गुरुवार, 1 जनवरी 2015

शब्द उसे ढाढ़स बांधते हैं ---वो उस आवाज की धुंध से बहार आती है -चुनी हुई नियति को तो एकबारगी स्वीकार किया जा सकता है थोंपी हुई को नहीं

कभी  तो क्या, अक्सर ही- निचाट दुपहरी को --खुमरी --की तरह सर पर ओढ़ लेना मजबूरी हो जाती  है 
अच्छा भी लगता है लेकिन बोझ भी लगता है ऐसी बिन बुलाई बरसात में चौक चौरस्ते लहराती गीली हवा से शहर को भिगोते हुए दौड़ लगाते हैं--तेज आंधी कड़क बिजली कलेजा फटता तो नहीं डर  से बैठ  जरूर जाता है इस लम्बे चौड़े जीवन में कई शब्द सीखें --कई बिना अर्थ के शब्द, खिलौने की तरह खूब जुटाए --मुझे प्यार आता है ऐसी ही निचाट दुपहरी में जब बारिश गुजर जाती है और हर तरफ वनस्पतियों --वाली खुशबू के साथ यही गीली हवा थोड़ा थोड़ा रूक रूक कर ठिठुरती है --याद आती है वो शाम --जायज अंत था उसदिन की उस  शाम का शब्द मोहताज थे जिसे जहाँ तर्कों और इक्षाओं के बल पर नहीं परम्पराओं और संस्कारों  के बल पर सोचा गया था, समय की किल्लत थी ---ना ट्रेन के लिए कोई अनाउसमेंट  था की फलाँ अपने निर्धारित समय से दो घंटा विलम्ब से पहुंचेगी या पहुँच रही है ,अक्सर तो मुठ्ठी भर सपने भी मुठ्ठी में ही चकना चूर हो जाते हैं ----कई सवालों से खीज़ पैदा होती है कई के जवाबों से सुकून मिलता है मगर वो अधूरे रह जाते हैं ---कॉफी की  गर्म भाप में सपनीली आँखों का विस्तार रेतीला हो रह जाता है ----उसका उठना गहरी आँखों से झांकना बिछी हुई बिसात पर सधे  क़दमों से चलते हुए चले जाना ---कल्पना से बाहर  हो,छूट  जाता है समीकरण ना गड़बड़ायें -चलो फिर मिलते हैं ---शब्द उसे ढाढ़स बांधते हैं ---वो उस आवाज की धुंध से बहार आती है -चुनी हुई नियति को तो एकबारगी स्वीकार किया जा सकता है थोंपी हुई को नहीं --वक़्त नहीं रूकता कई बातों  चीजों से ---सोच का सिरा फिर रेंगता सा आगे दिशा में बढ़ जाता है ---और बहुत कुछ आँखों में उतरता है ,भरम नहीं मुझे साथ का विश्वास चाहिए वसंत चाहिए -आँखें फिर मूँदती है थक कर एक दुपहरी सन्नाटा पेड़ों पर लटका आँखों के अंधेरों में अटक जाता है ---ज़रा सब्र करो --अपने को समझाती  हूँ --वो पुराना शहर तुम्हारे सपनो में आएगा ---तुम ये सोच के तिल से --ताड़-पहाड़ क्यों बना डालती हो ---ऐसा कुछ नहीं होगा अपने से आश्वस्त होना सबसे अच्छी स्थिति है --अक्सर उसके लिए सर झटक कर कई दृश्यों को विछिन्न कर देना   भी उसी के बूते की बात है वरना तो 
कल परसों और आज जो अच्छी खासी बारिश हुई --शाम इंद्रधनुष निकल आया, रंगो संग विशवास के शब्दों ,रिश्तों और जीवन साथ उसकी दैनिक कार्यसूची में शामिल था उसे सोचना --देर रात सितारों की बातें सुनना  अंतरिक्ष में विचरना --वो तो रास्तों की निश्चिंतता रहती है --कभी कभार हताश  खाली हाथ भी घर वापसी होती है --देर रात नींद नहीं आती --आती है तो --आँखे  जागी रहती है --अपनी ही धड़कन प्रत्यारोपित दिल सी अजनबी सी --एक धुकधुकी अक्सर कलेजें में --हथेलियाँ थाम  लेती है --नाप लेती है धड़कनो में बसी आवाजों को ---नदियों बियाबानो पहाड़ों  कचरों में घूम घूम कर अपने अर्थ खोजो तो अर्थ भरे रंग मिल ही जाते हैं ----जी लेते हैं --अपनी मिटटी अपनी वनस्पति से भर लेते हैं खुद को, शुक्रगुजार हो जाती हूँ तुम्हारे साथ जाने किस किस की, धूप  हवा पानी आकाश इस उदासी इस प्रेम की भी ऐसे जीना कि  दिन महीना साल दर साल प्रेम की अबोध प्रार्थनाओं  में --बीत जाना फिर याद आता है छीजना भी --अपना आप ---जैसे कोई   पोखर गर्मियां आते आते कैसे छीजता  जाता है 
 किनारों की मिटटी से सूखता दरकता वैसे ही --और वहीँ किनारे पीले पड़ते पत्तों  से लदे  अमरक के
पेड़ों से  कुछ पत्ते गिरते सूखी जमीन की दरारों में धंसते  ही जाते हैं  आगे आकर चीजें पीछे रहती हैं --पीछा नहीं छोड़ती---बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती है अपनी उपस्थिति दर्ज करने से बाज नहीं आती  टूटकर गिरते पत्तों की उदासी में से एक पल ख़ुशी  का जब एक नाम उभरता हैमोबाईल की  नियॉन लाइट में ,एक साधारण से दिन और  निरुपाय दिन में, खोई ख़ुशी  मिलने की ख़ुशी शामिल हो जाती है 

  •    उम्रे     --रफ़्त --पे  अश्कबार     न  हो 
  • अह्दे -गम  की हिकायतें मत पूछ [फ़ैज़ ]            

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