इनकार कर देता हूँ में उसे समझता हूँ उसे चाहता हूँ लेकिन अपने आप को भरपूर जोश में धोखा दे  देता हूँ..." हर दिन जड़ों के पास जमीन के भीतर मिटटी में दबे हुए पत्ते की तरह नामालूम सुख क़ी तरह कांच के टुकड़ों से निकली रौशनी में, विश्वास की  देह में, देह के प्रेम में, प्रेम की धडकनों में,आते वसंत की आहट में, फ्रेम में रुकी तस्वीर में... गुनगुनाते  एक मयूरपंखी अन्धकार  बरगलाता है, याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से रात के पिछले पहर रोज जगाती है हमें ...कोई ओर गहराता है सुबह से पहले ठीक  बीच रात संशय भरी आँखें कभी मुंदती- खुलती छोटी बड़ी होती जाती है,इससे आगे भी सोचना की अगले मोड़ के  बाद फिर बचा रहेगा समूचा दिन पूरा दिन ओर दोपहर. कल शुरू करना है सात्र का नाटक 'रास्ते बंद है ''....अभी....

अजब सी बात है, अजब सा ये फसाना है ,
कि अपने शहर में, अपना नहीं ठिकाना है ... (-तेजेंदर शर्मा)                     

मंगलवार, 21 दिसम्बर 2010

एक दोपहर की शुरुआत.. - 15 दिसम्बर' 2010


"बस अब इस बहस को विराम मिलना चाहिए", उसने सोचा लेकिन वैसा हुआ नहीं.. जैसा उसने चाहा.. हर दिन की तरह, अल्सुबह की नरमी आँखों में भारती रही, दोपहर का सूरज चटकता रहा और सुरमई शाम का जाता उजाला स्वाद बन जीभ पर तैरता रहा.. जिस बीच कई दिनों से खुद से लापता रहने के बाद मौसम के चेहरे पर खुशियाँ तलाशने में जुटना और इस कवायद में एक स्वप्निल जगह का बनना और ठहर जाना.. सब कुछ के बावजूद खुद को पा लेने वाले अपने ही अंदाज़ में. लेकिन खुद को पाना कभी खुद से लापता रहने वाली लुका छिपी के बीच वाली जगह में अभिवादन और खेद सहित लौटी - लौटाई गयी इच्छाएं ठूस-ठूस कर एक नुकीले तार में पिरोकर टांग दी गयी थी... मजबूत, कमज़ोर, छोटी, बड़ी, इस या उस तरह की.. अब यदि उनमे से किसी एक इच्छा को उतार कर निकलना फिर टटोलने का मन हो तो बाकी को भी उतारना और फिर उन्ही रास्तों, पतझड़ी मौसम की उदासियों की तरह गुज़ारना होता, सच के झूट में तब्दील होता एक पहाड़.. जहाँ तक हांफते हुए दौड़ना, पहुंचना फिर लौटना.. सांसो की आवा-जाही के साथ तार से बिंधी इच्छाओं को उतारना- संवारना... एक कातर नज़र डालना और पलटकर फिर टांग देना उसी बेतरतीब झुण्ड में... शाम होते होते एक चश्मदीद पेड़ मुड़कर सलाम बजाता है, उसकी मजबूत टहनियां हिलती हैं, एक मुस्कराहट दिल से चेहरे तक आती है तेजी से.. इतनी की ऑंखें पनीली हो उठती हैं.. हवा में नमी घुलती है, कोई तेज क़दमों से नज़दीक आता है और अनदेखा किये ही बगल से गुज़रता है.. क्या लौटा जाये यहीं से? अभी इसी वक़्त और समय बीतता है, लौटते हुए बुरी तरह, एक बीती हुई गूंज फिर भी बच जाती है, बिन बटोरी कुछ आहटें मरून पश्मीना में लिपट जाती है, चुभन वाली ठंडक मौसम में हवा के साथ तैरती है.. अपने को बचाने की कोशिश में दोनों बाँहों को क्रास बनाते हुए अपने से लपेटना, नए सिरे से इस दुनिया में अपने को खपाने की निरंतर कोशिश करना और यहाँ-वहाँ लगातार कुछ ना कुछ होना - होते जाना, कोई पूर्णविराम नहीं... मुश्किलों के विरुद्ध कोई जिरहबख्तर भी नहीं, अपनी उदारता में चतुराई से जीना, कितनो को आता होगा ? कितनी चीज़ें खटकती हैं, और कितनी बेखटके स्मृति  के पार चली जाती है, नुकीले तार में अटकती हुई..  एक आरंभिक रंग गाढ़ा होता है फिर फीका पड़ता हुआ नीली धुंध में तब्दील होता है.. कुछ ईमानदार चेतावनियों की दस्तकें साल के अंत की तरह "ठक-ठक" करती चली जाती है, पिछले दिनों की तरह दिन का चलना, थकना और फिर थम जाना... खासा अँधेरा घिर आता है, इन दिनों वैसे भी शाम जल्दी आती है. घर से ढाई किलोमीटर दूर तक, उसे लौटना चाहिए.. एक टूटे हुए चौराहे के सामने सिकुड़-ती हवा के बीच घर का रास्ता देर तक याद नहीं आता, शारीर और आत्मा से बेदखल मन बेहद निरर्थक भाव से ढलान की तरफ बेप्रयास लुडकता है, मन ही मन बच जाने की मंगल प्रार्थनाएं बुदबुदाते हुए, अंतिम अंक.. अंतिम द्र्श्य में एक काला चाँद, काली रात में जलता है.. सिर्फ थोड़ी से रौशनी सन्नाटे के इर्द-गिर्द चकराती फिरती है जो इस बीच इस शहर में दरके हुए बहुत कुछ के बीच अद्रश्य होना चाहती है.. एक कठिन समय में सुनो - जिसे सरलता से नहीं सोचा जा सकता, ना पीछे को आगे, ना बीते को आज, ना वक्र को सरल, ना चुप्पी को कल-कल, ना अँधेरे को रोशन, ना दुःख को सुख, ना दूरी को यहाँ में, ना टूटे को जोड़ने में, सच में तब्दील कर सके ऐसी युक्ति है क्या...?

वक़्त चला जाता है,
वक़्त/ चला गया है/ हर जगह हाजिर था में;
लेकिन/ दस्तखत कही नहीं.. (-श्रीकांत वर्मा)