सोमवार, 17 जुलाई 2023

 अपना एमपी गज्जब है..91

मिर्च का नाम जलेबी रखा

पर न हुई वो मीठी...

अरुण दीक्षित

अक्सर कहा जाता है कि नाम में क्या रखा है!आप तो काम देखो!काम से ही पहचान बनती है!फिर वो चाहे व्यक्ति हो या कोई संस्था! इन दिनों इसी कहावत को चरितार्थ करते हुए एमपी में एक ऐसा उदाहरण देखने को मिल रहा है जो यह साबित कर रहा है कि नाम चाहे जो रख लो पर काम नही बदलेगा!

 आप सही समझे!मैं व्यापम (व्यवसायिक परीक्षा मंडल) से कचबो (कर्मचारी चयन बोर्ड) तक सफर कर चुके सरकारी संस्थान की ही बात कर रहा हूं।पिछले एक दशक से अपने "कुकर्मों" की वजह से पूरी दुनियां में चर्चित इस संस्थान के नाम तो बदल रहे हैं पर चरित्र जस का तस है! दस साल पहले मेडिकल भर्ती परीक्षा में बड़े घोटाले की वजह से चर्चा में आया यह संस्थान अब पटवारी भर्ती में घोटाले को लेकर चर्चा में है।इसकी वजह से सरकार बैकफुट पर आ गई।मजे की बात यह है कि इस बार भी घोटाले के तार सत्तारूढ़ दल से ही जुड़े हैं!

 पटवारी भर्ती घोटाले पर बात करने से पहले एक नजर इस संस्थान पर डालते हैं।1970 की बात है।तब पंडित श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री थे।उन्होंने मेडिकल कालेजों में भर्ती के लिए होने वाली परीक्षाओं को कराने के लिए एक बोर्ड बनाया।नाम रखा गया प्री मेडिकल टेस्ट बोर्ड।यह नाम करीब 12 साल तक चला।

 लगभग एक दशक बाद 1981में इसी तरह का एक बोर्ड इंजीनियरिंग परीक्षा के लिए बनाया गया।उस समय अर्जुन सिंह राज्य के मुख्यमंत्री थे।एक साल बाद दोनों बोर्ड का आपस में विलय करके एक नया बोर्ड बनाया गया।उसका नाम रखा गया - प्रोफेशनल एक्जामिनेशन बोर्ड!हिंदी में नाम हुआ - व्यावसायिक परीक्षा मंडल।जो व्यापम नाम से मशहूर हुआ।

 गठन के करीब 30 साल तक व्यापम आम  सरकारी संस्थान की तरह चलता रहा।उसके भीतर क्या चल रहा है,इसके बारे में कभी कोई खास चर्चा नही हुई।इस दौरान कई सरकारें आई और गईं।किसी का ध्यान व्यापम के "चरित्र" पर नही गया।

 साल 2013 ! मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान।बीजेपी की दस साल पुरानी सरकार!दस साल की कांग्रेस सरकार की कमियों के भरोसे राज्य के लोगों का भरोसा जीतती आ रही बीजेपी सरकार को व्यापम ने बड़ा झटका दिया।अचानक यह राज खुला कि व्यापम में बैठे अफसरों ने सरकार के इशारे पर बड़ा खेल किया है।एक नेटवर्क के जरिए अयोग्य छात्रों को परीक्षा में पास कराया गया।इसके लिए मोटी कीमत ली गई। इस "कीमत" में दलाल,नकली छात्र,बोर्ड के अफसर - कर्मचारी,सरकार 

,निजी मेडिकल कालेजों के मालिक,बीजेपी के नेता और उनके मातृ संगठन के माननीय भी हिस्सेदार बने।

 व्यापम का यह घोटाला जब खुला तो देश भर में हंगामा हुआ।राज्य सरकार कटघरे में आई।खुद मुख्यमंत्री पर कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए।पहले राज्य सरकार की एटीएस ने जांच की।उसने शिवराज सरकार के मंत्री स्वर्गीय लक्ष्मीकांत शर्मा के साथ साथ व्यापम के अधिकारी पंकज त्रिवेदी,नितिन महेंद्र,अजय सेन और सी के मिश्रा को भी गिरफ्तार किया।निजी मेडिकल कालेजों के मालिक और अधिकारी भी पकड़े गए।

 मामला स्थानीय अदालत से होते हुए देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा।उसके आदेश पर सीबीआई ने इस मामले की जांच शुरू की जो आज भी जारी है।

 इस मामले में सैकड़ों लोग गिरफ्तार हुए।दर्जनों लोगों की संदिग्ध मौतें हुईं।आरोपों की जद में सीएम हाउस भी आया।लंबे समय तक यह मामला पूरे देश में छाया रहा।

 मेडिकल भर्ती परीक्षा की जांच के दौरान यह भी पता चला कि व्यापम ने इसके अलावा और जो परीक्षाएं कराई हैं,उन सभी में घपला हुआ है।खूब हंगामा हुआ।विधानसभा में जमकर आरोप प्रत्यारोप हुए।इस दौरान कई लोगों ने अपना मुंह बंद करने की भरपूर "कीमत"   वसूली तो कुछ को मुंह बंद रखने के लिए "समर्थन मूल्य" दिया गया।यह बात भी उसी दौरान सामने आई।

 भारी बदनामी और हंगामे के बीच राज्य सरकार ने तमाम फसाद की जड़ बने व्यापम का नाम बदलने का ऐलान कर दिया। हिंदी की हिमायती बीजेपी की सरकार ने व्यापम के मूल अंग्रेजी नाम को ही प्रचलन में लाने का आदेश दिया।इस आदेश के बाद सरकारी अमले ने व्यापम का नाम मिटा कर हर जगह पीईबी (प्रोफेशनल एक्जामिनेशन बोर्ड) लिखवा दिया।सरकारी रिकॉर्ड में व्यापम पीईबी हो गया।लेकिन लोगों की जुबान पर यह नाम नहीं चढ़ा। चढ़ता भी कैसे? खुद भोपाल नगर निगम ने अपने बस अड्डे पर बड़ा बड़ा लिखवाया - व्यापम चौराहा।

 इस बीच 2018 आ गया।लोग जेल आते जाते रहे।एक लक्ष्मीकांत शर्मा को छोड़ कोई दूसरा सत्ताधारी नेता नही पकड़ा गया।अन्य दलों के भी कुछ नेता पकड़े गए।लेकिन धीरे धीरे सब छूटते रहे।जांच चालू है साथ ही वसूली भी।

 2018 में बीजेपी की सरकार चली गई।लेकिन 15 महीने बाद ही,जैसा कि आरोप कांग्रेस लगाती  है, उसके कुछ विधायकों और एक बड़े नेता को मुंहमांगा "समर्थन मूल्य" बीजेपी ने फिर अपनी सरकार बना ली।शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बने।इसके बाद उन्होंने एक बार फिर व्यापम का नाम बदला।व्यापम से पीईबी बना यह संस्थान अचानक कचबो (कर्मचारी चयन बोर्ड) हो गया।2022 में व्यापम ने कचबो तक का सफर पूरा किया।

 नाम तो बदल गया पर संस्थान का डीएनए नही बदला।आजकल वह फिर चर्चा में है।इस बार उस पर रेवेन्यू सिस्टम की जान माने जाने वाले पटवारियों की भर्ती में घोटाला करने का आरोप लगा है।इस घोटाले में कचबो के साथ एक बीजेपी विधायक के कालेज का भी नाम आया है।

 विपक्ष ने विधानसभा में मामला उठाना चाहा तो अध्यक्ष ने अनुमति नहीं दी। 5 दिन चलने वाला विधान सभा का मानसून सत्र मात्र दो दिन में ही खत्म हो गया।इन दो दिनों में भी सिर्फ करीब ढाई घंटे ही सदन का कामकाज हुआ।सरकार के प्रवक्ता ने इस मुद्दे पर विपक्ष को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।उन्होंने अपनी सरकार का इतनी ताकत से बचाव किया कि ऐसा लगा जैसे विपक्ष ने ही पटवारी परीक्षा कराई हो।

 लेकिन अगले ही दिन जब पूरे प्रदेश में बड़ी संख्या में बेरोजगार युवा इस घोटाले के खिलाफ सड़कों पर उतरे तो खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने पटवारी भर्ती परीक्षा की जांच कराने की घोषणा की।जांच कैसे होगी और कौन करेगा यह बाद में बताया जाएगा।

 कांग्रेस हमलावर है।वह सीबीआई से जांच की मांग कर रही है।उसके शीर्ष नेतृत्व ने भी पटवारी भर्ती घोटाले को उठाया है।उधर भर्ती परीक्षा में बैठे 12 लाख से भी ज्यादा युवा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।जो चुन लिए गए हैं अब वे भी परेशान हैं। शुरुआती दौर में जो तथ्य सामने आ रहे हैं वे यह बता रहे हैं कि पटवारी भर्ती में भी जम कर लेन देन हुआ है।एक बस्ते में कालेज चलाने वालों ने मात्र कुछ लाख रुपयों की एवज में उन लोगों को "पटवारी का बस्ता"(रेवेन्यू रिकॉर्ड) थमाने की व्यवस्था कर दी जिन्हें यह भी नही मालूम कि एमपी में कितने जिले और संभाग हैं।चुनाव सिर पर हैं! इसलिए हंगामा चल रहा है।

 इस हंगामे के बीच यह बात तो समझ में आई कि नाम से कुछ नही होता!जो जैसा होता है वैसा ही रहता है।व्यापम ने ही 41 साल में तीन नाम पा लिए लेकिन उसका काम वही रहा।हमारे गांव में कहावत है - मिर्च का नाम जलेबी रक्खा..पर न हुई वो मीठी! ऐसा ही कुछ व्यापम के साथ हो रहा है।अब कुछ भी हो पर एक बात पक्की है !अपना एमपी है तो गज्ज़ब!है कि नहीं!?

 18 जुलाई 2023




सोमवार, 10 जुलाई 2023

उस दिन कितने पत्ते झड़े थे

 #एक धुकधुकी कलेजे से उतर अक्सर उसकी हथेलियां थाम लेती है आधी रात,

फिर उसके बरअक्स रखकर खुद को सोचना

मैंने सुना  है कि उसके आँगन में एक नीम का  बड़ा सा पेड़ है, ठीक वैसा ही जैसा मेरे घर के आँगन में और  मोड़ पे है ,जब तेज हवाएँ और आंधी चलती है, बरसात होती हैं बिजली चमकती है तो वो नींद से जाग दूर तक -------- अंधेरों में झांकता है कभी कभार -बदली से निकलते  छुपते चाँद की हल्की रौशनी में नीम की  पत्तियों पे पड़ी बूंदें फिसलती है ,और वो टकटक उन्हें देखा करता है ,तब उसके अंदर का वैभव चेहरे पर दमकता है ,यहाँ भी नीम की टहनियां झूमती है तब मन बेहद पीछे चला जाता है 

देर रात किताबों को समेटना  --मोबाईल ऑफ करना -- ठंडे पानी के घूंट भी  कलेजे को नही राहत देती ,पैरों को सिकोड़ लेना फिर लिहाफ में ढँक लेना -हाथों को मोड़कर गर्दन को सिर को मुड़ी हुई बाँहों में धंसा देने के बावजूद नींद आने की कोशिशें भी कभार  बेकार हो जाती है तो फिर परदों को सरका कर बाहर देखने लगना यही होता रहता है, जब तुमसे बात हुए बगैर दिन और आधी रात बीती जाती है

अक्सर बैचनियों में  ऐसा होता है  अपनी असहायता  से तकलीफ भी होती है लेकिन फिर भी--रात गुजर जाती है---

सुबह नीम के हरे -पीले पड़े गीले पत्तों से आँगन

पट जाता है फिर नए सिरे से दिन को शुरू होना होता है

(उस दिन कितने पत्ते झड़े थे जब उस मोड़ से मुड़ते हुए देखा था तुम्हे अपने घर से--और जो

 कहने से बच  गया याद रह गया

 जो सच में सच से ज्यादा था 

नीम के मोड़ पे "-

(कुछ फुटकर नोट्स)

री पोस्ट -

क्या हम पशु हैं ?

 #एक अखबार ने लिखा है ,"क्या हम पशु हैं" 

घटना यूं है कि एक कार्यक्रम के  दौरान सीधी जिला जनपद (मध्यप्रदेश )  में  भाजपा के विधयाक प्रतिनिधि आरोपी प्रवेश शुक्ला ने फुटपाथ पर  बैठे कोल आदिवासी युवक पर पेशाब कर दी ,इस घटना का वीडियो वायरल होने पर मुख्यमंत्री ने आरोपी को एन एस ए के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए हैं ,हालांकि आरोपी भारतीय जनता युवा मोर्चे का प्रतिनिधि रह चुका है 

अब आते हैं इस वाक्य पर कि "क्या हम पशु हैं" जवाब होगा नही ,लेकिन हम पशु से बद्दतर है क्योंकि किसी राह चलते या बैठे व्यक्ति पर कभी कोई पशु पेशाब नही करता, ना करी होगी 

 9 अगस्त को हम विश्व आदिवासी दिवस मनाते हैं 9 अगस्त 1982 को  UNO ने इसकी घोषणा की थी जिसके अंतर्गत आदिवासियों के मानवाधिकारों को लागू करने उनके संरक्षण के लिए आदिवासी दिवस मनाने की अपील की गई थी उस समय संयुक्त राष्ट्र महासभा के घोषणापत्र में अदिवासियों के  अधिकारों के विषय में घोषणा की गई 

इसके अनुच्छेद 7 के पैरा 2 में कहा गया है

आदिवासियों को विशिष्ट व्यक्तियों की तरह ही स्वतंत्रता शांति सुरक्षा के साथ जीने का सामूहिक / एकल अधिकार होगा और उनके प्रति किसी भी तरह का नरसंहार या हिंसक कार्यवाही नही की जा सकेगी, यह एक ऐसी घटना है जिसने सभ्य कहलाने वाले हमारे समाज पर कस कर तमाचा जड़ा है

मनोविज्ञान कहता है ऐसे  व्यक्ति किसी  विकृति के कारण ऐसे आचरण करते हैं ,तो सवाल है ऐसे तथाकथित सभ्य समाज में पैदा कैसे हो जाते हैं , और जनता के प्रतिनिधि तक बन जाते हैं,यदि  होते हैं तो उनकी परवरिश में क्या कमी रह जाती है बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं,क्या हम 16 वी सदी में आ खड़े हुए हैं - क्या आज़ादी के बाद हम रोटी कपड़ा मकान के आगे नही बढ़ पाये शिक्षा या उच्च शिक्षा के साथ बुनियादी शिक्षा में पिछड़ गए ,क्या कानून के लिए कानून बनाकर अपने समाज के पिछड़े दलित,गरीब कमजोर को हमने बेसहारा नही छोड़ दिया, कोई पावर फुल नेता / आदमी है क्या इन लोगों के लिए, लचर कानून और न्याय व्यवस्था के बीच लंबी खाई है,इस घटना ने साबित कर दिया है गरीबों के लिए मान  सम्मान के कोई मायने नही --आप उनके लिए योजनाएँ  बनायें ,उन्हें पैसा बांटे उन्हें रोटी कपड़ा और मकान दे दें ,फिर उन पर यह अमानवीय कुकृत्य करें ,शर्मनाक है यह

इस घटना के बाद में उस वीडियो को यहाँ शो करना असभ्यता समझती हूँ , आप तय करिये ऐसे नारकीय लोगों की सज़ा क्या हो, क्या उन्हें आदिवासी अधिकारों के तहत सज़ा देकर  आपका कर्त्तव्य पूरा हो जायेगा ? या कोई और सज़ा होनी चाहिए ?