मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

कुछ आहटें बाहर है ,कुछ दस्तकें भीतर,समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मेंअपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं ....,

अब भी कुछ टूट रहा है धरती मैं,
और छूट रहा है ,आकाश मैं ,
थोडा सा झांकते हुए ,चट्टानों से,
कुछ भीग रहा है पहाडों के पार,
कुछ आहटें बाहर है ,
कुछ दस्तकें भीतर,
समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मैं,
अपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं
किस तरह पवित्र और सुरक्षित रखा है मैंने
दुनिया भर के लेखे-जोखे .से अलग ...
अलग वर्ण -शब्दों मैं
अभिनव रंगों मैं ,
सबसे बचाकर,अनहद मैं लीन-तुम्हे।
जब सपना भी नही देखा जा सका
और रात बीत गई,
कोई क्यों रोना चाहता है
तुम्हारे साथ -हँसते हुए ...अकेले मैं ,
अनंत गूंज मैं, ये भी नही जान पाये...
उससे मीलों दूर ..वसंत पास ही है ,यकीन है
जबकि बीता है वो,पिछली रात की तरह,
अभी-अभी,
पीली धूप मैं खिले ,सफेद फूलों की मानिंद,
और मैं तैयार हूँ ,तुम्हारा हाथ थाम लेने को ,
इसी क्षण ,धैर्य और उत्ताप के संयुक्त क्षणों मैं
ये कौनसा मुकाम है ,फलक नही ,जमी नही ,के शब् नही,सहर नही, के गम नही,खुशी नही ,कहाँ पे लेके आ गई ..हवा तेरे दयार की .... (फोटो शिलांग घाटी से)

18 टिप्‍पणियां:

ali ने कहा…

बेहद खूबसूरत !

श्यामल सुमन ने कहा…

भीतर दस्तक दे रहा न जाने वह कौन।
रचना में जो भाव है कर देता है मौन।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

पीली धूप मैं खिले ,सफेद फूलों की मानिंद,
और मैं तैयार हूँ ,तुम्हारा हाथ थाम लेने को ,
इसी क्षण ,धैर्य और उत्ताप के संयुक्त क्षणों मैं

बहुत लाजवाब रचना. चित्र भी अति मनमोहक है.

रामराम.

अनिल कान्त : ने कहा…

आपकी रचना दिल में घर कर गयी ...बहुत ही प्रभावशाली ....

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" ने कहा…

दुनिया भर के लेखे-जोखे .से अलग ...
अलग वर्ण -शब्दों मैं
अभिनव रंगों मैं ,
सबसे बचाकर,अनहद मैं लीन-तुम्हे।
रहस्यमयी आवरण में लिपटी अंतर्जगत को छूती कविता ,शब्द मानों रोम -रोम का स्पर्श कर रहे हों .

SWAPN ने कहा…

sunderabhivyakti.

डॉ .अनुराग ने कहा…

सोचता हूँ कुछ लेन्द्स्स्केप मेल कर दूँ आपको....यकीकन कई कविताये मिलेगी..

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मैं,
अपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं
किस तरह पवित्र और सुरक्षित रखा है मैंने
दुनिया भर के लेखे-जोखे .से अलग ...
अलग वर्ण -शब्दों मैं
अभिनव रंगों मैं ,
सबसे बचाकर,अनहद मैं लीन-तुम्हे।

अदभुत ,और गहरे अर्थ ..सूफी भाव लिए हैं यह रचना ..कुछ पा के फिर उसको समेट लेने की तीव्र इच्छा .. न जाने आपने इसको क्या सोच कर लिखा होगा ..पर हर बार पढने पर इसने मुझे वही अर्थ दिया जो मेरा दिल समझना चाहता था ...संजो के रख ली है आपकी यह रचना ..शुक्रिया

Vidhu ने कहा…

भाई अली जी,श्यामल जी ,राम पुरिया जी ,अनिल्कांत जी,मोना जी ,स्वपन जी आप सभी का शुक्रिया ,डॉ अनुराग जी .आप लैण्ड स्केप जरूर भेजें ,नेकी और पूछ पूछ ...प्रिय रंजना कल जब नेट पर अपनी शिलोंग यात्रा के फोटो ग्राफ देख रही थी ....तभी ये कविता यकायक बन गई ...इसमें सुधार की गुंजाइश थी पर इसे सहज भाव के साथ ब्लॉग पर लगाने का मन बन गया अब जैसी भी है आप सभी के सामने हैं ...जबकि बहुत दिनों से एक कहानी लिख रही हूँ ....जो पूरी नही हो पा रही है ...कल अहमदाबाद जा रही हूँ ६ को लौटने पर ही....

ARUNA ने कहा…

काफी सुन्दर रचना है........और विधू जी, आपके फिशेस बढ़िया हैं!

Kishore choudhary ने कहा…

कविता एक विस्तृत केनवास पर यहाँ वहां फैले रंगों की ऐसी अनुभूति रचती है जो एकाकार हो के भी व्यापक हुई जाती है. मछलीघर के लिए भी आभार मन की तरंगें किसी का अनुसरण करने लगती है पहले अरुणा के यहाँ अब आपके भी, सुन्दर लग रहा है.

mark rai ने कहा…

नमस्ते!
इस पोस्ट के लिये बहुत आभार....
एक श्वेत श्याम सपना । जिंदगी के भाग दौड़ से बहुत दूर । जीवन के अन्तिम छोर पर । रंगीन का निशान तक नही । उस श्वेत श्याम ने मेरी जिंदगी बदल दी । रंगीन सपने ....अब अच्छे नही लगते । सादगी ही ठीक है ।

Surbhi ने कहा…

Pahli baar hi aapke blog par aayi hoon aur aapki rachna padhkar lagta hai ab aate rahna hoga

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।आप मेरे ब्लाग
पर आएं,आप को यकीनन अच्छा लगेगा।

शोभना चौरे ने कहा…

और मैं तैयार हूँ ,तुम्हारा हाथ थाम लेने को ,इसी क्षण ,धैर्य और उत्ताप के संयुक्त क्षणों मैं ये कौनसा मुकाम है ,फलक नही ,जमी नही ,के शब् नही,सहर नही, के गम नही,खुशी नही ,कहाँ पे लेके आ गई ..हवा तेरे दयार की ....
bhut khubsurat abhivykti.
abhar

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

अच्छी अभिव्यक्ति जो और अधिक अच्छी हो सकती है.

Rajat Narula ने कहा…

बहुत संवेदनशील रचना है, बधाई स्वीकार करें..

madhulika ने कहा…

kash ki hindi lipi mai likh pati! gahre bhavon ki sahaj saral abhivyakti. padh ker mujh se kai logo ko laga hoga ki ye to unhi ke dil ki bat hai jise shabdo ke abhav mai aaj tak kah nahi paye
badhai aashish u hi bhavon ko shabd deti raho.