
मंगलवार, 4 अगस्त 2009
//कच्चे कचनार के नीचे खड़े भाई खूब याद आते हैं... उस छोटी दुनिया में बड़ी खुशियाँ हासिल थी जहाँ हमे..//

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009
कुछ चीजों के साथ समय का फेरा था /औरइतिहास के जीवाश्म मैं परिवर्तित होने से /बचा हुआ समय ही है-/ और था /हमारे पास

शनिवार, 11 जुलाई 2009
'प्रेम एक ऐसा दृढ़ निश्चय है ,जो हमारी आत्मा के साथ रहता है और जो वतमान को अतीत तथा भावी युगों से जोड़ता है ,
अभी कल ही मैं मन्दिर के द्वार पर खडा था और पास से जाने वाले सभी व्यक्तियों से प्रेम के रहस्यों और लाभों के बारे मैं पूछ रहा था ....एक अधेड़ आयु का व्यक्ति जिसकी शक्ति क्षीण हो चली थी और त्योरियां चढी हुई थी वो कहने लगा ....प्रेम एक जन्म जात दुर्बलता है,जिसे हमने आदि पुरूष से उतराधिकार मैं प्राप्त किया है ...फिर एक नवयुवक जिसका शरीर और भुजाएं सुद्रढ़ थी उसने कहा ...''प्रेम एक ऐसा दृढ़ निश्चय है ,जो हमारी आत्मा के साथ रहता है और जो वर्तमान को अतीत तथा भावी युगों से जोड़ता है ,...उसके बाद एक शौकातुर स्त्री गुजरी वो बोली प्रेम एक घातक विष है जिसे पाताल वासी भुजधर सारे लोक मैं फैलातें हें आत्मा उसके प्रभाव मैं नशे से मस्त हो बाद मैं नष्ट हो जाती है ,..एक गुलाबी चेहरे वाली सुंदर लड़की का कहना था कि.....प्रेम एक अमृत है जिसे प्रभात कि वधुएँ बलवान पुरुषों के लिए बरसाती है जिससे वे समस्त आनंद का भोग कर सकें फिर एक काले वस्त्रों मैं लम्बी दाढी वाले व्यक्ति ने कहा कि ....प्रेम एक मुर्खता है जो जवानी के प्रभात के साथ प्रगट होती है और संध्या बेला मैं विदा हो जाती है ,....उसके बाद एक तेजपूर्ण चेहरे वाले आदमी ने शांत और प्रसन्न मुख से कहा प्रेम एक दैवी ग्यान है जो हमारे अन्तरंग और बाहर कि आंखों को प्रकाश प्रदान करता है जिस से हम समस्त वस्तुओं को देवताओं के समान देखने लागतें हैं ,...बाद मैं एक अंधे आदमी ने रोते हुए कहा प्रेम एक गहरी धुंद है जो आत्मा को ढंक देती है जिसमे आदमी अपनी इक्छाओं की प्रति छाया मैं अपनी ही आवाज की प्रति ध्वनी सुनता रहता है फिर एक नवयुवक वीणा बजाते हुए आया और बोला प्रेम एक स्वर्गिक ज्योति है जो सूक्ष्म ग्राही आत्मा की तरंग से चमक कर अपने आस-पास की समस्त वस्तुओं को प्रकाशमान कर देती है ,...फिर एक बूढे ने कहा प्रेम एक दुखी शरीर की विश्रांति है ,जो उसे कब्र मैं प्राप्त होती है फिर पाँच वर्ष का एक बालक दौड़ते हुए आया और उसने कहा ..प्रेम मेरा बाप है प्रेम मेरे माँ-बाप के सिवा कोई नही जानता कि प्रेम क्या है ...
और जब शाम हो चली सभी प्रेम के विषय मैं अपने विचार प्रगट कर चुके ..सन्नाटा होगया तब मैंने मन्दिर मैं एक आवाज सुनी ..जीवन दो चीजों का नाम है -एक जमी हुई नदी और दूसरी धधकती हुई ज्वाला .और धधकती हुई ज्वाला ही प्रेम है ...और मैंने घुटने टेक इश्वर से मन से प्रार्थना की,हे प्रभु मुझे इस धधकती हुई ज्वाला का भोग बना दे और इस पवित्र अग्नि की आहुति बना......
.मैं तुम्हे जिस भी कोण से देखता हूँ ,हर कोण द्रष्टि कोण बन जाता है ...शिव मंगल सिंह सुमन
शुक्रवार, 26 जून 2009
//वक्त के पार -अव्यक्त .उस वक्त की तरह
एक बहुत उंचा-नीचा
उबड़-खाबड़,कंटीला-पथरीला
,पहाड़ गढा मेरे लिए
और कहा -जा रहो और
करो इन्तजार ताउम्र
ये आजमाने की कोशिश थी ,या
दूर बहुत दूर रहने की कवायद
नही जान पाई ...फिर एक पुल बुना मैंने ,
अपनी संवेदनाओं के छोटे बहुत छोटे टुकड़े जोड़कर,
ढलान से थोडा ऊपर ,
चट्टानी गहरी खाई के ठीक ऊपर ,
बना पुल तुम्हारे लिए था ...
जहाँ खुला आसमान था ,
और थी जंगली वन्स्पतियों की खुशबू
और एक अनगूंज ...लगातार,
तुम्हे अपना कह सकने के पहले और बाद में,
कोई नाम जैसे ....निर्विकार -नीलाभ
सूर्य ..संदल..शुभम ..या सनातन ,
आदि गौत्र सा बजता है आधी रात शिराओं में ..
.मन है की उदासी नही छोड़ता,
ना जोड़ता है ,ना जुड़ता है,कहीं ओर,
क्या कोई आंसू इस लिखे पर गिरे
ओर कोई शब्द ..वक्त की तरह
धुंदला जाए तभी यकीन करोगे.?
जबकि में
वक्त के पार -अव्यक्त .उस वक्त की तरह
इस समय के साथ
गुमशुदा देहरियाँ ..तलाशती ...
इस बारिशी मौसम के शोर में भी सुन सकती हूँ तुम्हे ,
शुक्रिया दोस्त ,
जिसकी चौखट पर हाथों से पकड़े गए ,संग सितारे ,
ओर आंखों से समेटे गये ..उजाले,
हथेलियों पर स्पर्शों में ..अब भी दर्ज है ,
जब हमारी असंभव इक्षाओं का सम्भव भविष्य लिखा गया
बेमानी सा ....
बाकी सब जो झूट है ....अपनी नई-पुरानी कविताओं के संग्रह से
मंगलवार, 23 जून 2009
//बलात्कार एक स्त्री का अवमूल्यन है,उसके मौलिक अधिकारों का उलंघन,न्यायविदों के हाथ मैं सिर्फ कलम है, कोई मिसाल, नही कोई मशाल नही जिसे बतौर पथ प्रदर्शक

दरअसल बलात्कार को कानूनन गंभीर अपराध की श्रेणी मैं रखा गया है इंडियन पेनल कोड की धारा ४९८ ऐ मैं औरतों पर हो रहे उत्पीडन को रोकने मैं ये सहायक है ...इसमें अभियुक्त को जमानत पर छोड़ने का प्रावधान भी नही है ,इस सन्दर्भ मैं न्याय मूर्ति कृष्णन अय्यर के एक एतिहासिक फैसले मैं कहा गया था की बलात्कार की शिकार महिला का बयान अभियुक्त को सजा देने के लिए काफी होगा ...लेकिन मासूम -नाबालिग़ लड़कियों के मामलें मैं ये कैसे सम्भव होगा इस बारे मैं कुछ नही कहा गया .राष्ट्रीय रिकार्ड ब्यूरो के १९९० के अनुसार १९९६ तक ८६.७९१ब्लात्कार हुए जिनमे नाबालिग़ लड़कियों -१० वर्ष से कम उमर का प्रतिशत २० हजार ११४.[२३.३] प्रतिशत था और १० से १६ वर्ष की किशोरियों के साथ .४८.९१८[५६.७] प्रतिशत औए १६ से ३० वर्ष की महिलाओं के साथ १२५११[१४.५]प्रतिशत रहा ...,इसमें भी ३० तक की आयु की महिलाएं सर्वाधिक बलात्कार की शिकार हुई ,जबकि ८० प्रतिशत मामले मैं बच्चियों की उम्र १० वर्ष से कम हें एक अनुमान तो ये भी है की बच्चों के साथ किए गये १०० से अधिक यौन कुकर्म मैं से एकाध की ही सूचना या रिपोर्ट मिलती है और जो भी जानकारी सामने आती है वो दिलदहला देने के लिए काफी है अपराध रिकार्ड ब्यूरो भी आख़िर थानों न्यायलयों, एजेंसियों के आधार पर ही तो अपराध का डेटाऔर प्रतिशत निकालता है । सपना सा लगता है क्या हम आजाद देश मैं हैं ,और क्या येवही देश है जहाँ भगत सुखदेव,राजदेव जैसे क्रान्ति कारियों ने अपना बलिदान कर हमें आजाद कराया और उस आजादी का एसा हश्र ?असल मैं हम आत्मा और मन से इतने असुरक्षित और नपुंसक हो गये हैं की दूसरो के लिए कुछ करना ही नही चाहते ...हमने अपनी मान मर्यादा दूसरो के दुःख मैं दुखी होने वाले सहज गुणों को इतने ऊपर ताक पर रख दिया है कि वो अब हमारी अपनी ही पहुँच से दूर हो गएँ है ....ऐसे मैं ,एड्स अवेयरनेस प्रोग्राम, लिंग भेद समानता जैसे नारों-वादों घोषणाओं का कोई अर्थ नही रह जाता जब तक की हम उन तमाम ताकतों को चुनौती नही दे देते जिनकी वजह से औरतों की हैसियत कमतर होती है और उनकी मान-मर्यादा को ठेस लगती है ....यूँ संवेदन हीन होकर लिखने सोचने या कार्य की परिणिति तक पहुँचने से तात्कालिक लाभ चाहे हो जाए, लेकिन दूरगामी परिणाम शून्य होंगे ---और आजाद भारत मैं औरतों के जीवन यूँ ही स्याह अंधेरों मैं तब्दील होते रहेंगे ,---हमारी न्याय व्यवस्था लचर है ..क़ानून अंधा...न्यायविदों के हाथ मैं सिर्फ कलम है ....कोई मिसाल ऐसी नही ,...कोई मशाल ऐसी नही जिसे पथ प्रदर्शक बतौर [रिफरेन्स ]बताया जा सके ....हमारे देखने सोचने ,महसूस करने और फिर लिखने से कितना फर्क पड़ता है.समाज के प्रति विशेष कर औरतों के लिए हमारी नैतिक जिममेदारी की दावेदारी अन्तत ऐसे हादसों के बाद खोखली हो कर रह जाती है ।
किसी स्त्री को सतीत्व भंग की क्षति के साथ जिस गहन भावनात्मक दुःख भय मानसिक दवाब को जीवन पर्यंत तक सहना पड़ता होगा क्या पुलिस ,प्रशासन और अपराधी या सामान्यजन इसे समझ सकतें हैं ...ऐ आई आर १९८० सुप्रीम कोर्ट ५५९ ने कहा भी की स्त्री के लिए बलात्कार म्रत्यु जनक शर्म है ,और जब पीडिता न्याय के लिए गुहार लगाती है तो न्याय[परिणाम]भी उसके हक मैं अक्सर नही आते ---होता तो यही है की अक्सर समाज और परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए बलात्कार के मामले दबा दिए जाते हें चाहे न्याय व्यवस्था कितनीही कड़ी और सच्ची क्यों ना हो ,और बलात्कार होने से अधिक बलात्कार होने का अहसास, कोर्ट मैं विरोधी वकीलों का सामना उनके सवालों के जवाब अन्तत एक बलत्कृत महिला का मनोबल गिरा देतें हैं। १९८३ मैं हुए संशोधनों के बावजूद बलात्कार के संदर्भ मैं किय गये संशोधनों के अनुसार धारा ११४[ऐ ]की उपधारा ऐ बी सी डी औए जी के अंतर्गत बलात्कार के मामले में यदि महिला अदालत मैं ये कहती की उसकी सहमती नही थी तो अदालत को यह मानना पडेगा,लेकिन ये प्रावधान सिर्फ पुलिस,सार्वजनिक सेवा, मैं रत व्यक्ति जेल प्रबंधक डॉ द्वारा बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या महिला के गर्भवती होने की स्थिति मैं हो तो प्रभावी माना जाएगा मगर इस हालत मैं भी मर्जी या सहमती के आधार पर अपराधी के बच निकलने के रास्ते मौजूद है।
बलात्कार एक सर्वाधिक घृणास्पद कार्य है--बलात्कार वास्तव मैं एक स्त्री का अवमूल्यन है इन मामलों मैं वैसे तो दिनाक २८ जनवरी २००० मैं सुप्रीम कोर्ट ने एक एतिहासिक निर्णय मैं कहा था की किसी भी स्त्री के साथ बलात्कार ,उसके मौलिक अधिकारों का उलंघन है,सरकारी कर्मचारियों द्वारा कए गए दुष्कर्म के लिए केन्द्र सरकार को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है विशेषकर हर्जाना अदा करने के लिए .भारतीय सविंधान के अनुछेद २१ के अंतर्गत भारतीय ही नही विदेशी नागरिकों को भी जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है ...अपराध ब्यूरो द्वारा प्राप्त आंकडों की सच्चाई पर भरोसा करना ही पड़ता है यौन हिंसा का आंकडा एक आइना है जिसमें हम औरतों की मुश्किलों को गहराई से देख सकते हैं....
फिर भी महिलाओं की अस्मिता उनके सुख चैन को छीनने वाली ताकतों के खिलाफ देश ही नही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला संगठनों ने अहम् भूमिका निभाई है ,तेजी से बढ़ते सामाजिक सरोकारों अंतर्विरोधों के कारण गरीब-अमीरशिक्षित -अशिक्षित ,ग्रामीण-शहरी,महिलाओं ने अपनी अस्मिता-अस्तित्व और अधिकार की लड़ाई लड़ी है और सफल भी हुई है,अंतत संयुक्त राष्ट्र संघ को ७० का दशक अंतर्राष्ट्रीय महिला दशक के रूप मैं मनाना पढा था ,इसी के बाद महिला आन्दोलन जोर पकड़ते गये कहीं यौन हिंसा मुद्दा बनकर उभरा कही भ्रूण हत्या का विरोध हुआ कही दहेज़ प्रथा जैसी समस्या के लिए मोर्चा बंदी हुई कहीं कामगार की लड़ाई, कहीं स्त्री बिरादरी ने शराब बंद मुहीम छेडी... लेकिन वो बलात्कार के मामलों पर विवश हो कर रह गई है ....दरअसल बलात्कार जैसे अपराध की व्यापकता और उसकी भरपाई क्या इतनी ही है की पीडिता को पुनर्वास और हर्जाना मिले उसके छोभ ,ग्लानी ,उसकी मानसिक स्थिति और उसे तवरित न्याय मिले इसके लिए ---कुछ अन्य मुद्दे भी तय होने चाहिए ,लेकिन सबसे बड़ा सवाल बेमानी होकर रह जाता है की असुरक्षा का जो ये वातावरण है जिसमे औरत जी रहीहै ...उसे कैसे ख़तम किया जाय और वे कारक तत्व जो औरत के सम्मान को नीचा करते हें, जिनसे अपराध को बढावा मिलता है उन पर कैसे काबू पाया जाय .......
...इस लेख के लिए संदर्भ पुस्तक न्याय क्षेत्रे -अन्याय क्षेत्रे ...लेख अरविन्द जैन,एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट,मेरे प्रिय लेखक ..स्त्री के हक मैं उनकी -पुस्तक औरत होने की सजा -एक बेबाक पुस्तक है जिसे उन्होंने लिखा ही नही, महसूस भी किया है ....
रविवार, 14 जून 2009
इच्छाएं, सेकेण्ड की सुई की तरह अन्दर ही अन्दर एक ही वृत में गोल घूमती है... समुद्र किनारे फ़िर जंगल एक नए सिरे से जलता है, पीछे काली ज़मीन छोड़ता...
बुधवार, 20 मई 2009
एक चौकन्नी चिडिया की तरह मन आसन्न खतरे को भांप लेता है ओर एक खीज भरे रास्ते से गुजर जाता है... क्या मांगू उससे वो सब कुछ दे सकता है.
वो जितना आगे बढ़ी थी ,उतना ही पीछे लौटना था ..उस मुकाम से जहाँ वो थी आदेश पहले था और नियति बाद मैं ..गिने चुने क़दमों के साथ बिल्कुल आगे देखते हुए ..लौटना पीछे की ओर नियत दूरी को पैरों से साधते हुए .बचपन मैं ये खेल भाई-बहन दोस्तों के साथ खेलते हुए वो हर दम हार जाती आगे बढ़ना तो ठीक था लेकिन लौटना क्या इतना आसन था,एक बार जीत की आशा औरजोश मैं वो पाँच छह कदम पीछे लौटी और चकरा -कर गिर गई ..मामूली चोटें आई भाई ने डांटा आँखे क्यों मूँद लेती हो ..बस यही गलती है ..बाद मैं उसने गौर किया खुली आंखों चीजें देखने महसूस करने से उसे मुश्किल होती सुख-दुःख दोनों मैं सामान्यत वो खेल फिर ता- बचपन उसके लिए मुश्किल ही बना रहा जिसमें वो फिर कभी शामिल ना हो सकी बुद्धि सुलगती है,और सारे जतन हत बुद्धि होकर बैठ जाते हैं ऐसे मौकों पर अपने को निरीह लगना-सोचना भी तो ठीक नही था कुछ नया था जो जिन्दगी मैं घट रहा था ,कुछ भुला कर -कुछ ओर याद रखना अपने मैं समेटे रहना -अतल मैं उमड़ता -घुमड़ता चंदन जल सुगंधी ..फिर भी रंग-बिरंगे मोतियों की माला टूटती है धागा गलता जाता है बिखरे मोती हाथ नही आते ओर एक चौकन्नी चिडिया की तरह मन आसन्न खतरे को भांप लेता है ओर एक खीज भरे रास्ते से गुजर जाता है पुराना सम्मोहन आत्मा को जकड़ता है एक घबराहट मैं मुंदी आंखों पीछे लौटना जरूरी हो जाता है ... क्या मांगू उससे वो सब कुछ दे सकता है ..फिर भी मेरे लेने की सीमाएं हैं ओर उसका गुमान असीम उसकी अनिश्चितता एकदम से उसे हमसफर-ओर अजनबी बना जाती, एक चाबुक सा दिमाग को थरथराता है वो समेटना चाहती है ..सब कुछ बिखरा हुआ .गली गलियारों से लौटते ताजगी-खुशबू भरे दिन एक-एक शब्द सेमल के फूलों की तरह सुर्ख-सुंदर दिल-दिमाग पर टंगते जातें हैं समुद्र की लहरें उसे तेजी से भिगोतीं हैं अपनी ही देह मैं दुःख की आद्रता उसके शब्द सुनते बेआवाज ..वो बस सोच ही तो सकती है क्या वो दोस्ती किसी चुक गए रिश्ते की असफलता की भरपाई थी या कुछ ओर ,या ये, या वो, बस-बस बहस ना करने का इरादा टोकता है .पिघला हुआ सब कुछ पहले सा आकार ना ले पायें लेकिन पहले से बेहतर तो हो ही सकता है बिना कष्ट के लौटना उन रास्तों पर जिन्हें विश्वास के साथ अपनाया था जिसे एक ईमान दारी ओर सम्मान के साथ पाया जा सके बस यही तो इक्छा थी लेकिन उमीदों का बदरंग होना बचे-खुचे रंगों का अन्दर से झांकना -निरर्थक -अर्थों मैं कुछ खोजने जैसा ..जो की एक तरफा बेवकूफी भरी खोज थी बीच उनके ..एक ऐसे सच की तरह जिसके आगे सब कुछ झूटा ओर बौना हो गया था .बस मन के पीछे मन को धकेल कर बैठा जा सकता था ..जो हो ना सका, अँधेरा गाढा था -इधर ओर उसकी गिरफ्त मैं इक्छाओं का कतारबध्ध होकर रह जाना ...कोई चाहता तो हाथ खींच कर रौशनी मैं शामिल कर सकता था अपनी रौशनी मैं ..आसमान अब भी खुला था समुद्र नीला ओर धरती हरी ...पर स्म्रतियों का विसर्जन कर देने पर जिन्दगी राजी खुशी बीत जायेगी क्या ...किसी के हिस्से के दुःख.अपने हिस्से के सुख स्थांतरण कर दिए जाएँ तब भी क्या ...निष्ठा भी क्या लौटाने की चीज है ...जोड़ी घटाई गई इक्छायें ..अपना ही पोस्ट मार्टेम ओर कुछ हांसिल ना होना अपने को मरते -जीते देखना ..आधे चाँद का साक्षी होना ..किसी बियाँबान से गुजर कर हजारों बार पूरी रात का असुविधा जनक सफर ...एक सिरे से शुरूआत अंत के पहले बीच मैं अंत. एक आद्रता मन मैं फैलती है आंखों की कोरों मैं उलझ जाती है चांदी सा झिलमिलाता कोई आंसुओं मैं घुलता जाता है गलती कहाँ हुई ...मुश्किलें शब्दों से हल हो जाएँ जरूरी तो नही .... शनिवार, 9 मई 2009
// लाल कृष्ण आडवाणी के सितारें गर्दिश मैं...हार की संभावना ..सुनिश्चित
मंगलवार, 28 अप्रैल 2009
कुछ आहटें बाहर है ,कुछ दस्तकें भीतर,समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मेंअपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं ....,
और छूट रहा है ,आकाश मैं ,
थोडा सा झांकते हुए ,चट्टानों से,
बुधवार, 22 अप्रैल 2009
मेरे पास ना कोई सबूत है,ना दलील मैं सिर्फ उसकी कहानी छाप सकती हूँ ...चार कहार मिले डोलिया उठाय -अपना बेगाना छूटो ही जाय .
एक दिन जब मुझे मंत्रालय जाना था में सम्बंधित अधिकारी का नाम डायरी में खोज रही थी तभी 'एस 'के पेज पर मेरी एक दोस्त का नाम सामने आ गया ..वो मंत्रालय में पिछले आठ सालों से पदस्थ थी मेरी उससे मुलाक़ात दो तीन माह के अन्तराल पर हो जाती थी उन दिनों एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरा वहां आना जाना लगा हुआ था मंत्रालय के काम तो अपनी गति से ही होतें हैं वहां चमत्कार की कोई गुंजाइश नही होती ...ओर में जल्दी -जल्दी उससे मिलने लगी मुझे ख़ुद नही मालुम कब कैसे वो मेरी अन्तरंग हो गई वो थोडा घरेलू किस्म की आय ऐ एस अधिकारी थी रंग गोरा बाल भूरे-कर्ली ,चेहरा आम भारतीय स्त्री की तरह गोला कार जो की हर औरत को उसकी उमर से थोडा बडा ही दर्शाता है ..थोडा पद ओर काम की गंभीरता, परिवार के प्रति निष्ठा जिम्मेदारी ने भी उसे बढाकर दिया था वो चुस्त थी फिर भी शरीर थोडा थुलथुला हो चुका था ...वो एक पारदर्शी महिला थी पर ज्यादा नफासत पसंद नही,जल्दी ही उसने एक अधिकारी का लबादा उतार फेंका ओर मेरे साथ सहज हो गई ..वो कोई भी बेढंगे रंग-प्रिंट की साड़ी पहने होती ओर मुझसे पूछती बताओ कैसी लग रही हूँ में मुस्करा देती ...फिर कई मुलाकातें लेकिन उसने आगे होकर कभी कॉल नही किया ..जब मिलती तो कहती अरे कल ही तो याद कर रही थी देखो आज तुम आ गई हो ,क्या कहूं मीटिंग्स, टूर इन सारे कामों से उऊब चुकी हूँ ...शादी कर लो बिना किसी भूमिका के मुझे कहना पड़ा ....वो मुझमे एक अच्छी दोस्त तलाश रही थी ..में उसे पसंद भी करती थी ..किंतु जैसी मेरी आदत भी है जो लोग मुझे पसंद होतें हैं में उनसे एक निश्चित दूरी बनाकर रखती हूँ उसके साथ भी वैसा ही कुछ इरादा था मेरा ...उसे इस तरह के उत्तर की उम्मीद नही थी...जिसे पसंद करती हो या जिसने तुम्हे पसंद किया हो ..वो मुस्कराई एक तत्वज्ञानी की तरह .मानो वो इसी बिन्दु का इन्तजार कर रही हो कोई पूछे ओर वो बताये.....लेकिन वो एक विधुर है ...बच्चे स्टेब्लिश है बड़ी बेटी अपोज कर रही है ...ये उसका कहना है ...इन बातों के अब कोई मायने नही वो चाहेगा तो सब कुछ हो सकता है मेरा कहना था ...लंच हो चुका था काफी ओर सेंडविच के साथ बातें आगे बढती रही कुछ था उसके अन्दर जो घुल रहा था वो बताना चाह रही थी मेरी कोई विशेष रूचि नही थी उसे सुनने में इसके पहले भी वो प्यार मर्द बच्चों रिश्तों पर गहराई से बात कर चुकी थी उसका पूरा परिवार यू पी में कहीं था ,मुझे लगा ऐसे ही कामकरते साथ उठते बैठते प्रेम व्रेम के चक्कर में पड़ गई होगी ...उसने जो नाम बताया वो उस महकमे में खासा बदनाम था ...जानती हो ? नही, में तपाक से झूट बोली, नाम जरूर सुना है ...वो दोनों अक्सर दौरे पर साथ होते काम के सिलसिले में कभी यहाँ वहां रुकना मिलना होता रहता था ..ओर भी बहुत सी बातें जो एक शादी-शुदा औरत ही कर सकती थी मुझे समझ नही आया कया कहूं ,वो बहुत तनाव में थी उस दिन ...अपने हाथ में पहनी चूड़ी को दूसरे हाथ से गोल-गोल घुमाती जारही थी ,वो बड़ी सी बिंदी भी लगाती थी ...वो दूसरी अधिकारी महिलाओं से अलग थी ...वो मेरी बैचनी को समझ रही थी मुझे घर लौटने की जल्दी थी ,उसने पहली बार कहा इस रविवार घर आओ तुम्हे अपना बगीचा दिखाना है अपनी कढाई का हुनर ..साथ ही दूसरी रुचियों के बारें में ..बात करेंगे ..उसने ड्रावर से एक छोटी डायरी निकाली उसमें अपना पता नंबर दर्ज कर दिया जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है ...वो मुझे जितना अपना समझ रही थी में नही,वो रविवार बीत गया में उससे मिलने नही जासकी जान बुझकर ...फिर तकरीबन छे माह तक कोई मुलाक़ात नही ..जब में मुंगावली गई ओर लौटी उसके सात दिन बाद मंत्रालय गई ...मुझे अपनी फाइल की प्रोग्रेस मालुम करनी थी ..सविता वहां नही थी ...उसके पी ऐ ने बताया ...शी इज नो मोर ....अपने दौरे के समय वो नींद की गोलियाँ खाकर मर चुकी थी ....जिसके लिए मेंबहुत कुछ कर सकती थी ...नही कर पाई ...मन ही मन उससे माफी मांग ली मैंने ...खिन्न मन से ...बाद में मैंने पता लगाया चौकीदार वो रूम जिसमे में रुकी थी पहले खोलने से इनकार कर चुका था ...कभी ना कभी में उस अधिकारी से जरूर मिलूंगी मेरे अलावा उस धोखे बाज, लम्पट उसके अय्याश प्रेमी को कोई नही जानता मौका मिला तो थप्पड़ भी मारूंगी ये भी जानती हूँ क़ानून कोई सहायता नही कर पायेगा सविता के पक्ष में मेरे पास ना कोई सबूत है,ना दलील लेकिन अब उसके बारें में इससे ज्यादा कुछ लिखना भी नही चाहती ..उस रात सविता की बिंदी ओर चूडियों का वो टुकडा मुझे कुछ बताने के लिए हीनियति का साथ दे कर क्या उस रेस्ट हाउस में ले गये ...आज भी याद करती हूँ तो रीढ़ की हड्डी में सिहरन सी दौड़ जाती है ,में उस रविवार मिल लेती उससे तो वो शायद कोई एसा कदम नही उठाती ..लेकिन मेरा विशवास है जीवन में हुए बहुत से अन्यायों में प्रतिकार के लिए इश्वर को नियुक्त कर देना चाहिए ...सविता को न्याय जरूर मिलेगा ...तब में उसके उस निकृष्ट प्रेमी पर एक पोस्ट जरूर लिखूंगी....
चाँद से मांद सितारों ने कहा आखिर शब् ,कौन करता है वफा अहदे वफा आखिरशब्, ....फैज
मंगलवार, 14 अप्रैल 2009
आवाजें स्थिति सापेक्ष हो मौन हो जाती है,नियति एक नही कई शब्द, कई अर्थ जुडाती है --भावों को ताड़ती है कुछ भारी भरकम सा दिल-दिमाग पर शायद कोई बादल या पत
यूँ कहें कि जब कुछ घट रहा होता है तो वो सच होता है ,लेकिन कितना ..उस घटने के बाद ही पता चलता है चीजें और वक्त अपनी अर्थवत्ता साबित करती हें,और कभी कभी दलीलें कारगर नही होती ...उसने कैसे -कैसे बहाने किए अपने आप से ..तब एक अलग ढंग से पसरे सन्नाटे ने धूल और उमस भरी दोपहरी में उसकी आत्म तल्लीनता को ओर गहरा कर दिया,...बीच- बची उष्मा से तिक्त आवेग आनंद के साथ कौतुहल से लबालब क्षणों में ...फिर कहीं कोई हलचल नही ,फुरसत में ,जिसमें किसी ग़लत या तंग सीवन को उधेड़ना और उसी कवायद में किनारों का कुछ और फटना -छितरा जाना बस ऐसे कि दुबारा जोड़ने कि गुंजाइश ही ना रहे...दर्ष्टि बाहर नही भीतर देखती है ..वही सब कुछ- वही दुहराव वही द्रश्य ऊपर से ढलान की और जहाँ धूप के साथ बारिश भी मौजूद होती है ..वो द्रश्य-समय थोडा हतप्रभ करता है ,चिडियांये बेखौफ पंख फड फडआती हुई नहाती हैं ,ना जान सको ऐसी खुशी में मौसम में बदलाव की महक महसूस होती है...कपास के कच्चे पीले फूलों से निकली अनन्य स्निग्ध रूई के गोलों को हवाओं में गूंथना और एक गोला बनाकर नील आकाश के माथे पर पोंछ देना ..मानो कोई स्लेट साफ की हो ,उसे तसल्ली मिलती,आकाश की नमी उसकी अँगुलियों को थाम लेती ,पेडों की नुकीली लम्बी टहनियों की बारीक पत्तियों की हरियल प्रतिध्वनियाँ वहां होती रहती...है जिन्हें सुना तो जा सकता था लेकिन रोका नही,सूने- चौडे आकाश में कोई कपाट नही था .कुछ रिस रहा था अन्दर ही अन्दर ...साथ ही भराव के संसाधन भी मौजूद थे वक्त न्युसप्रीन की तरह छिडकाव करता है ..सब कुछ ठीक हो जायेगा, लेकिन कब तक नही मालूम, निश्चित नही ....दुखों की वैतरणी में धक्का देकर गिराने वाला ही किनारे खडा रहकर प्रार्थना करता है ...ऐसा भी होता है ,उसे मुस्कराना चाहिए-या- नही आवाजें भीतर कुछ टटोलती है.उलाहना भी देती है ..हमने तो कहा था ? कब कहा ,तुम इश्वर नही ..यूँ माफ कर देना भी तो आसान नही ...था आवाजें स्थिति सापेक्ष हो मौन हो जाती है,नियति एक नही कई शब्द, कई अर्थ जुडाती है --भावों को ताड़ती है कुछ भारी भरकम सा दिल-दिमाग पर शायद कोई बादल या पत्थर ----उसके बाएँ हाथों में तीव्र असहनीय दर्द क्रेपबेंडेज, पेन किलर ..कोई फायदा नही वेलियम टेन एम् जी के बाद नींद बेअसर -दर्द बेशर्मी के हद से बाहर हो जाता है वो धीरे से कोहनी को मोड़कर आंखों पर रख आहिस्ता से लेटना चाहती है ..कमरे की हलकी रौशनी -भारी भरकम कत्थई परदों की दरारों से शाम के जाते चटक उजाले के साथ मिल जाती है ...अब इस रंग का कुछ नाम नही हो सकता एक ही वृत में उसे बुलाना ,उसे भुलाना,सब कुछ नाकाम हो जाता है .इतनी बैचेनी वो कमरे के भीतर मिश्रित रंग को अलग करना चाहती है..खिड़की से परदों को सरका देती ही ....शीशे में अपना चेहरा देखती है और देखते-देखते आईने वाला चेहरा सजीव चेहरे को सोख लेता है जो चेहरा नही मन की बात जानता है कोई पीठ थपथपा कर आश्वस्त करता है ...सांवली ही तो हो तुम्हारे जैसा मन भी भी किसी को मिलता है ..सच मन ना भये दस बीस ..अब ये सच भी आईने के पास है ..शाम गहराने से पहले आधा घंटा टहल कर लौटना है,वो खूबसूरत धाकाई जामदानी के पल्लू को कमर के गिर्द लपेटती गर्दन तक ले आती है .कंधे से थोडा ऊपर तक दायीं तरफ नन्हा तिल ..पहले तो नही था उसे आश्चर्य होता है ..इसकी उपस्थिति आत्मा की गंध पहचानती है जैसे उस समय पर गेरू पुते स्वास्तिक सी इकछाओं का आलोप हो जाना किसी के बिछुड़ने पर किया जाने वाला सवाल -लेकिन ना कोई सवाल था ना कोई जवाब मिला प्रेम सौन्दर्य और आस्था के चरम के साथ जिए सच को अस्वीकार कर जीना क्या इतना आसान है...फिर भी एक निर्गुणी भाव अनायास पनप उठता है ...उसके लिय मन में एक करूणा उपजती है...कोई दोषी हो तो माफ किया जाय ...निशब्द भीड़ को ठेलते ...पहाड़ से ऊँचे ,दरख्तों से हरे,शाम से गहरे ,आकाश से नीले, धरती से असीम वक्त को चलते हुए देखती हूँ ..सिर्फ उसकी तरफ जाते हुए ..जहाँ आकर्षण -विकर्षण वासना- कामना बे मायने हें
बुधवार, 8 अप्रैल 2009
पिता...तुम हो आस-पास हमारे....

सख्ती-नरमी और तुम्हारे निश्चल प्रेम की सौगातों में ,
मंगलवार, 31 मार्च 2009
यूँ किसी को हाथ पकड़ कर इस दुनिया के कबाड़ से अलग किसी ऊंचाई पर बैठा देना.....और एक मुकम्मल सच में बासी होते दिन... उससे ना पूछिए...
शनिवार, 21 मार्च 2009
मणिपुर-इम्फाल मैं मानव अधिकारों के हनन का सिलसिला कई सालों से लगातार,कई संगठनों ने आवाज़ बुलंद की है
इस पूरी कहानी मणिपुर की स्त्रियों का एक पक्ष यह भी है की वह किस तरह लाम बध्द होकर अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है,बतौर उदाहरण ...एक युवा लड़की थंगजम मनोरम को ११जुलै २००४ को उसके घर से रात के वक्त उठा लिया गया बाद मैं बलात्कार एवं प्रताड़ना के बाद आसाम राइफल्स द्वारा मार दिया गया,परिणाम स्वरूप मायरापेबी की १२ औरतों -युवा इमा [माताओं]ने आसाम राइफल्स हेड क्वाटर्स -इम्फाल के एतिहासिक कांगला फौर्ट पर नग्न परेडनिकाली उनके हाथों पर बैनर्स पर लिखा था ..इंडियन आर्मी रेप अस ...ये एतिहासिक कदम शायद दुनिया मैं पहला एसा कदम था जिस के लिए एक होंसले के साथ ही अपनी बिरादरी के लिए कुछ करने का जज्बा उन औरतों मैं था, और आज भी है उस वक्त जो संगठन वहां अपने हक के लिए लड़ रहे थे वो भी सकते मैं आगये...तब से अबतक वालीवाल मेच के दौरान १४ मार्च १९८४ को सी आर पी ऍफ़ की फायरिंग से १४ लोगों की मौत ,१० जुलाई १९८७ को ओपरेशन ब्लू बर्ड के समय,१४ सिविलियंस को मारना,२५ मार्च १९९३ को तेरा बाजार कैल्थल -इम्फाल मैं ७ लोगों की ह्त्या, ७जुलाइ १९९५ मैं इंफालमेडिकल कालेज मैं ९ स्टूडेंट्स का खून करना,२ नवम्बर २००० को मालोम मैं १० लोगों के साथ एक बूढे आदमी की हत्या, -[जहाँ से शर्मिला नामक ३८ वर्षीय युवती ने हंगर स्ट्राइक शुरू की ,इसकी कहानी अगली पोस्ट मैं ]उपरोक्त विवरण के अनुसार थांग-जम मनोरम की कस्टोडियल मौत....जिसके परिणाम मैं कांगला फौर्ट पर नग्न प्रदर्शन ]ये उदाहरण एक इसे सच से रूबरू करातें हैं की सोचने पर मजबूर होना पड़ता है की क्या हम आजाद हिन्दुस्तान मैं रह रहें है,या बर्बर युग मैं...देश भर की महिला पत्रकारों का एक बड़ा दल देश के भिन्न भागों से ,मार्च के पहले हफ्ते मणिपुर मैं मौजूद था ...और भी कई कारक तत्व इस वक्त इंफाल मैं काम कर रहें की वहां के लोग सामान्य जीवन भी नही जी पा रहें हैं ...मणिपुर के लोगों के मुश्किल हालातों और जन जीवन मैं आए इस बिखराव-तनाव ..के कारण सबसे अधिक मुश्किलों का सामना महिलाओं को करना पड़ रहा है ,लेकिन हालत मैं बदलाव आयेगा जरूर ...सरकार को समझना होगा,सुनना होगा, और तुंरत उचित कारर्वाई भी करनी होगी,...मणिपुर की हमारी साथी पत्रकार अंजुलिका थिन्गम जिसके भाई को ३माह पूर्व आसाम राइफल्स वालों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी ,ने जब मुझे एयर पोर्ट छोड़ते वक्त कहादेश मैं कहीं भी कोई छोटी सी घटना होती ही छोटे-बड़े अखबारों मैं छपता है ...यहाँ जीवन कीडे-मकोडों के समान है हर दिन लोग मारे जा रहें है औरतें विधवा जीवन जी रही हैं ...उनके घर बर्बाद होगये हैं ...कहीं कोई हलचल नही होती,ये अन्याय नही है क्या?मेरा संदेश हिन्दी पाठको तक पहुंचे ..हमारे दुःख को वो भी समझेगे मुझे यकीन है पिछले कई दिनों से ये पोस्ट चित्रों के कारण पोस्ट नही हो पाई है...फोटो अपलोड होने मैं मुश्किल आरही है इसलिए फिलहाल सिर्फ रिपोर्ट...अगली पोस्ट मैं दूसरे चित्र भी ...होंगे.आमीन,
बुधवार, 18 फ़रवरी 2009
पतझर मैं बारिश- हालाँकि मौसम के टूटकर गिरते पत्तों में पुरानी उदासियाँ जज्ब है... प्रेम करते हुए चुप रहने की तरह...

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
मर्दों की इस तानाशाह दुनिया मैं,

मर्दों की इस तानाशाह दुनिया मैं
यह क्या कम बड़ी बात है
गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009
वसंत के इन दिनों मैं,
रविवार, 25 जनवरी 2009
गुमी हुई चीजें मिल जाती हैं, कभी नही ,और कभी अप्रत्याशित खुशियों की तरह सामने आ जाती है..
पेंसिल से टेढे -मेढ़े तरिके से हैवन लिखा हुआ था यकीनन ये उसी की हेंड लिखावट थी .जिसमे लिखे स्वर्ग शब्द के लिए उसे बचपन मैं एक झापड़ पडा था ,क्योंकि उसे बताया गया था की किताबें स्वर्ग का रास्ता होती है ,,,उसे गंदा नही करना चाहिए,उसने किताब को सीने मैं भींच लिया क्या यह कोई इंसिडेंट था? क्या चीजें लौटती हैं? सालों बाद भी?कभी शक्ल बदल कर लेकिन लौटतीहै , मुझे तो कम स कम यही अनुभव हुआ है ,अभी इसी मकर संक्रांत पर माँ की दी हुई साड़ी पहनने का मन हुआ ..तह खोली तो २१०० रूपये फर्श पर गिर पड़े उन्होंने साड़ी के साथ दिए थे रख कर भूल गई थी ..समझ नही आया रो पडूं या आंसू जब्त कर लूँ माँ के बिना बेरौनक और फीके पड़ते जाते त्यौहार ...लगा माँ लौट आई है, उन्हें मैंने खोते हुए देखा ,म्रत्यु के १० घंटे पहले तक ..तीन साल पहले ..विष्णु सहस्त्र नाम ,महा म्रत्युन्जय का पाठ,गणपति अथर्व शीर्ष का पाठ सतत सुनते चली गई ..कहा करती थी वो...सूर्य मन्त्र का पाठ प्रति दिन किया करो ..किसी दिन सूरज नही निकले तो क्या करोगे ?.मोगरे के फूलों की खुशबू मे,उनकी सुगंध,किसी पुस्तक की पंक्तियों में उनकी जीवन द्रष्टि का साम्य जिन्दगी की जीत-हार में आशीर्वाद और आश्वाशन की तरह वो अक्सर दिखाई देती है बस मुश्किलों से यूही पार पा जाती हूँ जब जब आस-पास बनावटीपन में सधी हुई बेईमानियाँ और षड्यंत्री चुप्पियाँ पाती हूँ तब -तब...मीठी घाटी में बेटी की खोई किताब कीतरह.....
माँ मिल ही जाती है अप्रत्याशित खुशियों कीतरह...
बुधवार, 21 जनवरी 2009
शब्द- अर्थों मैं बदले ,या अर्थों के पहाड़ बने,
शब्द अर्थों में बदले या अर्थों के पहाड़ बने ,फर्क नही पड़ता,
कभी - कभी शब्दों अर्थों की बात,
फिजूल लगती है
शिखर पर नही जाना मुझे....
आओ ढूँढ निकालें महा समुद्र,
सीपियों,शंखों सुनहरी मछलियों,मोतियों वाला...
(उस दिन कितने पत्ते झड़े थे, जब जाते हुए देखा था -तुम्हे मैंने मोड़ से मुड़ते हुए ...
अपनी ही कविता का एक अंश)
गुरुवार, 15 जनवरी 2009
कुछ ईमानदारियां दिलों मैं सुरक्षित रहती है,वक्त-जरूरत दुनिया के नियम कायदों से अलग भी निभाना होता है


