शनिवार, 29 अगस्त 2009

/इच्छाओं की एक छूटी हुई अधूरी फेहरिशत में हमारे नमकअश्रु के प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में तुम चाहो तो भी ना चाहो तो भी

तुम नही चाहोगे तो भी
बदलेंगे .मौसम
घूमेगी..धरती
बरसेंगे बादल और आएँगे ,याद हम
और वे लौटेंगी तितलियाँ ..
बेहिचक तुम्हे छू कर,
जिनके पंखों पर लिक्खी
समय ने कदाचित्
एक इंद्रधनुषी इबारत
तुम नही चाहोगे --तो भी,
इस ब्रह्मांड के ख़त्म
होने से पहले देखोगे -निर्विकार
अपने को दोहराए जाते
वक़्त की तरल -सघन रफ़्तार में
तुम नही चाहोगे तो भी
पानी में घुली मिठास सा
पुरइतमीनान समय
करेगा निरस्त -सारी दलीलें को
निश्चित नतीजों की तरह
तुम नही चाहोगे तो भी
आदि- उत्सव की सुगंध सी प्रतिज्ञाएँ
रहेंगी हमारे साथ,
इच्छाओं की एक छूटी हुई
अधूरी फेहरिशत में
हमारे नमकअश्रु के
प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में
तुम चाहो तो भी
ना चाहो तो भी...

"एक ही शख्स था, एहसास के आईने में... कभी शबनम, कभी खुशबु, कभी पत्थर निकला..." - तालिब जैदी (अपनी डायरी की शायरी से...)

13 टिप्‍पणियां:

अजित वडनेरकर ने कहा…

क्या बात है....
बहुत अच्छी कविता। समय बड़ा बलवान है।
अनवाद आपका ही किया लगता है। बढ़िया है।

अमिताभ मीत ने कहा…

Bahut sundar.

श्यामल सुमन ने कहा…

इन्सान की विवशता को दर्शाती एक अच्छी रचना विधु जी।

श्रुति अग्रवाल ने कहा…

बेहद खूबसूरत भावनाओं को व्यक्त करती कविता पढ़वाने का शुक्रिया.....आप कैसी हैं कल सुबह-सुबह आपको पत्र लिखूँगी ...अभी नन्हें महाराज लैपटॉप पर अपनी सीडी देखने की जिद्द पर अड़े हुए हैं।

siya08 ने कहा…

तुम नही चाहोगे --तो भी,
इस ब्रह्मांड के ख़त्म
होने से पहले देखोगे -निर्विकार
अपने को दोहराए जाते
वक़्त की तरल -सघन रफ़्तार में
vidhu ji,
very touching lines... and very beautiful... soulful!
congratulations!

pukhraaj ने कहा…

तुम नही चाहोगे तो भी बदलेंगे .मौसम घूमेगी..धरती बरसेंगे बादल और आएँगे ,याद हमऔर वे लौटेंगी तितलियाँ ..बेहिचक तुम्हे छू कर,जिनके पंखों पर लिक्खी समय ने कदाचित् एक इंद्रधनुषी इबारत.....bahut sundar एक ही शख्स था अहसास के आईने में ...कभी शबनम ..कभी खुशबू ...कभी पत्थर निकला ....

vikram7 ने कहा…

तुम नही चाहोगे तो भी बदलेंगे .मौसम घूमेगी..धरती बरसेंगे बादल
खूबसूरत भावनाओं से युक्त सुन्दर रचना

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut sunder rachna.

neera ने कहा…

true...real...and deep!

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

सृजनात्मकता सुदृढ़ है
--->
गुलाबी कोंपलें · चाँद, बादल और शाम

अनिल कान्त : ने कहा…

मैं तो कहीं खो सा गया कविता को पढ़ते पढ़ते ....मुझे बहुत बहुत बहुत पसंद आई

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

इच्छाओं की एक छूटी हुई
अधूरी फेहरिशत में
हमारे नमकअश्रु के
प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में
तुम चाहो तो भी
ना चाहो तो भी...

मूक कर देने वाली रचना ...कितनी अधूरी इच्छाओं की फेरिस्त संभली हुई है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

SACH HI TO HAI .... KISI KE CHAAHNE NA CHAHNE SE KUCH BHI NAHI HOTA .... YE DUNIYA, YE SAMAY KISI KE CHALAAYE NAHI CHALTE ......