गुरुवार, 24 जून 2010

दुःख चिंदी -चिंदी हो गया..//-

दुःख चिंदी -चिंदी हो गया,
पहली बारिश थी ,
बह गया टुकड़ों में ,
छोटी-छोटी नावों की शक्ल में ,
बहता-बहता गल गया होगा
आगे जाकर.या दूर जाकर ,
रूक गया होगा ,
कहीं किसी मुहाने पर जंगल के
बहुत कुछ छूट जाता है,
अक्सर ऐसे ही,बेरहमी से
इस जिन्दगी में
अपने बेगाने
जो लिखा था वो मिट गया
कुछ जिये कुछ शेष रहे .. ,
अकस्मात कुछ आहिस्ता
लेकिन छूटे जो छूट गये

२४ जून २००६ को नई देहली की एक उमस भरी दोपहर --के बाद ----उसी रात कुछ महिला पत्रकारों के साथ हमारी फ्लाईट जर्मनी के लिए थी ..पहले ब्रुसेल्स फिर बाद में बर्लिन तब वहां विश्व फूटबाल मैच हो रहे थे ,तब ये शब्द ख्यालों में थे ----उसी शाम देहली में धूप वाली छिटपुट बारिश भी हुई थी जहाँ में कई सालों बाद अपनी एक बेहद नफासत पसंद दोस्त से मिली थी ...

12 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ऊम्दा लगी आप की यह रचना, दिल के भावो को दर्शाती, धन्यवाद

pukhraaj ने कहा…

दुःख का साथी तो सुख है .. दुःख है तो सुख है .. अब कैसे दुःख को छोड़ें भला आप ही कहो ..

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

अकस्मात कुछ आहिस्तालेकिन छूटे जो छूट गये ...सही लिखा है आपने ...

kshama ने कहा…

Bahut nafasat se aapne dard ko baha diya...

डॉ .अनुराग ने कहा…

तभी वक़्त से शिकायत दिखती है ......

वन्दना ने कहा…

यही तो ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अच्छी अभिव्यक्ति

Gourav Agrawal ने कहा…

अच्छा लगा पढ़ कर
सुन्दर अभिव्यक्ति

अपूर्व ने कहा…

दुःख अगर ऐसा ही होता तो कितना अच्छा था..कच्चॆ सूत का..पहली बारिश मे गल कर बह जाने वाला...मगर अक्स दुख पत्थर की चट्टान सा सख्त होता है..बारिशे और बसंत आते जाते रहते हैं..

राजेश उत्‍साही ने कहा…

विधु जी। बहुत दर्द है आपकी इन पंक्तियों में । पर जो हैं उन्‍हें तो थामे रहिए।

neera ने कहा…

देर से आई, पर फुर्सत से आना चाहती थी बहते और गलते दर्द को छूने को...

राकेश कौशिक ने कहा…

मार्मिक तथा हृदयस्पर्शी रचना