शनिवार, 5 जून 2010

हमारा पर्यावरण हमारी चिन्ताएं ....हमारी नदिया ...(विश्व पर्यावरण दिवस पर...) //-


ये चित्र और स्लोगन अहिल्या बाई होलकर की पूर्व राजधानी महेश्वर घाट से करीब छ माह पूर्व लिया गया था ....नर्मदा किनारे स्थित इस घाट तक पहुँचने वाली एक संकरी सड़क पर दोनों तरफ की दीवारों पर पर्यावरण जागरूकता को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है ..पश्चमी मध्यप्रदेश के निमाड़ जिला खरगोन का यह सुप्रसिद्ध पौराणिक एवं धार्मिक स्थल आज शासन की उपेक्षा का शिकार हो कर रह गया है वर्ष १९९१ को जब पर्यटन वर्ष घोषित किया गया था, तब म.प्र राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा अनेक प्रसिद्ध स्थलों को विकसित करने और उनके रखरखाव की मह्त्वाकांची योजनायें हाथ में ली गई ...उसके अमली करण का लेखा -जोखा तो एक दूसरा विषय है ,फिर भी अहिल्या बाई का खूबसूरत किला आज भी नर्मदा के बीचों बीच से देखने पर अकेला उपेक्षित दिखाई पड़ता है,किले के अन्दर जरूर चहल-पहल है जहाँ रेवा सोसायटी द्वारा जग प्रसिद्ध साड़ियों का निर्माण पावर लूम पर होता दिखाई देता है ....समय-समय पर नर्मदा शुध्धि करण योजनाओं के तहत लाखों रुपया स्वीकृत होता है ,लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात की तरह पर्यावरण की दिशा में ना ही नियमित कोई काम होता है, और ना ही कोई ठोस पहल....
मानवीय पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र समेलन में स्व. इंदिरा गांधी जी ने कहा था की जीवन एक है और विश्व एक है और ये सभी प्रश्न परस्पर सम्बंधित है .जनसंख्या विस्फोट गरीबी ,ज्ञान तथा रोग हमारे परिवेश का प्रदूषण ,परमाणु हथियारों का जमाव तथा विनाश के जैविकीय तथा रासायनिक साधन से सभी एक दूसरे के दुष्चक्र के हिस्से हैं जिनमे से प्रत्येक बात महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है किन्तु उनमे से एक एक करके निपटना बेकार होगा .भूतकाल को गले को लगाए रखना या दूसरों को दोषी बताना व्यर्थ है ,क्योंकि हम में से कोई भी निर्दोष नहीं है.यदि कुछ लोग दूसरों पर प्रभुत्व जमा लेते हेँ तो ऐसा कम से कम अंशत दूसरों की कमजोरी एकता की कमी या कुछ लाभ पाने की लालच के कारण होता है .यह समर्धि शील लोग जरूरतमंद लोगों का शोषण करते हेँ ..तो क्या हम इमानदारी के साथ यह कह सकतें हेँ कि हमारे स्वयं के समाजों में लोग कमजोरों कि कम जोरी से फायदा या लाभ नहीं उठाते,हमें उन् मूलभूत सिधान्तों का जिन पर हमारा समाज आधारित है और उन आदर्शों का जिन पर वे टिके हेँ ...पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए यदि ह्रदय परिवर्तन ,दिशा परिवर्तन, और कार्य प्रणालियों का परिवर्तन होता है तो कोई एक संगठन या एक देश ,चाहे उसका आशय कितना भी अच्छा हो ऐसा नहीं कर सकता .प्रत्येक देश को समस्या के उस पहलु को हल करना चाहिए जो कि उसके लिए सर्वाधिक संगत हो. फिर भी ये सपष्ट है कि सभी देशों को एक समग्र प्रयास से एक जुट होकर कार्य करने चाहिए और हमारी ग्लोबल समस्याओं कि सम्पूर्ण व्याप्ति के प्रति पैमाने के आधार पर सहयोग पूर्ण द्रष्टिकोण अपनाने के अलावा कोई चारा हमारे पास नही है ...

अकेली चट्टान ने ,हर क्षण टूटने पर भी ,नर्मदा में खड़े रहकर ,रोकना चाहा ''रेवा '' वेग को ..ओ यशश्वी नदी वह में हूँ .....आज ना सही कल में इस भय को वैसे ही पीछे छोड़ कर आगे बढ़ जाउंगा ,जिस प्रकार नर्मदा का यशश्वी जल सब कुछ छोड़ता हुआ प्रवाहमान है ....श्री नरेश मेहता के उपन्यास ''नदी यशश्वी है '' से ...

दिसंबर २००९ में महेश्वर [इंदौर ] यात्रा के दौरान लिए गये चित्र...