शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

आतंकवाद के भस्मासुर की चुनौतियों के सामने आख़िर हम नाकाम क्यों?


आतंकवाद के भस्मासुर की चुनौतियों के सामने आख़िर हम नाकाम क्यों हैं?हम थोडा आगे देखें लादेन को जिसने सर पर बैठाया,वो ही विश्व व्यापी सर दर्द बन गया,और जिसकी निवारक गोली कोई देश इजाद नही कर पाया,तेल के कुओं पर कब्जा करने के लिए आक्रमण के बहाने ,अफगानिस्तान को नेस्तान्बूद करने के लिए इरान को धमकाना कभी मुस्लिम तो कभी हिंदू राष्ट्रों को परेशान करना,तो कभी लोकतंत्र के नाम पर ,कभी जेविक रासायनिक हथियारों के नाम पर तो कभी परमाणु कार्यक्रम के नाम पर हमले,,,सभी जानते हैं लेकिन महा शक्ति शाली अमेरिका मैं सत्ता परिवर्तन के बाद ,जो अभी ख़ुद भी आतंकवाद की आंच की झुलसन को भूलानही होगा,भारत की मुश्किल समझ रहा है , ये जो खामियाजा हम भुगत रहें हैं ,इसके लिए हमारी अन्दुरुनी हालत भी कम जिमेवार नही?इसके केन्द्र मैं छेत्रिय अलगाव भी प्रमुख है, पंजाब मैं भिंडरावाले का उपयोग पूरे देश का सर दर्द बना...इंदिरा गांधी की ह्त्या,सिख विरोधी दंगे,--कुर्बानियां ,आतंकियों की नोक पर कश्मीर ,श्रीलंका का तमिल सिंहली विवाद और राजीव गांधी की बलिऔर कुछ ही दिनों पहले मुंबई मैं भी ठाकरे की जातीय राजनीति ऐसे और भी कारण हैं , ,,आज भी पंजाब कश्मीर पूर्वोत्तर ,श्रीलंकाके आतंक के मूल मैं संकीर्ण `छेत्रिय धार्मिक व् जातीय चेतना है तो नक्सलियों व् नेपाल के माओवादी हिंसा के मूल मैं आर्थिक विषमता,रातों -रात अमीर बनने उपभोक्ता संस्क्रती और बेरोजगारी ने भी आतंकी गतिविधियों को खूब फूलने के अवसर दिए ,रास्ट्रीय जातीय धार्मिक भावनाओं के नाम पर युवा शक्ति का दुरूपयोग अब चलन मैं है ,महात्मा गांधी के बाद इतनी कुर्बानियां -पंजाब व् कश्मीर के आतंकवाद के शिकार १९८४ के सिख विरोधी दंगे बाबरी मस्जिद ,मुंबई बोम ब्लोस्त ,गोधरा गुजरात मैं बेगुनाहों की बलि और अब फिर मुंबई मैं लगातार आतंक का तांडव निर्दोषों की कुर्बानी हमारे लिए क्या अन्तिम सबक होगा या.....?

10 टिप्‍पणियां:

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

आतंकवाद के भस्मासुर की चुनौतियों के सामने आख़िर हम नाकाम क्यों हैं?
आतंकवाद के खिलाफ हमारे यहाँ राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी और वोट की राजनीती ही हमें नाकाम कर रही है |

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

यह शोक का दिन नहीं,
यह आक्रोश का दिन भी नहीं है।
यह युद्ध का आरंभ है,
भारत और भारत-वासियों के विरुद्ध
हमला हुआ है।
समूचा भारत और भारत-वासी
हमलावरों के विरुद्ध
युद्ध पर हैं।
तब तक युद्ध पर हैं,
जब तक आतंकवाद के विरुद्ध
हासिल नहीं कर ली जाती
अंतिम विजय ।
जब युद्ध होता है
तब ड्यूटी पर होता है
पूरा देश ।
ड्यूटी में होता है
न कोई शोक और
न ही कोई हर्ष।
बस होता है अहसास
अपने कर्तव्य का।
यह कोई भावनात्मक बात नहीं है,
वास्तविकता है।
देश का एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री,
एक कवि, एक चित्रकार,
एक संवेदनशील व्यक्तित्व
विश्वनाथ प्रताप सिंह चला गया
लेकिन कहीं कोई शोक नही,
हम नहीं मना सकते शोक
कोई भी शोक
हम युद्ध पर हैं,
हम ड्यूटी पर हैं।
युद्ध में कोई हिन्दू नहीं है,
कोई मुसलमान नहीं है,
कोई मराठी, राजस्थानी,
बिहारी, तमिल या तेलुगू नहीं है।
हमारे अंदर बसे इन सभी
सज्जनों/दुर्जनों को
कत्ल कर दिया गया है।
हमें वक्त नहीं है
शोक का।
हम सिर्फ भारतीय हैं, और
युद्ध के मोर्चे पर हैं
तब तक हैं जब तक
विजय प्राप्त नहीं कर लेते
आतंकवाद पर।
एक बार जीत लें, युद्ध
विजय प्राप्त कर लें
शत्रु पर।
फिर देखेंगे
कौन बचा है? और
खेत रहा है कौन ?
कौन कौन इस बीच
कभी न आने के लिए चला गया
जीवन यात्रा छोड़ कर।
हम तभी याद करेंगे
हमारे शहीदों को,
हम तभी याद करेंगे
अपने बिछुड़ों को।
तभी मना लेंगे हम शोक,
एक साथ
विजय की खुशी के साथ।
याद रहे एक भी आंसू
छलके नहीं आँख से, तब तक
जब तक जारी है युद्ध।
आंसू जो गिरा एक भी, तो
शत्रु समझेगा, कमजोर हैं हम।
इसे कविता न समझें
यह कविता नहीं,
बयान है युद्ध की घोषणा का
युद्ध में कविता नहीं होती।
चिपकाया जाए इसे
हर चौराहा, नुक्कड़ पर
मोहल्ला और हर खंबे पर
हर ब्लाग पर
हर एक ब्लाग पर।
- कविता वाचक्नवी
साभार इस कविता को इस निवेदन के साथ कि मान्धाता सिंह के इन विचारों को आप भी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचकर ब्लॉग की एकता को देश की एकता बना दे.

We hate Pakistan ने कहा…

जिहाद के नाम पर ये फैलाता है जूनून

मासूमों का खून बहाकर पाक को सुकून


आप भी, अपना आक्रोश व्यक्त करे

http://wehatepakistan.blogspot.com/

बेनामी ने कहा…

aur in netaon ko vahan bheja kisney, humney, to rajnitik ichhashakti ki kami kahan hui?

राज भाटिय़ा ने कहा…

जो हमारे नेता है जिन्हे हम वोट दे कर अपनी सुरक्षा का भार सोपते है, वही ही अपने मतलब के लिये हामारी जिन्दगियो से खेलते हे, हमे आपस मै डराते है

chitthanama.blogspot.com ने कहा…

1...........
कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो
सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाजिमी तो नहीं था
देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे
सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें
पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो
लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी
डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर

2............
ख़ून में लथ-पथ हो गये साये भी अश्जार के
कितने गहरे वार थे ख़ुशबू की तलवार के
इक लम्बी चुप के सिवा बस्ती में क्या रह गया
कब से हम पर बन्द हैं दरवाज़े इज़हार के
आओ उठो कुछ करें सहरा की जानिब चलें
बैठे बैठे थक गये साये में दिलदार के
रास्ते सूने हो गये दीवाने घर को गये
ज़ालिम लम्बी रात की तारीकी से हार के
बिल्कुल बंज़र हो गई धरती दिल के दश्त की
रुख़सत कब के हो गये मौसम सारे प्यार के

अशोक पाण्डेय ने कहा…

आप ठीक लिख रही हैं। जब भी इस तरह के हादसे होते हैं, हम विलाप करते हैं, निन्‍दा करते हैं, आक्रोश जाहिर करते हैं, नारे लगाते हैं, और फिर अपने स्‍वार्थ में डुब कर सब कुछ भूल जाते हैं। सबक कभी नहीं लेते। भ्रष्‍टाचार, असमानता, गरीबी, अशिक्षा आदि इनकी जड़ में हैं, इन्‍हें खत्‍म किए बिना आतंकवाद जैसी चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता।

Pt. D.K.Sharma "Vatsa" ने कहा…

हमारा देश राजनीतिक ईच्छाशक्ति मे सचमुच नपुंसक ही साबित हुआ है

shruti ने कहा…

आतंकवाद के भस्मासुर का अंत ठीक उसी तरह से हो सकता है जैसे मोहनी रूप रखकर प्रभु विष्णु ने भस्मासुर दानव का अंत किया था। अब तो साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग करना होगा लेकिन वक्त आ गया है यदि हम एक हुए तो भस्मासुर को भस्म होना ही होगा।

Waiting For True Indians ने कहा…

Subject: Invitation to Jago Bhopal Inaugural Online Blogger Symposium (22 Dec - 28 Dec 2008).

Vidhu Ji,
Hello.

The Mumbai Terror Attack evoked the same emotions in all of us, we all tried to do something for our country, someone SMSed, the other joined a Candle Vigil, even some people sulked that nothing can be done in this country, for this country, by its people.

The Blogging Community is an exception to this, because each person’s ideas and solutions are there for all of us to read and discuss, and then we can convert these into reality. The problem is simply by writing a blog article we cannot change our country, the problem is apart from a few famous ones all the bloggers stay at the margins of internet getting frustrated why their wonderful idea is not being listened to and put to action.

The problem is that we all don’t connect with each other even in the same city, even on the internet. The problem is our intentions should be reflected in our actions, to clean the politics of this country, we must at least participate in political discussions (not like that shown on NDTV, but like all of talking together through blogs)

In this context, I invite you to connect with other bloggers from Bhopal and make an initial contribution to a new kind of politics in Bhopal and in our country.

I invite you to the Jago Bhopal Blogger Symposium (2008).

I request you to write an article (write a sentence, a long article, a full-fledged criticism, a couplet, a poem, anything) on any one of the following topics:

1. India of My Dreams.

2. Is Jago Party a better option than other political parties of India.


ENTRY SUBMISSION:

1. Publish the entry on your blog and mail it to latent.dissent@gmail.com or post the link on the symposium notice form on jagobhopal.blogspot.com

2. Send the entry directly to latent.dissent@gmail.com or jagobhopal@gmail.com along with your name.

3. The date of entry is from 22 December to 28 December 2008.

Sincerely,
Latent Dissent.
(latentdissent.blogspot.com)