शनिवार, 7 मार्च 2015

सोचते ही पहुँच जाना भीतरी हदों तक --बेछोर आसमान में ,बियाबान जंगलों में पुराने अस्त्रों से बार बार मुश्किलों को, काट छांट कर पहुंचना तुम तक, एक राग, एक प्रियता का बुलाना।

जब तुम्हारी लय टूटती है,असंगत होती जाती है -अच्छा नहीं लगता एक छोटी सी जगह में छोटे-छोटे शब्द अनुत्तरित हो घायल कबूतरों की तरह लौटते हैं,--सुरमई शाम में, अपने मौन में अपनी यात्रा से ऊबा हुआ  थोड़ा- थका सा ,दिन डूब ही जाता है ,तारीखें बदलती जाती हैं लेकिन कुछ चिन्हित पल रूक रूक दस्तक देते ही जाते हैं उस तरफ से कोई आहट  ही नहीं जैसे कोई बीहड़ शुरू हो -दूर तक- देखो तो कुछ सुझाई नहीं देता -किसी पल को तो सन्नाटा अपनी जद  में लेने की जिद्द भी करता है निजी वजहों से बिछुड़ते पल धूसर हो रह जाते हैं यकीन जानो दिल भी दुखता है बेहद तकलीफ भी होती है ये टोकरी भर लोग मेरे तुम्हारे बीच मन भर पहाड़ कैसे बन जाते हैं, नहीं जान पाती --ये तो मानोगे मुझे सब रंग अच्छे लगते हैं --बस यही धूसर रंग नहीं, सन्नाटे का चुप्पी का ये रंग, हद दर्जे तक इससे मुझे नफ़रत है --बाकी सब रंग मुझे लुभाते हैं-अपने खुश रंग में --फिर भी रंगो से मुझे डर  लगता है--तुम भी जानते हो -सफेद सुबह जीवन से भरा और शाम काला श्याम सा बस ये दो रंग ही अपनी सपाट बयानी में ज्यादा आकर्षित करते हैं-हालाँकि रंगो को ढोंगी होना नहीं आता,तुम्हारी कविताओं के रंगों को तो बिलकुल भी नहीं, कितनी सरलता से लिपट जाते हैं मुझसे-फिर दिनों हफ़्तों महीनो लिपटे लिपटे ही मुझमें समा जाते हैं।   लेकिन पिछले कई सालों से जबसे तुम्हे जाना है --कच्चे पीले फूलों से लदा -फदा एक प्रौढ़ टेबुआइन मेरे सिरहाने वाली खिड़की की चौखट  तक आकर अपनी भव्यता के साथ खिल-खिल करता,खुश करता है उसके रूई जैसे नर्म गोलगोल फूल  हवा चलते ही अंदर सिरहाने तक फैल  जाते हैं 

 सिरहाने खुशियां हो तो भरपूर नींद का आना लाज़िमी है--किन्तु  हर दिन तो ऐसा नहीं होता -खुशियों और उदासियों के सामानांतर स्मृतियाँ चलती है मन को मथती  हुई. उस दिन तुम्हारी हथेलियों में कच्चे आम्रबौर की खुशबू थी वो हथेलियाँ मेरे हाथों में थी और उड़ती ख़ुश्बू आँखों से भर एक दूसरे पर उलीचते हुए हम दोनों -तुम्हे जाना था,मैंने बस जाते हुए महसूस किया तुम्हे,देखा नहीं,देख ही नहीं सकती थी दर्द आँखों में घुलता है बहता नहीं - उस शाम के बाद देर तक रात भी जागी रही संग-घर से लगे उजाड़ पार्क को नगर निगम वाले देर रात तक रेट गिट्टी, मिटटी से-पूरते रहे स्मृतियों की आवाजें भी आती रही --भरती  रही सुबह तक , कहते हैं, जिस साल आम्र ज्यादा फलता है , वो साल शुभ शुभ होता है एक हठ भरी कोशिश --अब ना छूटेगी ना घटेगी वो शुभ महक ,दिन बढ़ते हैं तपे हुए दिनों के साथ  धत्त'' हठात ये सोचना की ऐसा भी होता है --और सोचते ही पहुँच जाना भीतरी हदों तक --बेछोर आसमान में ,बियाबान जंगलों में पुराने अस्त्रों से बार बार मुश्किलों को, काट छांट कर पहुंचना तुम तक, एक राग, एक प्रियता का बुलाना। सजीव स्मृतियों का चलना कोई समृति भूलती नहीं कोई सपर्श छूटता नहीं ---बिना सलवटों वाला शांत समुद्री हरा हरा रंग - मन को सजल बनाय रखता है --लेकिन सृष्टि का क्रम टूटता है एक दुनियादार औरत अंदर बैठी डराती है अपनी जिरह मुश्किल में डालती है सच और सच के सिवा कुछ नहीं वर्जित क्षेत्र में अपनी पहचान मत खोना ?--उसकी बातों से दूर निर्भीक बन सोचती हूँ तुम्हे, बस तुम्हे सोचना ही तो जिलाता है भीतरी कोई अभाव, जिसे लबालब भरता है अपने एकांत और बाहरी शोर से उपजी एक तरंग एक घटना जिसके तारतम्य में विनिर्माण को गूंथना और फिर देखना देर तक उजालों में दर्ज होती तुम्हारी उपस्थिति --एक नैतिक अन्वेषण की मानिंद जिसे में आखिर खोज ही लेती हूँ अपनी पनीली खोजी आँखों से एक कच्ची महक बजती है --डूब जाने को आतुर 
 
[तनहा उसे अपने दिले तंग में पहचान हर बाग़ में हर दश्त में हर संग  में पहचान 
हर आन में हर बात में हर डग में पहचान,आशिक़ है तो दिलबर को हर रंग में पहचान ]


[नज़ीर]  

2 टिप्‍पणियां:

neera ने कहा…

बहुत खूब हमेशा की तरह!

सच एक दुनियादार औरत अंदर बैठी बहुत डराती है

Vidhu ने कहा…

neera thanx