गुरुवार, 31 मार्च 2011

खेद सहित ढेर से फूलों के खिलने के दिनों का अद्रश्य हो जाना ,मुक्त होते-होते गहरी आसक्ति में बांध जाना .चीजों का बदल जाना और कुछ का वैसा ही रह जाना ..//-

कोई कैसे  देख सकता है आने वाले वक़्त की शक्ल ये किसी की इक्छा पर नही निर्भर नहीं हो सकता की वो शक्ल वैसी ही हो जैसी वो चाहे, रिल्के की कविता याद आती है ...टूटे पंख वाला समय -फिर भी अपनी पुरजोर चाल से दौड़ता है समय यूं मानो अंतिम दौड़ हो सुस्ताने का कोई क्षण मोहलत नहीं देता जहाँ बैठकर ये सब होता है वहाँ की सफेद दीवारें पसीजती है,और उनके पीछे एक दूसरी दुनिया खुली-खुली सी ..आपकी पकड़ से बाहर ,मौसम के निशान चस्पां हें यहाँ-वहाँ... हवाएं भी सुस्त हें उस  समय में चुप सी ....सवाल नहीं जवाब सूझे तो बताना ना  सूझे  तो कोशिश करना,एक चेहरा एक बार  स्पष्ट होता है, दूसरी बार दिमाग से बेदखल होता है ..गाढे अँधेरे में एक चकमक मुठ्ठी में बंद है जब चाहा जो चाहा  चमका लिया खुद के किसी पसंदीदा कोने में बैठ जाना और वहाँ बैठ इत्मीनान से बुनना अपने को एक गहरी तन्मयता में --ऐसे में ख़ास ये होता है की चीजें तब दूसरे ढंग से होती हें सिमट-सिमट कर फैलती सी ..सामने आकर अद्रश्य होती सी एक कोशिश लगातार उन्हें एक जुट करने की ..मगर ऐसा होता नहीं ,आत्मा पर मढ़ी खोल कभी भी उसे तार्किक परिणिति तक पहुँचने नहीं देती ..खैर इन दिनों मौसम में उमस की शुरुआत  हो चुकी है बावजूद शामें अभी चिपचिपी नहीं हुई है,अभी कुछ और दिन  सुबह शामे ठंडी रहेंगी बाद  में  जो होगा देखा जाएगा ......आगत गर्मी का आतंक उसकी आँखों के चौकन्नेपन में भर जाता है सहजता से पुराना छूटता है जो नया महसूस होता है होता, दरअसल वो भी पुराना ही होता है कोई विकल्प नहीं .... एक लम्बी टहनी पर आगे- पीछे स्मृतियाँ गौरय्यों की शक्ल  में चहकती है कुछ उडती जाती और कुछ बैठी बतियाती है.घर के बाजू वाली एक मंजिला बिल्डिंग की छाया लगातार छोटी होती जाती है,दूसरी तरफ कालोनी के उजाड़ से पार्क में खड़े लम्बे-लम्बे तेबुआइन के खुरदरे तने लिए ऊँचे पेड़ों पर फैली अधपत्तों वाली शाखाओं पर छलकती धूप जमीन पर इठलाती पड़ी मुस्कुराती है इन्ही पेड़ों से अभी कुछ दिन पहले ही कच्चे पीले नर्म फूल झड कर हवा के साथ यहाँ -वहाँ जाने कहाँ उड कर चले गये ...दिन भर की थकी धूप थोड़ी स्थिर हो जाती है.....खेद सहित ढेर से फूलों के खिलने के दिनों का अद्रश्य हो जाना ,मुक्त होते-होते गहरी आसक्ति में बांध जाना .चीजों का बदल जाना और कुछ का वैसा ही रह जाना ..संभावनाओं को अपनी पूरी ताकत से खंगालना मेहँदी हसन को सुनते हुए.. की धुन पर उन दिनों की छाप लिए श्यामला हिल्स की पहाड़ियों से देखना वहाँ ...जहाँ मीलों दूर हवा कुछ रोशनियों को अब भी रोक लेती है..

कैसे-कैसे मरहले सर तेरी खातिर से किये,
कैसे-कैसे लोग तेरे नाम पर अच्छे लगे ..
(- नजीर अहमद) 
       
     

6 टिप्‍पणियां:

डॉ .अनुराग ने कहा…

सुभानल्लाह !!!!!!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत सच कहा है, समय सुस्ताने की मोहलत नहीं देता है।

daanish ने कहा…

.दिन भर की थकी धूप थोड़ी स्थिर हो जातीहै

पशो-पेश का अजब आलम
लफ्ज़-दर-लफ्ज़
असरदार इज़हार !!

अभिवादन .

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

बहुत सही . जबर्दश्त पोस्ट . शब्दों का जादू और सबसे अंत में एक शानदार शेर. वाह वाह

आभार
विजय
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कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

Vidhu ने कहा…

बहुत दिनों बाद यू कहें की दस माह बाद अपने ब्लॉग पर हूँ और मुझे खुशी है अपने प्रशंसकों के लिए मैंने कुछ नया लिखा है जो उन्हें जरूर पसंद आएगा

Vidhu ने कहा…

बहुत दिनों बाद यू कहें की दस माह बाद अपने ब्लॉग पर हूँ और मुझे खुशी है अपने प्रशंसकों के लिए मैंने कुछ नया लिखा है जो उन्हें जरूर पसंद आएगा