शुक्रवार, 7 नवंबर 2008

कुछ दुःख भी सुखों की तरह अलौकिक होते हैं...








जब वो चार साल की थी तभी तय हो चुका था की उसके किडनी का आपरेशन होगा ...और जब वो ९ साल की हुई उसका आपरेशन हो रहा था ,जो करीब ९ घंटों तक चला उतने समय मेरी आंखों से आंसू बहते रहे,-जाने कितनी दुश्चिंताओं के साथ की अन्दर डॉक्टर उसको चीर-फाड़ रहे होंगे। एक असहाय और निश्चित नियति में, वो समय गुज़र रहा था... मित्र,परिवार सभी लोग चारो और थे लेकिन माँ तो अकेली थी- बस बेटी और मेरे बीच एक इश्वर था... वो ज़िन्दगी का अनमोल पल था जब शाम सात बजे डॉक्टर ने आकर कहा, "आप उसे देख सकते हैं", हमारी ज़िन्दगी में कुछ दुःख भी सुखों की तरह अलौकिक होते हैं और एक ही मुहाने पर आ खड़े होते हैं, वो पल ऐसा ही था। उसे स्ट्रेचेर पर लेटे देखा, हाथ और पेट पर अनगिन पट्टियाँ-नलियाँउसे जोर से गले लगाकर, भींचने का मन हुआ... जब पैदा हुई थी एकदम रुई के गोले सी किंतु नर्म दहकते हुए टेसू के फूल की तरह और उस वक्त मुरझाई, सुस्त और पीली पड़ गई थी। वो उसका पुनर्जन्म था... माँ से बेटी का जो रागात्मक रिश्ता होता है, ताउम्र एक ही लय-ताल से बंधा होता है। वो दुःख जो नौ घंटे मैंने जिए, उन महीनो में भी जब वो मेरे शरीर में अपने नन्हे शरीर के साथ एक सुखद अनुभूति की तरह पल-बढ़ रही थी तभी उसने मुझे एकाग्र होना सिखाया था, आत्मा से एकाग्र होना और उस दुःख ने ही मुझे मांजा और सुख ने मुझे जिलाया।
इसके बाद वह लगातार एक माह तक नर्सिंग-में रही, अपने प्रतिदिन के काम करना डॉक्टर की विसिट के पहले वाली सारी मेडिसिंस खाना, उन्हें नोटबुक में लिखना अपनी यूरीन बैग पकड़े हुए टॉयलेट जाना, उसे संभालना... पूरी-पूरी रात वह मेरी बांह पर सोती, कॉमिक्स पढ़ती - ताज्जुब कोई दुःख, कोई थकान, कोई मुश्किल नहीं होती - बस वो स्वस्थ हो गई। ज़िन्दगी की सबसे बड़ी अनुपम सौगात, जब मैंने उसे बीमारी से उभरते हुए, चलते-फिरते देखा वो मेरी भूख , प्यास , नींद, सुख-दुःख का ध्यान रखती अपनी उम्र से दस साल बड़ी हो गई थी उन दिनों... और आज (आठ नवम्बर) को वो अट्ठारह साल की हो गई है। इस दुनिया की सारी खुशियाँ उसे मिलेगी, विश्वास है...

गुरुवार, 6 नवंबर 2008

सिहांसन किसी की बपौती नहीं... पिछले चुनाव और उमा भारती.




कल जब ओबामा की जीत का जश्न पुरी दुनिया मना रही थी,तो मुझे मप्र के २००३ के विधानसभा चुनावोंके बाद के माहौल की बरबस याद हो आई,तब उत्तर भारत के चार प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों,मप्र राजस्थान देहली तथा छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनाव संपन्न हुए थे तब इनमे से छतीसगढ़ को छोड़कर शेष राज्यों मैं महिला नेतरतव के उदय स्थापना के साथ ही इतिहास ने मोड़ लिया,मप्र और राजस्थान मैं काबिज कांग्रेस को सत्ता से हटाने मैं बीजेपी ने वसुंधरा राजे सिंधिया और उमाभारती को मुख्यमंत्री के रूप मैं प्रोजेक्ट किया था तब तुलसी कीये पंक्तियाँ "धीरज,धर्म,मित्र अरु नारी; आपातकाल परखीं ये चारी" को उन्होंने चरितार्थ किया। उन्हें संगठन व चुनाव अभियान की जिमेदारी भी सौंपी गई थी,परिणाम मैं उन चुनावों मैं तीन चौथाई बहुमत से जीत हांसिल हुई जिसका श्रेय सिर्फ उमाभारती को जाता है ...बचपन से अलोकिक उमा चाहे राजनीति मैं राजमाता के कहने पर आई हो लकिन अपनी असाधारण प्रतिभा के बल पर ,अपनी सात्विक और प्रबल इक्छाशक्ति के बल पर दमदारी से जब उन्होंने चुनाव जीता था तब मप्र के राजनेतिक इतिहास मैं पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप मैं उनका आगमन थोड़े समय केलिए ही सही ,एक अति विशिष्ट घटना की तरह था, बिना लागलपेट के अपनी बात कहने वाली मुखर,कर्मठ इस साध्वी ने सिद्ध कर दिया की सिहांसन किसी की बपौती नही होते -सच्ची किंतु हठी बालसुलभ और परिपक्व भी गंभीर तो सरल साधारण भी किंतु स्त्री के असाधारण -व्यापक रूपों और अर्थों से भरी उमाभारती चुनाव पूर्व अपनी जिस अद्भूत ताकत के बल लोगों से मिलती थी,उनके यात्रा अनुभवों को एक स्त्री की दर्ष्टि ही अनुभूत कर सकती है जहाँ जहाँ वे गई लोग अति उत्साहित थे ठीक वैसे ही जैसे लोग बराक ओबामा को जीत से पहले और बाद मैं देख रहें हैं,संकल्प रथ के दौरान वो ना रुकी ना थकी ना हताश हुई ,जनता को उन्हें चुनना था ,सो चुन लिया कुछऐसे कारक तत्वों ने उनके पक्ष मैं असर किया था की सन्यासिन ने जो चाहा उसकी झोली मैं आ पडा ,अपनी धुँआधार आम सभाओं मैं वेस्त्रीऔर गरीब के पक्ष मैं बोलती, यात्राओं के दौरान जहाँ रूकती वहीँ पूजा करती ,किसी गरीब के यहाँ भोजन करने से नही हिचकती, रास्तें मैं जहाँ से उनका काफिला गुजरता कार के शीशे हल्दी कुमकुम और रोली से पट जाते,ज्यादातर महिलाएं उन्हें अयोध्या वाली बाई कह कर संबोधित करती थी,८दिसम्बर की सुबह ११ बज कर ५५ मिनट पर जब उन्होंने भगवा वस्त्रों मैं शंखनाद और वैदिक मंत्रोचार के बीच मुख्यमंत्रi पड़ की शपथ ली वो द्रश्य अद्भुत था २०-२२हजार लोंगो के बीच गेंदों और गुलाबों की खुशबू साधू-संतों का जमावाडा था ।उसी शाम अपनी पहली पत्रकार वार्ता मैं उन्होंने मेरे एक प्रशन के उत्तर उन्होंने कहा था ...महिलाओं के मान सम्मान की रक्षा करना उनके स्वाभिमान को बनाय रखने के लिए मेरी सरकार सम्पूर्ण प्रयास करेगी ...मेरा उनसे पहला परिचय ९६ मैं लोकमत के लिए एक साक्षात्कार के सन्दर्भ मैं हुआ था,ये रिश्ता एक पत्रकार से ज्यादा महिला मित्र का था और आज भी है ....बाद की कथा मैं उन्हें उनके हक से बेदखल करना और दूसरी चुनौतियां थी जिसका मुकाबला उन्होंने डट कर किया,उनके नेत्रत्व मैं पंडित दीनदयाल का एकात्म राजनीतिकवाद के रूप मैं आकर लेता तो प्रदेश की तस्वीर ही कुछ और होती ,लकिन ये सच है उमाभारती जैसीस्त्री का महत्व किसी पार्टी से नही ...इस बार जनशक्ति पार्टी का भविष्य जो हो सो हो ।आगामी वर्षों मैं उसकी सूरत बदली नजर आएगी।

बुधवार, 5 नवंबर 2008

पृथ्वी की तरह थरथराते हुए... प्रेम करते हुए...



जिन दिनों ,

अंधेरे आकाश से लड्ते हुए।

बादलों को चीर कर कभी कभार ,

दिख जाता था,एक टुकडा चाँद,

तुमने मेरे मन को,

पोथी की तरह बांच डाला था,

पृथ्वी की तरह थरथराते हुए,

तुमने किया था स्पर्श ,

कई बार जब तुम्हे प्यार करते हुए,

मुझे याद आया हमारा युद्धरत देश,

तुमने गुलाबी होंटों को,

मेरे माथे पर धर कर अभिषेक किया,

जबकि बेहद आक्रोश था मन मैं,

तुमने फूल सा हाथ,

मेरे कन्धों पे रखते हुए,

मुझे और तपने दिया।


यह खूबसूरत प्रेम-कविता सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के पौत्र - 'विवेक निराला' की है। जिसे अपनी डायरी से ...


मंगलवार, 4 नवंबर 2008

बांधो ना नाव इस ठौर बन्धु...


कई बार मुश्किलों से बचने की कवायद में, मन ही मन टोह लेना पड़ता है की सामने वाला क्या सुनना चाह रहा है। सारी सतर्कताओं के साथ कुछ कदम नियत से आगे भी देखना होता है। जब मैं जॉन स्टुअर्ट को पढ़ती हूँ "स्त्रियों की पराधीनता" पुस्तक में, और वे कहते हैं, "पुरूष केवल महिलाओं की पूरी-पूरी आज्ञाकारिता ही नहीं चाहते, वे उनकी भावनाएं भी चाहते हैं... सभी पुरूष अपनी निकटतम सबंधी महिला में एक जबरन बनाये गए दास की ही नहीं बल्कि स्वेच्छा से बने दास की इच्छा रखते हैं अतः उन्होंने महिलाओं के मस्तिष्क को दास बनाने के लिए हर चीज का इस्तेमाल किया। तो मुझे लगता है जैसा की पिछला तमाम अनुभव भी बताता है की ज़िन्दगी एक ही ढर्रे पर नहीं जी जा सकती, अनुभव हमेशा विशिष्ट होता है। ख़ुद के पक्ष और पक्षकारों के तर्कों के सहारे, समय और इतिहास से परे सोचना, बतलाना, जतलाना एक किस्म की सस्ती-बेवकूफी हो सकती है। मैं महान नहीं, ना तपस्वी फ़िर भी सचमुच कितनी तपस्या करनी होती है कुछ जोड़ने-सहेजने के लिए। इंच भर की कमी कभी-कभार मन मुताबिक ना हो तो रिश्ते पानी की लहरों की तरह इधर-उधर हो जाते हैं, क्या हमारा संघर्ष हमारे संस्कारों का ही हिस्सा नहीं बन जाते? सच मानियेगा, ज़िन्दगी जितनी बड़ी लगती है; उतनी है नहीं। अब देखिये ना, समय नहीं ठहेरता किसी के लिए। झूठ है, कहते हैं, इन्द्रधनुषी समय में रुके हुए पल, ज़िन्दगी अकस्मात एक बहुत बड़ा कैनवास बन जाती है जिसमे अधिकांश नाराज़ लोगों के चेहरे उभर आते हैं। समझ नहीं आता, समझ तो यह भी नहीं आता क्यों लोग अपने जीने, रहने और सोचने के तरीकों को अपने इष्टमित्रों पर लाद देते हैं, उसे सही साबित करना भी। पर हमेशा ऐसा नहीं होता ना? जो कहीं सही होता है, वही कहीं-कभी ग़लत भी हो जाता है, और हम उसी में से अपना सही-ग़लत चुन लेते हैं। किसी भी रिश्ते के चरम का अंदाजा लगाये बिना, एक-दुसरे की पीड़ा जाने बगैर, लौट आना वहीं जहाँ से चले थे। बीते सुखों को गोल चाँद के पीछे धकेल कर... बहुत सी हिदायतें, ये करो; वैसा करो; पुख्ता करो... हमेशा कोई कैसे सही हो सकता है? मानसिक चौकसी पाबन्दी यंत्र की तरह कैसे सम्भव है?... जब बोनसाई की देखभाल करती हूँ रसोई में दूध उफान जाता है, मनपसंद गीत-ग़ज़ल सुनते मोबाइल या फ़ोन सुनाई ही नहीं देता, जल्दबाजी में ठोकर भी लग जाती है... आप बताएं क्या में अपने बेहतरीन समय की अमुल्यता को इसी हिसाब-किताब लगाने में ख़त्म कर दूँ - की किस काम से कितना नफा नुक्सान होगा? मुझे रूककर, पीछे पलटकर या आगे बहुत दूर तक नहीं देखना चाहिए की आख़िर मैं कहाँ तक पहुँची और मुझे कहाँ तक जाना है

हमारी यादों में बचपन के भय मौजूद रहते हैं, ज़िन्दगी उदास घाटी में बेकाबू हो जाती है। पहाडों के पार से गूंजती आवाजें इस कलिकाल में किसी अपने-अपनों के अंतस में उतर जाने की आकांछा दम तोड़ देती है। रिश्ते टूटने, खोने और उन्हें बचाने की कशमकश में कुछ नायाब इच्छाएं बीच-बीच में सर उठती है। दूसरो की खुशी में अपनी खुशी हांसिल होना , पाना और हर कहे को सर- माथे पर रखना हमेशा तो नहीं हो सकता ना? फ़िर कभी ना मीठे में तब्दील होने वाली कड़वाहट! क्योंकि मैं स्त्री हूँ, क्यों नहीं मान लेते आप- मेरा स्त्री होना एक जैविक बोध ही नहीं बल्कि सामाजिक बोध भी है और मनुष्य होने के नाते, मैं भी वो सब कर सकती हूँ जो आप सब कह/कर पातें हैं...

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008

"कई मौसम एक साथ चलते हैं" अमृता प्रीतम की किताब - दूसरे आदम की बेटी...मैं


अमृता प्रीतम की "दूसरे आदम की बेटी" पुस्तक २००२ में 'राजपाल एंड संस' ने समीक्षा के लिए मुझे भेजी थी। यह किताब पढ़ना शुरू करने के बाद ख़त्म किए बगैर छोड़ देना मुश्किल है, उनके लिए ही नहीं जिन्होंने गुज़रा ज़माना देखा है या जो किताबों के साथ जिए हैं, बल्कि उनके लिए भी जो इस टी.वी संस्कृति के मुरीद तो हैं साथ ही अपने वक्त की दुनिया का अपने पड़ोसियों का और दुनियाभर के अदीनो लिखने वालों का हाल जानना चाहते हैं। अमृता प्रीतम की नायाब कलम से, एक दूसरी नायाब कलम का, एक नायाब बयान है यह किताब।


तौसीफ ने कहा - "मैं कहानियो की शक्ल मैं कुछ लौटा रही हूँ, और ख्वाहिश रखती हूँ की और लिखूं ताकि दुनिया छोड़ने से पहले मेरा वजूद हल्का हो जाए..."

कौन है ये तौसीफ? अमृता प्रीतम ने लिखा वह आई थी/ शनाख्त के कागजों पर मोहरें लगवाती हुई/और सफर के लिए/ उँगलियों पर गिने जा सकने योग्य/ दिनों की मोहलत मांगकर... मुख्य बात यह नहीं है की तौसीफ कितनी ऊँची अदीन हस्ती है पाकिस्तान की बल्कि यह है की वह अमृता की रूह में जज्ब हो चुकी दोस्त भी है, और अमृता जैसी शायराना कलम जब अपनी रूह में बैठी दूसरे आदम की बेटी के लिए चलती है तो लफ्ज़ जैसे बहने लगते है। "कई मौसम एक साथ चलते हैं मजमून के" यह शब्द कभी लाहौर शहर के ऊँचे बुर्ज के नीचे से बहता दरिया बन जाते हैं और कभी पंजाब की मिटटी में खड़े दरख्त की सुर्ख-नर्म कोंपले... कभी करांची की शायरा सईदा गजदर का जलाया हुआ दीया बनते हैं तो कभी मिजोरम की जोयान पारी की जल्पई हुई आग की लपट... ।

ऐसे एक साथ कई मौसमों की ताजा बयार बहती है इसमे। तौसीफ पाकिस्तानी लेखिका है, बागी लेखिका है, सत्ताधीशों का चैन हराम करने वाली लेखिका भी जो महीनो पाकिस्तानी जेलों में बंद रही हैं। वे उस पंजाब में पैदा हुई थी जो अब भारत में है। अमृता उस लाहौर में पली-बड़ी जो अब पाकिस्तान में है। विभाजन की बेबसी, दोनों की कलम तीखी कर गई और दर्द से भर गई। तौसीफ ने अमृता जी को ख़त लिखने शुरू किए। उनका लिखा हुआ पढने के बाद - गुमनाम ख़त, जिसमे नीचे लिखा होता था - "एक बेटी पंजाब की"। किसी ख़त के नीचे कुछ और, और किसी के अंत में "एक कैदी शहजादी का ख़त" और इस कलम की शहजादी के गुमनाम खतों से हो पहचान शुरू हुई थी अमृता जी की उसी की परिणिति है दूसरे"आदम की बेटी"।

तौसीफ ने अमृता प्रीतम के लिए कहा था - "तुम खुदा के हाथ से गिरी हुई दुआ हो", और अमृता ने कहा तौसीफ को "तुम जैसी नियामत को कोई खुदा हाथों से गिरने न दे"। यह सच ही कहा था उन्होंने ।

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008

जब गूंजता हुआ एकांत था...

जब गूंजता हुआ एकांत था,
और हर संकेत समुद्र सा गहरा,
हमारे समीप का कण कण वसंत था,
और उल्लास की हर बार,एक और सूर्योदय,
और तुम
की जैसे गीत की कोई एक पंक्ति, बार बार दोहराई जाती सी,
तब सब कुछ मुठ्ठी मैं था और मैं,
मुठ्ठी मैं से रिसने का अर्थ तक नही जान पाया।

आज पुरानी डायरी खोली तो इस कविता का अंश दर्ज था। जो समय, मौका, दुःख और सुख से परे है। यह कविता,भिक्खुमोग्ग्लायन की अद्भुत प्रेम कविताओं से है।

रविवार, 26 अक्टूबर 2008

मनाओगे क्या तुम अपने को मेरे साथ, त्यौहारों से ज्यादा... "


ना मिलने के मुकाबिल जो हमे मिल जाता है उसे ही हम जानते हैं. विभक्त हुए बिना का जीवन जाने बिना, सुख के बिना का पर्व, मृत्यु के बिना का जीवन और हमारा मन। कहते है संसार की तीन चीजें कभी अपनी पहचान नहीं खोती - आकाश, धरती और मन! यदि मन में राग नहीं तो जीवन का मूल तत्व निर्जीव हो जाता है। कोई इसे अपशकुन कह सकता है, राग से अनुराग होता है तभी घर में बिना दीप के भी प्रकाश होता है, बिना पर्व के उत्सवी वातावरण। यूँ देखे तो मनुष्य का जन्म ही प्रकाश की खोज के लिए हुआ है। उसकी ऑंखें गर्भ से बहार आकर खुलती है सिकुड़ती है रौशनी के लिए, वो दीपक से मिले सूर्य से या बादलों के बीच झिलमिलाते चाँद से उसे बस प्रकाश चाहिए, अपने साथी के भीतर भी वह अपना प्रकाश पाना चाहता है - उसके सहारे जीना।

पुरूष ने सूर्यास्त के पश्चात् अंधेरे के भय को दूर करने के लिए शरण-स्थली जैसे आवर्तित प्रकाश के स्वरुप में स्त्री की खोज की थी, साथ मिलकर अग्नि के प्रकाश का दहन किया था, संध्या का वंदन किया था - तब ना उसे अधो वस्त्र की जरूरत थी ना उत्तरीय (ऊपर के वस्त्र) की थी या तो मात्र मन का प्रकाश उसकी निर्मल छवि थी, मन के किसी भी प्रारूप को कभी भी तो स्थिर नहीं किया जा सका है, ना आकाश, ना धरती, ना क्षितिज में, ना उसका मापदंड बनाया जा सका है। सच है मन ही काल और कालांतरित व्यवस्था - दोनों का निरपेक्ष दृष्टा होता है। यह मन ही है जो कभी न प्राप्त होने वाले सुख की परिकल्पना को भी बेहद अपना बना छोड़ता है। इसीलिए 'भवानी प्रसाद मिश्र' की कविता की उक्त पंक्तियाँ - "मनाओगे क्या तुम अपने को मेरे साथ, त्यौहारों से ज़्यादा" - इस उत्सवी वातावरण में भी शून्य और बेनाम होते जाते रिश्तों को मूल्यवान बनने में जुट जाती है, अपनी, निहायत भोली संभावनाओं के साथ इस लचर, शुष्क, बोनी और लिजलिजी व्यवस्था में एक गहरे अविश्वास के बावजूद मन के साथ.
-दीप पर्व की शुभकामनाएं!

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008

चकाचौंध करते आकाश की पृष्ठभूमि में सगर्व - "कज्जाक"

इमानदारी से जीने के लिए आदमी को कुछ करने को लालायित होना, चाहिए भटकना और गलतियाँ करना शुरू करना चाहिए और फ़िर से छोड़ना चाहिए और निरंतर संघर्ष करना चाहिए। इत्मीनान और चैन तो मानसिक अधमता है। लेव तोल्स्तोय के ये शब्द - हमारे लिए भी बहुत कुछ स्पष्ट करते हैं, जब भी उनकी बात होती है तो उनके विश्व विख्यात उपन्यास- युद्ध और शान्ति, अन्ना कारेनिना और पुनुरुथ्हन के विषय में ही, लेकिन 'कज्जाक' जिसका शाब्दिक अर्थ है 'आजाद आदमी'। उपन्यास उनके प्रारंभिक उपन्यासों में से हे जो उनके अपने निजी अनुभवों के आधार पर लिखा गया है। १८५१ में २२ वर्ष की उम्र में वे अपने बड़े भाई निकोलाई के साथ 'काकेशिया' गए थे, यहाँ 'तैरक नदी' के पास 'कज्जाक' नामक गाँव में वह लगभग तीन वर्ष तक रहे और काकेशिया में हुई सैनिक कार्यवाही में उन्होंने भाग लिया। उन्होंने ख़ुद लिखा है की - 'अपना सहस परखने और लडाई क्या होती है, देखने के लिए वह यहाँ आए हैं, काकेशिया आकर ही वह लेखक बने।' हालाँकि मोस्को में ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। उनका लघु उपन्यास 'बचपन' था जिसे उन्होंने काकेशिया में ही पूरा किया। उन्ही दिनों पित्तेस्बुर्ग से प्रकाशित होने वाली पत्रिका - 'सोब्रेमिन्नक' के संपादक और रूसी कवि 'निकोलाई नेक्रसो' को जब यह रचना प्रकाशन हेतु मिली वो उससे इतना प्रभावित हुए की इसके लेखक का नाम जाने बिना ही उन्होंने इसे प्रकाशित कर दिया। 'कज्जाक' उपन्यास पर तोल्स्तोय ने १८५२-१८६२ तक काम किया... करीब दस वर्ष। काकेशिया में बिताये वर्षों का उनका अनुभव इसमे प्रतिबिंबित हुआ है। इसमे जन-जीवन का सौन्दर्य और सरलता तथा कुलीन समाज का झूट और पाखंड है। इसका नायक - 'ओलेनिन्न' आत्म-चरित्रात्मक है, जो कुलीन समाज की आलोचना और भर्त्सना करता है, उनसे नाता तोड़ने को भी तैयार है ताकि साधारण लोगो के समीप आ सके, उनका जीवन अपना सके। लेकिन उपन्यास में बांके 'कज्जाक' और 'लुकाश्का', गर्वीली सुंदरी 'मर्मंका' और बुडे शिकारी - 'येरोश्का' और उनके बीच और एक गहरी खाई है जिसे पाटने के सारे प्रयास ओलेनिन्न के व्यर्थ होते जाते हैं। कज्ज़कों के गाँव में ओलेनिन्न परदेसी है, लेकिन एक बात, इस अर्थ में, नायक लेखक से भिन्न है। उन्ही दिनों एक पत्र में उन्होंने लिखा था की काकेशिया में ही उन्होंने जीवन की शिक्षा पायी। सैनिक सेवा के लिए दुसरे स्थान पर जाते हुए अपनी डायरी में लिखा - की काकेशिया से मुझे गहरा अनुराग हो गया है। यह बीहड़ इलाका सचमुच अनुपम है, यहाँ दो विपरीत बातों 'युद्ध और स्वतंत्रता' का विचित्र और काव्यमय संयोजन हुआ है। उसी समय 'कज्जाक' उपन्यास के साथ तोल्स्तोय के लेखन कार्य का पहला दशक पूरा हुआ था। उनके स्रजन में यह उपन्यास एक सीम का महत्व रखता है और फ़िर बाद में विश्व विख्यात उपन्यासों का सिलसिला शुरू हुआ।
यह उपन्यास करीब पंद्रह वर्ष पूर्व पढ़ा था, और हाल ही में दोबारा, जिसे माँ ने उपहार में दिया था। मुझे लगता है कज्जाक को पढ़े बिना तोल्स्तोय को जानना अधुरा होगा।

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008

अजरा तुम जहाँ हो...

समकालीनता के साथ-साथ परम्परा से भी लगातार रूबरू होना ज़रूरी होता है, परम्परा मैं बहुत सी धाराएं एक साथ चलती हैं जिनसे जरुरी नहीं सभी सहमत हो। लेकिन उनकी मौजूदगी से इंकार एक तरह की हटधर्मिता ही मानी जायेगी। चीजें, व्यक्ति और व्यवस्था एक खुली बहस और वैचारिक संघर्ष से ही आकर ग्रहण करती है।


अजरा... (ख़त एक) -


अपनी पहली पोस्ट मैं अपनी बचपन की मित्र अजरा के लिए लिख रही हूँ... ये ख़त बरसो से दिल-दिमाग में था। ज़िन्दगी के कई ज़रूरी और गैर-ज़रूरी कम करते वक्त बीतता रहा... अजरा तुम कहाँ हो? कल जबकि १४ अक्टूबर को तुम्हारा जन्मदिन भी है, सुबह की ताजा और कच्ची धुप मैं तुम्हे एक बड़ा सा ख़त लिखूंगी।


प्रिय अजरा,


कई दफा हमे अपनी एकांगी सोच से बचना होता है, तुम भी मुझे जहाँ हो याद ज़रूर करती होगी। लेकिन कितनी हैरानी की बात है की सुचना के इस संपन्न- संभ्रांत युग में मेरे पास न तुम्हार टेलीफोन नम्बर है,न सेल और ना ही आई-डी। जब हम आठवी कक्षा में थे तब हमारी पहचान हुई, बरसों पहले से ही, शायद जन्म से ही तुम परम्परावादी धर्म की रस्सियाँ तोड़कर उससे आगे जाना चाहती थी और फ़िर लौटने के बाद सारे रास्ते बंद! आज तुम बहुत याद आ रही हो, तुम्हारी बातें उस वक्त कोई मुल्ला-मौलवी सुन लेता तो उस कुफ्र के लिए तुम्हे उसी वक्त इस्लाम से निकाल खदेड़ देता, तुम्हारे बहुत से सवालों के जवाब उस वक्त मेरे पास नहीं थे सिवाय अपनी अबोध समझाइश के जो तुम्हारे धर्म के बारे में मुझे मालुम थी। अब सोचती हूँ वाकई इस्लाम की बुनियादी अवधारणा पर ही शक करने वाली अजरा तुम्हारा परिवार में रहना उस वक्त कितना मुश्किल रहा होगा।अब ये मेरी ज्यादा समझ मैं आता है. तुम मेरी गहरी दोस्त थी, दिमागी तौर पर तुम जितनी ऊँचाई पर थी उतनी ही शारीरिक तौर पर भी... एक पठानी मुस्लिम लड़की जो औसतन अपनी उम्र से करीब सात -आठ साल बड़ी लगने वाली, बात-बात पर खिलखिलाने वाली। तुम आती और हम बरामदे के बड़े से झूले पर दिनभर बतियाते , तुम्हारा होटों को थोड़ा तिरछा कर हंसने पर मुह के दायें दातों पर अर्धविकसित दांत का चढा होना दीखते ही... आह! कितनी खूबसूरत लगती थी तुम, बस तुम्हारा रंग आम मुस्लिम लड़कियों से अलग था... ना गोरा , ना काला औरत्वचा एकदम चमकीली , उन्ही दिनों हमने आज के गुज़रे ज़माने की अभिनेत्री - मौसमी चेत्तेर्जी , जो हुबहू तुम्हारी शक्ल मिलती थी की एक फ़िल्म कृष्णा टाकिज में देखी थी। आज वहां एक बड़ा शौपिंग मॉल बन गया है, खुदा जाने , तुम्हे याद है की नहीं जहाँ बैठकर हमने पूरी दुनिया को भुलाकर 'मंजिल' का शो देखा था, शो ख़त्म होने के बाद बारिश हो रही थी, और तीन किलोमीटर का रास्ता घर तक हमने पैदल ही तय किया था... तुम अपना बुरखा पहन कर लौट गई थी।अजरा बस कल शाम कुछ मेहमान आए देखा कांच के ग्लास ज़यादातर मेरे घर में बेजोड़ हो चुके हैं, पति की तमतमाई आँखें देखी, हालाँकि अब कई बातें बेअसर होने लगी हैं। वैसे अजरा १७-१८ साल की गृहस्ती मैं कोई औरत हमेशा चीजों की देखभाल कैसे करती रह सकती है? यूँ तो मैं आम औरतों की तुलना मैं अपने घर की सार-संभार थोडी अच्छी तरह स करती हूँ और अपने को १०० में स ७५ नम्बर देती हूँ इसीलिए मैंने सोचा कुछ अच्छे ग्लासों की खरीदारी कर लूँ वैसे मैं यहाँ हजारों बार आई हूँ लेकिन तुम इतनी शिद्धत स जेहन में कभी नहीं उभरी। कांच की चीजों स मुझे वैसे भी हमदर्दी कभी नहीं रही उन्हें काम वाली बाई तोडे या मेहमान या वो अपने हाथ से छूटकर 'चन् से ' टूट जाए अथवा गैर-जिम्मेदार बातूनी माँओं के बच्चे उन्हें खिलौना समझकर फर्श पर पटक दे। मुझे कभी दुःख नहीं होता यकीन मानो सिर्फ़ कांच की किरचों को उठाते मैं बेहाल हो जाती हूँ... घर लौटी तो...

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

शालमल्ली अब फूल नहीं बेचती..


शालमल्ली अब फूल नहीं बेचती...


शालमल्ली एक जादुई सच थी, पाँच पैबंद का एक गाम्ठी लहंगा पहने

जिसपर खुशबुएँ निर्बाध तैरती थी, जो अब ठिठुरेगी इस शीत मैं...

घास की ताजा पत्तियों की नियति में, उसकी उदासी मैं जज्ब हो गई है,

सितारों की राख; आसमान की स्याही जो बनती है गवाह, लिखती है - "ऐ खुदा!"

वो सब रद्द किया जाए, कहा-सुना माफ़ और विलोपित। मुड़कर देखा गया भी

गोपीनाथ बारदोलाई मार्ग से जब गुजरा था एक घुड़सवार ; हाथों में चाबुक,

आखों में प्रेम, मन में उत्ताप लिए कई बार...

शालमल्ली दौडी थी उसके पीछे हर बार , फूलों का एक गुच्छा लिए।

पिछले दिनों दिल्ली बम-धमाकों के बाद, शिनाख्त के लिए उसे बुलाया गया

उस घुड़सवार , डॉन जूआन के पैरों तले शालमल्ली का हाथ था,

लिली, मुंडासा, दहेलिया, चंपा के नीले-पीले-जामुनी और गुलाबी

मुरझाये फूलों का गुच्छा, और बंद हथेलियों में चाबुक के निशान।

पूरी शिष्टता और संजीदगी से उसने उसके विक्षत, हाथ विहीन शव को पहचान लिया।

एक संवाद टूट गया।

मृत्यु की अनेक कहानियो की तरह,

शालमल्ली अब वहां फूल नहीं बेचती।

राजमार्ग पर प्रवेश निषेध है,

उसका सनातन प्रेमी अब मूर्तिकार बन गया है-

जो अब शाल्भंजिकाएं बेचता है...

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2008

एक रिपोतार्ज़ ख़त..अजरा तुम कहाँ हो?

अजरा तुम जहाँ हो.....


घर लौटी तो चार पाँच घंटे का एकांत है मेरे इर्द गिर्द तुम ही तुम घूम रही हो याद है ग़ालिब फैज़ तोल्स्तोय शरत यहाँ तक की शिव पुराण भी बहुधा हम साथ साथ पढ़ते थे शिव पुराण माँ तुम्हे कितने सटीक ढंग से समझाती थी ,लेकिन सच बताऊँ माँ की कई बातें उनके इतने पढ़े लिखे होने और साफ नजरिये के बावजूद,मैं नही जान पाई जैसे की जब भी तुम आती वो अंदर बुलाकर तुम्हे कांच के बर्तनों मैं ही खाने पीने की चीजें देने की हिदायतें देती और तुम्हारे जाने के बाद उन्हें गर्म पानी से साफ करने या किचिन के पीछे रखवाने तक और भी बहुत कुछ,जो इस्लाम और हिंदू मैं विभेद करती है शायद उन पर उनका कट्टर ब्राहमण होना उस वक्त हावी होजाता था उन पर बेहद गुस्सा आता लेकिन एक तरह से उनकी हुकूमत मैं जिन्दगी जीने के अलावा कुछ आता भी तो नही था,फिर भी माँ के प्यार मैं कोई कमी नही थी, और फिर एक बार उनकी अनुपस्थिति मैं तुमने भाभी की खूबसुरत साढी पहनी बिंदी लगाई जाने कैसे उन्हें पता चल गया तुम छह महीनो तक घर नही आई वो खामियाजा मुझे भुगतना पढा,भाभी ने ही किसी कडुवाहट के तहत तुम्हे बताया था ,बस उस एक छोटे सेहमारे बीच आए अवरोध के अलावा कभी कुछ नही हुआ,तुम भूगोल की और मैं हिन्दी की छात्रा,तुम मैं जो खूबियाँ थी मैं उन पर दिलोंजान से फिदा थी तुम चुप्पा और गंभीर किस्म की और मैं तुमसे उलट,फिर भी हमारी तुम्हारी रुचियाँ एक सी थी,तुम्हे मेरे यहाँ बेसन भरी मिर्ची कोथ्म्बीर की वरी और ककडी का थालीपीठ ,लहसून का थेसा बेहद पसंद था बस माँ तुम पर यहीं जयादा मेहरबान होती और भरपेट से भी अधिक खिलाती थी,


यूँ जिन्दगी मैं कई चीजों के कोई मायने नही होते अजरा लेकिन इतनी लम्बीचौडी जिन्दगी मैं कई लोग मिलते बिछड़ते हैं कभी फर्क पड़ता है और कभी नही, तुम याद आई तो बस आती चली गई मेरे और तुम्हारे इस किस्से मैं बीता हुआ बहुत कुछ ऐसा भी है जिसे हम चाह कर भी नही लौटा पायेंगे तुम इसे कभी पढो शायद..वो तुम्हारा बेवफा प्रेमी पिछले हफ्ते बुक्स वर्ल्ड पे यदि नही मिलता तो मैं तुम्हे ऐसे ही थोडा बहुत याद करके भूल भाल जाती ,वो अपने दो अब्लू गब्लू से बच्चों के साथ था,मैंने उसे हिकारत से देखा पर उसे कोई फर्क नही पढा,बेशर्मी की हँसी के साथ वो बोला और कैसी हैं आप ,कुछ बोलने के पहले ही उसकी कश्मीरी सी दिखने वाली बीवी ने मेरी और देखा इतवार की वजह से भीड़ भी थीऔर जाहिर है मैं कुछ जवाब दिए बिना निकल आई,सच अजरा वो तब भी तुम्हारे काबिल नही था,तुम कितना रोई थी और मेरा गुस्सा ये था की तुम रोजाना मिलती रही फिर भी मुझे कानो कान ख़बर नही होने दी फिर भी मैंने तुम्हे समझाया था नाहक उस सडियल के लिए रो रही हो,तुम्हारी पसंद पे मैं अफसोस करने के सिवाय कर ही क्या सकती थी,.....