बुधवार, 12 मई 2010

काश कोई महसूस करता, मेरे शहर के तालाब की फैली....//-

काश कोई महसूस करता ,
मेरे शहर के तालाब की फैली ,
सीमातीत थरथराहट ,
और मरी हुई -बेजान पत्तियों की ,
लगातार कसमसाहट .
डोंगियाँ चली जाती है ,
इस पार से उस पार ,
अपने विकृत अस्तित्व तले ,
मरी हुई पत्तियों को ओर मारते हुए ,
और छोड़ जाती है ,मौन तालाब के अंतर पर ,
क्षण दो क्षण की हलचल ,
काश कोई महसूस करता ,
फिर वही लम्बी चुप्पी ,
और परत दर परत चढ़ती सी ,
प्रकम्पित उदासी ,
काश कोई महसूस करता .....
अपने कॉलेज की पत्रिका ''अभिव्यक्ति'' में प्रकाशित [१९८०]भोपाल के बड़े तालाब के किनारे बेहद खूबसूरत जगह बना एम्.एल बी कन्या महाविधालय जहाँ हम सभी दोस्त बैठकर ग़प- शप्प करते थे ...जिसके दूसरे छोर पर गर्ल्स होस्टल था ...और वहां रहने वाली ..लड़कियां
क्लासेस ख़त्म होने के बाद ..कॉलेज की बोट से ही उस पार जाया करती थी ...बेहद सरल और खूबसूरत उन दिनों की बात ही निराली थी ...

11 टिप्‍पणियां:

Amitraghat ने कहा…

"बहुत बेहतरीन रचना ,लोग अक्सर अजीवित या फिर कल्पनाओं के बारे में लिखते हैं पर आपने एक प्राणवान वस्तु के बारेमें लिखा है ..। मेरी माँ भी-जब वो पढ़्ती थी एम.एल.बी में-तब वो बताती थीं उस जगह के वृक्षों के बारे में ,उस दिशाओं तक पसरे तालाब के बारे में....."

kshama ने कहा…

Aaki rachana wo saare bhaav mahsoos kara gayi..ek talab ke kinare manko le udi..

डॉ .अनुराग ने कहा…

नोस्टेल्जिया!!!!! .......आप भी इसकी चपेट में है......

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ही अच्छी कविता, आप का धन्यवाद

neera ने कहा…

वाह! अल्हड़ समय से इतनी सुंदर कवितायें लिखती हैं आप!

अपूर्व ने कहा…

रचना जैसे स्मृतियों के गाढ़े घोल मे डुबा कर रखी लगती है..’मरी हुई पत्तियों को ओर मारते हुए’ यह बिंब समय की झील मे तरैती स्मृतियों की नौका के लिये ही संभव होगा..
...कविता जेहन की लाइब्रेरी मे सुरक्षित रखी उस किताब की तरह है जिसके पन्नों की खुशबू ३० साल बाद भी फ़ीकी नही पड़ी है...

संजय भास्कर ने कहा…

सुंदर कवितायें लिखती हैं आप!

संजय भास्कर ने कहा…

अच्छी लगी आपकी कवितायें - सुंदर, सटीक और सधी हुई।

संजय भास्कर ने कहा…

ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

संजय भास्कर ने कहा…

PEHLI BAAT YE...
DUSRI BAAT...

AAP TO MERE NANIHAL HI HAI.......

AAP MERE BLOG PAR AAI BAHUT HI KHUSI HUI...

राकेश कौशिक ने कहा…

लगता है आप पर्यावरण के प्रति बचपन से ही सजग रही है - सुंदर रचना