सोमवार, 10 सितंबर 2012

एक सफेद कनेर का फूल उसके नाम ..जीत लेना खुद को उसके लिए..खैरियत ओर राजी ख़ुशी का सम्बन्ध वक्त ओर मेरे- उसके बीच वजह बन जाता है .


  •  फिर से लिखा है आज हरे कागज़ के टुकड़े पर ,साथ,ख़ुशी,ओर भरोसा ,  अरसे बाद इक्का - दुक्का विस्मृत कोनो को,वो भरोसा जो मिला था, बिना मांगे ओर याद किया एक नीला सा धुंआ छाया हुआ बेवजही चुप्पी पर   एक गुलदाउदी चेहरा ..फिर से बादल, बारिश ओर उदासी.. ओर लौट कर जाती हुई....ना आती हुई बमुश्किल चंद सांसे. उसका चेहरा कभी कभी यूँ ही उचाट नजर आने लगता है आइना भी अक्सर झूट बोल जाता है, पर आईने से कोई  शिकायत नहीं जब दुनिया की हर चीज मनमानी पर उतारू हो जाये ...कुछ दुश्वारियां थी ..एक लम्बी फेहरिश्त थी,तेजी से गुजरती उम्र थी, संसार की इस आवाजाही में बसी स्मृतियाँ ,क्या सब कुछ याद रख पाऊं बस इसलिए भूल जाना होगा लेकिन कितना ओर क्या ...अपने हरेपन में मौसम की मन मर्जी के आगे हार जाना होता है ..खैरियत ओर राजी ख़ुशी का सम्बन्ध वक्त ओर मेरे- उसके बीच वजह बन जाता है ..आश्रम रोड पर ट्रेफिक में फँसी कार के शीशे को थपथपाते दो हाथ ...पानी की बूंदों से भीगी दो रजनी गंधा की टहनियां,जाने क्या सोच कर ले लेती हूँ,उस रात खूब महकी रजनीगंधा,ओर देर रात तक माय एफ एम पर ''जाने क्या बात है नींद नहीं आती.. गीत बजता रहा...मानों पांच साल से यूँ ही बज रहा हो .. .शायद इसी में बेहतरी होगी लेकिन ..क्या बेहतर होगा ओर क्या नहीं आपकी बेहतरी इश्वर से ज्यादा कौन सोच सकता है ..कनाटप्लेस के मंदिर समूह में बनी ब्लेक मार्बल की गणपति की मूर्ति के  आगे सर झुकता है एक आत्मीय  सूची में उसका नाम नए सिरे से फिर जुड़ जाता है, मंदिर की परिक्रमा एक गुच्छा फूलों का हाथ में लिए, एक सफेद कनेर का फूल उसके नाम ..जीत लेना खुद को उसके लिए ..कुछ चीजें ओर पसंद नहीं बदलती शाम हो आई थी, हर बार मेसेज अलर्ट ने निराश किया लेकिन उस  शाम का रवा डोसा बेहद लजीज था तो दूसरी ओर .शाम के समाचार में बारिश बाबत हाय अलर्ट ...
  •  उसने  ऐसा तो नहीं चाहा था,  आसमान स्लेटी अंधेरों में गुमसुम हो जाता है तमाम साजिशें यकीन को पुख्ता करती हेँ  .आज फिर लिखा है लौटकर अपने शहर में  तुम्हारे शहर के बादल को बारिश के लिए, पहाड़ों को नदिया के लिए, इन थरथराते शब्दों को चुम्बन के लिए ...सच उस रात सुबह तक नींद नहीं आई सुबह बारिश की नमीओर ठंडक थी दो घंटे यूँ ही एक ही जगह लेटे रहने का अपना सूकून था .कोई दुःख कोई ताप कोई खालीपन भी नहीं था...पूरा शहर पानी पानी था..मेरी जमीन भी डूब में थी ओर मुडे -तुडे सपने भी,,सीने में धडकते हुए  बस इक नाम भीगने से बच गया था ..दूसरे दिन हल्की धूप थी बड़ी उम्मीदों से नाउम्मीद होना तय था दिल ने कहा था ये  सच नहीं होगा वो जैसा तुमने चाहा ओर वही हुआ वैसा ही खैर .... उसे नहीं मालूम था,उसके  किस हथेली में धूप  थी ओर किसमें चांदनी ..जाने किसमें में कौन सा सपना रख दिया ..जल गया ...76 घंटे बाद दोपहर का सुनहरा ओर डूबती शाम की हल्की नीलाई- आसमानी मिलकर धूप-छाहीं हो जाते हेँ उसे बाएं हाथ की बीच वाली अंगुली पर भरपूर लपेट लेती हूँ ,थोड़ी ठंडक की उम्मीद ..राहत मिले ..शायद ..पहले ही दिन .कार के गेट में जल्दी बाजी में फँसी रह गई अंगुली .एक नीला सा दर्द ..आँख झिलमिला जाती है लोधी स्टेट की उस बिल्डिंग की नौवीं मंजिल तक लिफ्ट .बर्लिन के चार्ली स्कवेयर में तब्दील हो जाती है उस दिन भी यही हुआ था ..लापरवाही की भी हद है ...अपने को कोसने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं ..तब पचास हजार मील की दूरी भी तय हो गई थी ओर आज  महज पचास मील पर कोई विस्थापित हो  कर  रह  जाता  है ...उसकी डायरी में दर्ज ओर फाड़ दिए गए दिन ओर तारीखों में संयोगों से  सिमट जाते हेँ..कल -परसों आज -कल ...  जो उस तक नहीं पहुंचे ...ओर आज भी निश्चिंत नहीं हूँ कि लड़ने सुलह करने हंसने -रोने या राजी ख़ुशी जीने या डूब कर मर जाने के लिए क्या बचेगा मेरे पास ..आज फिर लिखने का मन है... कि एक छिला हुआ दिन, नील पड़ी वो अंगुली वो धूप छाहीं.. वो मौसम, वो शहर उसका, उनमें से गुजरते दिन रात उसके,  ओर बारिश में भीगा सफेद दुपट्टे का वो कोना ओर उसमें अटका बारिश में  रेशा-रेशा हुआ टूटा ओर उधड़ा सा  एक पीपल का पत्ता उसके शहर का देखो ना, साथ चला आया है अनायास एक जिद्द में ..जिसमें हम थे ओर जिसमें उलझी हमारी एक पूरी दुनिया ...कोई इस्तरी कोई शब्द कोई  लगन ओर जतन से .इन उलझनों पर करूँ .....वो पत्ता सफर करता है एक रात का सफर महज दो घंटों में आश्चर्य एयरपोर्ट से घर तक...मुझे सुनते देखते चुपचाप ..जिसने मुझे एक बूँद तक रोने ना दिया ..एक अकेलेपन में अपने आप से कठोर होना ..वाकई एक दूसरी ही तरह की नरमी में घुलमिल जाना भी था 

  • अजनबी शहर के अजनबी रास्ते मेरी तन्हाई पर मुस्कराते रहे 
  • में अकेला बहुत देर चलता रहा तुम याद बहुत देर तक आते रहे 
  • [राही मासूम रजा ]



 




4 टिप्‍पणियां:

Vinay Prajapati ने कहा…

मोहक रचना

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महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

ओह..
क्या बात
अच्छा लेख

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

भावों का उत्कृष्ट निरूपण..

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

उसकी डायरी में दर्ज ओर फाड़ दिए गए दिन ओर तारीखों में संयोगों से सिमट जाते हेँ..कल -परसों आज -कल ... जो उस तक नहीं पहुंचे ...ओर आज भी निश्चिंत नहीं हूँ कि लड़ने सुलह करने हंसने -रोने या राजी ख़ुशी जीने या डूब कर मर जाने के लिए क्या बचेगा मेरे पास ..........लाजवाब ..मूक कर देने वाला लिख देती हैं आप ...बस दिल में कई पल तक यही लिखा चलता रहता है ...