बुधवार, 17 मार्च 2010

इन दिनों सेमल के पेड़ पर ... //-


वो अपनी चुप्पी में मगन है,
अपने दुःख में सुखी, -गर्वोंमुक्त,
अपनी जीत में हार की ख़ुशी लिए ,
अपने सच के झूट से चमत्कृत ...
वक्त से आगे जाना चाहता है ,
सितारों के पार ,
ना जाने किस-किस में व्यक्त होना चाहता है ,
उसका सुख....
इन दिनों सेमल के पेड़ पर ,
लाल सुर्ख फूलों की नियति में ,..
टंका हुआ ,
अकेला अलग -थलग.

दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका के अक्तूबर २००७ के ''अहा जिन्दगी'' में प्रकाशित

9 टिप्‍पणियां:

Amitraghat ने कहा…

बेहद सुन्दर शब्दों से रची भावमयी कविता जिसे पढ़कर मन कभी खुश तो कभी निराश हुआ........"
प्रणव सक्सैना
amitraghat.blogspot.com

अनिल कान्त : ने कहा…

aapki har rachna khaas aur alag hoti hai...

राज भाटिय़ा ने कहा…

सुंदर रचना के संग सुंदर चित्र भी वाह वाह जी

Udan Tashtari ने कहा…

उम्दा रचना!!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

इतनी खूबसूरत कविता में दो स्थानों पर ’की’ के स्थान पर ’कि’ होना खटक रहा है । प्लीज़ उसे सुधार दीजिये ! यह ट्रांसलिटरेशन की दिक्कत है ।

प्रविष्टि का आभार ।

डॉ .अनुराग ने कहा…

अपने सच के झूट से चमत्कृत ...

पूरी कविता में जैसे अंडरलाइन किया हुआ अलग दिख रहा है ....अद्भुत....

योगेश स्वप्न ने कहा…

wah. bahut khoob.

P.N. Subramanian ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कल्पना. आभार.

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

जितनी सुंदर कविता,
उससे सुंदर चित्र!

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मेरे मन को भाई : ख़ुशियों की बरसात!
मिलने का मौसम आया है!
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संपादक : सरस पायस