गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009

प्रेम से ऊर्जा ...उर्जा से क्रिया शीलता ,क्रिया शीलता से रौशनी और रौशनी से सुघड़ता ...//-


हर साल दिवाली आती है मनो- कूढा-करकट हम घर से बाहर फ़ेंक देतें हें पर मन मस्तिष्क पर जमा थोडी भी धूल हम नहीं उतार पातें हें ... लाख गुनी ग्यानी कह गये की मन का मनका फेर .पर अब तो सब कुछ असंभव लगता है ..ये भी सच है की किसी के मन में हम चाहे जितना गहरा झाँक लें और चाहे जितनी पैनी हमारी खुर्दबीनी नजर हो, तो भी बहुत कुछ जान नहीं पाते, ऐसे कई लोग हमारे आस-पास ... बस एक फूहढ़ अंदाज में जिए जातें हें और उनकी उम्र'' दिन गिनती ना जाने कितनी दिवालियाँ पीछे ठेलती आगे बढती जाती है ...ना दिलों में रौशनी होती है ,ना घरों में ....ज़रा विस्तार से सोचें ..हमारी किताबों पर जमा धूल जिनका एक पेज भी ना खुला हो ,यदि गमलों में जमा घास -खरपतवार उग आई हो ,दीवारों का पलस्तर उखड गया हो ,कपडे की सीवन उधड जाए तो मन दुखता है रंग-रोगन सिलाई की जरूरत होती है रसोई के डिब्बे इधर-उधर हो जायें,प्याज की टोकरी में प्याज कम छिलके ज्यादा हों,अलमारी की सतह पर धूल हो उसके अन्दर कपडों की भरमार हो,प्रेस किये कपडें सलवटों से भरें हों अन्य उपकरणों वाशिंग मशीन, सिलाई मशीन,ए.सी में मेल दाग-धब्बे उभर आये,परदों से छन्न कर आती रौशनी फीकी लगने लगे,अचार मुरब्बों की बरनी के नीचे लगे कागज़-कपडों पर तेल मसाले के छींटेंलग जाए अच्छी सफाई ना होने के कारण ड्रेसिंग टेबिल पर बाल रह जाए मंहगे जूतों-चप्पल की तली से धूल मिटटी चिपक कर एक इंच तक उठ जाए शिफान जार्जेट की साडियों के पेटीकोट फाल से ऊपर होने के कारण साडी की किनारी घिस कर उधड जाए तो ऐसी मैली फूह्ढ़ता के लिए कौन जिमेदार होगा?क्या हर दिन या दो दिन में इन कामों पर फोकस करने की जरूरत नहीं? आप करें या नौकर से कहें ...क्या जरूरी है दिवाली पर ही सब कुछ किया जाए ,सारा कचरा घर से बाहर किया जाए...
हमारी एक परिचिता बरसों रद्दी इकठ्ठा करके उन्हें दिवाली पर बेचती रही पति सरकारी विभाग में पी. आर. ओ थे जाहिर सी बात है दुनिया भर के अखबार उनके यहाँ पहुँचते थे इस तरह दस-पन्द्रह तोला सोना उन्होंने बनाया ..लेकिन उस रद्दी को सहेजने में ,कीडो-काक्रोंचों से बचाने में उन्हें कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी ये भी सोचें , आप इसे सुघड़ता भी कह सकतें हें वाह रद्दी से सोना ...एक अन्य महिला पुराने कपडे सहेजे रहने में सुख पाती है बस यही कहती हें पति ने पहली वेडिंग एनिवर्सरी पर दी या माँ ने जनम दिन पर या की कालेज के दिनों की ये ड्रेस है जब दुबली -पतली थी बस मन को ऐसी ही फूह्ढ़ता से संतुष्ट करती है लेकिन किसी जरूरतमंद को नहीं देगी .....एक नव धनाड्य मेरी महिला मित्र ने बताया की उसके यहाँ कोई नौकर नहीं टिकता अब इसके कारण बहुत से हो या चाहे जो हो ,लेकिन साथ ही उसका ये भी कहना था की कोई त्यौहार हो या मेरे फार्म हाउस पर पार्टी हो ,या घर में कोई कथा हो में इन्हें कपडा खाना भरपूर देती हूँ मेरी समझ से मेंने जो जाना वो ये की ,गरीब नौकर मेरी इस मित्र का देना अपना अधिकार समझ रहे थे ,जो कपडा भोजन दक्षिणा उन्हें मिला ...वो किसी ना किसी को मिलता सो उन्हें मिल गया मित्र का कहना था की इतना देतें हें फिर भी नमकहरामी करतें हें ..क्या ये दिमागी फूह्ढ़ता है या चालाकी ?... मेरे आँगन में सौ -दो सौ फूल रोजाना खिलतें हें जिनकी लतरें बाहर सड़क की और फैली हुई है सुबह की सैर को जाने वाले बुजुर्ग और स्कूली बच्चे अधिकाँश फूल तोड़ लेतें हें पडोसी शिकायत करतें हें मुझे कोई शिकायत नहीं, जबकि में अक्सर अपने पडोसी को भी निर्लिप्त भाव से फूल तोड़ते देखती हूँ ..तब भी रोजाना कई फूल बच जातें हें हर बरसात में कलम बीज से तय्यार कुछ ख़ास पौधे बांटने में सुख मिलता है ये एक लंबा सिलसिला होता है कभी उनके घर जाओ पौधे बडे हुए और उनमे खिले हुए फूलों को देखना ...एक अव्यक्त ख़ुशी होती है देने बांटने की चीजें फूल पौधे कोई मांगे और उन्हें ना दिए जाए ऐसी फूह्ढ़ता कोई निभा सकता है भला ...
कुछ लोगों के पास शार्ट कट होतें हें जो अपने ही में एक सुखी संपन्न जीवन बिता कर दुनिया से अलविदा हो जातें हें और कुछ लोग तमाम काबलियत और ईमान दरी के बावजूद वो नहीं पा-पाते जिनके वो काबिल होते हें जिनकी उन्हे चाहना होती है फिर भी वो जिन्दगी जीतें हें अपनी कमियों और अच्छाइयों को नई व्यवस्था में किसी नए रूपक में बांधकर एक सुख में डूबकर और कुछ ठीक इन से उलट अपने ही ढर्रे पर चलने वाले ...पर जी ,इस दुनिया में सुघड़ता से जीने के लिए एक दिमागी प्रबंधन की भी जरूरत होती है की कब करें क्या करें कैसे करें और क्या ना करें और जब आप अपने को निर्देश देतें हें या दो टूक निर्णय सुनातें हें ..हाँ या नहीं ..... कुछ बातें क्या जायज हें? ...?आपका हमारे घर में प्रवेश मय जूतों चप्पलों से और हम आपके यहाँ नगें पैरों, आपके घर हम बिना इजाजत बिना प्रयोजन के बैठक से आगे ना जा पायें...हमारे घर में आप बेडरूम से बालकनी छत्त तक घूम आयें क्या ये फूह्ढ़ता है या सहजता?, आपको हम सादर आमंत्रित करे भोजन में अचार मुरब्बों से लेकर चटनी-पापड से लेकर जायके दार खाना खिलाएंऔर आपके घर में हमें फ्रिज का बासी खाना गर्म करके परोसा जाए ....कुछ रिश्ते जिन्दगी की कड़ी धूप में.. साए की तरह हो तो .जीना आसान हो जाता है कि .जब मिलो तब दिवाली सा आनंद मन उठा सके ...
एक और महिला हर दिवाली पर बड़ी और महंगी खरीददारी करती है ,साल भर वो चीजें उनके यहाँ इधर-उधर लुढ़कती दिखाई पड़ती है ..फिर अगली दिवाली तक वो बेवजह बाइयों में बंट जाती है ,ना वो नौकरी करती हें ना पति की कमाई में कोई इजाफा,सुबह बारह बजे तक अलसाए पड़े रहना ,दिन का खाना-नहाना चार बजे तक, रात बारह बजे तक अकारण जागना उनकी दिन चर्या है उनकी फूह्ढ़ता की अन्नत कथा है रौशनी कहाँ नहीं करने की जरूरत है बताना मुश्किल होगा ...एक और मेरी अच्छी दोस्त ...अच्छे पद पर खासा कमाती है मेरी पसंद की कायल जो मेरे पास हो वो सब उसके पास होना चाहिए ..साडी -कपडों से लेकर ना जाने क्या-क्या ..इसमें कोई हर्ज भी नहीं..में कहती भी हूँ मुझे साथ ले चलो खरीदो मेरी पसंद से,नहीं अपनी खरीददारी गुप्त रखेंगी मुझे वितृष्णा होती है ...मुझे ये भी लगता है कि.कामो का संधान व्यवस्था से ही तो हो सकता है बजाय नक़ल से?एक और स्त्री का घर हमेशा बैठक में गीला तौलिया गीलेपन की बदबू के साथ महंगे चमकीले कुशन के बीच सिमटा हुआ फैला हुआ मिलेगा किचिन में पैर रखने की जगह नहीं, कहीं कटी हुई सब्जी खुली हुई तो, कहीं सिंक में झूटे बर्तनों का ढेर फ्रिज में बासी खाने के ढेरों डिब्बें ...कहीं दूध खुला हुआ तो कही गैस पर दाल सब्जी पैर पसारे हुए उनके यहाँ हमेशा मिल जायेंगे..वे .खासा कमाती है नौकर भी है फिर भी.....अपने ही बनाए हुए नर्क में जीने मरने की अभ्यस्त ऐसे कूड़े करकट के साथ जिन्दगी बिताते लोग..मुझे आर्श्चय होता है ...अपने रोजमर्रा के दायित्वों को पूरा किये बिना कैसे बाहरी काम कर पातें होंगे ....बर्ट्रेंड रस्सेल की "कान्क्वेस्ट" का अनुवाद जब पढ़ा तो लगा सच.हांसिल करना... जीतना अपने को, अपने बलबूते पर आसान है ..कठिन नहीं ...और उस आसानी में घर का शामिल होना जरूरी है वो भी रौशनी से भरा और ये कहना बिलकुल सही होगा की............ एकरसता से उब पैदा होती है ,फूह्ढ़ता से वितृष्णा ...इससे बचना ही चाहिए....और प्रेम से ऊर्जा ...उर्जा से क्रिया शीलता ,क्रिया शीलता से रौशनी और रौशनी से सुघड़ता ...जो हमारी चेतना को लगातार बींधती है ताकि हम-आप एक साफ दिल- दिमाग से जी पायें और लोगों को भी जीने दें ...
बहुत भारी होता है जीवन का सार मित्र,बुलाती सी चमक सुदूर के सितारों की,अंधेरों में डूबे तुझ से मांगते जवाब है ..अंधेरों से...अन्जोरे में निकल चल [मुक्तिबोध] अँधेरा और उसका मिथकीय चित्रण मुक्तिबोध की सभी रचनाओं में मिल जता है ..अज्ञान का अँधेरा व्यवस्था जन्य अँधेरा,मन के भीतर छिपे बैठे अँधेरे, सब पर मुक्तिबोध की द्रष्टि है ..अंधेरों में ही भय होता है पहचान खोने का जीवन लक्ष्य से भटकने का [दीपावली कि अनंत शुभकामनाएं ]

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

-एक पुरसुकून आसमान की तलाश ,मन खुश था अपने ही सवाल पर जो उसके जवाब की प्रति क्रिया से छूट गया था चलो अच्छा हुआ... एक कांट-छांट मन की सतह पर होती है ..//


लगातार बरसात की नीम ठंडक से चिढ होती है ,बहुत दिनों तक धूप ना निकले तो मन कुढ़ता है खैर बरसात को कभी ना कभी तो रुकना ही होता है बारिश ख़त्म भी होती है ,हलकी सी धूप के साथ मौसम में ठंडक की शुरुआत ,धूप वाली ठण्ड, मन को तसल्ली ...मिलती है इस सुकून के साथ की आगे के पांच..छ माह अच्छे गुजरेंगे --ना भी गुजरें तो भी ...अक्सर ही ऐसी बेमौसमी सोच निरर्थक ख्यालों के पुल पर इस पार से उस पार ,इधर से उधर आते जाते रहतें हें, किसी भी आकस्मिकता के लिए मन तैयार नहीं होता ..आशाएं पनपती है और घट भी सकती है ,एक धमक धमनी में होती है गर्म आंच से ज्यादा -अन्तश्चेतना में बार-बार कुछ घुमड़ता है स्मृति धुंधली नहीं होती,शब्दों के चेहरे धूसर होते जातें है ,सवाल सामने होतें हें ,कोई नई शुरुआत ...एक लिपिबद्ध दस्तावेज आँखों के आगे से गुजरता है ..वो थोडी देर के लिए गुडी-मुडी होजाती है ,संकुचित धूसर शब्दों के पीछे देर तक छिप जाना भी ना कोई देखेगा ना जानेगा ना समझेगा ..फिर कभी शब्दों के साथ डूबना भीतर बहुत भीतर अतल में ......वो वक़्त की परवाह करता है और वो वक़्त को जूती की नोक पर ---गर उसका साथ हो एक स्निग्ध सांत्वना मन को मिलती ...खिलाती है दरारों से झांकता है वक़्त का बदला हुआ चेहरा ..पुराना ...बदले हुए मिजाज में ,सुबह के धुले हुए बालों का एक गुच्छा दायें गाल पर फैल जाता है समय के अन्तराल में डूबा जाता और भीग कर बाहर लौटता सा मन..दस -नौ-सात -पांच-चार- तीन -...एक दस्तक ,उसके सवाल आसान नहीं और जवाब अलबत्ता बेसब्र से ....अक्सर शब्दों में इच्छाएं पंख फड फ्डाती है ..जवाब नहीं मिलता हमेशा एक निस्तब्धता और चौडा शून्य होता है वहां जिसका बहु उपयोग वक़्त जरूरत पर कर लेना बखूबी और दो-दो बातें एक साथ और या एक भी नहीं ,उसकी नजर एक खोजी शिरकत करती है ....किताबें ,चाय की ट्रे ,खाली कप ,कप पर हरे फूल ,उलझा सा मोबाइल चार्जर ,खिड़की के परदों से झांकता धूप का एक संतुष्ट टुकडा शीशे के परे नीम की पतली टहनियों पर थोडा कम-कम हिलती हुई हवा ,हवा से झुकते -टूटते डाल से बिछुड़ते कमजोर पीले पत्ते, उसे सतर्क होने का मौका मिल जाता है ...हाँ तो बात फिर से शुरू होना चाहती है ...बेफिक्र दिखने की चाहना -सहज होने की जद्दो -जहद ..अर्थ दीप्त होकर पसर जाती है , वहीँ आस-पास.. कुछ शब्द बमुश्किल जुड़ते हें ...अपनी तकलीफों को कम आंक कर उसकी आँखों में झाँक कर -थोडा नजदीक ----एक पुरसुकून आसमान की तलाश ,मन खुश था अपने ही सवाल पर जो उसके जवाब की प्रति क्रिया से छूट गया था चलो अच्छा हुआ... एक कांट-छांट मन की सतह पर होती है ..अपनों में कोई गैर तो निकला ..अगर होते सभी अपने तो ?..किसी पुराने गीत की पंक्तियाँ याद आ जाती है ..मन पाखी दूसरी दिशा में उड़ जाता है कोई हथेलियाँ थामता है ..तारों भरी दोपहरी उस अबूझ समय में बीत ही जाती है अँगुलियों में मुडी -फँसी हुई अंगुलियाँ अब तक ..डरती हो ,सवाल खुद से --एक भय उसे सताता है मामूली सी आहट पर चौंकते -सतर्कता में फैलते कानो में समुद्र की लहरों का शोर भर जाता है,दूर से आती बेगम अख्तर की आवाज़ में दादरा ...लहरों के साथ लौटती लय, विलग होती स्मृति .मरी हुई मछली की चमकीली आँखों से उसे टोहती है ...एक वितृष्ण रागात्मकता अन्दर फैलती है ...जल्दी-जल्दी एक आत्मीयता उसकी आँखों में भरने लगती है संकोच भी सुख भी ....थोडा समय स्थिर स्थिति में बीतता है ,थोडा और समय ...नीम के पत्ते तेजी से हवा में लहराते हुए नीचे जमीन पर गिरते हें उसकी सोच की कोई तार्किक परिणिति नहीं मिलती ...दूर से आती आवाज़ ,विपरीत दिशा में फैली दो बाहें ... ख़त्म होता हुआ तीसरा वाक्य..ये उदासी,.. बहुत से रेशमी धागे उलझे-उलझे -की वो वो दो कदम आगे फिर पीछे ---उसकी आँखों में नीली चमक है ..सीढियों में बहते पानी में नंगे पैर रख कर उतरने का सुख ..ऐसी आकस्मिकता के लिए वो तैयार नहीं होती ..बात फिर नए सिरेसे शुरू होना चाहती है बहुत से मुडे -तुडे शब्द सीधे होतें -खुलते हें ,वो शब्दों को निचोड़ती है ....गीले शब्दों से एक बूँद पानी नहीं ताजुब्ब ,है बहुत कुछ बीतता है ,संभावनाएं भी, प्रेम की वजहें भी, अनसुलझी इच्छाएं भी ,लरजती रौशनी भी, बहुत सी जागी रातें और सोये दिन भी .
और तुम उदास हो ,तुम्हारी उदासी में पढता हूँ में ...अंधेरे में जीने का सच विशिष्ट चेतना के कवि लाल्टू की कविता की पंक्तियाँ .

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

माँ मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी... शब्द घुप्प अंधेरों में चले गये थे ,मां के अर्थों में शब्दों को ढूढना कितना मुश्किल ...//


शब्द घुप्प अंधेरों में चले गये थे ,मां के अर्थों में शब्दों को ढूढना कितना मुश्किल ...मां थी जब सूरज यूँ ही नियत स्थान से निकलता था लेकिन डूबता मां की आँखों में ही था ..कितने ही काम, ताजे-बासे ,कितनी आशाएं ,कितनी चिंताएं एक साथ संजोई दिखलाई पड़ती थी उनकी आँखों में, मां थी तो खुशहाल थी जिन्दगी और बेफिक्र भी और अब एक जमा हुआ सन्नाटा अन्दर- भीतर गहरे तक... मां से ही थी हमारी इच्छाएं -अकां छायें ,और बिन तुम्हारे इतने शुद्र -कातार ये मन -तन ..क्या कहूं किस्से कहूँ .सुनो मां मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी जैसे अपनी म्रत्यु से ठीक पहले सुना था तुमने ..विश्नुसह्स्त्र नाम,गणपति अथर्व शीर्ष पाठ ,बंद आँखों से और जर्जर काया में तकलीफों के साथ आती जाती साँसों के बीच ...वो एक साफ और उजली रात थी रात का अंतिम प्रहर जब मां ने साथ छोड़ दिया ..कभी ना भूलने वाले पल ...निरंतर नेह की नीड़ बुनती स्मृतियों में एकदम ताजा कभी न धुंधली पड़ने वाली मां ..मंत्रोचार सी पवित्र ,मेरी मां मुझे तुम कभी नहीं भूलती हर दिन तो याद करती हूँ हर पल तो परछाई सी साथ चलती हो धमनियों में गूंजती हो ,तुम्हारी आवाज और बेटा के साथ नाम का उच्चारण आज भी मन भर देता है एक तपी हुई स्नेहिल गंभीरता तुम्हारे चेहरे पर हमेशा बनी रहती,हम सभी की छोटी उपलब्धियों पर हमें विशिष्ट बना देने वाली मां ,हमें सर माथे पर रखने वाली तुम्हे कितना याद करूँ कितना भूलूँ ..मां मां ..हमें अपने घर-परिवार के स्वार्थ में गुम होते कभी सच कभी झूट बोलते देखती सब कुछ जान कर भी अजान बनी रहती तुम हमारी ख़ुशी में खुश और दुःख में दुखी होजाती तुम ----तुम्हारे अनमोल शब्द कुछ सीखें -सौगातें तुम्हारा दिया हुआ सूर्य मन्त्र आज भी जपती हूँ -रो पड़ती हूँ अचानक जब तुम उमड़ती हो अंतस में.. तो सब कहतें हें पागल है मां तुम्हारी याद आती है तो बस आती है तुम्हारी बातें पेड़ नहीं काटना ,बालों को छोटा नहीं रखना ,गुरुवार को हल्दी का उबटन करना केले के पेड़ की पूजा करना ,तुलसी में शाम पड़े दिया जलाना ,दुःख-सुख में इश्वर को सहभागी बनाना ,..भरसक कोशिश करती हूँ उन्हें निभाना ,मां तुम्हारे कई रंग यादों के जल में डूबते-उतराते रहतें हें ..तुम्हारे दुखों की गठरी तुम्हारे सुखों की गठरी से बड़ी थी माफ करना हमें दुख तो बाँट नहीं पाए तुम्हारे हिस्से का सुख भी नहीं दे पाये ..शर्मिन्दा हें ...तुम चली गई .बरस दिन बीते -पतझर वसंत भी आये ..सारे मौसमों में बीतती हो तुम ..जब साडियों के ढेर उलटती-पलटती हूँ तुम्हारी दी हुई-पहनी हुई साडियों में तुम्हारी देह गंध को सजीव पाती हूँ अपनी पीठ -माथे पर तुम्हारा ताजा स्पर्श महसूस कर सकती हूँ आज भी...
वो द्रश्य स्तब्ध कर देने वाला था तुम्हारी मृत देह सामने थी आवाज मानो छिल गई थी एक दिन पहले आर्शीवाद में उठा हाथ ...अध् मुंदी आँखों से विस्मृति के अथाह में तुम डूब-उतरा रही थी में महसूस कर सकती थी तुम्हारे स्मृति के बवंडरों को शायद हमारे बचपन ,अपनी खुशियों -दुखों और बिछोह को--फिर तुम्हे होश नहीं आया ,संसार की सर्व श्रेष्ठ मां मेरी तुम...चीजों के प्रति, इस दुनिया के प्रति कितनी निर्लिप्त...मैंने कभी तुम्हे अपने लिए बड़े चाव से कभी कुछ ना खरीदते देखा ना पहनते ...कैसे काबू पाती थी ,,,नहीं सीख पाई ..तुम्हारे हाथों की बनी मैथी-भाजी ,आम की लौंजी ,नीबू लहसन का अचार फिर कभी नहीं मिल पाया तुम थी तो हमारी जिन्दगी सौंधी सी महकती थी ...राह तक-तक बेटियों की बात जोहते तुम्हारे उदास जर्जर दिन बीतते रहे कितना सहा-कितना जिया तुमने ये हिसाब करने बैठती हूँ तो अपने को धिक्कारती हूँ ..जिन्दगी अब भी जा रही है ...छोटे से बड़े सुख दुःख में तुम याद आती हो तुम्हारे सारे आर्शीवाद फलीभूत हुए ..लेकिन तुम्हारे निष्टूर देवी-देवता जिनके लिए उम्र का एक हिस्सा गुजार दिया तुमने दूसरा हमारी खा.तिर,... इश्वर पर तुम्हारी अटूट आस्था ,अगाथ श्रधा .इस दुनिया में अपनों परायों से झेले गए मान-अपमान आवहेलनाएँ -चाहूँ तो भी नहीं भूल पाउंगी..बाद में दूसरी चीजों के साथ तुम्हारे पूजा घर के भगवानों का बंटवारा हुआ कुछ सस्कृत के श्लोक के साथ तुम्हारे उपन्यास और किताबें मेरे हिस्से आ गई ..उनमे वो किताबें और अखबारों की कटिंग भी थी जिनमे मेरी रचनाएं प्रकाशित हुई थी ..अपनी माँ जैसी कद-काठी -सुघड़ता नए और पुराने का अद्भूत मिश्रण मैंने आज तक किसी दूसरी स्त्री में नहीं देखा ..मान होता है अपने पर एक सादगी भरा जीवन जीकर अपनों से ज्यादा परायों के लिए हर तरह से तत्पर रहने वाली माँ तुम अब कहाँ मिलोगी , एक प्रसंग ज्यों का त्यों बना हुआ है स्मृति में मेरी ... जब मेरी बेटी होने वाली थी शाम सात बजे से सुबह तक तुम लेबर रूम के बाहर खडी रही मुझे तुम्हारे डॉक्टर को बोले शब्द आज भी याद है ...आपरेशन नहीं होगा वो मेरी बेटी है ..थोडी तकलीफ तो होगी बाद में तुम मेरे पास ही सिरहाने थी पसीने भरे सर पर तुम्हारा चुम्बकीय सुख भरा हाथ -स्पर्श कभी नहीं भूल पाती हूँ , ऊसके बाद तुम्हारा द्रढ़ विशवास --बेटी हुई उसके पहले जनम दिन पर लिखी आर्शीवाद चिठ्ठी ,वैसी की वैसी रखी है सहेजी ..अनेकों शुभकामना वाली ..वो इसी वर्ष पढने अमेरिका चली जायेगी जैसा तुमने लिखा और कहा था ;हमें ले जाना नहीं भूलना ..तुम तो हमेशा हमारे साथ हो ..इस कोलाहल में ,इस भीड़ में इतने अपनों-अजनबियों में ..तुम अलोप हो फिर भी शेष हो मुझमे मेरी इस दुनियादारी में .माँ... माँ मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी
अपनी माँ की पांचवी पुण्य स्मृति में [दो सितम्बर o5 ] सुनो माँ ,मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी ये एक लम्बी कविता लिखना चाहती थी लेकिन कभी पूरी ही नहीं कर पाई ...

शनिवार, 29 अगस्त 2009

/इच्छाओं की एक छूटी हुई अधूरी फेहरिशत में हमारे नमकअश्रु के प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में तुम चाहो तो भी ना चाहो तो भी

तुम नही चाहोगे तो भी
बदलेंगे .मौसम
घूमेगी..धरती
बरसेंगे बादल और आएँगे ,याद हम
और वे लौटेंगी तितलियाँ ..
बेहिचक तुम्हे छू कर,
जिनके पंखों पर लिक्खी
समय ने कदाचित्
एक इंद्रधनुषी इबारत
तुम नही चाहोगे --तो भी,
इस ब्रह्मांड के ख़त्म
होने से पहले देखोगे -निर्विकार
अपने को दोहराए जाते
वक़्त की तरल -सघन रफ़्तार में
तुम नही चाहोगे तो भी
पानी में घुली मिठास सा
पुरइतमीनान समय
करेगा निरस्त -सारी दलीलें को
निश्चित नतीजों की तरह
तुम नही चाहोगे तो भी
आदि- उत्सव की सुगंध सी प्रतिज्ञाएँ
रहेंगी हमारे साथ,
इच्छाओं की एक छूटी हुई
अधूरी फेहरिशत में
हमारे नमकअश्रु के
प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में
तुम चाहो तो भी
ना चाहो तो भी...

"एक ही शख्स था, एहसास के आईने में... कभी शबनम, कभी खुशबु, कभी पत्थर निकला..." - तालिब जैदी (अपनी डायरी की शायरी से...)

सोमवार, 17 अगस्त 2009

एक तपिश थी शब्दों को जलना था,वहीँ म्रत्यु की पदचाप थी, चमत्कार था ,अनेक नामो में समाई उसकी उष्मा थी... //

क्या वो इक्छाओं का परिविस्तार था .उच्चारित स्वरों में ,ना कह कर भी कितने गहरे उतर गई एक उम्र वसंत मेरे भीतर था ,वर्षा और शीत भी आग की लपट भी और उमस भी थी, साथ जीने की जीवनेछा धुंधले पृष्टों में दबी थी बीते कई मौसमों की पदचाप थी घर के जिस कोने में दिया जलता था धुंआ था जिसमे बनती-बिगडती आकृतियाँ थी सपने बागी थे बंद दरवाजों पर दस्तक थी .घुप्प अंधेरों के बावजूद दूर कहीं झिलमिल थी पास आती आवाजें थी, अचीन्ही राहों में फलित प्रार्थनाए थी रेशा-रेशा चित्रित था,बगीचें की घांस पर ठंडी ओस थी ,खिले फूलों की महक थी ,एक सफेद लिफाफे पर अगरबत्ती का पीलाजला हुआ कडुवा निशान था, में आउंगा तुम्हारे पास मन्त्र की मानिंद दोहराव था इन्द्रधनुष उस वक़्त उपस्थित था,समय ने आगाह किया था .यू ही हंसते-हंसते उदासी थी, नील स्वप्न्जल में हरी काई थी,पानी की सतह पर इक्छाओं के गले पंख थे तल में सीप से मोती नदारत था ,फिर भी प्रेम दीप्त समय में डूबती तृप्ति का अथाह था, तलघर की आखरी सीढ़ी थी ,तभी बसता था घर, जहाँ सुख की दोपहरी थी ,एक किस्सा था, जिसने छुआ था,एक घटना का समारंभ था,करवट बदलती सदी थी, और जुट पाया तभी तो जीने का प्रपंच था ,सलवटों भरी उदासी थी, भय की जड़ता थी, पत्ते खडकते थे,सप्तरिशियों से भरा आकाश था,कई हंसते सितारे थे कोई पुकारता था ,लय थी ,प्रेम करना जटिल था ,गरुडपुराण में कैद अगला-पिछला जनम था,चीजें साफ थी, पलते सपने थे ,निरापद थे , एक लम्बी चुप्पी थी ,दुर्दांत अभिलाषा थी ,तकलीफों से छिले निर्वासित दिन-रात थे ,एक सख्तशिला थी सीने में जमा थी ,कोशिशे बेकार थी बारिशों में यू ही भटकते थे जन्म दर जनम,कहा भी अनकहा था ,समय को निशेष देखती दो आँखें थी ,रिश्ते कागज़ के थे ,आग की लपटें थी ,चीजों को ढहना था ,एक तपिश थी शब्दों को जलना था,वहीँ म्रत्यु की पदचाप थी, चमत्कार था ,अनेक नामो में समाई उसकी उष्मा थी.
एक गध्य दृश्य गीत :- बहुत दिनों से, बहुत से शब्द बेठिकाने थे...इस ब्रह्माण्ड की धुल धक्कड़ में...

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

//कच्चे कचनार के नीचे खड़े भाई खूब याद आते हैं... उस छोटी दुनिया में बड़ी खुशियाँ हासिल थी जहाँ हमे..//

किसी छोटे बच्चे की गुल्लक मैं रखी ,सहेजी और जतन से जोड़ी गई निधि की तरह , उसके भीतर छोटे बड़े सिक्कों और मुडे-तुडे नए पुराने नोटों की शक्ल मैं जब स्मृतियों को जोड़ती हूँ ...वक़्त जरूरत तोड़ती हूँ --फिर सोचती हूँ ,यदि स्मृतियों को जीवन से हटा दें या उसमें से घटा दें तो आत्मा मैं क्या बचेगा? सिर्फ मुह चिढाता सा ...शेष समय ही नहीं क्या?
बचपन मैं हमारे घर मैं वर्ष भर उत्सव का वातावरण बना रहता था,दो भाई- चार बहने सबसे छोटे हम ,बड़े भाई से हमारी हमेशा अघोषित फर्माइशे रहती वो खूब मेहनत करते खूब कमाते वो जिस मुकाम पर थे उनसे घर खुशहाल था कोई बड़ी इक्छा ना उनकी थी ना हमारी जो थी वो सब पूरी होती थी ..मुझे लिखते हुए वास्तव में गर्व होता है की हमारे भाई मैं कोई ऐसी आदत ना थी जिसे व्यसन कहतें हें ..शांत स्वभाव के धीर गंभीर व्यक्तितव वाले रूप मैं ही उन्हें देखा ...जाना घर के हर सदस्य के परिचित दोस्तों के वो दोस्त हुआ करते हम अंदरूनी तौर पर एक आदरणीय भाव के साथ उनसे डरा करते हमारी छोटी सी दुनिया में बड़ी खुशियाँ हांसिल थी हमें भाई और मां की हुकूमत में रहना सभी की आदत बन गई थी उनकी अवहेलना करना, ये सोच तक हमारे भीतर कभी नहीं बनी.. नाते रिश्तेदारों का आना -जाना बना रहता, गर्मियों की छुट्टियों और अन्य मौकों पर बहने आती उनके पति- बच्चे मां एक अज्ञात सुख से भर जाती, सोचती हूँ तो लगता है मां की दुनिया कितनी सरल थी.. फिर घूमना मौज मस्ती फिल्मे देखना खरीददारी नए कपडे .. संग त्यौहार ,.रूठना मनाना सब कुछ पढाई के साथ चलता रहता..रात मैं महफिल जमती... भाई बहुत अच्छा गाते एक कशिश थी उनकी आवाज में मोहम्मद रफी से उनकी आवाज उन्नीस ही होगी , घर के हर सदस्य और मेहमान को गाना अनिवार्य होता मां हमेशा जज होती और ..भाई हमेशा अव्वल आते मैं दूसरे नंबर पर बाद में भाई के कहने पर ही बी ए मैं एक सब्जेक्ट के तौर पर मैंने संगीत को चुना. कुछ गाने जैसे "ओ दूर .. के मुसाफिर[उड़न खटोला]", "सुहानी रात ढल चुकी [दुलारी]", "टूटे हुए ख़्वाबों ने [मधुमती]", "सीने में सुलगतें हें अरमां[संगदिल]".आदि दिल दिमाग की स्मृतियों में गहरे खजाने की तरह बसे हैं उनकी आवाज़ में, जब तक गर्मियों की छुट्टियां और मेहमान -रिश्तेदार रहते एक हलवाई हमारे यहाँ मुकरर रहता जिसे भाई और मेरी फरमाइश पर ताजा आलू चिप्स,हींग वाली मूंगदाल के पकौडे ,दही बड़े , बेसन की मोटी सेंव ,बड़ी इलायची के दाने डली बड़ी बूंदी [नुकती] बनती जिसे मेहमानों के चले जाने के बाद भी हम खाया करते...टोकरी भर-भर आम आते ..आम रस के साथ कुर डाई[एक तरह के गेहूं के आटे के पापड] तली जाती. पूरण पोई [चने के दाल की मीठी रोटी ]और भी एसा बहुत कुछ जिन्हें खाए बरस बीत चुकें हैं .. हंसी भी आती है दुःख भी होता है ..हम भाई बहनों का प्रेम भी सच्चा और लड़ाई दोनों ही सच्ची हुआ करती थी ,धीरे-धीरे सबके ठौर ठिकाने अलग होते चले गये,अपना घर अपने बच्चे ,अपनी दुनिया और इस दुनिया के स्वार्थ और उसी में जीते-मरते हम दूर होते चले गए ..यादों में एक कच्चा हरा कचनार का पेड़ अब भी आँगन में है जिसमे ढेर से गुलाबी फूल साल भर खिलते जब भी हम जाते और लौटते भाई हमेशा बाहर तक छोड़ने आते थोडा और रुकने खाना खाकर जाने की मनुहार करते ...ये वही शहर यहाँ वही पेड़, वही सड़कें वही लोग वही आबो-हवा ,जहाँ हम संग रहे जिए चले ...लेकिन कल जहाँ हम खिलखिलाते थे रूठते थे संग तीज-त्यौहार मनाते थे आज उन घरों में उनके बच्चों की हूकमतें चलती है रिश्तों की नरमाई नहीं है वहां ,कोई शिकायत भी नहीं,भाई भी नहीं ...पांच साल पहले खो गए वो दिसम्बर की एक कडाके की रात में ...और दूसरे दिन एम्बुलेंस से भाई को उतारते लोग ..आँगन में उनका लेटा हुआ शांत चेहरा ,भुलाने से क्या भूलेगा ?कचनार के मुरझाये फूल तब भी बिखरे थे वहां एक हफ्ते पहले ही तो कहा था उन्होंने फ़ोन पर तुम्हे एक बढिया मोबाईल दिलवाना है, हमारे सुख-दुःख में हमेशा साथ खडे रहने वाले वाले भाई नहीं लौटे....फिर दिन भी बीते ७ माह गुजर गए एक दिन दैनिक भास्कर में एक सूचना थी ,अपने भाई के नाम सन्देश भेजें ...सर्वश्रेष्ठ को पुरूस्कार दिया जाएगा ..पुरूस्कार की तो कोई चाह ना थी ..बिना कुछ कहे, सुने, मिले बिना ,जाने वाले भाई से बात करे बिना दम घुट रहाथा ..मैंने लिखा था वो छपा भी और नोकिया का एक मोबाइल फ़ोन भी, यकीनन वो मेरे भाई के कहने पर ही दिया गया था..उनके बिना राखी का त्यौहार कितना फीका होगा मेरे लिए कौन समझ सकता है...
भीगे शब्दों सूखे आंसुओं, पहाड़ सी यादों रूखे मौसमों,
रूठे पलों पर, लपेट मन का धागा भेजती हूँ,
अनन्त से झांको देखो -सुनो- स्वीकारो
मैंने चांदनी खुशबू और हवाओं से की है प्रार्थना
की ले जाएँ वो मेरी असीम शुभकामनाये
की खुश रहो जहाँ रहो तुम
यूँ चले जाने से ख़त्म नहीं होगा
किसी भी जनम ये रिश्ता...

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

कुछ चीजों के साथ समय का फेरा था /औरइतिहास के जीवाश्म मैं परिवर्तित होने से /बचा हुआ समय ही है-/ और था /हमारे पास


कुछ चीजों के साथ समय का फेरा था /औरइतिहास के जीवाश्म मैं परिवर्तित होने से /बचा हुआ समय ही है-/ और था /हमारे पास / तुम कभी नही जान पाओगे /पानी मैं घुलती/मौसमों मैं डूबती/एक सघन सात्विक मौन शाम/तुम्हारे ओझल होने तक /किस कदर निरंतर पीछे छूटती है/लौटती है/और इस छूटे के साथ /किस तरह और कितना कुछ भरता जाता है/ये भी कभी जान पाओ या नही / नही जानती /लेकिन सच कहती हूँ, चाहती हूँ / सारे प्रतीक अपनी रहस्यता छोड़ /प्रतिध्वनित होने लगे, /ध्वनित बार-बार /शहर से दूर/बहुत दूर-दूर तक फैले /खामोश तालाब /किनारे खडे अलसाए खजूर /और उनकी सतही थरथराती परछाई यां/स्याह पत्ते /जंगली मेहँदी की खुशबू /बे शब्द करती हुई /जिसके सहारे ना जाने कितने शब्द सांत्वना देते हें/ कुछ सवाल निरस्त होतें हें/ हों भी तो?/जानती हूँ तुम अनुत्तरित रहोगे/मुमकिन सम्भव खोज लोगे /मेरे लिए कोई विकल्प/और मैं दूर सही /आकाश का नीलापन /देखूंगी तुम्हारी आंखों मैं /या शायद ये भी सम्भव हो /हम तुम इस बरसात मैं /किसी दिन -किसी पुल के नीचे भीगते,/मटमैले पानी मैं पैर डाले /तिनके-घांस ,फूल -पत्तियों -डोंगियों को /देखें एक साथ बहते हुए
[कई बार जो मन, कहना चाहता है ..उसके लिए शब्द दुर्लभ हो जाते हें ,भाषा नही मिलती सिफर होकर भाव गुम हो `जातें हें जो लिखा होता है उस हर लिखे शब्दों के चेहरों पर सफेदी पुत जाती है साक्षी भी कोई नही,कुछ नही ...मनचेतना की गहराई से -नए सिरे से सोचती हूँ -जतन से फिर लिखे को छूना -जीना ,वो ही सामने आता है]

शनिवार, 11 जुलाई 2009

'प्रेम एक ऐसा दृढ़ निश्चय है ,जो हमारी आत्मा के साथ रहता है और जो वतमान को अतीत तथा भावी युगों से जोड़ता है ,


खलील जिब्रान की एक पुस्तक ''दी अर्थ गोड्स का हिन्दी मैं अनुवाद धरती के देवता नाम से ..माई दयाल जैन ने किया था और इसका चौथा सस्करण [१९८९] मैं सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन द्वारा हुआ था जिसकी कीमत केवल ६ रूपये मात्र है जो मुझे देहली के फूटपाथ से मिली ,हो सकता है जिब्रान बहुतों को नापसंद हो लेकिन जो उन्हें पढ़ते रहें होंगे वे जानते हैं ...जीवन संदेश,पागल,बटोही,शैतान ,तूफान और विद्रोही आत्माए आदि उनकी ऐसी कृतियाँ हें जो कभी पुरानी नही होगी धरती के देवता जिब्रान की अन्तिम रचना है जो उनकी म्रत्यु के दो सप्ताह पूर्व प्रकाशित हुई थी इनमे उनके कुछ गध्य गीत भी हें जिसमे संगीत और लय का अलौकिक सौन्दर्य है, जिन्हें बारम्बार पढने पर भी तृप्ति नही होती ....उसी से एक अंश....प्रेम क्या है .......
जिसे हम प्रेम कहतें हैं,वो महान मुक्ति क्या है जो समस्त परिणामों का कारण है और सब कारणों का परिणाम वो क्या शक्ति है जो मौत और जिन्दगी को एक करती है और फिर उनमे एक ऐसा स्वप्न पैदा करती है जो जीवन से भी अधिक विचित्र और मौत से भी अधिक गहरा है
अभी कल ही मैं मन्दिर के द्वार पर खडा था और पास से जाने वाले सभी व्यक्तियों से प्रेम के रहस्यों और लाभों के बारे मैं पूछ रहा था ....एक अधेड़ आयु का व्यक्ति जिसकी शक्ति क्षीण हो चली थी और त्योरियां चढी हुई थी वो कहने लगा ....प्रेम एक जन्म जात दुर्बलता है,जिसे हमने आदि पुरूष से उतराधिकार मैं प्राप्त किया है ...फिर एक नवयुवक जिसका शरीर और भुजाएं सुद्रढ़ थी उसने कहा ...''प्रेम एक ऐसा दृढ़ निश्चय है ,जो हमारी आत्मा के साथ रहता है और जो वर्तमान को अतीत तथा भावी युगों से जोड़ता है ,...उसके बाद एक शौकातुर स्त्री गुजरी वो बोली प्रेम एक घातक विष है जिसे पाताल वासी भुजधर सारे लोक मैं फैलातें हें आत्मा उसके प्रभाव मैं नशे से मस्त हो बाद मैं नष्ट हो जाती है ,..एक गुलाबी चेहरे वाली सुंदर लड़की का कहना था कि.....प्रेम एक अमृत है जिसे प्रभात कि वधुएँ बलवान पुरुषों के लिए बरसाती है जिससे वे समस्त आनंद का भोग कर सकें फिर एक काले वस्त्रों मैं लम्बी दाढी वाले व्यक्ति ने कहा कि ....प्रेम एक मुर्खता है जो जवानी के प्रभात के साथ प्रगट होती है और संध्या बेला मैं विदा हो जाती है ,....उसके बाद एक तेजपूर्ण चेहरे वाले आदमी ने शांत और प्रसन्न मुख से कहा प्रेम एक दैवी ग्यान है जो हमारे अन्तरंग और बाहर कि आंखों को प्रकाश प्रदान करता है जिस से हम समस्त वस्तुओं को देवताओं के समान देखने लागतें हैं ,...बाद मैं एक अंधे आदमी ने रोते हुए कहा प्रेम एक गहरी धुंद है जो आत्मा को ढंक देती है जिसमे आदमी अपनी इक्छाओं की प्रति छाया मैं अपनी ही आवाज की प्रति ध्वनी सुनता रहता है फिर एक नवयुवक वीणा बजाते हुए आया और बोला प्रेम एक स्वर्गिक ज्योति है जो सूक्ष्म ग्राही आत्मा की तरंग से चमक कर अपने आस-पास की समस्त वस्तुओं को प्रकाशमान कर देती है ,...फिर एक बूढे ने कहा प्रेम एक दुखी शरीर की विश्रांति है ,जो उसे कब्र मैं प्राप्त होती है फिर पाँच वर्ष का एक बालक दौड़ते हुए आया और उसने कहा ..प्रेम मेरा बाप है प्रेम मेरे माँ-बाप के सिवा कोई नही जानता कि प्रेम क्या है ...
और जब शाम हो चली सभी प्रेम के विषय मैं अपने विचार प्रगट कर चुके ..सन्नाटा होगया तब मैंने मन्दिर मैं एक आवाज सुनी ..जीवन दो चीजों का नाम है -एक जमी हुई नदी और दूसरी धधकती हुई ज्वाला .और धधकती हुई ज्वाला ही प्रेम है ...और मैंने घुटने टेक इश्वर से मन से प्रार्थना की,हे प्रभु मुझे इस धधकती हुई ज्वाला का भोग बना दे और इस पवित्र अग्नि की आहुति बना......
.मैं तुम्हे जिस भी कोण से देखता हूँ ,हर कोण द्रष्टि कोण बन जाता है ...शिव मंगल सिंह सुमन

शुक्रवार, 26 जून 2009

//वक्त के पार -अव्यक्त .उस वक्त की तरह

तुमने
एक बहुत उंचा-नीचा
उबड़-खाबड़,कंटीला-पथरीला
,पहाड़ गढा मेरे लिए
और कहा -जा रहो और
करो इन्तजार ताउम्र
ये आजमाने की कोशिश थी ,या
दूर बहुत दूर रहने की कवायद
नही जान पाई ...फिर एक पुल बुना मैंने ,
अपनी संवेदनाओं के छोटे बहुत छोटे टुकड़े जोड़कर,
ढलान से थोडा ऊपर ,
चट्टानी गहरी खाई के ठीक ऊपर ,
बना पुल तुम्हारे लिए था ...
जहाँ खुला आसमान था ,
और थी जंगली वन्स्पतियों की खुशबू
और एक अनगूंज ...लगातार,
तुम्हे अपना कह सकने के पहले और बाद में,
कोई नाम जैसे ....निर्विकार -नीलाभ
सूर्य ..संदल..शुभम ..या सनातन ,
आदि गौत्र सा बजता है आधी रात शिराओं में ..
.मन है की उदासी नही छोड़ता,
ना जोड़ता है ,ना जुड़ता है,कहीं ओर,
क्या कोई आंसू इस लिखे पर गिरे
ओर कोई शब्द ..वक्त की तरह
धुंदला जाए तभी यकीन करोगे.?
जबकि में
वक्त के पार -अव्यक्त .उस वक्त की तरह
इस समय के साथ
गुमशुदा देहरियाँ ..तलाशती ...
इस बारिशी मौसम के शोर में भी सुन सकती हूँ तुम्हे ,
शुक्रिया दोस्त ,
जिसकी चौखट पर हाथों से पकड़े गए ,संग सितारे ,
ओर आंखों से समेटे गये ..उजाले,
हथेलियों पर स्पर्शों में ..अब भी दर्ज है ,
जब हमारी असंभव इक्षाओं का सम्भव भविष्य लिखा गया
बेमानी सा ....

बाकी सब जो झूट है ....अपनी नई-पुरानी कविताओं के संग्रह से

मंगलवार, 23 जून 2009

//बलात्कार एक स्त्री का अवमूल्यन है,उसके मौलिक अधिकारों का उलंघन,न्यायविदों के हाथ मैं सिर्फ कलम है, कोई मिसाल, नही कोई मशाल नही जिसे बतौर पथ प्रदर्शक


कुछ वर्ष पूर्व मुंबई की एक चलती ट्रेन मैं ,एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार हुआ ,उस कम्पार्टमेंट मैं करीब सात-आठ लोग थे जिनमे एक बडे अखबार का संवाददाता भी था ...उस वक्त टी वी चैनल्स ,अखबारों मैं ये ख़बर प्रमुखता से आई ,और चली गई ...बाद के वर्षों मैं भी देश भर मैं बलात्कार होते रहे ,खबरें बनती रही ,छपती रही और उन्हें टेलीविजन पर दिखाया जाता रहा ....हम आजाद हुए हें तब से अब तक ना जाने कितने बलात्कार के प्रकरण हुए होंगे इसका पूरा ब्योरा राष्ट्रीयअपराध ब्यूरो ही दे सकता है ...पिछले दिनों दिल्ली मैं चलती कार मैं गेंग रेप और फिर भोपाल मैं मुंबई की एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार ......

दरअसल बलात्कार को कानूनन गंभीर अपराध की श्रेणी मैं रखा गया है इंडियन पेनल कोड की धारा ४९८ ऐ मैं औरतों पर हो रहे उत्पीडन को रोकने मैं ये सहायक है ...इसमें अभियुक्त को जमानत पर छोड़ने का प्रावधान भी नही है ,इस सन्दर्भ मैं न्याय मूर्ति कृष्णन अय्यर के एक एतिहासिक फैसले मैं कहा गया था की बलात्कार की शिकार महिला का बयान अभियुक्त को सजा देने के लिए काफी होगा ...लेकिन मासूम -नाबालिग़ लड़कियों के मामलें मैं ये कैसे सम्भव होगा इस बारे मैं कुछ नही कहा गया .राष्ट्रीय रिकार्ड ब्यूरो के १९९० के अनुसार १९९६ तक ८६.७९१ब्लात्कार हुए जिनमे नाबालिग़ लड़कियों -१० वर्ष से कम उमर का प्रतिशत २० हजार ११४.[२३.३] प्रतिशत था और १० से १६ वर्ष की किशोरियों के साथ .४८.९१८[५६.७] प्रतिशत औए १६ से ३० वर्ष की महिलाओं के साथ १२५११[१४.५]प्रतिशत रहा ...,इसमें भी ३० तक की आयु की महिलाएं सर्वाधिक बलात्कार की शिकार हुई ,जबकि ८० प्रतिशत मामले मैं बच्चियों की उम्र १० वर्ष से कम हें एक अनुमान तो ये भी है की बच्चों के साथ किए गये १०० से अधिक यौन कुकर्म मैं से एकाध की ही सूचना या रिपोर्ट मिलती है और जो भी जानकारी सामने आती है वो दिलदहला देने के लिए काफी है अपराध रिकार्ड ब्यूरो भी आख़िर थानों न्यायलयों, एजेंसियों के आधार पर ही तो अपराध का डेटाऔर प्रतिशत निकालता है । सपना सा लगता है क्या हम आजाद देश मैं हैं ,और क्या येवही देश है जहाँ भगत सुखदेव,राजदेव जैसे क्रान्ति कारियों ने अपना बलिदान कर हमें आजाद कराया और उस आजादी का एसा हश्र ?असल मैं हम आत्मा और मन से इतने असुरक्षित और नपुंसक हो गये हैं की दूसरो के लिए कुछ करना ही नही चाहते ...हमने अपनी मान मर्यादा दूसरो के दुःख मैं दुखी होने वाले सहज गुणों को इतने ऊपर ताक पर रख दिया है कि वो अब हमारी अपनी ही पहुँच से दूर हो गएँ है ....ऐसे मैं ,एड्स अवेयरनेस प्रोग्राम, लिंग भेद समानता जैसे नारों-वादों घोषणाओं का कोई अर्थ नही रह जाता जब तक की हम उन तमाम ताकतों को चुनौती नही दे देते जिनकी वजह से औरतों की हैसियत कमतर होती है और उनकी मान-मर्यादा को ठेस लगती है ....यूँ संवेदन हीन होकर लिखने सोचने या कार्य की परिणिति तक पहुँचने से तात्कालिक लाभ चाहे हो जाए, लेकिन दूरगामी परिणाम शून्य होंगे ---और आजाद भारत मैं औरतों के जीवन यूँ ही स्याह अंधेरों मैं तब्दील होते रहेंगे ,---हमारी न्याय व्यवस्था लचर है ..क़ानून अंधा...न्यायविदों के हाथ मैं सिर्फ कलम है ....कोई मिसाल ऐसी नही ,...कोई मशाल ऐसी नही जिसे पथ प्रदर्शक बतौर [रिफरेन्स ]बताया जा सके ....हमारे देखने सोचने ,महसूस करने और फिर लिखने से कितना फर्क पड़ता है.समाज के प्रति विशेष कर औरतों के लिए हमारी नैतिक जिममेदारी की दावेदारी अन्तत ऐसे हादसों के बाद खोखली हो कर रह जाती है ।
किसी स्त्री को सतीत्व भंग की क्षति के साथ जिस गहन भावनात्मक दुःख भय मानसिक दवाब को जीवन पर्यंत तक सहना पड़ता होगा क्या पुलिस ,प्रशासन और अपराधी या सामान्यजन इसे समझ सकतें हैं ...ऐ आई आर १९८० सुप्रीम कोर्ट ५५९ ने कहा भी की स्त्री के लिए बलात्कार म्रत्यु जनक शर्म है ,और जब पीडिता न्याय के लिए गुहार लगाती है तो न्याय[परिणाम]भी उसके हक मैं अक्सर नही आते ---होता तो यही है की अक्सर समाज और परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए बलात्कार के मामले दबा दिए जाते हें चाहे न्याय व्यवस्था कितनीही कड़ी और सच्ची क्यों ना हो ,और बलात्कार होने से अधिक बलात्कार होने का अहसास, कोर्ट मैं विरोधी वकीलों का सामना उनके सवालों के जवाब अन्तत एक बलत्कृत महिला का मनोबल गिरा देतें हैं। १९८३ मैं हुए संशोधनों के बावजूद बलात्कार के संदर्भ मैं किय गये संशोधनों के अनुसार धारा ११४[ऐ ]की उपधारा ऐ बी सी डी औए जी के अंतर्गत बलात्कार के मामले में यदि महिला अदालत मैं ये कहती की उसकी सहमती नही थी तो अदालत को यह मानना पडेगा,लेकिन ये प्रावधान सिर्फ पुलिस,सार्वजनिक सेवा, मैं रत व्यक्ति जेल प्रबंधक डॉ द्वारा बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या महिला के गर्भवती होने की स्थिति मैं हो तो प्रभावी माना जाएगा मगर इस हालत मैं भी मर्जी या सहमती के आधार पर अपराधी के बच निकलने के रास्ते मौजूद है।
बलात्कार एक सर्वाधिक घृणास्पद कार्य है--बलात्कार वास्तव मैं एक स्त्री का अवमूल्यन है इन मामलों मैं वैसे तो दिनाक २८ जनवरी २००० मैं सुप्रीम कोर्ट ने एक एतिहासिक निर्णय मैं कहा था की किसी भी स्त्री के साथ बलात्कार ,उसके मौलिक अधिकारों का उलंघन है,सरकारी कर्मचारियों द्वारा कए गए दुष्कर्म के लिए केन्द्र सरकार को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है विशेषकर हर्जाना अदा करने के लिए .भारतीय सविंधान के अनुछेद २१ के अंतर्गत भारतीय ही नही विदेशी नागरिकों को भी जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है ...अपराध ब्यूरो द्वारा प्राप्त आंकडों की सच्चाई पर भरोसा करना ही पड़ता है यौन हिंसा का आंकडा एक आइना है जिसमें हम औरतों की मुश्किलों को गहराई से देख सकते हैं....
फिर भी महिलाओं की अस्मिता उनके सुख चैन को छीनने वाली ताकतों के खिलाफ देश ही नही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला संगठनों ने अहम् भूमिका निभाई है ,तेजी से बढ़ते सामाजिक सरोकारों अंतर्विरोधों के कारण गरीब-अमीरशिक्षित -अशिक्षित ,ग्रामीण-शहरी,महिलाओं ने अपनी अस्मिता-अस्तित्व और अधिकार की लड़ाई लड़ी है और सफल भी हुई है,अंतत संयुक्त राष्ट्र संघ को ७० का दशक अंतर्राष्ट्रीय महिला दशक के रूप मैं मनाना पढा था ,इसी के बाद महिला आन्दोलन जोर पकड़ते गये कहीं यौन हिंसा मुद्दा बनकर उभरा कही भ्रूण हत्या का विरोध हुआ कही दहेज़ प्रथा जैसी समस्या के लिए मोर्चा बंदी हुई कहीं कामगार की लड़ाई, कहीं स्त्री बिरादरी ने शराब बंद मुहीम छेडी... लेकिन वो बलात्कार के मामलों पर विवश हो कर रह गई है ....दरअसल बलात्कार जैसे अपराध की व्यापकता और उसकी भरपाई क्या इतनी ही है की पीडिता को पुनर्वास और हर्जाना मिले उसके छोभ ,ग्लानी ,उसकी मानसिक स्थिति और उसे तवरित न्याय मिले इसके लिए ---कुछ अन्य मुद्दे भी तय होने चाहिए ,लेकिन सबसे बड़ा सवाल बेमानी होकर रह जाता है की असुरक्षा का जो ये वातावरण है जिसमे औरत जी रहीहै ...उसे कैसे ख़तम किया जाय और वे कारक तत्व जो औरत के सम्मान को नीचा करते हें, जिनसे अपराध को बढावा मिलता है उन पर कैसे काबू पाया जाय .......
...इस लेख के लिए संदर्भ पुस्तक न्याय क्षेत्रे -अन्याय क्षेत्रे ...लेख अरविन्द जैन,एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट,मेरे प्रिय लेखक ..स्त्री के हक मैं उनकी -पुस्तक औरत होने की सजा -एक बेबाक पुस्तक है जिसे उन्होंने लिखा ही नही, महसूस भी किया है ....

रविवार, 14 जून 2009

इच्छाएं, सेकेण्ड की सुई की तरह अन्दर ही अन्दर एक ही वृत में गोल घूमती है... समुद्र किनारे फ़िर जंगल एक नए सिरे से जलता है, पीछे काली ज़मीन छोड़ता...

एक अशिष्ट बदलाव था अध् चटके फूल चटकीली धुप मैं खिले बिना ही सिरे से काले हो सूख कर झड़ रहे थे गर्म बजती हुई हवा सन्नाटे को चीरती, भरी दोपहरी अजीब तर्क जुटाती,...गले ना उतरने वाले ,एक पुर इत्मीनान समय का कोने मैं दुबके बैठे रहना ..किसी विस्मृत नाद का हवा मैं तैरना...कानो तक पहुंचना .किसी शहर मैं अपने को अधूरा छोड़ आना --जहाँ उसकी गिरफ्त से हाथ छूट गया एक निर्वासित नदी ने मूड कर पीछे देखा ,रास्ता बदल गया ..कोई अपना सलीब यू भी ढोताहै ..जैसे तुम?उसके सामने बहुत से सवाल ख़ुद अपने जवाब ढूँढ लेते मौन अनुभवों की अभिव्यक्ति और शब्दों की बेचारगी भी थी...तभी किसी फूल का नाम याद करना उसके रंग खुशबू से अपने को सराबोर करना और एक संभावना के बीच ना ख़त्म होने वाली भीतर की यात्रा करना .जिसका गंतव्य ना था ,कहाँ जीना-मरना होगा ये भी अनिश्चित था बहुत कुछ खोया हुआ छूटा हुआ पाने की भी जद्दो-जहद ना थी -बस बचे हुए हम मैं हमी ...मन की वृतियों और इच्छाओं से संचालित एक सुखद अभ्यास था,उनदिनो-हर दिन एक निर्णायक उतार -चढाव से भरा हुआ... बाद मैं कई दिन बीते -दिनों के भीतर बहुत भीतर उन दुखों के साथ जो सिर्फ अपने सहने और भोगने के लिए थे । ऐसे मैं हर दिन बेसब्र और झुंझलाए दिन की शुरुआत होती मन को भी आख़िर खुश रहने का कोई कारण तलाशना ही पड़ता ,मुख्य द्वार पर आकाश चमेली का पौधा एकदम से बड़ा दिखलाई पड़ता है पिछली बारिश मैं रौपा था--इस बारिश मैं फूल खिल उठे उसमें ..अद्भूत भीनी खुशबू वाले जिसकी लम्बी और नुकीली डंठल को क्रॉस स्टिच की तरह एक दुसरे पर रख कर वेणी गुंथी जा सके -बहुत कुछ बुना-गुना गया असीमित सोच के पार जो बस सोचा ही जा सकता था,सुबह के अखबार के साथ ताजा ठंडी हवा, चाय की केतली ,जामुनी रंगों के गुच्छे के गुच्छे खिले फूल कुछ अलग अंदाज से सम्मोहित करते ....फिर भी समय सोच और समझ के खुरदुरे तल पर बहुत सा काई सा फिसलन भरा जमा हो जाता है ...उचाट मन तिनका रेशा तक साफ कर देना चाहता है ताकि रचे गये सुख के साथ आने वाली सुबह नए दृश्य देखें जा सके ...लेकिन कल शाम मौसम की पहली बारिश मैं गर्मी के मारे झुलसे- मुरझाये पेड़ पत्तियों और सड़कों से धूल बहकर किनारे जा लगी सब कुछ साफ-चमकदार हो गया. रह गया हरियाली के बीच एक हैरान करता एक पत्ता ...जो कहने से बच गया याद रह गया एक तार वाली फेंस के पार से उसकी कविताओं के सन्दर्भ कभी रिक्त तो कभी तिक्त करते -तय से ठीक उलट -निपट अकेली मुफलिसी पर पर रुलाते ..हंसा भी तो नही जाता ..राग द्वेष से परे परमहंस सा जीना क्या सबके बूते की बात है ऐसा भी नही था समंदर भी तैरे थे,और परिंदों से ऊँची उड़ान भी, एक ही साँस मैं खो गया फिर भी जो सच में सच से ज्यादा था ...स्लेटी शाम मुँह ढँक कर सो जाती है -एक उदास जुगनू मुठ्ठी को उजाले से भर जाता है हाथ की नसों में रौशनी की लहर दौडती है मुठ्ठी खुलती है रौशनी आंखों की पकड़ से दूर भागती गायब होती जाती है ...अंधेर भरी टोने-टोटके सी रात डराती है कहीं दूर एक आत्मीयता ढाढस बंधाती है डर नही भागता ...बहुत कुछ स्वीकार ,बहुत कुछ के साथ डूबता है ,डूबने की अपनी दुश्वारियों के साथ डूबने के अपने अंदाज और आवाज के साथ-आपकी काबलियत यही तो नही ना की कब तक बगैर साँस के जी सकते हो ..सतह पर लौटे बिना और लौटना पड़ता है दुबई में होटल अल-कसर और सामने समुद्र... पैरों के नीचे धंसती रेत के साथ हवा में घुलता कोई सपना लहरों के साथ अपने में समेट लेने को बेकाबू उसकी तरफ़ तेज़ी से आता है...वो पीछे पलटती है,एक मात्र बचाने लायक सच बच जाता है... इच्छाएं, सेकेण्ड की सुई की तरह अन्दर ही अन्दर एक ही वृत में गोल घूमती है... समुद्र किनारे फ़िर जंगल एक नए सिरे से जलता है, पीछे काली ज़मीन छोड़ता...एक पत्ते का अरण्यरोदन नहीं रुकता।
"बचना था तुम्हे सपनो से/प्रेम से, एकांत से / तुममे जो एक झरना छिपा था/बचना था उसके शोर से/बचना थे आषाढ़, फाल्गुन और आश्विन से..." (मेरे प्रिय कवि *अलोक श्रीवास्तव* की कविता का अंश)

बुधवार, 20 मई 2009

एक चौकन्नी चिडिया की तरह मन आसन्न खतरे को भांप लेता है ओर एक खीज भरे रास्ते से गुजर जाता है... क्या मांगू उससे वो सब कुछ दे सकता है.

वो जितना आगे बढ़ी थी ,उतना ही पीछे लौटना था ..उस मुकाम से जहाँ वो थी आदेश पहले था और नियति बाद मैं ..गिने चुने क़दमों के साथ बिल्कुल आगे देखते हुए ..लौटना पीछे की ओर नियत दूरी को पैरों से साधते हुए .बचपन मैं ये खेल भाई-बहन दोस्तों के साथ खेलते हुए वो हर दम हार जाती आगे बढ़ना तो ठीक था लेकिन लौटना क्या इतना आसन था,एक बार जीत की आशा औरजोश मैं वो पाँच छह कदम पीछे लौटी और चकरा -कर गिर गई ..मामूली चोटें आई भाई ने डांटा आँखे क्यों मूँद लेती हो ..बस यही गलती है ..बाद मैं उसने गौर किया खुली आंखों चीजें देखने महसूस करने से उसे मुश्किल होती सुख-दुःख दोनों मैं सामान्यत वो खेल फिर ता- बचपन उसके लिए मुश्किल ही बना रहा जिसमें वो फिर कभी शामिल ना हो सकी बुद्धि सुलगती है,और सारे जतन हत बुद्धि होकर बैठ जाते हैं ऐसे मौकों पर अपने को निरीह लगना-सोचना भी तो ठीक नही था कुछ नया था जो जिन्दगी मैं घट रहा था ,कुछ भुला कर -कुछ ओर याद रखना अपने मैं समेटे रहना -अतल मैं उमड़ता -घुमड़ता चंदन जल सुगंधी ..फिर भी रंग-बिरंगे मोतियों की माला टूटती है धागा गलता जाता है बिखरे मोती हाथ नही आते ओर एक चौकन्नी चिडिया की तरह मन आसन्न खतरे को भांप लेता है ओर एक खीज भरे रास्ते से गुजर जाता है पुराना सम्मोहन आत्मा को जकड़ता है एक घबराहट मैं मुंदी आंखों पीछे लौटना जरूरी हो जाता है ... क्या मांगू उससे वो सब कुछ दे सकता है ..फिर भी मेरे लेने की सीमाएं हैं ओर उसका गुमान असीम उसकी अनिश्चितता एकदम से उसे हमसफर-ओर अजनबी बना जाती, एक चाबुक सा दिमाग को थरथराता है वो समेटना चाहती है ..सब कुछ बिखरा हुआ .गली गलियारों से लौटते ताजगी-खुशबू भरे दिन एक-एक शब्द सेमल के फूलों की तरह सुर्ख-सुंदर दिल-दिमाग पर टंगते जातें हैं समुद्र की लहरें उसे तेजी से भिगोतीं हैं अपनी ही देह मैं दुःख की आद्रता उसके शब्द सुनते बेआवाज ..वो बस सोच ही तो सकती है क्या वो दोस्ती किसी चुक गए रिश्ते की असफलता की भरपाई थी या कुछ ओर ,या ये, या वो, बस-बस बहस ना करने का इरादा टोकता है .पिघला हुआ सब कुछ पहले सा आकार ना ले पायें लेकिन पहले से बेहतर तो हो ही सकता है बिना कष्ट के लौटना उन रास्तों पर जिन्हें विश्वास के साथ अपनाया था जिसे एक ईमान दारी ओर सम्मान के साथ पाया जा सके बस यही तो इक्छा थी लेकिन उमीदों का बदरंग होना बचे-खुचे रंगों का अन्दर से झांकना -निरर्थक -अर्थों मैं कुछ खोजने जैसा ..जो की एक तरफा बेवकूफी भरी खोज थी बीच उनके ..एक ऐसे सच की तरह जिसके आगे सब कुछ झूटा ओर बौना हो गया था .बस मन के पीछे मन को धकेल कर बैठा जा सकता था ..जो हो ना सका, अँधेरा गाढा था -इधर ओर उसकी गिरफ्त मैं इक्छाओं का कतारबध्ध होकर रह जाना ...कोई चाहता तो हाथ खींच कर रौशनी मैं शामिल कर सकता था अपनी रौशनी मैं ..आसमान अब भी खुला था समुद्र नीला ओर धरती हरी ...पर स्म्रतियों का विसर्जन कर देने पर जिन्दगी राजी खुशी बीत जायेगी क्या ...किसी के हिस्से के दुःख.अपने हिस्से के सुख स्थांतरण कर दिए जाएँ तब भी क्या ...निष्ठा भी क्या लौटाने की चीज है ...जोड़ी घटाई गई इक्छायें ..अपना ही पोस्ट मार्टेम ओर कुछ हांसिल ना होना अपने को मरते -जीते देखना ..आधे चाँद का साक्षी होना ..किसी बियाँबान से गुजर कर हजारों बार पूरी रात का असुविधा जनक सफर ...एक सिरे से शुरूआत अंत के पहले बीच मैं अंत. एक आद्रता मन मैं फैलती है आंखों की कोरों मैं उलझ जाती है चांदी सा झिलमिलाता कोई आंसुओं मैं घुलता जाता है गलती कहाँ हुई ...मुश्किलें शब्दों से हल हो जाएँ जरूरी तो नही ....
जैसे की समय को मेरी याद आई हो ऐसे बेवक्त ,जब कोई मुझे याद आता है भूले हुए समय मैं से, मैं आ जाता हूँ उसकी समुद्रों ओर पहाडों से घिरी हुई हथेली पर ,कभी-कभी,ओर कभी कभी अपनी आंखों के पलकों जितने करीब ओर अपने लिए अद्रश्य हो जाता हूँ (मेरे प्रिय कवि लीलाधर जगूडी की कविता का अंश )

शनिवार, 9 मई 2009

// लाल कृष्ण आडवाणी के सितारें गर्दिश मैं...हार की संभावना ..सुनिश्चित

लगभग साढे पन्द्रह लाख आबादी वाले अहमदाबाद की गांधी नगर संसदीय सीट पर इस बार लालकृष्ण आडवाणी का मुकाबला कांग्रेस के सुरेश पटेल से है...भा.जा .पा के घोषित प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी जी ने इस क्षेत्र मैं १५ सालों से लगातार जीत हांसिल की है .और हर चुनावी - जीत के बाद उनके दो -ढाई लाख वोट बढ़ जाते हें.गांधी नगर सीट का इतिहास गवाह हे की उनके सामने अच्छे और बढे ,नामी-गिरामी दिग्ज्जों की भी बुरी हार हुई है ...गाँधी नगर क्रीम एरिया है ,यहाँ अधिकाँश पढेलिखे और लब्ध-प्रतिष्ठीत लोगों की आबादी है और वे जानतें हैं की उन्हें क्या करना होगा -किसे चुनना होगा ...की जो उनके हित मैं होगा. इस बार आडवाणी के भाग्य का फैसला वे कर चुके हें,अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ज्योतिषों की गणना -भविष्यवाणी और जनता ने भी अपने नेता का चुनाव कर लिया है ...और अब मुश्किल से सात दिन मैं चुनाव परिणाम आ भी जायेंगे ...इस बार आडवाणी जी की हार सुनिक्षित है यदि जीत जातें हैं तो भी प्रधान मंत्री बन ने के कोई आसार नही . ..उनके सितारें गर्दिश मैं हैं भले ही वो अपने को देश भर मैं एक उदारवादी नेता के रूप मैं पेश कर रहें हों ...बतौर युवाओं का नेता भी---बतलाने-जतलाने मैं कोई कोर-कसरनही छोड़ रहें हों ...अब इस बात से कोई फर्क नही पड़ता की उन्होंने देश के लिए कुछ किया या नही ..फिलवक्त वे २१ वीं शाताब्दी को भारत की शताब्दी बनाने,गरीबों को कंप्यूटर शिक्षा देने,लड़कियों को अनिवार्य शिक्षा...और शिक्षा के समुचित अवसर देने का वादा कर चुकें हें ......तो क्या भारत को आडवाणी जैसे बूढे बनाम युवा या युवा बनाम बूढे प्रधान मंत्री की जरूरत होगी चुनाव बाद निशिचित ही कुछ और मुद्दे उठेंगे ...इस नए अवतार [एक बड़ी राजनैतिक पत्रिका मैं अति रंजना शब्द शैली मैं उनका व्यख्यान किया गया है ]को परिणाम के बाद संन्यास लेते .हताश होते हुए भी देखा जा सकेगा ...मराठी मैं एक कहावत है ..दिसतो तसा नसतो...जैसा दिखाई देता है वैसा नही होता ..तो क्या आडवाणी के सन्दर्भ मैं कहा जा सकता है की वो जितना और जैसा जाने जाते हैं क्या उतने और वैसे हें जितना की उन्हें पेश्तर किया जारहा है, ---या नही ..चुनाव परिणाम के बाद ज्यादा ठीक से समझे जा सकेंगे ....फिलहाल उनका सामना कर रहें सुरेश पटेल ..कलोल तालुका के दस साल से एम् एल ऐ हें उनकी छवि साफ-सुथरी है इस क्षेत्र मैं तीन लाख लोग पाटीदार समाज के हें और इस वक्त वे सभी आडवाणी के विरोध मैं हें यदि सुरेश पटेल जीततें हें तो इस अमूल्य जीत के बाद उनका कद तो बढेगा ही साथ ही वो पार्टी मैं सिरमौर की हेसियत वाले नेता भी बन जायेंगें ...जीत के बाद सुरेश पटेल की प्राथमिकताओं मैं अहमदाबाद को जोड़ने वाले सभी गावों मैं सड़क -पानी प्राथमिक शिक्षा ,स्कूलों मैं सुधार की रहेगी.. जैसा उन्होंने बताया ....इस समाज के वर्तमान मैं तीन लाख परिवार अमेरिका मैं हैं, चुनाव प्रचार अभियान के दौरान १०० से ज्यादा लोगों ने भारत आकर सुरेश पटेल का होंसला आफजाई की थी...पटेल समाज के अध्यक्ष और जबरदस्त राजनैतिक हस्तक्षेप रखने वाले स्थानीय रहवासी डॉ। मफत लाल पटेल ने बताया ...दर- असल अधिकाँश लोगों की नापसंदगी लालकृष्ण आडवाणी के लिए क्यों है ?...पहली तो बीते पन्द्रह वर्षों मैं आडवाणी अपने क्षेत्र मैं ना तो कभी आए ना अपने क्षेत्र के लिए कुछ उल्लेखनिय किया --ना अपने क्षेत्र की जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरे ...दूसरे गुजरात मैं हुए अन्याय के खिलाफ लोकसभा सदस्य होने के नाते ना तो कुछ कहा -ना किया ....तीसरे हाल ही मैं आशाराम बापू के आश्रम मैं दो बालकों की ह्त्या के मामले मैं [तंत्र-मन्त्र हेतु ]उनके प्रति मिली भगत होने का संदेह ....जो भी हो इन चुनावों मैं जो भी तस्वीर उभरे लेकिन ...देश भर के पत्र-पत्रिकाओं मैं जो उनकी तस्वीरें प्रकाशित हुई हें वो एक हताशा और उत्साह के अतिरेक भरा ..मिला -जुला चेहरा है ...आत्म विशवास की झलक वहां हल्की है अन्यथा सन्यासी क्या यूँ ही कोई हो जाना चाहेगा .....
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ज्योतिष जगदीश मोदी,डॉ मफत लाल पटेल स्थानीय रहवासी यों से बात चीत के आधार पर ....अहमदाबाद से लौटकर

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

कुछ आहटें बाहर है ,कुछ दस्तकें भीतर,समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मेंअपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं ....,

अब भी कुछ टूट रहा है धरती मैं,
और छूट रहा है ,आकाश मैं ,
थोडा सा झांकते हुए ,चट्टानों से,
कुछ भीग रहा है पहाडों के पार,
कुछ आहटें बाहर है ,
कुछ दस्तकें भीतर,
समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मैं,
अपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं
किस तरह पवित्र और सुरक्षित रखा है मैंने
दुनिया भर के लेखे-जोखे .से अलग ...
अलग वर्ण -शब्दों मैं
अभिनव रंगों मैं ,
सबसे बचाकर,अनहद मैं लीन-तुम्हे।
जब सपना भी नही देखा जा सका
और रात बीत गई,
कोई क्यों रोना चाहता है
तुम्हारे साथ -हँसते हुए ...अकेले मैं ,
अनंत गूंज मैं, ये भी नही जान पाये...
उससे मीलों दूर ..वसंत पास ही है ,यकीन है
जबकि बीता है वो,पिछली रात की तरह,
अभी-अभी,
पीली धूप मैं खिले ,सफेद फूलों की मानिंद,
और मैं तैयार हूँ ,तुम्हारा हाथ थाम लेने को ,
इसी क्षण ,धैर्य और उत्ताप के संयुक्त क्षणों मैं
ये कौनसा मुकाम है ,फलक नही ,जमी नही ,के शब् नही,सहर नही, के गम नही,खुशी नही ,कहाँ पे लेके आ गई ..हवा तेरे दयार की .... (फोटो शिलांग घाटी से)

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

मेरे पास ना कोई सबूत है,ना दलील मैं सिर्फ उसकी कहानी छाप सकती हूँ ...चार कहार मिले डोलिया उठाय -अपना बेगाना छूटो ही जाय .

मध्यप्रदेश में मुंगावली खुली जेल के लिए प्रसिद्ध रहा है हालांकि अब वहां जेल नही ,बस्ती के गरीब-बेसहारा लोगो ने कच्ची-पक्की दीवारें उठाकर वैध-अवैध सर छुपा सकने लायक घर बना लिये है ,लगभग चार साल पहले मेरा वहां जाना हुआ था, कुछ पत्रकार साथी और एक महिला संगठन के साथ ..मुंगावली में गणेश शंकर विद्यार्थीकी मूर्ति को एक चौराहे पर लगानेके लिए स्थानीय लोग विरोधकर रहे थे और हमें एक जुट होकर समर्थन में वहां एक कार्यक्रम में भाग लेना था... भोपाल से हम शाम ७बजे वाया रोड निकले और करीब १२ बजे रात मुंगावली पहुंचे ,सभीको तेज भूख लग आई थी हम लोगों ने एक ढाबेनुमा होटल को खुलवाकर भोजन बनवाया और खाया..तब तक डेढ़ बज चुका था मार्च का पहला सप्ताह था ,गर्मी कम और अभी ठंडा मौसम शेष था -रात गहराने के साथ सभी को नींद आ रही थी ..मुंगावली एक छोटे शहर की शक्ल में रात में ऊँघता नजर आ रहा था.. बीच से उसे पार करते दुसरे छोर पर जो सर्किट हाउस था वहान्हामारे ठहरने का इंतजाम था ..तब रात के लगभग २बज चुके थे हमारी अगुवाई करने वाले जो की एक बुजुर्ग थे उन्होंने चौकीदार के साथ सारे कमरों का मुआयना किया चौकीदार ने बताया चार कमरे बड़े और एक छोटा है ,सभी में तीन-तीन लोग आराम से सो सकतें है ,उन्होंने एक से चार तक के कमरों में ग्रुप बनाकर अपने हिसाब से जाकर सोने के निर्देश दिए ..अन्तिम पाँच नंबर के कमरे में मुझे अपना बेग रखने को कहा ...मेरे बगल वाले चार नंबर में महिला संगठन के सदस्यों ने अपना सामान रख दिया, मेरे पीछे-पीछे चौकीदार एक बड़ी सी मोमबत्ती ,माचिस ,मच्छरों की टिकिया ,बेद शीट्स वगेरहा लेकर आ गया ..उसने मुझे बतया बाथरूम में पानी शीशा ,साबून बकेट सभी कुछ है ,कोई काम हो तो बेल बजा देना में आपके कमरे के ठीक बाहर बरामदे में सो रहा हूँ वो शायद गहरी नींद का मारा था लेकिन अपनी नौकरी केप्रति प्रतिबद्ध एक बूढा और इमानदार नौकर....मेरे जवाब की प्रतीक्षा किए बिना वो कमरे से बाहर जाते-जाते हिदायत भी देता गया की दरवाजा अन्दर से ठीक से बंद कर लें ...


उस रात अँधेरा था पावर भी कम था बल्ब ६० वाह्ट से ज्यादाके ना होंगे एक ही बरामदे के इस छोर से उस छोर तक एक लाइन में बने उन कमरों के सामने ठीक बीच में चार-पाँच सीढियां उतर कर छोटा सा एक उजाड़ मैदान था जिसमें टूटी-फूटी कांटो की तार वाली एक फेंस लगी हुई थी, जिसके बीच में एक घना बरगद का पेड़ ...अंग्रेजों के समय का बना हुआ यह सर्किट हाउस सरकार की लापरवाही का जीता .जागता नमूना ही था हालांकि उज्जैन -के देवास रोड और इंदौर के रेसीडेंसी एरिया के न्यू रेस्ट हाउस भी कोई बहुत अच्छी स्थिति में नही ...भुतहा से ये बंगलेजाने कब से अधिकारियों के आराम के नही अय्याशी के अड्डे बन कर रह गये हैं ...चौकीदार के जाते ही मैंने बाथरूम में जाकर सफर के कपड़े चेंज किए वहां वाश बेसिन पर एक तिड़का हुआ आइना लगा हुआ था जिस पर ट्रेपेजियम शेप की मरून-रेड तीन बिंदी डिसआर्डर में चिपकी हुई थी ,जरूरत से ज्यादा ऊंचाई पर बने वेंटिलेशन पर एक जंगली चिडिया का घोंसला था जिसे बनाने की कवायद में ढेर से तिनके टॉयलेट की शीट पर बिखरे हुए थे ..फर्श जगह-जगह से उधडी हुई थी ,कभी सफेद झक्क रही होगी टाइल्स पीली पड़ चुकी थी ..लंबे-और बड़े से रूम के बराबर उस बाथरूम के एक कोने पर एक दरवाजा स्थाई तौर पर जंग लगे ताले के साथ बंद पडा हुआ था दरवाजे के ठीक नीचे एक हरे कांच की कड़े नुमा लहरिया चूड़ी का टुकडा इन्द्रधनुष की तरह तना हुआ अटका पडा था स्मृति चक्करघिन्नी खा रही थी ...,शायद वहाँ से पीछे कोई मैदान हो, मैंने अंदाज लगया...जैसी की मेरी आदत है नई जगहों पर रूकने -ठहरने से पहले अक्सर ही में दीवारों दरारों .खिड़की यों उनके पल्लों कांचों किनारों को सरसरी तौर पर जरूर देख लेती हूँ ....ये उपरो तौर पर अपने को निडर घोषित करने जैसा होता है जो स्वतः उसको अंदरूनी डरपोक साबित कर जाता ...बाथरूम से लौटकर मैंने दरवाजा मजबूती से बंद कर लिया मेरे ख्याल से उस समय रात के ३ बज चुके थे डर की कोई बात नही थी लाईट को जलता छोड़कर में पलंग पर लेट गई कोहनी से हाथों को मोड़कर मैंने आंखों पर रख लिया रौशनी से बचने के लिए...दूसरे हाथ से सिरहाने रखे पर्स में मैंने अपने अभिमंत्रित गणेश की मूर्ति को टटोला वो सुरक्षित थी ..वो अमूमन मेरे हर सफर में साथ होती है इस भरोसे को साथ लिए की कुछ अनिष्ट नही होगा ...मुझे समझ आ गया था की अब सुबह तक नींद नही आएगी ,एक बारगी अपने साथ आए लोगों में से किसी को फ़ोन करने का मन हुआ -लेकिन तत्काल ही लगा एक तो ये ठीक नही होगा दूसरे वे अबतक सो चुके होंगे ये ख्याल कर में सुबह होने का इन्तजार करने लगी ..मैदान के दूसरी तरफ हाईवे पर लगातार ट्रकों की आवा-जाहीके साथ बाहर सूखे पत्तों की खडखडाहट की आवाज के अलावा सब ओर सूनसान था हलाँकि चौकीदार की खाट बरामदे में लगी थी ओर उसने कहा भी था की वो जाग रहा हैपर उसके खर्राटे की आवाज उस निस्तब्ध रात में भी एक होंसले कीतरह -एक सहारे की तरह ..जागते रहो की गूँज की तरह मुझे लग रही थी ....इन सारी बातों का मतलब ही यही था की मुझ पर एक अज्ञात भय हावी हो चुका था समझ नही आया की मुझे डर क्यों लगा .....जैसे-तैसे सुबह हुई सुबह की हलकी रौशनी में भी रेस्ट हाउस उतना ही उजाड़ था जितना रात के अंधेरे में बरगद के चारों ओर फर्शी लगी हुई थी ,जिसके बगल में एक हेंडपंप था आस-पास की औरतें जिस से पानी निकाल रही थी में वही ठंडी हवा में बैठीं रही ..ओर सबके उठने का इन्तजार करने लगी...ये किस्सा यू ही ख़त्म नही हुआ शाम तक सभी कार्यक्रम समाप्त होने के बाद देर रात तक हम लोग भोपाल लौट आए इसका जिक्र मैंने घर में नही किया और एक हफ्ता गुजर गया ।

एक दिन जब मुझे मंत्रालय जाना था में सम्बंधित अधिकारी का नाम डायरी में खोज रही थी तभी 'एस 'के पेज पर मेरी एक दोस्त का नाम सामने आ गया ..वो मंत्रालय में पिछले आठ सालों से पदस्थ थी मेरी उससे मुलाक़ात दो तीन माह के अन्तराल पर हो जाती थी उन दिनों एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरा वहां आना जाना लगा हुआ था मंत्रालय के काम तो अपनी गति से ही होतें हैं वहां चमत्कार की कोई गुंजाइश नही होती ...ओर में जल्दी -जल्दी उससे मिलने लगी मुझे ख़ुद नही मालुम कब कैसे वो मेरी अन्तरंग हो गई वो थोडा घरेलू किस्म की आय ऐ एस अधिकारी थी रंग गोरा बाल भूरे-कर्ली ,चेहरा आम भारतीय स्त्री की तरह गोला कार जो की हर औरत को उसकी उमर से थोडा बडा ही दर्शाता है ..थोडा पद ओर काम की गंभीरता, परिवार के प्रति निष्ठा जिम्मेदारी ने भी उसे बढाकर दिया था वो चुस्त थी फिर भी शरीर थोडा थुलथुला हो चुका था ...वो एक पारदर्शी महिला थी पर ज्यादा नफासत पसंद नही,जल्दी ही उसने एक अधिकारी का लबादा उतार फेंका ओर मेरे साथ सहज हो गई ..वो कोई भी बेढंगे रंग-प्रिंट की साड़ी पहने होती ओर मुझसे पूछती बताओ कैसी लग रही हूँ में मुस्करा देती ...फिर कई मुलाकातें लेकिन उसने आगे होकर कभी कॉल नही किया ..जब मिलती तो कहती अरे कल ही तो याद कर रही थी देखो आज तुम आ गई हो ,क्या कहूं मीटिंग्स, टूर इन सारे कामों से उऊब चुकी हूँ ...शादी कर लो बिना किसी भूमिका के मुझे कहना पड़ा ....वो मुझमे एक अच्छी दोस्त तलाश रही थी ..में उसे पसंद भी करती थी ..किंतु जैसी मेरी आदत भी है जो लोग मुझे पसंद होतें हैं में उनसे एक निश्चित दूरी बनाकर रखती हूँ उसके साथ भी वैसा ही कुछ इरादा था मेरा ...उसे इस तरह के उत्तर की उम्मीद नही थी...जिसे पसंद करती हो या जिसने तुम्हे पसंद किया हो ..वो मुस्कराई एक तत्वज्ञानी की तरह .मानो वो इसी बिन्दु का इन्तजार कर रही हो कोई पूछे ओर वो बताये.....लेकिन वो एक विधुर है ...बच्चे स्टेब्लिश है बड़ी बेटी अपोज कर रही है ...ये उसका कहना है ...इन बातों के अब कोई मायने नही वो चाहेगा तो सब कुछ हो सकता है मेरा कहना था ...लंच हो चुका था काफी ओर सेंडविच के साथ बातें आगे बढती रही कुछ था उसके अन्दर जो घुल रहा था वो बताना चाह रही थी मेरी कोई विशेष रूचि नही थी उसे सुनने में इसके पहले भी वो प्यार मर्द बच्चों रिश्तों पर गहराई से बात कर चुकी थी उसका पूरा परिवार यू पी में कहीं था ,मुझे लगा ऐसे ही कामकरते साथ उठते बैठते प्रेम व्रेम के चक्कर में पड़ गई होगी ...उसने जो नाम बताया वो उस महकमे में खासा बदनाम था ...जानती हो ? नही, में तपाक से झूट बोली, नाम जरूर सुना है ...वो दोनों अक्सर दौरे पर साथ होते काम के सिलसिले में कभी यहाँ वहां रुकना मिलना होता रहता था ..ओर भी बहुत सी बातें जो एक शादी-शुदा औरत ही कर सकती थी मुझे समझ नही आया कया कहूं ,वो बहुत तनाव में थी उस दिन ...अपने हाथ में पहनी चूड़ी को दूसरे हाथ से गोल-गोल घुमाती जारही थी ,वो बड़ी सी बिंदी भी लगाती थी ...वो दूसरी अधिकारी महिलाओं से अलग थी ...वो मेरी बैचनी को समझ रही थी मुझे घर लौटने की जल्दी थी ,उसने पहली बार कहा इस रविवार घर आओ तुम्हे अपना बगीचा दिखाना है अपनी कढाई का हुनर ..साथ ही दूसरी रुचियों के बारें में ..बात करेंगे ..उसने ड्रावर से एक छोटी डायरी निकाली उसमें अपना पता नंबर दर्ज कर दिया जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है ...वो मुझे जितना अपना समझ रही थी में नही,वो रविवार बीत गया में उससे मिलने नही जासकी जान बुझकर ...फिर तकरीबन छे माह तक कोई मुलाक़ात नही ..जब में मुंगावली गई ओर लौटी उसके सात दिन बाद मंत्रालय गई ...मुझे अपनी फाइल की प्रोग्रेस मालुम करनी थी ..सविता वहां नही थी ...उसके पी ऐ ने बताया ...शी इज नो मोर ....अपने दौरे के समय वो नींद की गोलियाँ खाकर मर चुकी थी ....जिसके लिए मेंबहुत कुछ कर सकती थी ...नही कर पाई ...मन ही मन उससे माफी मांग ली मैंने ...खिन्न मन से ...बाद में मैंने पता लगाया चौकीदार वो रूम जिसमे में रुकी थी पहले खोलने से इनकार कर चुका था ...कभी ना कभी में उस अधिकारी से जरूर मिलूंगी मेरे अलावा उस धोखे बाज, लम्पट उसके अय्याश प्रेमी को कोई नही जानता मौका मिला तो थप्पड़ भी मारूंगी ये भी जानती हूँ क़ानून कोई सहायता नही कर पायेगा सविता के पक्ष में मेरे पास ना कोई सबूत है,ना दलील लेकिन अब उसके बारें में इससे ज्यादा कुछ लिखना भी नही चाहती ..उस रात सविता की बिंदी ओर चूडियों का वो टुकडा मुझे कुछ बताने के लिए हीनियति का साथ दे कर क्या उस रेस्ट हाउस में ले गये ...आज भी याद करती हूँ तो रीढ़ की हड्डी में सिहरन सी दौड़ जाती है ,में उस रविवार मिल लेती उससे तो वो शायद कोई एसा कदम नही उठाती ..लेकिन मेरा विशवास है जीवन में हुए बहुत से अन्यायों में प्रतिकार के लिए इश्वर को नियुक्त कर देना चाहिए ...सविता को न्याय जरूर मिलेगा ...तब में उसके उस निकृष्ट प्रेमी पर एक पोस्ट जरूर लिखूंगी....
चाँद से मांद सितारों ने कहा आखिर शब् ,कौन करता है वफा अहदे वफा आखिरशब्, ....फैज

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

आवाजें स्थिति सापेक्ष हो मौन हो जाती है,नियति एक नही कई शब्द, कई अर्थ जुडाती है --भावों को ताड़ती है कुछ भारी भरकम सा दिल-दिमाग पर शायद कोई बादल या पत

यूँ कहें कि जब कुछ घट रहा होता है तो वो सच होता है ,लेकिन कितना ..उस घटने के बाद ही पता चलता है चीजें और वक्त अपनी अर्थवत्ता साबित करती हें,और कभी कभी दलीलें कारगर नही होती ...उसने कैसे -कैसे बहाने किए अपने आप से ..तब एक अलग ढंग से पसरे सन्नाटे ने धूल और उमस भरी दोपहरी में उसकी आत्म तल्लीनता को ओर गहरा कर दिया,...बीच- बची उष्मा से तिक्त आवेग आनंद के साथ कौतुहल से लबालब क्षणों में ...फिर कहीं कोई हलचल नही ,फुरसत में ,जिसमें किसी ग़लत या तंग सीवन को उधेड़ना और उसी कवायद में किनारों का कुछ और फटना -छितरा जाना बस ऐसे कि दुबारा जोड़ने कि गुंजाइश ही ना रहे...
दर्ष्टि बाहर नही भीतर देखती है ..वही सब कुछ- वही दुहराव वही द्रश्य ऊपर से ढलान की और जहाँ धूप के साथ बारिश भी मौजूद होती है ..वो द्रश्य-समय थोडा हतप्रभ करता है ,चिडियांये बेखौफ पंख फड फडआती हुई नहाती हैं ,ना जान सको ऐसी खुशी में मौसम में बदलाव की महक महसूस होती है...कपास के कच्चे पीले फूलों से निकली अनन्य स्निग्ध रूई के गोलों को हवाओं में गूंथना और एक गोला बनाकर नील आकाश के माथे पर पोंछ देना ..मानो कोई स्लेट साफ की हो ,उसे तसल्ली मिलती,आकाश की नमी उसकी अँगुलियों को थाम लेती ,पेडों की नुकीली लम्बी टहनियों की बारीक पत्तियों की हरियल प्रतिध्वनियाँ वहां होती रहती...है जिन्हें सुना तो जा सकता था लेकिन रोका नही,सूने- चौडे आकाश में कोई कपाट नही था .कुछ रिस रहा था अन्दर ही अन्दर ...साथ ही भराव के संसाधन भी मौजूद थे वक्त न्युसप्रीन की तरह छिडकाव करता है ..सब कुछ ठीक हो जायेगा, लेकिन कब तक नही मालूम, निश्चित नही ....दुखों की वैतरणी में धक्का देकर गिराने वाला ही किनारे खडा रहकर प्रार्थना करता है ...ऐसा भी होता है ,उसे मुस्कराना चाहिए-या- नही आवाजें भीतर कुछ टटोलती है.उलाहना भी देती है ..हमने तो कहा था ? कब कहा ,तुम इश्वर नही ..यूँ माफ कर देना भी तो आसान नही ...था आवाजें स्थिति सापेक्ष हो मौन हो जाती है,नियति एक नही कई शब्द, कई अर्थ जुडाती है --भावों को ताड़ती है कुछ भारी भरकम सा दिल-दिमाग पर शायद कोई बादल या पत्थर ----उसके बाएँ हाथों में तीव्र असहनीय दर्द क्रेपबेंडेज, पेन किलर ..कोई फायदा नही वेलियम टेन एम् जी के बाद नींद बेअसर -दर्द बेशर्मी के हद से बाहर हो जाता है वो धीरे से कोहनी को मोड़कर आंखों पर रख आहिस्ता से लेटना चाहती है ..कमरे की हलकी रौशनी -भारी भरकम कत्थई परदों की दरारों से शाम के जाते चटक उजाले के साथ मिल जाती है ...अब इस रंग का कुछ नाम नही हो सकता एक ही वृत में उसे बुलाना ,उसे भुलाना,सब कुछ नाकाम हो जाता है .इतनी बैचेनी वो कमरे के भीतर मिश्रित रंग को अलग करना चाहती है..खिड़की से परदों को सरका देती ही ....शीशे में अपना चेहरा देखती है और देखते-देखते आईने वाला चेहरा सजीव चेहरे को सोख लेता है जो चेहरा नही मन की बात जानता है कोई पीठ थपथपा कर आश्वस्त करता है ...सांवली ही तो हो तुम्हारे जैसा मन भी भी किसी को मिलता है ..सच मन ना भये दस बीस ..अब ये सच भी आईने के पास है ..शाम गहराने से पहले आधा घंटा टहल कर लौटना है,वो खूबसूरत धाकाई जामदानी के पल्लू को कमर के गिर्द लपेटती गर्दन तक ले आती है .कंधे से थोडा ऊपर तक दायीं तरफ नन्हा तिल ..पहले तो नही था उसे आश्चर्य होता है ..इसकी उपस्थिति आत्मा की गंध पहचानती है जैसे उस समय पर गेरू पुते स्वास्तिक सी इकछाओं का आलोप हो जाना किसी के बिछुड़ने पर किया जाने वाला सवाल -लेकिन ना कोई सवाल था ना कोई जवाब मिला प्रेम सौन्दर्य और आस्था के चरम के साथ जिए सच को अस्वीकार कर जीना क्या इतना आसान है...फिर भी एक निर्गुणी भाव अनायास पनप उठता है ...उसके लिय मन में एक करूणा उपजती है...कोई दोषी हो तो माफ किया जाय ...निशब्द भीड़ को ठेलते ...पहाड़ से ऊँचे ,दरख्तों से हरे,शाम से गहरे ,आकाश से नीले, धरती से असीम वक्त को चलते हुए देखती हूँ ..सिर्फ उसकी तरफ जाते हुए ..जहाँ आकर्षण -विकर्षण वासना- कामना बे मायने हें
जज्ब कर लिए हें मैंने अपने भीतर,अपने आंसू और मुझे मालूम नही ,मैं तेरा हूँ रेतीले विस्तार में और मुझे मालूम नही ,तुम्हे भुलाने की कोशिश में इन दिनों,में लगभग भूल ही गया हूँ तुमको ,और मुझे मालूम नही ....स्व.हरीन्द्र दवे की ये कविता ...अपनी डायरी से

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

पिता...तुम हो आस-पास हमारे....


पिता...तुम हो हमारे आस-पास
महाबोधि वृक्ष थे तुम
जिसकी छाया में पनपी ये साधारण काया
हमारी हथेलियों की रेखाओं में बसी है ,
तुम्हारी कर्मठ ऊर्जा की गर्माहट,
महकता है तुम्हारा चेहरा अब भी
केया गंध सा हमारे बचपन की सौंधी शरारतों में
मीठी मुस्कराहटों में..अनगिन सच-झूट में
ताउम्र उगते रहे जो सूरज तुम्हारी आंखों में
हमें रौशनी देने की खातिर,रौशनी के उस मुकाम में
हमारी छोटी उपलब्धियों पर चकित होने वाले ,
तुम्हारे वैभव शाली लाड-दुलार में,डांट-फटकार,निषेध आज्ञाओं में ,
सख्ती-नरमी और तुम्हारे निश्चल प्रेम की सौगातों में ,
कठिन लक्ष्यों के प्रति ,धैर्य से साधे गए संधानो की सीख में ,
पिता शब्द की सनातन अनगूंज में,
शिराओं में घुले रक्त के प्रवाह में ,
स्तब्ध सन्नाटे के खिलाफ बन आवाज में
कठिनाई में सचेत हो दौड़ पड़ने वाले आत्मबल में,
हमारी अबोध चाहतों के विस्तार में
बचपन से युवा होते समय के अनंत में ,
तुम्हारे पसंदीदा महकते चम्पा के फूलों में ,
माँ के प्रति सदैव तुम्हारी अछूती ताजगी भरी धडकनों में
हमारे बच्चों और उनकी संतानोकी किलकारियों और पवित्र स्पर्शों में ,
आगत उत्सवों के नाद में,और रक्त से रक्त संबंधों के बनते पर्व में,
अप्रत्याशित बिछोह के दुःख में ,शिव की शक्ति में,
इस ब्रह्मांड-जड़ चेतन में चिरंतन दर्ज तुम्हारी उपस्थितियों में,
तुम्हारे लिए फिर भी बहुत कुछ ना कर पाने के स्वीकार में ,
हमारी अगाध,असीम ,अनंत भावनाओं के अभिमंत्रित अर्ध्य में ,
अंजुरी से बहते जल में ,गति शील कर्तव्यों की सक्रियता में ,
हमारी भूलों और तुम्हारी भोली क्षमा में ,
निशेष सपनो,हँसी आंसुओं,के साथ उस रिश्ते में ,
जो मिटटी ,पानी, आकाश, हवा और आग संग गुंथा है ,
वही तुम्हारे होते रहने की मूर्तता है ..तुम हो आस-पास हमारे .....
पिता की एक उजली छवि अब तक मन में है....जिन्होंने ना कभी डांटा,ना कान उमेठे..बिना कहे हमारी मुश्किलों को समझने वाले.....कहते थे जमीन पर पड़ी कोई चीज कभी नही उठाना...सितारें तोड़ने का होंसला हमेशा दिल में बनाय रखना...

मंगलवार, 31 मार्च 2009

यूँ किसी को हाथ पकड़ कर इस दुनिया के कबाड़ से अलग किसी ऊंचाई पर बैठा देना.....और एक मुकम्मल सच में बासी होते दिन... उससे ना पूछिए...

क्या अपने तर्कों से दूसरो के दुखों की शिनाख्त की जा सकती है नए होने के लिए प्रतिपल मरना जरूरी था .और अपने दुःख को रूक कर देखना भी इसलिए अनिवार्य हो गया ..तर्क के नियमों का अतिक्रमण किए बगैर ,औरकुछ ऐसा जानना -खोजना भीतर से बाहर की तरफ जो उसके सुख का कारण होता अपनी सामर्थ्य पर उसे भरोसा था ,ये एक तर्क ही था अपने आप से....आखी र नए मौसमों की खुमारी भी तो उतरती ,वो खुश थी या नही ये ठीक से जान पाना मुश्किल था ,लम्बी यात्राओं पर जाने और लौटने के बाद ताजगी के साथ शामिल दुखों का नए सिरे से खुल जाना ....सावधान आगे खतरनाक मोड़ है.के हर आधा किलोमीटर की दूरी पर लिखे बोर्ड को पढ़ते-डरते पोर्ट पर पहुँच ही गई ...मौसम की खराबी की वजह से फ्लाईट चार घंटे लेट थी ...मुश्किल यही की पिछली मुश्किलों और स्म्रतियों मैं जाने का मतलब ...आसान नही था बाद मैं लौटना .....कई दिनों तक दुनिया दारी के बीच इंटेंसिव केयर से उबर पाया मन ,तब घर के पेड़ पौधों के पत्तों पर खिली धुप मैं धूल की पर्त थी बोनसाई की जड़ें हद से बाहर जारही थी ,छंटाई की जरूरत थी ,नए सिरे से घर की सफाई की भी, -किताबों को करीने से रखना विषय नुसार रखना, टेग लगाना,चलता रहा फिश टैंक में मछलियां लगातार मर रही थी हर दिन एक मरी मछली को किसी पेड़ की जड़ में रखना और उनकी चमकीली देह को चींटियों को खाते हुए देखना बर्दाश्त के बाहर हो चला था ,एक पसंदीदा ब्लेक फिश बची थी ...जल्द ही और रंगीन मछलियाँ खरीदना तय था ,वार्ड रौब मैं सब कुछ उलट-पुलट था काटन -सिल्क साडियां बेतरतीब तरीके से मिक्स हो चुकी थी उन्हें छांटना ड्राई क्लीन को देना -किचिन मैं इकठ्ठा हुए डिब्बे बोतलें, जार, रद्दी को फेकना ,परदों को बदलना सब कुछ चलता रहा ....उसके बाद कुछ दिन सूकून रहा ग्रीन टी वाली खुशबु ...से दिल दिमाग तरोताजा रहा ,लेकिन एक स्थाई अंतरा मन में खुश मिजाज होने का ढोंग रचता रहा ....ये भी जल्दी ही समझ आ गया, सर्दियों के दिनों में ढेरों मौलश्री के फूल बटोरना फिर उन्हें हथेलियों में भर जोरों से साँस लेना ...छोटे और तेज खुशबू वाले मौलश्री एक अज्ञात खुशी में भीग जाने वाले अहसास को लिए होते थे,एक नर्म आहट ,चाशनी जल में भीगती आवाजें ..तो क्या सब कुछ झूट था वो मैत्री वात्सल्य ,वो यूँ किसीका हाथ पकड़ कर इस दुनिया के कबाड़ से अलग -थलग किसी ऊंचाई पर बैठा देना ...कुछ गुमने-पाने का अहसास स्थिर हो जाए ....ऊंचाई से उसका डर ही शायद उसे किसी गहरी खाई मैं फ़ेंक गया, शिलोंग की सबसे ऊँची पहाडी से नीचे अतल में अपने को देखना जिन्दगी खुश है आग से भरी नदी को पार कर लेना बिना झुलसे ...और फिर ठेल दिया जाना की देखें फिर झुलसती हो या नही वो आँखे बंद कर लेती है ...होल्ड मी टाईट...उसी गर्माहट में ..देखते -देखते चटख -पलाश खिलने का मौसम आपहुंचा .धीरे-धीरे पलाश भी मुरझा गए --रंग उड़ गया उनका तेज धूप में, पेड़ों के नीचेबिखर कर, मौसम की क्रूरता बे आवाज़ ...एक्सक्लूसिव होकर रह गई.....उसने एक लय ईजाद कर कर ली थी इस बीच ,एक चक्कर घिन्नी में इक्च्छा,इर्द-गिर्द सपनों के, जिनका कोई सिरा नही था ,और सारी गड्ड-मड्ड यहीं से शुरू होती थी ,अपने को लानत भेजने के अलावा कोई चारा नही बचता ..एक मुकम्मल सच में बासी होते दिन, फिर भी उन दिनों की ताजगी में लौटना -मायूस होना जरूरी हो जाता उससे शिकायत थी, लंबे अरसे से ख़त ना लिखने की -यूँ ख़त तो उसने कभी लिखा भी नही जो कहा वो ही बस ख़त की शक्ल में अमिट-अक्षय था ..सीने में, करिश्मे के इन्तजार में उम्र का बीतना इलियट की कोफी के चमच्चों के साथ वो सोचती रह गई जो झूट था.. सामने था, सच था तिलस्मी ...घर दूर बहुत पीछे छूट गया ,बातें टल गई,ख़त्म नही हुई ...उसकी हथेलियों में सौ प्रतिशत सन्यासी हो जाने के चांस थे...जब पूछा तो यही कहा सच कोई हाथ-वाथ देखना नही आता ,अंक ज्योतिष पर तो भरोसा है लेकिन लकीरों का फरेब....एक हँसी ...आंखों मैं मुक्ति की पीडा के साथ छटपटाहट ,रुलाई ना फूटे और रोना आए तो... साथ चलते ना कोई काँटा गडा ना तो..कोई तिनका आँख तले अडा..ना कोई चोट लगी ना ठोकर ..हर चीज को शब्द दे देने में माहिर जल में घुलते हुए शब्द ...डूबते हुए ,उससे ना पूछिये अपने साहिल की दूरियां ....बुद्ध के शब्द... एक साँस ,एक शब्द ,एक वाक्य ,के बाद हम वो नही हो सकते जो उसके पहले थे,हर क्षण अलग....कोई हाथ हिला कर बिदा देता है...खीचकर माथा चूम लेता है आंखों की नमी माथे पर देर तक ठंडक देती ,असुआई आंखों से पीछे, सब कुछ धुंधला जाता है ..उसकी फलाईट का नंबर अनाउंस होता है... ।
कैसे-कैसे मरहले सर तेरी खातिर से किए ,कैसे-कैसे लोग तेरे नाम पर अच्छे लगे...शैदा रोमानी .चित्र एलिफेंट फाल्स ..शिलोंग,