बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

खिलंदड़ी --गिलहरियां बहुत आसानी से पीछा करती हें --एक दूसरे का

खिलंदड़ी --गिलहरियां बहुत आसानी से 

पीछा करती हें --एक दूसरे का 

--वहाँ प्रतियोगिता नहीं है /उनकी बेहिसाब दौड़ती-फुदकती दुनिया में /-
-एक आरामदायक सुरक्षा है /उजली सुबहों में घास के बीज कुतरती गिलहरियां मुझे पसंद हें /-
-उतरती दोपहर और शुरू होती शामों से पहले वाले सन्नाटे में /--
पत्तों की  हरी रौशनी में झुरमुटों के बीच /उनका होना एक हलचल है /-
-पत्तों के गिरते रहने में भी /
--तब भी ,जब सुकमा की झीरम घाटी में विस्फोट होता है /
और पत्तों की  नमी यकायक सूख जाती है
/--भरभराकर टूटते शब्द बौने होते जाते हें /
तब कड़क और कलफदार चेहरों वाली इस दुनिया को /-
-अपनी गोल किन्तु छोटी और चमकदार आँखों से ,
चौकन्ने कानों से,  पंजो के बल /पेड़ के तने को नन्हे पंजों से थामे / -खड़ी  हो देखती है 
,झांकती ,सुनती है गिलहरियां- अगल बगल -
---मेरी समझ से---लचीली गिलहरियां दुःख ताप  ईर्ष्या  से परे
दुनियावी चीजों को एक सिरे से देखती मिलेंगी /-
-एक लम्बे विलाप को पूर्ण विराम देती सी /
-किसी लोकवाद्य यंत्र की  तरह बजती हुई  निष्कपट /
-बांस की  दो चिपटियों  के बीच दबकर निकलती सी उनकी आवाज़ की  मिठास /-
उस-- इस समय में /-जिनमे दर्ज है हमारा प्रेम /-
-प्रेम के उत्सव की  तरह ,मंगलगीत गाती बीतती  है /
--फिर आना तुम याद बहुत कहती--/

और तमाम तरक्कियों के बावजूद बदत्तर  होती जाती इस दुनिया में /
-बचे हुए खूबसूरत प्रेम की  मानिंद /
जो घास के एक  नन्हे तिनके के सहारे थाम लेती है, पूरा आकाश /-
उन्ही गिलहरियों से मुझे बेहद  प्रेम है 
---बेहद
गिलहरियां--[कविता ]
विधुल्लता 

शनिवार, 22 जुलाई 2017

# भारतीय खान पान ,परम्परा और हमारे व्यवहार और हमारी रेलवे

# भारतीय खान पान ,परम्परा और हमारे व्यवहार और हमारी रेलवे 
कल एक खबर देख रही थी ,भारतीय रेल विभाग में खान पान को लेकर कितनी गड़बड़ियां है ,हेल्थ को लेकर सरकार एक तरफ चौकन्ने होने का दावा करती है, दूसरी तरफ ,ऐसा खान -पान जो कई बीमारियों के साथ जान लेवा हो सकता है --तो कहाँ है हमारी गलती और कहाँ है सरकारी भूले ,
बचपन में रेल के सफर के दौरान हर स्टेशन पर हमें सीज़नल फल फ्रूट मिल जाते थे,करौंदे ,आम अमरूद, ककड़ी खीरा चिरोंजी ,शहतूत,फालसे,जामून और उबलासूखा हुआ चना मूमफली आदि, एक सुराही होती थी या छागल जिसमें पानी भर कर घर से ले आते थे ,खाने में अचार पूड़ियाँ पराठे आलू की सब्जी --और नमकीन --सोने के लिए एक मोटी से दरी होल्डाल एकाध एयर पिलो होता, सफर कितना ही लंबा होता मज़ा आता था,और आराम से कट जाता था 
धीरे धीरे सब बदल गया ,वातानुकूलित डिब्बे सफ़ेद झक चादरें कम्बल --और उसमें रेलवे की मन मर्ज़ी का खाना --रेलनीर --जिससे ना मन भरता है ना पेट --अब स्टेशन पर वो फल कटी हुई ककड़ी भुट्टे नहीं मिलते ,अब हम अंकल चिप्स हल्दीराम की भुजिया खाते हैं ,वो भी मनमाने दामों पर ,अब सफर पर चलने के दौरान औरते वो मशक्क्त नहीं करती जो हमारी माँ को हमने देखा --वो दो चार लोगों की अतिरिक्त खान सामग्री साथ रखती थी कि ,नामालूम कब ट्रैन लेट हो जाये कब कहाँ रुक जाना पड़ जाए, और ऐसा होता भी था ,तब माँ की चतुराई देखते ही बनती थी ,बचपन के ऐसे तमाम किस्से याद है जब हमने रातें वोटिंग हाल में गुजारी लेकिन खाना कम नहीं पड़ा बल्कि आस पास में बांटकर भी बच जाता था ---अब एक शब्द ' सुनती हूँ ज़हर खुरानी , ना किसी का खाना खाइये ना खिलाइये , चोरों और ठगों का बोल बाला है हमारी ये परम्परा है क्या सब कुछ अकेले अकेले खा जाएँ --सहयात्रियों को बांटे बिना --लेकिन सब कुछ बदलने के साथ मानवीय वृतियां भी ज्यादा बदली और ज्यादा ठगी होने लगी --सोचने की बात ये हैकि ऐसा क्यों हो रहा है --पूँजीवाद ने जो भी बदला है उससे भौतिक प्रगति के सूचकांक चाहे जितने ऊँचे हो ,लेकिन शनै शनै मानवीय वृतियों का ह्रास हुआ है और होता जा रहा है -
पिछले साल ही में तिरुपति से लौट रही थी सम्पर्क क्रांति [ए पी ] उसमें पेंट्री कार ही नहीं थी ये ट्रैन तिरुपति से सुबह 5 बजे निकलती है ,वो तो हमारी बर्थ के बगल में एक रेल अधिकारी थे उन्हें हैदराबाद उतरना था उन्होंने कहीं काल किया और इडली डो से का इंतजाम हुआ ,एसी 2 ,और ऐसी 1 में भी वही वेंडर आते हैं जो रेलवे से अथोराइज़्ड होते हैं और उनके पास भी वही होता है जिस खाने का हम या तो खा नही पाते या लम्बे सफर में उसे पचा नही पाते, इसका विकल्प नहीं होता ,जाते वक़्त तो हम दो दिन तक के सफर का भरपूर खाना साथ रखते हैं --लेकिन लौटते वक़्त क्या करें --आजकल यदि किसी रिश्तेदार का कोई स्टेशन बीच राह पड़ता भी है तो --कई बहाने है ,किसी का घर दूर है ,तो कोई बिज़ी है ,कोई आफिस में है ,कोई बीमार है ---तो कहने और सुनने के बीच स्वाभिमान आड़े आ जाता है --बचपन में हमारे शहर से किसी परिचित /रिश्तेदार /परिवार केगुजरने पर माँ खाना लेकर भेजती थी यथा संभव उनके पसंद का ,और अब सब कुछ रेलवे सडा गला खाना मैनेज करता है ---
शताब्दी से अपनी दो सालपहले की यात्रा के दौरान पड़ोस के एक बुजुर्ग दम्पत्ति जो जल्दबाजी में खाने का पैकेट घर भूल आये थे --मुश्किल में आ गए उन दोनों को शुगर थी जब नाश्ता ,खाना सर्व होता वो समेटकर रख देते या लौटा देते --मैंने पूछा तो पता चला डायबिटिक हैं ,और अब तक जितना खान पान सर्व हो रहा था उनके काम का ना था --मैंने अपने बेग से उन्हें चने और कुछ नमकीन दिया --वेंडर से दही मांगा तो नहीं था ना लस्सी थी और थी भी तो मीठी --रेलवे ने उस वक़्त कांट्रेक्ट आगरा केंट के किसी कांट्रेक्टर को दिया था --प्लेट में रखे पेपर नेपकिन पर उनका नाम फोन नंबर था काल किया और सजेशन दिया --एक माह बाद अखबार में छपा भी अब डायबिटिक लोगों के लिए शताब्दी में खाना अलग से दिया जाएगा --वो लागू हुआ या नहीं ,नहीं पता 
हम अपने बचपन से ही खान पान की बिगड़ी आदतों की वजह से बड़े होने तक मुश्किल में रहते हैं, हम सभी भाई बहन मूम्फ़ली ककड़ी चना बिस्कुट से पेट भर सकते हैं --देखती हूँ सफर के दौरान बच्चे तो बच्चे, माँ बाप भी कोल्डड्रिंक्स और जंकफूड डकारते हुए सफर पूरा करते हैं और साथ में रेलवे का कुभोजन भी ,
सोम नाथ एक्सप्रेस में सोमनाथ की यात्रा के दौरान चूहों की भरमार थी -सीट बर्थ में कुतरे हुए बिस्किट रोटियां --तो तमीज़ किसे सिखाएं रेलवे को या खुद को ---बिना धुली चादरें प्रेस करके फिर यात्रियों को दे देना --आप सजग नहीं तो भुगतो किसी इंफेक्शन को -मेरा चाहे जिस कैटेगरी में रिज़र्वेशन हो में अपनी बेडशीट ले जाना नहीं भूलती -भूल जाऊं तो दुपट्टे को ही उपयोग में लाती हूँ चादरों के नीचे --बाहरी खान पान -रहन सहन से एक अज्ञात डर सताता है और उसके सारे उपाय कर लेना जरूरी समझती हूँ 
फिर बेटी को बताया उसने कहा मॉ आगे से किसी जंक्शन का पता कर के वाहन से आन लाइन बुकिंग करो ब्रेकफास्ट लांच डिनर सब कुछ मिलेगा ,में कहती हूँ ये अमेरिका नहीं है बेटा ,ट्रैन अक्सर लेट होती है ,खाने की क्वालिटी खराब हो तो क्या ग्यारंटी पैसा वापिस होगा ,और होगा भी तो इतनी झंझट में कौन फंसे --तुम अमेरिका में हो हम इंडिया में --कुछ दिन पहले हमारे फेसबुक दोस्त आर एन शर्मा जी भोपाल से गुजरे तो मैंने उनसे कहा था, आप पहले बताते तो में खाना लेकर आती,उज्जैन से भोपाल की दूरी ट्रैन से 4 घंटे की है,लेकिन हमारी सास पूड़ी सब्जी अचार पैक करके रखती थी, जाने कब जरूरत पड़ जाए,और अक्सर मक्सी या काला पीपल पे ट्रैन 4 4 घंटे खड़ी रहती थी, तब ना कार थी ना बस रुट अच्छे थे ,आज भी कार के सफर के दौरान भी में खाना जरूर साथरखती हूँ वो उपयोग ना आये तो किसी जरूरत मंद को दे देती हूँ --एक बात सच है की हम दूसरे के लिए ऐसा नहीं करना चाहते इसके पीछे एक ही मकसद है ,की फिर हमे भी करना पडेगा ,अगर सभी इस भाव को दिल से निकाल दें वक़्त जरूरत अपने इष्ट मित्रों रिश्तेदारों को भोजन पैक कर देते रहें तो रेलवे की जरूरत ही नहीं होगी यथासंभव साथ घर का बना शुद्ध सात्विक भोजन साथ ले जाएँ 
और में सच कहूँ मुझे आज भी स्टेशन पर अपने परिचितों को खाना देकर आना अच्छा लगता है एक सुकून है किसी हमारे को, हमारे शहर से गुजरते देखना और उसे शुद्ध स्वादिष्ट घर का ,हाथ से बना भोजन खिलाकर तृप्त होना
सरकारें ना सुधरी है ना सुधरेंगी --आप हमको ही सुधरना होगा अपनी आदतों और बिगड़े चलन पर कंट्रोल करना होगा
[कल रात इंडियन रेलवे के बिगड़े खान पान पर रिपोट देख सुनकर ]
[इसे अपने ब्लॉग ,ताना बाना,के लिए लिखा है,सोचा यहाँ भी पेश कर दूँ ]

शुक्रवार, 19 मई 2017

इस वर्तमान को अतीत होने से फिलवक्त बचाना चाहती हूँ,बस इतना ही तो चाहती हूँ

इस वर्तमान को अतीत होने से फिलवक्त बचाना चाहती हूँ,बस इतना ही तो चाहती हूँ 

## और में चल पड़ती हूँ ,जंगलों की तरफ -
जंगलों के अंतिम विनाश के खिलाफ़ --
अपनी आत्मा की समूल शुद्धि -के लिए -
तुम्हारी स्मृति के गाढ़े हरियल होने को
जंगल की सुवासित देह को,पेड़ों की सुगठित गठन ,चमकीले पत्तों ,अनाम फूलों की जंगली खुशबूओं को ,
भरे पूरे गर्भा गूलर को ,चट्टान के सीने से लिपटी प्रेम पगी लत्तरों को आत्मसात करने 
चलते चलते - 
 देखती हूँ शहर के तालाब का अंतिम छोर लांघते, मछुआरों को जाल डाले 
कच्चे तूरे हरे सिंघाड़ों से लदी नाव को किनारे लगते हुए आहिस्ता -
और में चलती रहती हूँ ,गहरी नदियों ऊँचे पहाड़ों की सीमांत तक ,
खुद को तुम्हारी और चलते देखना-मानो तुम वहां हो -
'भीम बैठिका, की अंतिम चोटी से मॉरीशस की 'मुड़िया' चोटी तक
पूरा शहर टिमटिम जुगनूओं सा ,

में चाहती हूँ तुम्हे दिखाना अपनी आँख से,
सांस लेते शाल वृक्ष,सागौन वन वृक्षों को -
उनसे बात करते,उनमें निमग्न होना,रोजगार और शोर से परे,
बस इतना ही चाहती हूँ -
ताकि सुन पाओ गुन पाओ मुझे भी,एक अनुष्ठान की तरह -समझ पाओ मेरी साधारणता को -
चहकती वनस्पतियों के दिन है ये और उनकी सुगंध से भर दूं हथेलियों से तुम्हारी देह,  -चाहती हूँ
वहीँ कहीं आस -पास --धुँआती लकड़ी पे बनती सौंधी चाय के अस्वाद संग -गीली आँखों से
एक मुस्कान का बाहर आना --दृश्य से  
--उस वक़्त 
एक जीवन का बीत जाना  हो -वहाँ
पहाड़ी सीने पर उड़ते धुएँ से बनते धूसर बरसाती रंग में-एक भूरी चिड़िया का तिनका बनता घोसला -देखना
चट्टान के सीने पर खड़े निड़र पेड़,पत्थरों पे उकेरी प्रेम की प्रतिध्वनियां -जंगल की अनगूंज सुनना
मेरे धानी दुपट्टे से छनकर आती जंगली मेहँदी की खुशबू,और प्रेम में लीन वो काला जंगली खरगोशों का जोड़ा
,देखना शाम की ठंडक में,तुम्हारी आँखों के जुगनुओं को समेट लेना तभी,फिर देखना जंगली झरना -पहाड़ी ऊंचाई पे,
काँधे पर तुम्हारे,अपनी साँसों का दुशाला -ओढ़े सो जाना
बीच आधी रात,पूरी रात में खिलने वाले फूलों को देखना,देखते हुए --
सोचती हूँ -सुनूंगी तुमसे एक कविता -तुम्हारी-अलौकिक इच्छाओं से भरी
फिर अपने नाम का- 
 जाप- उच्चारण बार बार 
इस ब्रह्मांड के जड़ चेतन से निर्विवाद अलग थलग,संशय रहित,आत्मिक और कायिक निकटता में 
बस इतना ही तो चाहती हूँ --
में इस वर्तमान को अतीत होने से फिलवक्त बचाना चाहती हूँ
जो तुम्हे दिखाना है,उसे आत्मसात कर 
एक मुकम्मल जंगल से गुजर जाना चाहती हूँ -यकीन करो में,अपनी गवाह बन -सरसराती जंगली हवा की तरह 
ना लौटकर आने के लिए -
लेकिन थोड़ा ज्यादा चाहती हूँ -
बस इतना ही ---

रविवार, 11 सितंबर 2016

## जेब्रा क्रॉसिंग -6,,बाहरी अँधेरे में एक सनातन भिक्षु मन की बंटी हुई दुनिया में डोलता है
आज खबर है इस शहर को स्मार्ट सिटी में तब्दील किया जाएगा तो निश्चित ही वो ज़ेब्रा क्रासिंग भी कई नए मोड़ के साथ अपनी नई शक्ल में सामने होगा,बैचैन हूँ इस खबर से - इस खबर के अलावा यहाँ सब कुछ ठीक ठाक है लेकिन सनातन बीते कई वर्षों में समय अपनी रफ़्तार से आहिस्ता घटती हुई घटनाओं और काल जिसमें हम तुम बीत रहे हैं चल रहा है -मेरा मन यकीन करों उसमें नही लगता जिंदगी में कितनी सारी बातें उल्ट हो जाती है --असावधानी से पीटे मोहरे और फिर भी खेल जारी रहे तो इसका मतलब हम हारना नही चाहते ---जीत की उम्मीद के बिना --और मुश्किल और दुःख यही ना की दूसरी बाजी खेलने नही मिलती 
उम्र दिन गिन रही है और मुझे याद आया अचानक वो दिन --लेकवयू से श्यामला हिल्स की पहाड़ियों तक जब हम जाने क्या सोच पांच किलोमीटर तक पैदल चलते रहे उस दिन हल्की ठंडक थी सड़कें दूर तक सूनसान ऊपर नील आकाश में चमकता नर्म पीला चाँद साथ चलता हुआ,तुम्हारा बात को बीच बीच में अधूरा छोड़ देना ''सुनो एक जरूरी बात -और तुमने मेरा हाथ हाथों से छोड़ दिया थोड़ी तपिश भरी हथेलियों में हल्की ठण्ड का टुकड़ा सिमट आया और बाहरी दुनिया से मन जुड़ गया --में देखती हूँ तुम्हारी आँखों में एक स्लेटी शाम का अन्धेरा -नही कुछ नहीं जाने क्या सोच बात अधूरी छोड़ दी तुमने ---आज इतने सालों बाद भी उस अधूरी बात को सुनना चाहती हूँ और एक पल में में उस ज़ेब्रा क्रॉसिंग को पार करती हूँ एक बिना भीड़ वाला दिन उस दिन भारत भवन से एक प्ले देख कर लौटे हुए मेरी पैरट ग्रीन जामवार साड़ी -के पल्लू पर पर्पल कलर के बने मोर पे कैसे मोहित हुए थे तुम --ज्यादा ही मूडी हो गए थे कहते कहते तुम मेरी मोरनी और में, ये मोर--उड़ने मत देना -में हंसी, मोर वैसे भी कहाँ उड़ पाते हैं -सहेज रखना तुमने कहा -
-आज वार्डरोब से कई साड़ियां निकाली कामवाली बाई से और वो चीख पड़ी दीदी ये तो में लूंगी आपको तो नहीं देखा पहने कभी आनन् फानन में उसने झट उसी पल्लू को सीने पे डाल कहा देखो तो कितनी अच्छी -साड़ी झपट कर मैंने उससे कहा ,,ना --ये नहीं इसके बदले दूसरी दोऔर ले लो पर ये नही दूँगी --क्या प्रेम और आस्था के जिए चरम क्षणों में हम जीवन की दूसरी यंत्रणाओं संग सहनीय नही बनाते --बनते --शायद हाँ 
- कोई उदासी कोई ,कोई कुंठा ,कोई याद कोई मोह ,-और ऐसा ही कोई रूखा सूखा दिन किसी रात में गड़मड़ होता है कोई ठौर नहीं ,बेस्वाद और तूरा सा दिन दूर से नजदीक की चीजों को देखता हुआ ख़त्म होता है और रात पास आकर दूर जा कर सोचती है --हर मोड़ पर भटकाव --हर जगह ढेर से रास्ते --ठिठक जाओ या एक चुन लो या लौट जाओ सब कुछ आपकी सोच पर निर्भर करेगा ---लौटो तो दस पांच खिड़कियों वाला घर भी अंदर से रोशन नहीं करता, लेकिन क्या जरूरी है हर खिड़की से रौशनी भीतर आये --क्या इन्ही में से किसी दिन या रात -- तयशुदा मृत्यु नही आएगी सवाल अपने आप से होता है --मृत्यु का भय घेरता है ---कई डर सताते हेँ एक साथ .दरवाजों पर नीले परदे कांपते हेँ सचमुच सच सा लगता था- वो साथ अब छूट जाता है ओर फिर --.
.इस घटाटोप में कोई हाथ थाम लेता है .कहने को बहुत कुछ था तब भी अब भी दरअसल एक पूरा भाषा विज्ञान था ओर कहने के खतरे भी नहीं थे, उँगलियों में गंध का टुकडा लिए, लेकिन हम सोचते रहे संबंधों की बड़ी डोर से धरती ओर आकाश को बाँध लेना, एक ही संवाद को दुहराते जाना ओर यह सोचते जाना की डूबने से पहले पानी के बीच किसी स्निग्ध फूल की तरह खिला था वो वक्त.
वक़्त को पलट कर देखना 'कौन हो तुम ''पूछते ही वह धूप की परछाई में गुम होता है किसी मुकम्मल स्पर्श से जीवित होती देह --फिर छूट जाने से डरती है तेज गले से रुलाई का भरभराना रोने से बदत्तर --कितना दम घुटता है कोई माप नहीं, एक तपिश देह में उतरती है --जल में उँगलियाँ डूबा देना एक सुकून एक ठंडक एक राहत --लेकिन कब तक ? एक चुप्प सी रात भी बीत जाती है -बहुत उदास किया एक उदास दिन -रात ने जो बीत गया अभी अभी, डब डब सी आवाज़ करता पानी में--
तुम्ही बताओ हे तथागत उस उजल और साफ दिन में जैसा आज यहाँ है उस दिन तब जब एक समरस समय में तालाब जल बीच में बने शिवमन्दिर भीतर एक सौ आठ रक्त-चम्पा के फूलों से में शिव का अभिषेक करुँगी -एक दिन ये होगा जरूर-- -सोचती ही रह जाती हूँ रात घिरती है-देर रात फ़रमाइशी गीतमाला में आशाजी का गीत बज उठता है 'समय और धीरे चलो --बुझ गई राह से छाँव --दूर है पी, का गाँव --धीरे चलो-साथ ही -पति की आवाज़ हेडफोन लगाकर क्यों नही सुनती हो उफ़ कितना शोर है--जेब्रा क्रॉसिंग की कालीपट्टियों पे चलता हुआ --बाहरी अँधेरे में एक सनातन भिक्षु मन की बंटी हुई दुनिया में डोलता है 
[जेब्रा क्रॉसिंग ,, अपनी लंबी कहानी का छटवां [6] भाग ]

सोमवार, 1 अगस्त 2016

#‪#‎जेब्रा‬ क्रॉसिंग -
#‪#‎उस‬ मोड़ पे मिलो तो-सोचूँ जहाँ से मुड़कर एक नदी बहती है -वहां पानी की नीली रौशनी की सतह पे ताजे बुरुंश के खिले फूलों को बहाया था मैंने कल,गहराती शाम से पहले हथेलियों के चप्पु से उस दिशा में --ताकि उन्हें समेट पाओ दूसरे किनारे से--तुम --
कहो तो चलना शरू करूँ, यहाँ से इस मोड़ से -तुम तक -अपनी नीली जरी के चौड़े पाट वाली गुलाबी साड़ी पहने -अपनी पदचाप में तुम्हे गुनते बुनते ---में ठीक हूँ ----बिलकुल ठीक हूँ
तुमने क्यों पूछा --

अच्छा लगा तुम्हारा पुकारना
उस जेब्रा क्रासिंग के पार रेलिंग के सहारे वो कोट की जेब में हाथ छुपाये खड़े रहना -याद है मुझे अब तक और भीड़ में दूर से मुझे पहचान लेना तुम्हारा --सालों बाद भी वो याद है क्या फिर कभी ये होगा जिंदगी कितना ही बीते को दोहराये जानते हो सन्दल" रंग और रूप वक़्त का वो नही होता --एक द्रश्य के सौ रूप और उनमें से एक तुम को ढूंढना --आज भी उस जेब्रा क्रासिंग पे रूक जाती हूँ ,अपने शहर में -देर तक कार पार्किंग की दिशा याद नही आती शॉपिंग का बोझा मन, भर का हो जाता है -पिछली बार तुमने पूछा था तब घुटनो में दर्द आ गया था, पैथॉलॉजी रिपोर्ट में केल्शियम डिफेंशियनशी --एक हद्द के बाद दर्द में जीना भी सरल हो जाता है--
जिस जेब्रा क्रॉसिंग को उड़ कर क्रास कर लेती थी -उस पार खड़े तुम पलक झपकाये बिना देखते रह जाते थे मुझे, क्या अब भी में तुम्हे वैसे ही दिखूं ,ना अब में 20 साल पहले वाली नही रही शायद तुम तैयार ना हो वो सब देखने के लिए
पर सच में बदल गई हूँ --क्या में बदल गई हूँ तुम देखोगे तो जानोगे ---लो में अपनी कार तक आ पहुंची --बगल की कार में एक ड्राइवर बैठा ऊँघ रहा है --गीत बज रहा है" जरा सा झूम लूँ में जरा सा घूम लूँ में -- में चली बन के हवा----
तुम याद आते हो इसी जेब्रा क्रॉसिंग पे
अक्सर संदल
जेब्रा क्रॉसिंग ## (दो) 
कभी कभी चुप्पियाँ निरर्थक साबित होती जाती है प्रार्थना के बाद भी -जब हम दुनिया के सही सलामत और साबूत बचे रहने की उम्मीद में आँख मूँद खड़े रहते हैं 
"जानते हो क्यों ?-इसलिए कि इसी दुनिया में तुम
हो -जब धरती हिली और 6.6 के रिएक्टर पर, तुम्हारे शहर में दहशत थी -समाचारों की धुकधुकी में में तुम्हे बार बार काल करती रही कोई उत्तर नही.कितनी धरती आकाश लांघ गई पल में कुछ याद नही -- देर बाद देखा एक डिजिट बीच में गलत डायल होता रहा उफ़ अपनी ही जल्दबाजी और बेवकूफी दोनों पर शर्मसार होना था, बहुत सी तबाही में सब ठीक था ""यही क्या कम था -फिर भी उस रात एक करवट की नींद के बाद सुबह कत्थई उजालों से भरी थी --बहुत कुछ छूट जाने की आशंका से बच जाना --लेकिन किसी अकस्मात से पहले मुठ्ठियों की ऊँगली से रेत के झर जाने के बावजूद स्मृतियों का हरा पहाड़ सांत्वना देता रहा दिल में एक ठंडी लौ जगाये हुए
संदल तुम जानते --मोहलत नही देती जिंदगी तेज चाल के बावजूद --उस जेब्रा क्रॉसिंग के बाद सड़क की रेलिंग्स पर रुक जाती हूँ हाथ टिकाये --सोचते हुए तुम्हे --हांफ भी उठती हूँ वहां तक आने के लिए कभी तो ऑटो को दूसरी तरफ छोड़ देती हूँ, कार से आऊं तो पार्किंग तक जाने में वो रेलिंग छूट जाता है वो बरसो पुराना हाथ भी जहाँ तुम हाथ टिकाये खड़े होते थे --बस एक अहसास है तो है
तुम्हे नही पता इतनी फुर्तीली में तुम्हारी अब कितनी गोलियां खाकर ज़िंदा हूँ थायराइड बी पी ये वो --हर सांस पे शक़ धक--
अभी लौटी हूँ ड्रायक्लिंर्स के यहाँ से उस गीले जेब्रा क्रॉसिंग से अहा बारिश में कितना चमकीला धुला धुला सा --जहाँ से एक बार तेज दौड़ते हुए हाथों को पकड़े हुए हमने सड़क क्रास की थी और देर रात तालाब 
के किनारे खड़े रहे
तुम भी जानते हो वो सड़क रक्त में कथाओं की तरह घुली है
ये तुम्हारा दुःख है तुम्हारी याद है जो बेअसर नही होने देती मुझे मेरे शहर में -
ज़ेब्रा क्रॉसिंग--3-- ## जब-जब लौटती हूँ, वहाँ से ,बातें ठीक से याद अाती हें,बहुत से शब्द अपने ढेर से अर्थ देर बाद खोलते हें-पुराने निशानों के सहारे चलते जाना ओर लौटना कभी धोखा भी हो जाता है -नगर निगम वालों ने पूरे शहर का नक्शा ही बदल दिया है -अक्सर भौच्चक उसी ज़ेब्रा क्रॉसिंग पे दाएं बायें देखती हूँ -ट्रेफिक सिग्नल की ग्रीन रेड लाइट मे गुम सी--अंधेरा अाजकल जल्दी घिर अाता है ,शाम से पहले शाम -रात से पहले रात -हैरानी होती है किसी का पुकारना एक अंतराल के बाद -कोई मुझे तलाशता है ,मे चकित हूँ ,-क्या मुझे अपने को संशोधित करने की जरूरत है इस अाशा निराशा राग द्वेष से परे -जानते हो संदल मे दुखों के टोहे जाने से डरती हूँ,फिर भी मऩ वहीं पहुंचता है --कहता भी है -तुम कहां हो ? जिस जगह हजार हरसिंगार झरते थे --अब तुम नही तो वह जगह अनायास अपरिचित. फीकी सी ,बेस्वाद लगने लगती है- ओर मे अपनी प्रार्थना कामना मे अनायास खाली हो जाती हूँ --ये एक प्रयास होता है सबसे जुदा तुम्हे सोचने का ---फिर तुम भीतर उतरते हो तो मे अासमान होती जाती हूँ -और उसी खालीपन से शुरू करती हूं नये सिरे से अपने को भरना---उड़ना ---
तुम होते तो देख पाते --तुम्हारे ना होनेे पर भी समय अपने पूरे अधूरेपन के साथ कैसे विस्तारित होता है
''तुम स्लीवलेस नही पहनती --ना' ओर तुम्हारी तर्जनी घुप्प से मेरी बाहं मे गड जाती है --अपनी बाहं को सहलाती हूँ --ओर लिपिस्टिक ''ना -क्यों ?-क्यों मतलब नही पसंद --क्यों पसंद नही --अब बातों को घसीटना जरूरी है --नही ---क्यों पूछा --मेरा पूछना -तुम चुप बस अांखों मे झांकते मुस्कुराते रह जाते हो---दो सेकंड बाद ही 
''ओर ये जो मऩ भर काजल भर लेती हो अांखों मे ठीक से देख पाती हो मुझे ? मे हंसी जोर से --हंसी इतना, अनन्त मे चांद की बिंदी मे-सितारों की खनक चमक मे अपने गजरे की महक मे-हंसी मे ,भीगी इतना कि हँसते हँसते रो पड़ी ---उपर सर उठाया तो बादलों के बीच से उड़ता झिलमिल प्लेन --अांखें उसका पीछा करती है -- कितना देर -- सब कुछ ओझल हो जाता है --जानते हो संदल जब सारी दुनिया ठसाठस भरी होती है --मे ज़ेब्रा क्रॉसिंग के पार उस छोटी सी सड़क के किनारे बने पार्क की रेलिंग्स वाला स्पेस तुम्हारे लिए बचा लेती हूँ ---जिसके सहारे, किनारे चलते हुए हम झील किनारे तक अहिस्ता अाते थे 
जानते हो जहां रंग बिरंगे फूलों को बेचने वाला वो गरीब लड़का कितनी हसरत से तुम्हे तकता था ---और तुम मुझे ---
अभी लौटी हूँ कुछ मेहमानों को शहर दिखाने के बाद --अब इस शहर मे ले दे के झील ही तो है --क्या दिखाया जाय - मेंने ,उनसे कहा चलिए पैदल ही चलते हें हालांकि पति महोदय को मेरा अायडिया जरा रास नही अाया --वो बोले मे उस तरफ मिलता हूँ --ओर ज़ेब्रा क्रॉसिंग की काली सफेद पट्टियों पे चलने का सुख उससे ज्यादा तुम्हे सोच लेने का सुख --पर संदल अब नही चल पाती हूँ सांसे तेज़ चलती है -तो झट्ट याद अाता है , बी पी की टेब खाई या नही -याददाश्त पे ज़ोर देती हूँ तो कुछ ओर याद अा जाता है --वो कोना जहां तेज बारिश होती है --मेरी गीली पीठ पे तुम्हारा हाथ --जान लो कुछ दिन बिजी रहूँगा --करीब दो माह --अपनी रिसर्च कंप्लीट कर लो --इस बीच ---बीच -तालाब के पानी पे एक नाविक जाल फैलाता है -अंधेरा अांखों को काटने लगता है किनारे लगे लैम्प जल उठते हें --उनकी रोशनी पानी की सतह पे गिरती है ओर वहाँ से प्रतिबिंबित होती हुई अांखों की पुतलियों मे चमक अाती है ----तुम देखते हो --समझते हो --मे तुम्हे ** सायमा झील के किनारे ले चलूँगा' नंदिनी '' कहते तुम्हारी झक्क सफेद कमीज़ भीग जाती है बारिश से बचने की कवायद मे---तुम्हारी बारिश भरी हथेलियाँ ---मेरी गीली हथेलियों को भर जाती है ---
# अाज तुम्हारी नंदिनी ने भीगा हुअा रजनीगंधा का एक बड़ा सा बंच लिया है----
*** सायमा झील 'फिनलैंड' की सबसे बीडी झील
जेब्रा क्रॉसिंग ## 4 -एक # इतनी बारिश जिसमें भीगने सांस लेने का मऩ --- जो --वहाँ सुन लिया गया जाने कैसे --शाम बीत रही थी -शाम का अखरी पल जैसे रुक गया ,पानी की सतह पे --हमारे देखते ही देखते धूप हिली और लचीली पतली लकीर सी हमारे एडियों से उपर तक पानी मे भीगे पैरों को छूती हुई बीच तालाब की तलछट पर पहुंच गई---झिलमिल सी --वो घाट ,वो किनारा ,वो नावों का झुरमुट उस पल मे सिमटा वो शाम रात का अंधेरा उजाला 
तुम्हे गुस्सा नही अाता --जवाब मे मुस्कुराना -मानो जवाब ही मुस्कुराना हो --अपने ही शब्द नजरा जाते है ----नाराज़ी ओर चुप्पी एक ही हाईट पे --अब क्या करो-जो महीनो नही टूटती- जो गलती ना करे और बात की पहल भी-- ना- तो ----
फिर उन दिनों का बीतना---जैसे समय ही खुराफात करता हो दोनो के बीच -- सुना है इस बार तुम्हारे शहर मे बर्फबारी हुई है --सर्दी तुम्हे जल्दी लग जाती है सोचते हुए तुम्हारी --सुकुड़ती नाक बजने लगती है --- ज़ेहन में
घर से निकली सोच कर कि पास के एक नये बने मॉल मे जरूरी शॉपिंग करुगी - बाहर एक लंबी रैली और भीढ़ दिखाई दी ,अब घूम कर जाओ तो उसी क्रॉसिंग पे--जानते हो सनातन एकांत मे एकांत अक्सर काटता है लेकिन भीढ़ मे अंजानेपन का एकांत ,अजनबी होने का सुख मुझे खूब भाता है --जब चाहे मन को टोह कर कहीं भी रुक जाना शॉप विंडों मेे झांक लेना --देर तक -- भी क्या खूब काम है पता चला, रोड ब्लॉक-रहेगा किसी स्थानिय नेता की सभा होना है - अब उस क्रॉसिंग से गुजरना मजबूरी है --कुछ पल को भी -सोच" टॉप गेयर पे दौड़े तो मुश्किल होती है-- 

''तुम इतना क्यों डरती '' रोड क्रॉस करने मे --वाकई तुम साथ हो तो --सोच रुकती है- तुम झुंझला गये --हाथ पकड़े पकड़े कहना- अराम से चलो ---सच सनातन अाज भी रोड क्रॉस करने से --डरती हूँ --एक कल्पना ,फिर देखना ट्रेफिक सिगनल को,काउंट डाउन करना 6,5 ,4 ,3 ,2 ,1 मे, अपने को बीच सड़क लहूलुहान पाती हूँ --बर्लिन की वो 22 वीं फ्लोर पे लिफ्ट मे अकेले एक अजनबी के सहारे ग्राउंड फ्लोर पे अाना ,सच कितनी शर्मिंदगी होतीअपनी ही बुजदिली से ,लेकिन डर नही जाता --अपने डरों के सच होने से डरती हूँ--तुम्हे खो देने का डर सच हुअा जब -तब से ओर ज्यादा,--बोटिंग करते हुए उस शाम जब बारिश शुरु हुई और नाविक ने जैसे ही हिचकोले खाती नाव को , तेजी से मोड़ा तो तुम्हारे तरफ झुकी नाव लगा अब डूब ही गई --मैने तुम्हे पीठ ओर बाजुओं से जोर से थाम लिया आँखें बंद कर ली-- तुम कहते रहे-तुम्हे मरने नही दूंगा नंदिनी ---अांखों की झिलमिल में तुम मुस्कुरा दिए --
खोया समय याद अाता है देर रात ,भाग कर जी लेने की अातुरता बेसब्र होती जाती है --
ये बालों को क्यों इतना कस लेती हो ''नंदिनी अांटी जी ''--हाथ से बालों मे लगे रबर बेंड को लूज़ कर देना ओर मेरा नंदी बन जाना ---देखो तो कितनी अच्छी लगती हो ''कैसे देखूं? ''मेरी अांखों मे उफ्फ ---
तुम्हारी यादों ओर बातों से बनी दुनिया करवट लेती है ---में ज़ेबरा क्रॉसिंग पार करती हूँ -
यही तो कहा था --एक पूरी रात बिना कामना के जागो मुझ संग ''फिर --फिर हम जुगनुओं को पकड़े -एक दूसरे की बंद -मुठ्ठियों को खोले -अांखों से एक दूजे के लिए सितारे पकड़े --तुम मे्रे लिए कोई कविता पढ़ दो --ना ' ये ना होगा मुझसे -
-अरे कोई किताब से पढ़ देना --एक शरारती सवाल- और क्या ? बस उस रात सूरज भी दोपहर दिन चढ़े तक मूह ढाँप सोता रहे -आइडिया अच्छा है 'जान '' और अनायास चेहरे को सिकोड कर होंटों को गोल घुमाकर सीटी मे तुम्हारा गा पड़ना 
''ना जाने कहां तुम थे ,ना जाने कहां हम थे जादू ये देखो हम तुम मिलें हें'' -------मन्ना डे की पुरसर अावाज़ मे ,मन्नाडे की आवाज़ पसंद है तुम्हे- तुम कहते हो तो बस फिर कुछ याद नही रहता--वो सिकुड़े हुए होंट वो घूमती अांखें जीरोक्स हो जाती है "जान" सुनते -ही
तुम्हारा खुश चेहरा द्रश्यों मे चमतकार पैदा करता है -तुम्हारा साथ चाहना अाज भी ---उस शाम कितनी बैचैनी थी तुमसे ना मिल् पाने की --अाज सोचती हूँ तो लगता है हम वाकई जिंदगी मे उतना ही पाते हें जितने के हकदार होते हें बाकी कोशिशें बेकार है सनातन---सच बताऊँ एक मुकाम एसा भी अाता है जब सारे सच के झूटे होने के अंदेशे मुझे बहलाते हें --पिछले हफ्ते से पीठ मे दर्द है--अब डॉक्टर के पास जाने से डरती हूँ सनातन जाने कोनसी पैथालॉजी रिपोर्ट से जाने कोन सा भूत निकल अाये --अभी शाम डूबना चाहती है --मे ज़ेब्रा क्रॉसिंग के पार उस रेलिंग्स से खड़े हो वहाँ से देखना चाहती हूँ खुद को चलते हुए तुम तक अाते हुए-फिर एक साथ हवा के गुब्रबार को देखना अासमान मे ,जहां ढेरों अबाबील पंख फैलाये उड़ती रहती है -लेकिन फिलवक़्त ये भी ना हो सकेगा रात कहीं डिनर है '`--तुम्हारी सोच को भी तह लगा छोड़ जाऊंगी -सिरहाने --फिर भी --खोलूंगी बीच रात संशय में---इतने बरस बरस बीते ऑर कल रात से बारीश भी बेइंतहा बरस रही है--
समय का कोई विश्वसनिय पाट है --हमारे बीच सनातन '' जो दिन ओर रात की काली सफेद पट्टियों से चल कर हमे एक दूसरे के भीतर पार उतारता है-- -+
मे समय को सांस लेने की मोहलत देती हूँ--
ताकि चलती रहे जिंदगी ---
## ज़ेब्रा- क्रॉसिंग ## 5 ## उसका चेहरा यकायक अब याद नहीं आता ना वो ना उसकी वो बातें और आता भी है तो कहीं भी कभी भी फिर चाहे तालाब पर फैलती सिकुड़ती रौशनी की परछाई ही क्यों ना हो --उनमें भी --बस इस सोच के साथ एक अजब भाव उस पर तारी हो जाता है ---एक लम्बी सांस के साथ रूकना पड़ता है और देखना तालाब की शेडेड रोशनियां कुछ नीली काली सी -- उसके ड्राइंग रूम के पर्दों की तरह -जिन्हे रस्सी की तरह बल देकर कभी पकडे पकडे वो उस तरफ देखती है-- कालबेल पर रखा उसका हाथ -याद आता है ये जो बार बार ज़ेब्रा क्रॉसिंग से लौटती हूँ ना सनातन , तो लगता है कुछ था जो रोशनियों से भरा था वहां से लौटना चाहे जितना तकलीफ देह हो पर ये पीड़ा उस सुख के सामने छोटी ही लगती है -
-''तुम पानी फुलकी खाओगी '' ना अरे पूरा बताया करो आखिर क्यों ना --तुम्हारा ये कहना और चिढ़ना और मुठ्ठियों का गोल करके होंटो और मुँह के पास लगा कर खांस उठना और साथ ही मेरे सफ़ेद कुर्ती पर लहराता 
सतरंगी लहरिया दुपट्ट्टे को मुठ्ठियों में भर लेना --याद आता है --सुन लेने की बेसब्री में --जानती हूँ- ,नहीं पसंद कह उठती हूँ फिर आँखों में कोशचन मार्क --ये खट्टी चीजों से मुझे कोई लगाव नहीं जिंदगी में --- ये क्या हुआ लड़कियों को तो बहुत पसंद होती है' नहीं मुझे नहीं पसंद में जोर देकर कहती हूँ -तुम औरों से बिलकुल अलग हो नंदिनी--और सच सनातन में औरों से कितनी अलग हूँ तुम्ही जानते हो --- 
लेकिन क्या कितना --सोचना पड़ता है और देर तक सुझाई नहीं देता --बल खाया पर्दा जोर से छोड़ देना पड़ता है जो खिड़की के एक हिस्से के टूटे कांच की तिरछी दरार नुमा लकीर से होकर बेतरतीब हो फैल जाता है और पल भर को शीशों से छन कर अंदर आती रौशनी उसके चेहरे पर लहराती हुई जमीन पर फैल जाती है अंदर की भटकन भी एक झटके के साथ कोने में जा सहम बैठ जाती है ---मिल जाए वो शायद --सब कुछ नहीं बस उतना ही जो उसके हिस्से का था, एक निर्जन सपने में निमग्न होना और हर रात ये प्रार्थना करते हुए सो जाना हे ईश्वर आज कोई सपना मत भेजना ऐसा दुःसह --जैसा कोई नहीं एक सचेतन पूर्व ज्ञान समय की गर्द - गुबार हटाकर स्पंदित होता है बहुत कुछ किसी रंग में ,किसी शब्द में ,किसी वक़्त में किसी मिलती जुलती शक्ल में और कभी तिनके-रेशे भर की समानता में भी--- उसकी निगहबानी चाहे-अचाहे होती ही जाती है फैली हुई हवा की शक्ल का बनना टूट जाता है -और ----स्मृतियों का दरवाजा बेवक़्त खुल ही जाता है एक कोलाज रास्ता रोकता है --जो मेरा था वो वक़्त दूर जाकर चिढ़ाता सा दिखाई पड़ता है तेज गति वाली किसी ट्रेन की खिड़की से हिलते हाथ में रुमाल का धब्बे की शक्ल में होते-होते आलोप हो जाना ---एक क्षण के जादू का ताउम्र उसकी गिरफ्त में जीना ---देर रात तक कई बार नींद नहीं आती ---कांपती ठण्ड में नीले मखमली कम्बल में कुड़मुड़ाते बस पड़े रहो --खैर तसल्ली यही है दृश्यों में पहले सा सन्नाटा नहीं है बेडरूम से सटा हुआ बड़े बड़े भूरे लाल पत्तों वाला पेड़ खड़खड़ करता ---जागते रहो की गुहार लगाता चेताता रहता है, 
-मन की बैचेनी बारिश के बाद खिल आये जामुन- अमरुद के ताजे पत्तियों की खुशबू में घुमड़ती ही जाती है तंग दिनों की शुरुआत ---अब राहत देती है ---देखो अब हम कितना बदल गए हें --रोते नहीं--एक दूसरे तरह का हुनर अपने में विकसित कर लेना -- एक पेड़ का निर्लिप्त भाव स्मृतियों की निरंतरता को बरकरार रखता है अँधेरे में खड़ा अपने धड़ से कटा पेड़ अपनी दो टहनियों के साथ विपरीत दिशाओं में फैला एक काले बिजूके की तरह ठहाका लगता है- --तुमने कुछ कहा शायद--मैंने कुछ सुना हमारे अच्छे -सच्चे दिनों--का लौटना मुमकिन होगा-- कभी सपनो में कभी सोच में कभी सच में उम्मीद से अधिक उम्मीद आखिर क्यों --सड़क, दुकाने, आवाजें ,शहर --किसी शहर के खूबसूरत नाम वाला वो मार्ग एक गंध कि तरह व्यक्त होता है --क्या सचमुच कोई उधर इन्तजार कर रहा है छूटा हुआ कुछ मिल जायेगा ये भी तय नहीं है बाहर कोहरा है बेहद ठण्ड है --हर वक़्त स्मृतियों की यात्राएं बेठौर कर देती है कोई ठिकाना नहीं बचता 

---और हर यात्रा को पीछे मुड़कर देखना अजीब है एक सीझा हुआ सा दिन, उन दिनों के पतझड़ के में प्रेम करने और भुलाने के लिए.मजबूर करता है ---हमारा समय कहाँ दर्ज है जिसमें किसी पत्ती तक के गिरने की आहट नहीं है लेकिन हर रात खड़ खड़ करती बड़ी पत्तियों वाला पेड़ जो आधी रात जगा देता है उसे सुबह देखो तो अजनबी लगता है ,हाँ आजकल घर के नजदीक ही जेब्रा क्रॉसिंग की तरह एकांत पार्क में एक पुलिया ढूंढ ली है बिलकुल वैसी ही बस फर्क इतना है में उससे चलकर अकेली आती हूँ दूर तक, कभी कभी तो तुम्हारा चेहरा सोच कर भी याद नही आता -लेकिन बहुत कोशिशों के बाद -तुम्हारा चेहरा कुछ कुछ याद आ चला है-तुमने फिर अपना कहा अच्छा लगा एक नदी -पहाड़ों के नीचे कछारों में - बहती हुई बढ़ती है ,गीले तिनको घास कागज सीपी शंख को ठेलते हुएआगे बढ़ती है इस साल बारिश भी 
ज्यादा हुई और इस मौसम में भी लगातार बारिश हो रही है --नदियों के उफान पर आने के साथ ही ----ये भी बीत जायेगा ---लेकिन हम कितना बचा रहेंगे एक दूसरे के लिए ये कौन जानता है -
##-ज़ेब्रा क्रासिंग अंतहीन सिलसिला है, कौन जाने इसका क्या अंत है- जब तक स्मृतियां रहेंगी ज़ेब्रा क्रॉसिंग लिखा जाता रहेगा ये, इसका 5 वां  भाग  है ]

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

सुनो प्रेम तुम भीतर उतरते हो तो में आसमान होती हूँ--वक़्त से पहले वक़्त की गुहार--हमेशा कारगर नहीं होती --तब समय रेंगता है जब उसे दौड़ना हो वो घिसटता है



  1. सुनो प्रेम तुम भीतर उतरते हो तो में आसमान होती हूँ ##  पुराने निशानों के सहारे चलते जाना -और एक निर्धारित जगह से लौटना कभी कभी धोखा दे जाते है, पुराने निशानों की याद के बावजूद आप रास्ते भूलते जाते हो और भौच्चक किसी चौराहे पे दायें बाएं ,नाक की सीध में या कि पीछे पलटे संशय होता है ,बहुत से निशाँ बरगलाते है --अन्धेरा आजकल जल्दी घिर आता है,शाम से पहले रात ,रात से पहले रात होती है, बस वही नही होता जिसे वक़्त से पहले होना चाहये-और वक़्त से  पहले वक़्त की गुहार--हमेशा कारगर नहीं होती --तब समय रेंगता है जब उसे दौड़ना हो वो घिसटता है और वो धीरे धीरे सरकते हुए -बाहर पसर जाता है यहां  वहां टुकड़ों में --शाम की हल्की ठंडक धड़कती नब्ज पर पलकों और हाथों पे महसूस होती है और आँखों में उस ठंडक का उतरना महसूस होना एक जरूरी सोच के साथ प्रकम्पित करता कुछ बातों वातों के साथ ठगता है, तभी उस यात्रा पर जाना ,जहां जाना अनेकों बार स्थगित हो चुका हो --एक लम्बे अंतराल के बाद कोई तलाशता है मुझे, में चकित  हूँ --मुझे अपने को संशोधित करने की जरूरत है --क्या ? देर तक सवाल का उत्तर नहीं मिलता -फूलों के -रंगो में ,तितलियों के पंखों में ,सौंदर्य के अर्थों में ,प्रेमियों के एकांत में ,ऊँची घास के मैदानों में ,जोर से कहना --सुनो प्रेम तुम भीतर उतरते हो तो में आसमान होती हूँ --एक जादू असर के साथ बातों का बेहिसाब होना --कहीं पहुँचने से बेखबर --   एक लॉन्ग ड्राइव पे निकल जाना ,दिल में हजार हजार ख्वाहिशों के दृश्य लिए-एक खनक -एक गमक ठुमकती है राग द्वेष  से परे --कभी कभी हम अपनी प्रार्थनाओं-कामनाओं में खाली हो जाते हैं --फिर से भर जाने को 

  1. --तभी चीजों को भीतर की तरफ देखना कारगार होता है --सूखे फूल एक विस्मृत गंध ,मुड़े हुए मोर पंख ,और पाजेब सी झंकृत होती स्मृतियाँ ----देर तक विस्मृति में रहने के बाद एक रास्ता जंगल नदी की और मुडत्ता है,घर लौटने से बेहतर , विभ्रम से दूर,नदी के उस छोर तक चलते जाना जहां से लौटने की कोई जल्दी नही होती सूखे पीले पत्तों कुछ जंगली फूलों सूखी टहनियों का, पारदर्शी नदी जल में बहना और उस ठंडे जल में अपना गीला चेहरा देखना आहा फिरअपने ही ,चेहरे का लहरों में गुम  हो जाना ---तुम कहां  हो ---पर जिस जगह तुम नही हो वो जगह अनायास अपरिचित और बेस्वाद लगने लगती है मुझे - लौटना होगा अपने को कहना --अपनी सीध से ठीक उल्ट ,और वो अपनी ब्लेक पश्मीना में कढ़े गुलाबी गुलाबों को बाहों में जकड़े लौटना चाहती है --जाने कितने तमाम सफर जाने कितने छूटे शहरों-जंगल को सोचती हुए  ये छूटना भी तय है --दोपहर की धूप में ,नदी जल में एक भीगी जंगली चिड़िया का सूखी टहनी पे बैठ पंख झाड़ना बार -बार काश तुम, मुझ संग देख पाते, नदी की रेतीली दोमट मिटटी वाले कच्चे रास्ते से लौटते हुए  अपने कानों पे हाथ रख जोर से कहना सुनो इस बार हम **'सायमा' झील के किनारे मिलेंगे सुना तुमने ----
  2.  [ एक रात की नींद ---बारह हजार दिन के सपने -- मन की रिपोतार्ज  कथा  ]
  3. [** सायमा झील --फिनलैंड की सबसे बड़ी सबसे सुंदर झील ]     

सोमवार, 21 सितंबर 2015

-किरदारों को मोड़ दे देने से क्या होगा -हड़बड़ी और नाउम्मीद सी इस दुनिया में रौशनी में झिलमिल उन दिनों में अपने लिए और वो खुश थी ,वो ऐसा ही सोचती थी उसने सोचा भी ---लेकिन सच सजगताएं आदमी को असहज और निकम्मा बना देती है

वैसे किरदारों को मोड़ दे देने से क्या होगा  - --बारिशों की उमस भरी सुबह जब रात तेज बारिश होकर गुजर जाए --जिसे बगैर कुछ याद किये गुजारने की कोशिश तो की ही जा सकती है --जिंदगी के अधकचरेपन को समझने में अपनी समझदारी  कितना काम आई,उस दिन को इस दिन के मत्थे मढ़   देना हालांकि समझदारी नहीं थी --फिर भी कई बेईमान दोस्त और कई कई तरीकों से सताने वाले लोगों और रिश्तों से छुटकारा पा लेना मुश्किल था पर उसने किया वो सब -
--हड़बड़ी और नाउम्मीद सी इस दुनिया में रौशनी में झिलमिल उन दिनों में अपने लिए और वो खुश थी ,वो ऐसा ही सोचती थी उसने सोचा भी ---लेकिन सच सजगताएं आदमी को असहज और निकम्मा बना देती है अनुभव तो यही है --फिर भी एक निरीह सपाट आतंक उसके दिल दिमाग पर छाता गया उसका यही भय उसके सामने कभी निराशा तो कभी अतिशय प्रेम और कभी विवशता की तरह सामने आने लगता --जिसका खामियाजा भी उसे  बेतरतीब तरीकों से भुगतान कर  करना पड़ता --आखिर खींचतान के बाद सलवटों भरा ही तो बचाया जा सकता था बाद में उन्ही सलवटों में खुद को समेट सिकोड़ लेना फिर वैसे ही रहना अनमने और कसैले से हिसाब लगाते रहना दोयम स्थिति से उबरने की कोशिशें, सस्ते और बेहूदा मोहों से बच निकलना -
निकलकर मुकम्मल उदासी और खालीपन से अपने को खूब खूब भर लेना उसे बखूबी आता है -फिर भटकना अज्ञात लोक नक्षत्रों में  ढून्ढ लेना कोई ठौर  हो जाना
निस्संग  आस-पास से --अरसे तक चलता, कई कहानियो उपन्यासों को बार बार पढ़ना --उनके अंत और घटना क्रम को मन मर्जी से बदल देना --और तसल्ली देना खुद को कोई भी उस जैसी मुश्किल में नहीं ये सोचना उसे खुश करता --आखिरकार अंत तो उसे अपना आप ही बनाना है --किरदारों को मोड़ दे देने से क्या होगा ---इस सब में अपने को जानबूझकर स्थितियों में तर रखना एक तरह की निर्ममता में जीवित रहना उसे रास आ जाता ---उसकी यादों बातों और वादों से ऊब की हद तक उक्ता जाना --ये सोचना किसी के लिए बेवकूफी में बिताये दिनों से फिर भी ये बेहतर है ---एक यही  सोच बस थोड़ी सोच की हद से उसे ऊपर ले जाती ----बावजूद कई चीजें और भी इतर चीजों से बड़ी थी जैसे परत उधेड़ती हवा का पीले पत्तों का लहराते  कुड़मुड़ाते हुए शाखों से नीचे गिरते देखना खूबसूरत था/, ख़ुशी  के खजाने की तरह कोई फूल खिला देखना भीगी चिड़िया का पंख झाड़ना बार बार आँख खुलते ही सिरहाने वाली  खिड़की की मुंडेर पर कबूतरों के जोड़े का गुटरगूं करना  बारिश में, नीली धूप  का निकलना छिपना देखना ---एक  द्वैत भाव ही तो था जो जिला देता था, बाकी दिनों में खुद को तटस्थ रख अपने लिए मृत्त घोषित हो जाना किसी परिणीति के बाद तलाश ख़त्म होगी भी या नहीं ---क्या चीजें छीन  लिए जाने के लिए नियति अक्सर चीजों को मिला देती है मिटटी सी चीजों को इतना प्यार करना भी तो ठीक नहीं हंसी आ जाती है एक बूँद आंसू भी --किसी ऐतिहासिक अद्भुत सीलन भरी गंध में सराबोर प्रेम अपनी जगह था जहाँ के तहाँ --इन्तजार एक हैरानी और मूर्खता से भरा पल ही है ,बीते पलों की मौजूदगी में आतुरता से स्पर्श में दर्ज ढाई आखर ---जैसे मधय सप्तक का निषाद स्वर एक ही सांस में मन्द्र  सप्तक के निषाद पर उत्तर आये --हैरानी यही थी इस साल वर्षा कम होने के बावजूद,शहर में हरियाली बहुत घनी थी  
]एक रात की नींद ---बारह हजार दिन के सपने --मन की आंशिक रिपोतार्ज ] 

सोमवार, 4 मई 2015

मन को एक मथ देने वाली उदासी टोहती है,और मुकम्मिल ब्यान दर्ज करती जाती है एक दो तीन एक लम्बी फेहरिस्त फिर सोचना की उसे भरोसा ही नहीं तो कोई क्या करे ? आपका ईमान ही आपका प्रहरी हो सकता है, यू सोच लो कोई माने या ना माने --बेहद कठिन हो जाता है,तुझसे मिलना फिर खोना ,पसीजना ---देर तक फिर सिसकना --वो ठौर पीछे दूर तक छूट जाता है--उदास उदास --लेकिन सब कुछ जल्दी ही धुल पुछ जाता है और फिर नेह की नीड बुनने में व्यस्त ,हल्दी पुते दिनों में तुम्हारी हल्दी हंसी, रेडियो में बजते संगीत से ताल मिलाती है ---दिनभर के बाद शाम देर से आती है और जल्दी लौट जाती है एक अपूर्व निजता मन को कस कर घेरती है उस डूबती दोपहर सी ,उस शाम देर तक देह का पोर पोर बजता रहा था एक हरियल पल --भी एक पल को उदास हो मुस्कुरा उठता है --फिर ऐसा भी होता ,जहाँ मन डूबता ,वहीँ किनारे हरी पत्ती के रंग में ,हर सिंगर के फूलों से गिरती खुश्बू से मन भर जाता तुम हो लगता है, कहीं आस -पास --वो तारीखें और वो भी जिसमें ऐसा कुछ नहीं हुआ वो तारीखें मुकम्मिल है अब भी , थी कम ज्यादा उन तारीखों में सोचे गए कई दिन रात गायब थे ---यूं हिसाबी -किताबी होना आपकी फितरत ना हो तो ,कहते हुए शर्मंदगी हो सकती है लेकिन वक़्त की फितरत अबूझ है यू पलटना और गिनना पल पल कभी मजबूरी हो जाती है और एक अजब करुणा में आद्र हो जाना ,अपने को स्मृतियों से गुणित कर लचल बना लेना तुम्हारी खातिर अच्छा ही लगता जाता है --पानी से गीलापन आग से ऊष्मा मिटटी से आकार लेता सौंधापन मेरे भीतर यही तो हो तुम बस तुम, सुनो ना सुनो में मिलूंगी इसी धरती और आकाश के भीतर कपिल धारा में नर्मदा के सबसे पहले सबसे ऊँचे जल प्रपात के पास अखंड कौमार्य लिए जहाँ नर्मदा, कुण्ड से निकल केवल सात किलोमीटर आगे तक ही तो चलती है,वहीँ जहँ धुप छनकर पानी में चक्राति हुई पैरों की बिछिया बन जाती है शाल वृक्ष से लिपटी हथेलियाँ में मेहँदी घुलती जाती है , पत्तों गुंथी हुई पगडण्डी घुमावदार सड़क के पार जहाँ सूखे शाल पत्र से पटा समतल मैदान है वहीँ, छल -छल पानी गूँज है, चार पग फेरों के बाद -तीन जन्मों के साथ उस गोलाकार सड़क पर जिसे मैंने सुना ही सुना है, का पूरा फेरा लूंगी ,हथेलियाँ मेहँदी रंग,और पायल की रुनझुन में आत्मा की सुवास से भर ,तुम्हारे पीले उत्तरीय वस्त्र के कोने से लिपटे बंधे मन से ,परकम्मपावासी का दृष्टी- आशीर्वाद लेते, में मिलूंगी वहीँ- किसी जनम में, दिन डूबने से पहले हल्दी काया में, केया रंग चूड़ियों भरे हाथ -पीले जरी के पाट वाली --लाल साड़ी में ---सूरज की बिंदी माथे लिए सकुचाई आँखों से ---तुम मिलोगे ना --

मन को एक मथ  देने वाली उदासी टोहती  है,और मुकम्मिल ब्यान दर्ज करती जाती है एक दो तीन एक लम्बी फेहरिस्त फिर सोचना की उसे भरोसा ही नहीं तो  कोई क्या करे ? आपका ईमान ही आपका प्रहरी हो सकता है, यू सोच लो कोई माने या ना माने  --बेहद कठिन हो जाता है,तुझसे मिलना फिर खोना  ,पसीजना ---देर तक फिर सिसकना --वो  ठौर पीछे दूर तक छूट जाता है--उदास उदास  --लेकिन सब कुछ जल्दी ही धुल पुछ  जाता है  और फिर नेह की नीड बुनने में व्यस्त 
,हल्दी पुते दिनों में तुम्हारी हल्दी हंसी, रेडियो में बजते संगीत से ताल मिलाती  है ---दिनभर के बाद शाम देर से आती है और  जल्दी लौट जाती है एक अपूर्व निजता मन को कस  कर घेरती है उस डूबती दोपहर सी ,उस शाम देर तक देह का पोर पोर बजता रहा था  एक हरियल पल --भी एक  पल को उदास हो मुस्कुरा उठता है --फिर ऐसा भी होता ,जहाँ मन डूबता ,वहीँ किनारे हरी पत्ती  के रंग में ,हर सिंगर के फूलों से गिरती खुश्बू से मन भर जाता तुम हो लगता है, कहीं आस -पास  --वो तारीखें और वो भी जिसमें ऐसा कुछ नहीं हुआ वो तारीखें मुकम्मिल है अब भी , थी कम ज्यादा उन तारीखों में सोचे गए कई दिन रात गायब थे ---यूं हिसाबी -किताबी होना आपकी फितरत ना हो तो ,कहते हुए शर्मंदगी हो सकती है लेकिन वक़्त की फितरत अबूझ है यू  पलटना और गिनना पल पल कभी मजबूरी हो जाती है और एक अजब करुणा में आद्र  हो जाना ,अपने को स्मृतियों से गुणित  कर लचल बना  लेना तुम्हारी खातिर अच्छा ही लगता जाता है --पानी से गीलापन आग से ऊष्मा मिटटी से आकार  लेता सौंधापन मेरे भीतर यही तो हो तुम बस तुम, सुनो ना सुनो में मिलूंगी इसी धरती और आकाश के भीतर कपिल धारा में नर्मदा के सबसे पहले सबसे ऊँचे जल प्रपात के पास अखंड कौमार्य लिए जहाँ नर्मदा, कुण्ड से निकल केवल सात किलोमीटर आगे तक ही तो चलती है,वहीँ जहँ धुप छनकर पानी में चक्राति हुई पैरों की बिछिया बन जाती है  शाल वृक्ष से लिपटी हथेलियाँ में मेहँदी घुलती जाती है , पत्तों गुंथी हुई पगडण्डी घुमावदार सड़क के पार जहाँ सूखे शाल पत्र  से पटा  समतल मैदान है वहीँ, छल -छल पानी गूँज है, चार पग फेरों के बाद -तीन जन्मों के साथ उस गोलाकार सड़क पर  जिसे मैंने सुना ही सुना है, का पूरा फेरा लूंगी ,हथेलियाँ मेहँदी रंग,और पायल की रुनझुन में आत्मा की सुवास से भर ,तुम्हारे पीले उत्तरीय वस्त्र के कोने से लिपटे बंधे मन से ,परकम्मपावासी का  दृष्टी- आशीर्वाद लेते,  में मिलूंगी वहीँ- किसी जनम में, दिन डूबने से पहले हल्दी काया में, केया रंग चूड़ियों भरे हाथ  -पीले जरी के पाट वाली --लाल साड़ी में ---सूरज की बिंदी माथे लिए सकुचाई आँखों से ---तुम मिलोगे ना --
अगर शरर है तो भड़के-जो फूल है तो खिले 
तरह तरह की तलब,  तेरे रंगे  लब  से    है  
सहर की बात --उम्मीदें -सहर की बात सुनो [फ़ैज़] 

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

जिनमे दर्ज है हमारा प्रेम /--बचे हुए खूबसूरत प्रेम की मानिंद---गिलहरियां

खिलंदड़ी --गिलहरियां बहुत आसानी से 
पीछा करती हें --एक दूसरे का 
--वहाँ प्रतियोगिता नहीं है /उनकी बेहिसाब दौड़ती-फुदकती दुनिया में /-
-एक आरामदायक सुरक्षा है /उजली सुबहों में घास के बीज कुतरती गिलहरियां मुझे पसंद हें /-बेहद पसंद है 
-उतरती दोपहर और शुरू होती शामों से पहले वाले सन्नाटे में /--
पत्तों की  हरी रौशनी में झुरमुटों के बीच /उनका होना एक हलचल है /-
-पत्तों के गिरते रहने में भी /
--तब भी ,जब सुकमा की झीरम घाटी में विस्फोट होता है /
और पत्तों की  नमी यकायक सूख जाती है
/--भरभराकर टूटते शब्द बौने होते जाते हें /
तब कड़क और कलफदार चेहरों वाली इस दुनिया को /-
-अपनी गोल किन्तु छोटी और चमकदार आँखों से ,
चौकन्ने कानों से,  पंजो के बल /पेड़ के तने को नन्हे पंजों से थामे / -खड़ी  हो देखती है 
,झांकती ,सुनती है गिलहरियां- अगल बगल -
---मेरी समझ से---लचीली गिलहरियां दुःख ताप  ईर्ष्या  से परे
 दुनियावी चीजों को एक से ,दूसरे सिरे तक  देखती मिलेंगी /-
-एक लम्बे विलाप को पूर्ण विराम देती सी /
-
-बांस की  दो चिपटियों  के बीच दबकर निकलती सी उनकी आवाज़ की  मिठास /-
-किसी लोकवाद्य यंत्र की  तरह बजती हुई  निष्कपट /
उस-- इस समय में /-जिनमे दर्ज है हमारा प्रेम /-
-प्रेम के उत्सव की  तरह ,मंगलगीत गाती बीतती  है /
--फिर आना तुम याद बहुत कहती--/शर्माती  शाख की सबसे ऊँची फुनगी तक दौड़ जाती है 
और तमाम तरक्कियों के बावजूद बदत्तर  होती जाती इस दुनिया में /
-बचे हुए खूबसूरत प्रेम की  मानिंद / हर सुबह -हर दिन 
 घास के एक  नन्हे तिनके के सहारे थाम लेती है, पूरा आकाश /-
उन्ही बहादुर  गिलहरियों से मुझे बेहद  प्रेम है 
---बेहद 
पिछले साल सुकमा के झीरम घाटी में नक्सली  हमले [विस्फोट ] के बाद



गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

किसी मुकम्मल स्पर्श से जीवित होती देह --फिर छूट जाने से डरती है तेज गले से रुलाई का भरभराना रोने से बदत्तर --कितना दम घुटता है कोई माप नहीं, एक तपिश देह में उतरती है --

दो आवाजों को अलगाना मुश्किल हो जाता है जब एक ही समय में एक ही सुर में वो सुनाई दे ---ठीक वैसे ही भीतर के दृश्य धूप  से छनकर बाहर की ओर एक बड़े से सेमल के पेड़ की झुकी हुई शाखाओं को भेद जमीन पर आते हैं, उनका दिखना ही अद्भुत है --सेमल की बड़ी बड़ी हरी गदबदी नरम रूई वाली कच्ची फलियों में अब दरारें पढ़ना ही चाहती हैं --इन्तजार तो धूप  को भी है, फलियों की छोटी बड़ी परछाइयाँ हवा संग संग जमीन पर पड़े आड़े तिरछे दृश्यों को दुलराती हुई अलसाई दिखलाई पड़ती है धूप  लम्बी शाखों पे चढ़ते -उतराते एक पतली कांच की लकीर की मानिंद लचीली डोलती है ---हतवाक'' समय में सब कुछ साफ होता है कुछ आवाजें भी, में तो कहीं गया ही नहीं था सच कहीं जाने के लिए ---तुम्ही बताओ तथागत  ऐसा कैसे चलेगा --एक सिरे पर आवाज कंपकपाती तो दूसरे सिरे पर स्थिर हो रह जाती है कबूतर का एक जोड़ा भरी दोपहर क्लॉक वाइज़ ,एंटी क्लॉकवाइज घूमता हुआ सोच को फिर वहीँ लौटाता  हुआ चकित करता है --कुछ चीजें जीते जी अश्मीभूत होती जाती हैं तो दूसरी तरफ फूलों की शिराओं में प्रतिध्वनियों की शक्ल में जी उठती है --सन्नाटे वाली दोपहर में दबी दबी हंसी वाली धूप थोड़ा आगे सरकती है ,बीतती  है आहिस्ता -पहुँचती है शाम तक सुस्त चाल से --लेकिन शाम देर नहीं करती  चुस्त चाल से लम्बूतरी हो पहुँच ही जाती है अँधेरे के निकट --अँधेरे में सुझाई नहीं देता कहाँ सुख है और कहाँ पीड़ा --
कोई उदासी कोई ,कोई कुंठा ,कोई याद कोई मोह ,कोई मुक्ति -और ऐसा ही कोई निश्छल दिन कोई रात में गड़मड़ होता है कोई ठौर नहीं ,बेस्वाद और तूरा सा  दिन दूर से नजदीक की चीजों को देखता हुआ ख़त्म होता है और रात पास आकर दूर सोचती है --हरमोड़ पर भटकाव --हर भटकाव में ढेर से रास्ते --ठिठक जाओ या एक चुन लो या लौट जाओ सब कुछ आपकी सोच पर निर्भर करेगा ---लौटो तो दस पांच खिड़कियों वाला घर भी अंदर से रोशन नहीं करता, लेकिन  क्या जरूरी है हर खिड़की से रौशनी भीतर आये --लेकिन इन्ही में से किसी दिन या रात तयशुदा मृत्यु  जरूर आएगी --मृत्यु  का भय घेरता है ---'कौन हो तुम ''पूछते ही वह धूप की परछाई में गुम  होता है किसी मुकम्मल स्पर्श से जीवित होती देह --फिर छूट जाने से डरती है तेज गले से रुलाई का भरभराना रोने से बदत्तर --कितना  दम घुटता  है कोई माप नहीं, एक तपिश देह में उतरती है --जल में उँगलियाँ डूबा देना एक सुकून एक ठंडक एक राहत --लेकिन कब तक ?  एक चुप्प सी रात भी बीत जाती है -बहुत उदास किया एक उदास दिन -रात ने जो बीत गया अभी अभी, डब डब  सी आवाज़ करता पानी में--
उसे डूबते देखना भी कितना अजीब है चलो रास्ता दिखाओ कोई आदेश सर माथे चढ़कर देता है -कहीं जाने के लिए नहीं -बस ज़रा टहलते हैं -वो रात ख़त्म होती है जिसका कोई जायज अंत नहीं होता 
कोई तो है, कोई सपर्श अब भी बचा है, कोई प्रेम में पगा बैठा है- कैसा दुःख -अँधेरा या डर ये एक आश्चर्य समय होता है जिसमें रहने का सुख -दुःख सपर्श राग विराग --सारे कुछ को मुठ्ठी में दबाये रहना और इसी सच बीच जीना --पंख ऊग आये तो कौन ना चाहेगा  उड़ना उसे तो वैसे भी पसंद नहीं, ठहर जाना गति से बचकर --अपनी ही इक्षाओं की नजर कैद से स्वाभाविक मुक्ति खुश भी तो करती है --कब लौटोगे ? लौटोगे तो जरूर --सवाल के जवाब का इन्तजार कौन करे --तुम्ही बताओ हे तथागत उस उजल और साफ दिन में जैसा आज यहाँ है ये दिन तब जब एक समरस समय में तालाब जल बीच में एक सौ आठ रक्त-चम्पा के फूलों से शिव का अभिषेक करुँगी --''एका दिवशी ये होणार'' --एक दिन ये होगा जरूर 
[समय और धीरे चलो --बुझ गई राह से छाँव --दूर है पि का गाँव --धीरे चलो ]

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

बचपन के डर हमेशा कमजोर नहीं होने देते समय के साथ वो आपके व्यक्तित्व को जिम्मेदार और मजबूत बनाते

व्हाट्स एप्प पर कुछ दिन पहले एक मैसेज कुछ इस शक्ल में था ,म sssssssssम -मी ईईईईईईई''सुनोsssनाsss  -वो एक लम्बी बात थी,बेटी ने जो  कहना चाहा,वो बाद में, इस संस्मरण के बाद ---
चार साल की बेटी को शाम अक्सर सामने वाले पार्क में जूते मोज़े फ्राक पहनाकर  घुमाने ले जाती थी वो भोपाल का पांच नंबर बस स्टॉप कहलाता है  उस पार्क में एक छोटा सा तालाब था जो आज भी है,जिसमें तब भी, आज भी ढेर से सुन्दर कमलफूल खिले रहते हैं, लगता था की बस उन्हें एक टक  देखते ही रहो, पार्क में ही एक साइड में मंदिर और दूसरी तरफ बच्चों के खेलने के लिए छोटे झूले और करीब छह फूट ऊँची एक फिसल पट्टी थी --मेरी बेटी आहिस्ता  अपने नन्हे क़दमों से ऊपर चढ़कर बैठ तो जाती थी लेकिन ऊपर से नीचे फिसल कर आने में उसे डर लगता था, तब ऊपर से नीचे आने में उसे मेरे सपोर्ट  की जरूरत होती और में उसका होंसला आफजाई करती उसे पुश करती और वो धीरे धीरे फिसलते हुए नीचे आती फिर उसके पैर रेत के ढेर में धंस जाते --वो जोर से हंसती मानो अपने ही बल पर कोई जंग जीत ली वो  समझ ही नहीं पाती कि उसकी इस बहादुरी में, माँ का कितना बड़ा सहारा है --वो रेत भरी हथेलियों को फ्राक से पोंछते हुए फिर से दुगने उत्साह से पीछे सीढ़ियों की तरफ दौड़ जाती,लेकिन हर बार ऊपर जाकर उसे माँ  के सहारे की जरूरत पड़ती ---एक बार मैंने उसे ऊपर चढ़ते हुए देखा, फिर मेरा ध्यान बंट गया में भूल गई की ऊपर जाकर उसे फिर मेरे सहारे की जरूरत होगी,  में तालाब के किनारे खिले कमल के फूलों को देखने में मग्न थी - तभी एक चीख सुनाई दी -म sssssमी ssईईइ  लगा जान निकल गई मैंने पलटे बिना ही बेटी के लहूलुहान होने की कल्पना कर डाली ---और उसकी  तरफ तकरीबन भागते हए देखा बेटी उसी पॉइंट पर ऊंचाई पर अटकी हुई थी --करीब पहुंची तो वो डरी हुई सी साफ साफ आवाज में बोली मम्मी आप उधर फूल देख रही हो मुझे देख ही नहीं रही हो --वो-रुआंसी सी-- थी मुझे यहाँ ऊपर से डर लग रहा है मम्मी  मैंने उसे आहिस्ता से ऊपर से नीचे की ओर फिसलने में मदद की --वाकई में,मैं उस दिन बेहद  शर्मिंदा थी --फिर मैंने कभी उसकी तरफ से इस जिंदगी में कभी  गफलत नहीं की ---सोचकर ही डर  जाती हूँ की ऊपर से वो गिर जाती तो ---?आज वो करोड़ों मील मुझसे दूर है लेकिन उसे मेरी ऐसी ही अब भी मानसिक सम्बल की जरूरत वक़्त -बेवक़्त पढ़ जाती है  समझती हूँ वो कहती नहीं लेकिन में जानती हूँ --उस वाक्यात के बाद  फिर मैंने कभी आज तक उसमें गिर जाने का भय तक पैदा नहीं होने दिया ना ही कहीं गिरने दिया ना डरने दिया वक़्त जरूरत जहाँ जरूरत हुई उसके लिए न्यायोचित लड़ाई भी लड़ी उसे बुलंद होना उसकी प्रिंसपल के सामने बोलना, सच और झूट में फर्क करना सिखाया दूसरों को अपनी मदद से ऊपर उठाना भी --हर हाल में जीना लेकिन मजबूर होकर नहीं थोड़ी मुश्किलें तो अब भी आती हैं लेकिन  वो खुश है और में भी
वाहट्स एप्प पर जो चार - पांच दिन पहले उसका[बुलबुल] जो मैसेज था वो ही बचपन वाली आवाज में, वो इस लिए की उस दिन सुबह से उसके कई मेसैजेस थे ,दो चार मिस्ड काल भी,, अमूमन मोबाईल मेरे आस पास ही रहता है लेकिन उसी दिन बैटरी डाउन थी चार्जर पर लगा कर में बाई के साथ घर की साप्ताहिक सफाई में लग गई --दोपहर में जब देखा तो वही मम्मी वाली लम्बी टोन में लिखा -हुआ --में परेशान हो गई कई फोन और मैसेजेस दिए लेकिन कुछ उत्तर नहीं मिला आखिरकार रात उसने फोन किया -बोली एग्जाम था ,आपकी याद आ रही थी सोचा आपसे बात कर लूँ -  लेकिन आप का तो फुरसत ही नहीं,मुझे उसका बचपन याद आया, ना बचपन के डर हमेशा कमजोर नहीं होने देते समय के साथ वो आपके व्यक्तित्व को जिम्मेदार और मजबूत बनाते [मेरी बेटी बुलबुल इस वक़्त कोलोराडो यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग के फोर्थ सेमेस्टर की पढाई कर रही है  और मुझे आज उसकी जोरदार याद आ रही है ]

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

उसका एक अव्यक्त दुःख , एक आर्तनाद रोजाना मुझे सुनाई देता है --मुझे रूकना पड़ता है उसके पास,सांत्वना देती हूँ - कहती हूँ कब तक ठूँठ रहोगे एक दिन यहीं से कोंपले फूटेंगी तब तुम चारों तरफ से लहराती शाखाओं वाले सुन्दर वृक्ष बन जाओगे --तब देखना किसी को भी याद ना रहेगा की तुम कभी इतने निरीह रहे होगे



  1. हमारी कालोनी के पार्क में  एक पलाश के पेड़  ने ,आज फिर दिल दुखाया पार्क के एक सिरे से, थोड़े पहले ये  टेसू का पेड़ अपने  सहोदरों से बिछड़ा महसूस होता है मेरे ख्याल से --न्यू भोपाल की बस्ती बनने के क्रम  में छोटे जंगलों को काटा छांटा  गया होगा --कुछ पेड़ काटे गए होंगे --कुछ को जड़ से उखाड़ा गया होगा, पता नहीं ये किस  कर्मचारी की दयालुता की वजह से बच गया  या अपनी  कमसिन फूलों की खिली हुई  डालियों की वजह से, ये तो पता नहीं ,किन्तु ये पार्क की हद में है लेकिन इसका आधा तना सड़क के बहार तक फैला  हुआ है जो बाउंड्री वाल के सहारे बहार की ओर सड़क तक अपनी शाखाओं के साथ फूलों से लदे - फदे  होने के बावजूद ,उदास नजर आता है 
  2. इसके  ढेरों पत्तों और उनकी उपयोगिता को भी आज भुला दिया गया है कभी जन्म मरण आयोजनो कथा पाठ तो प्रसाद में इसके बने दोनों पत्तलों के बिना काम ही नहीं चलता था और आज किसी को जरूरत ही नहीं ,मनुष्य ने सभ्य होकर हर चीज का विक्लप ढूंढ लिया है हाँ बस कहावतों में याद रखा है --फिर वही  ढाक के तीन पात ---
  3. --जमीन से थोड़ा  ऊपर ही इसकी  दो विभाजित भुजाओं में से किसी ने एक भुजा को काट दिया है लगता है जैसे कोई हादसा हुआ है --पलाश वहीँ से ठूँठ नजर आता है --विकलांग भी दुःख होता है उसे यूं देख कर , नजदीक जाने पर --लगता है इस हादसे के जिमेदार लोगों की शिकायत करना चाहता है -लेकिन  कोई सुने तब ना -किसे फुरसत क्षण भर रुके उसके पास। -अपनी एक ही भुजा से ऊपर की और जाता हुआ ये टेसू मुझे निरीह युवा पुत्र  की तरह दिखाई पड़ता है ---
  4. उसका एक अव्यक्त दुःख , एक आर्तनाद रोजाना मुझे सुनाई देता है --मुझे रूकना पड़ता है उसके पास,सांत्वना देती हूँ -  कहती हूँ कब तक ठूँठ रहोगे एक दिन यहीं से कोंपले फूटेंगी तब तुम चारों तरफ से लहराती शाखाओं वाले सुन्दर वृक्ष बन जाओगे --तब देखना किसी को भी याद ना रहेगा की तुम कभी इतने निरीह रहे होगे बस खुश् रहा  करो और इन्तजार करो उस दिन का जब लोग ठिठक कर तुम्हारे पास रूकेंगे तुम्हे निहारेंगे तब तुम अपनी डाल  पर खिले सैकड़ों फूलों संग दुलार प्यार में ही व्यस्त होगे 
  5. टेसू  के खुरदुरे तने पर काली चीटियों की कतार ऊपर तक जाती दिखाई पड़ती है जो फूलों के गुच्छों के पास जाकर खो जाती है ---चीटियों की मीठी प्यास बुझाता --खुद टेसू कितना प्यासा है, कौन जनता है --उदासी में भी मुस्कुराता हुआ , इसके ठीक सामने --डा मित्रा का बँगला  है जो आजकल अपनी चमचमाती बड़ी सी  सफेद गाडी  को इसकी शाखाओं के नीचे  खड़ा कर देते हैं --सुबह देखो तो लगता है किसी युवती के सफेद दुपट्टे पर रेशमी  सिंदूरी टेसू फूल कढ़े  हो --यहाँ वहां ये एक अद्भुत नजारा होता है --लेकिन कारवाश वाला बड़ी बेरहमी से उन्हें बुहारता हुआ यहाँ  वहां बिखेर देता है --फूल गिरते हुए टायरों के नीचे  बिखरते -कुचलने को अभिशप्त होते जाते हैं, डा मित्राका  परिवार शायद ही कभी इसको अपनी प्यार दुलार भरी नजरों से देख पाया हो ---काश ये मेरे घर के सामने होता  --इसके दहकते फूलों में कितनी ऊर्जा है इसके रंगों में कितनी प्रियता है वो समझ पाते --जिंदगी में वो सब आपके पास नहीं होता जिसकी आपको दरकार होती है ---देवताओं  के प्यार से अभिशप्त टेसू के फूलों को इन दिनों मंदिर में देवी देवताओं की मूर्ति पर भी अर्पित कर आती हूँ शायद कभीये शाप मुक्त हों और इन्हे भी चौतीस करोड़ देवी देवताओं का पवित्र और असीम दुलार -प्रेम मिल सके अन्य फूलों की तरह और इसके पेड़ को भी वो ही मान्यता मिले जो बरगद और नीम पीपल की है --कोशिष्टो कर ही सकती हूँ 

  6. [व्यक्ति एवं अन्य द्वारा निर्मित ऐसी कई स्थितियों के अलावा भी संसार में बहुत कुछ है जिनके अस्तित्व से  जुड़कर हमारे विचार नवीन ऊर्जा से भर जाते हैं --जैसे वृक्ष नदी पर्वत पहाड़ पशु पक्षी --जो जीवन की गहरी जड़ों तक ले जाते हैं हमारी स्मृतियाँ ताज़ी करते हैं  और सबसे ज्यादा आसानी से याद रखने वाली बात को याद रखने और भूल जाने वाली बात को भूल जाने में सहायक बनते हैं --मेरा अनुभव तो यही है ---]

शनिवार, 7 मार्च 2015

सोचते ही पहुँच जाना भीतरी हदों तक --बेछोर आसमान में ,बियाबान जंगलों में पुराने अस्त्रों से बार बार मुश्किलों को, काट छांट कर पहुंचना तुम तक, एक राग, एक प्रियता का बुलाना।

जब तुम्हारी लय टूटती है,असंगत होती जाती है -अच्छा नहीं लगता एक छोटी सी जगह में छोटे-छोटे शब्द अनुत्तरित हो घायल कबूतरों की तरह लौटते हैं,--सुरमई शाम में, अपने मौन में अपनी यात्रा से ऊबा हुआ  थोड़ा- थका सा ,दिन डूब ही जाता है ,तारीखें बदलती जाती हैं लेकिन कुछ चिन्हित पल रूक रूक दस्तक देते ही जाते हैं उस तरफ से कोई आहट  ही नहीं जैसे कोई बीहड़ शुरू हो -दूर तक- देखो तो कुछ सुझाई नहीं देता -किसी पल को तो सन्नाटा अपनी जद  में लेने की जिद्द भी करता है निजी वजहों से बिछुड़ते पल धूसर हो रह जाते हैं यकीन जानो दिल भी दुखता है बेहद तकलीफ भी होती है ये टोकरी भर लोग मेरे तुम्हारे बीच मन भर पहाड़ कैसे बन जाते हैं, नहीं जान पाती --ये तो मानोगे मुझे सब रंग अच्छे लगते हैं --बस यही धूसर रंग नहीं, सन्नाटे का चुप्पी का ये रंग, हद दर्जे तक इससे मुझे नफ़रत है --बाकी सब रंग मुझे लुभाते हैं-अपने खुश रंग में --फिर भी रंगो से मुझे डर  लगता है--तुम भी जानते हो -सफेद सुबह जीवन से भरा और शाम काला श्याम सा बस ये दो रंग ही अपनी सपाट बयानी में ज्यादा आकर्षित करते हैं-हालाँकि रंगो को ढोंगी होना नहीं आता,तुम्हारी कविताओं के रंगों को तो बिलकुल भी नहीं, कितनी सरलता से लिपट जाते हैं मुझसे-फिर दिनों हफ़्तों महीनो लिपटे लिपटे ही मुझमें समा जाते हैं।   लेकिन पिछले कई सालों से जबसे तुम्हे जाना है --कच्चे पीले फूलों से लदा -फदा एक प्रौढ़ टेबुआइन मेरे सिरहाने वाली खिड़की की चौखट  तक आकर अपनी भव्यता के साथ खिल-खिल करता,खुश करता है उसके रूई जैसे नर्म गोलगोल फूल  हवा चलते ही अंदर सिरहाने तक फैल  जाते हैं 

 सिरहाने खुशियां हो तो भरपूर नींद का आना लाज़िमी है--किन्तु  हर दिन तो ऐसा नहीं होता -खुशियों और उदासियों के सामानांतर स्मृतियाँ चलती है मन को मथती  हुई. उस दिन तुम्हारी हथेलियों में कच्चे आम्रबौर की खुशबू थी वो हथेलियाँ मेरे हाथों में थी और उड़ती ख़ुश्बू आँखों से भर एक दूसरे पर उलीचते हुए हम दोनों -तुम्हे जाना था,मैंने बस जाते हुए महसूस किया तुम्हे,देखा नहीं,देख ही नहीं सकती थी दर्द आँखों में घुलता है बहता नहीं - उस शाम के बाद देर तक रात भी जागी रही संग-घर से लगे उजाड़ पार्क को नगर निगम वाले देर रात तक रेट गिट्टी, मिटटी से-पूरते रहे स्मृतियों की आवाजें भी आती रही --भरती  रही सुबह तक , कहते हैं, जिस साल आम्र ज्यादा फलता है , वो साल शुभ शुभ होता है एक हठ भरी कोशिश --अब ना छूटेगी ना घटेगी वो शुभ महक ,दिन बढ़ते हैं तपे हुए दिनों के साथ  धत्त'' हठात ये सोचना की ऐसा भी होता है --और सोचते ही पहुँच जाना भीतरी हदों तक --बेछोर आसमान में ,बियाबान जंगलों में पुराने अस्त्रों से बार बार मुश्किलों को, काट छांट कर पहुंचना तुम तक, एक राग, एक प्रियता का बुलाना। सजीव स्मृतियों का चलना कोई समृति भूलती नहीं कोई सपर्श छूटता नहीं ---बिना सलवटों वाला शांत समुद्री हरा हरा रंग - मन को सजल बनाय रखता है --लेकिन सृष्टि का क्रम टूटता है एक दुनियादार औरत अंदर बैठी डराती है अपनी जिरह मुश्किल में डालती है सच और सच के सिवा कुछ नहीं वर्जित क्षेत्र में अपनी पहचान मत खोना ?--उसकी बातों से दूर निर्भीक बन सोचती हूँ तुम्हे, बस तुम्हे सोचना ही तो जिलाता है भीतरी कोई अभाव, जिसे लबालब भरता है अपने एकांत और बाहरी शोर से उपजी एक तरंग एक घटना जिसके तारतम्य में विनिर्माण को गूंथना और फिर देखना देर तक उजालों में दर्ज होती तुम्हारी उपस्थिति --एक नैतिक अन्वेषण की मानिंद जिसे में आखिर खोज ही लेती हूँ अपनी पनीली खोजी आँखों से एक कच्ची महक बजती है --डूब जाने को आतुर 
 
[तनहा उसे अपने दिले तंग में पहचान हर बाग़ में हर दश्त में हर संग  में पहचान 
हर आन में हर बात में हर डग में पहचान,आशिक़ है तो दिलबर को हर रंग में पहचान ]


[नज़ीर]  

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

-देह अद्भुत शान्ति की खोज में अपने से ही नितांत अलग थलग चल पड़ती है ---चरम उपलब्धि से कुछ कदम पीछे ही, राग -विराग ,आसक्ति -अनासक्ति ,मिलन--बिछोह और समय की क्रूरताओं में हमारी समिल्लित अनुभूतियों के बीच आकार लेता

में कहना चाहती थी,और नहीं कह पाई,उस दिन --उसका मिलना मतलब अक्सर कुछ ना कुछ छूट जाना--और चले जाने के बाद सैकड़ों बातों से मन भर लेना --येभी- वोभी जाने क्या क्या कहना, रह जाना  -  
दो चीजें ही हमें एक जुट,जुड़े हुए और एक रखती है --तुम्हारा शिद्दत से लौटना और मेरा इन्तजार --भीतरी  और बाहरी-और फिर लौटकर --मेरा पुकारा गया नाम, जब --आवाज फकत आवाज नहीं होती है उस वक्त वो --एक आख्यान होता है - 
समय के  अजनबी रंगो ,रोशनियों  शब्दों की बाढ़ में --बहुत भटकन और अंतराल के बाद मिलने वाला चेहरा सचमुच अपना है, संशय से मन कुलबुलाता है ---तुम्हारे चेहरे पर टिकी मेरी आँखें बस मूंद सकती है ----उधेड़बुन में भटकते शब्द कुछ अर्थ बुन पाते तभी ये सोच कि - जानती हूँ भटकाव जिंदगी को गहराई देते हैं -कितना अच्छा होता --आदमी किताब की तरह खुल  तो  पाता। 
अक्सर  दुःख निराशाओं के मायने ढूँढ़ते हैं --मेरे प्रयत्नो में मुक्ति की कामना नहीं होती वहां -कारण और परिणामों का विश्लेषण भी नहीं होता --इसलिए दुःख भी नहीं , 

जानते हो- जिस समय में तुम नहीं होते, भीतरी अनुभव संसार खाली सा अपने अधूरे आपे के साथ विकलांग हो कर रह जाता है --एक बेसुरी चुप्पी -जिसमें -फरियाद की कोई लय  नहीं रूखा सूखा सा-- 
एक ध्यानाकर्षण की सूचना की तरह --दूसरे छोर के शोर गुल में अनसुनी -गुम हो रह जाती है --क्या कहूँ बस अपना वास्ता ही दे सकती हूँ कितनी जकड़न -सिहरन एक रात बिन सोये बीतने की थकान -भरम हो जाता है --इस सत्य के साथ की में बस वो हिस्सा हूँ --जहां  भय और इक्षा का एक सा चेहरा है, जिसे तुम्हारी भीतर वाली आवाज पहचानती है ये --सोच कि  -तुम्हारे लिए इस कदर जरूरी क्यों है  दुःख का अपने साथ बनाय रखना  ? दूर दराज के ठिकानो में ढूंढ  आना फिर  बेहाल होना ---और नहीं मिलना खोई हुई चीजों की तरह एक बैचैनी --थोड़े संदेह की तरह की, मिलोगे भी या नहीं शंका-कुशंका के कुहासे में चीजें साफ नहीं होती एक अहसास की, इतनी आवाजों में से कौनसी पद चाप देर तक सुनाई देती रहेगी ,सुख तो सापेक्ष है --वसंत आते आते रूक जाता है एक हद के बाद -
-देह अद्भुत शान्ति की खोज में अपने से ही नितांत अलग थलग चल पड़ती है ---चरम उपलब्धि से कुछ कदम पीछे ही, राग -विराग ,आसक्ति -अनासक्ति ,मिलन--बिछोह और समय की क्रूरताओं में हमारी समिल्लित अनुभूतियों के बीच आकार लेता --हमारा बचा हुआ प्रेम,इसी उम्मीद पर तो बाढ़ को तैर कर --तूफान को पार कर --इस दुनिया को तुम्हारी ही आँखों से देखते हुए,कोई अगर बची हो उन अधूरी इक्षाओं को पूरा करना, जीना चाहती हूँ, असंभव में कुछ संभव जोड़ते हुए -उन -सारे सपर्शों को गंध में लपेट--झिलमिलाते हुए 
अधीर दिन की तरह,  दो शब्दों में बोला गया एक शब्द, शहद में गूंथा हुआ नाम , देह की परिचित भाषा में - दिनों हफ़्तों महीनो सालों जिसमें तुम उजाले की शक्ल में दिखाई देते रहते हो हरदम , अपने लिए, तुम्हारे लिए बचाये गए जीवन में, अपने वासन्ती आँचल के बालूचरि ताने- बाने में,एक भरा पूरा सच, जिसे  इस जीवन में  तुम्हारे सिवा कोई कुछ नहीं जानता
 [''एक संभव दिन'' ---अपनी एक लम्बी कहानी का अंश ]

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

शब्द उसे ढाढ़स बांधते हैं ---वो उस आवाज की धुंध से बहार आती है -चुनी हुई नियति को तो एकबारगी स्वीकार किया जा सकता है थोंपी हुई को नहीं

कभी  तो क्या, अक्सर ही- निचाट दुपहरी को --खुमरी --की तरह सर पर ओढ़ लेना मजबूरी हो जाती  है 
अच्छा भी लगता है लेकिन बोझ भी लगता है ऐसी बिन बुलाई बरसात में चौक चौरस्ते लहराती गीली हवा से शहर को भिगोते हुए दौड़ लगाते हैं--तेज आंधी कड़क बिजली कलेजा फटता तो नहीं डर  से बैठ  जरूर जाता है इस लम्बे चौड़े जीवन में कई शब्द सीखें --कई बिना अर्थ के शब्द, खिलौने की तरह खूब जुटाए --मुझे प्यार आता है ऐसी ही निचाट दुपहरी में जब बारिश गुजर जाती है और हर तरफ वनस्पतियों --वाली खुशबू के साथ यही गीली हवा थोड़ा थोड़ा रूक रूक कर ठिठुरती है --याद आती है वो शाम --जायज अंत था उसदिन की उस  शाम का शब्द मोहताज थे जिसे जहाँ तर्कों और इक्षाओं के बल पर नहीं परम्पराओं और संस्कारों  के बल पर सोचा गया था, समय की किल्लत थी ---ना ट्रेन के लिए कोई अनाउसमेंट  था की फलाँ अपने निर्धारित समय से दो घंटा विलम्ब से पहुंचेगी या पहुँच रही है ,अक्सर तो मुठ्ठी भर सपने भी मुठ्ठी में ही चकना चूर हो जाते हैं ----कई सवालों से खीज़ पैदा होती है कई के जवाबों से सुकून मिलता है मगर वो अधूरे रह जाते हैं ---कॉफी की  गर्म भाप में सपनीली आँखों का विस्तार रेतीला हो रह जाता है ----उसका उठना गहरी आँखों से झांकना बिछी हुई बिसात पर सधे  क़दमों से चलते हुए चले जाना ---कल्पना से बाहर  हो,छूट  जाता है समीकरण ना गड़बड़ायें -चलो फिर मिलते हैं ---शब्द उसे ढाढ़स बांधते हैं ---वो उस आवाज की धुंध से बहार आती है -चुनी हुई नियति को तो एकबारगी स्वीकार किया जा सकता है थोंपी हुई को नहीं --वक़्त नहीं रूकता कई बातों  चीजों से ---सोच का सिरा फिर रेंगता सा आगे दिशा में बढ़ जाता है ---और बहुत कुछ आँखों में उतरता है ,भरम नहीं मुझे साथ का विश्वास चाहिए वसंत चाहिए -आँखें फिर मूँदती है थक कर एक दुपहरी सन्नाटा पेड़ों पर लटका आँखों के अंधेरों में अटक जाता है ---ज़रा सब्र करो --अपने को समझाती  हूँ --वो पुराना शहर तुम्हारे सपनो में आएगा ---तुम ये सोच के तिल से --ताड़-पहाड़ क्यों बना डालती हो ---ऐसा कुछ नहीं होगा अपने से आश्वस्त होना सबसे अच्छी स्थिति है --अक्सर उसके लिए सर झटक कर कई दृश्यों को विछिन्न कर देना   भी उसी के बूते की बात है वरना तो 
कल परसों और आज जो अच्छी खासी बारिश हुई --शाम इंद्रधनुष निकल आया, रंगो संग विशवास के शब्दों ,रिश्तों और जीवन साथ उसकी दैनिक कार्यसूची में शामिल था उसे सोचना --देर रात सितारों की बातें सुनना  अंतरिक्ष में विचरना --वो तो रास्तों की निश्चिंतता रहती है --कभी कभार हताश  खाली हाथ भी घर वापसी होती है --देर रात नींद नहीं आती --आती है तो --आँखे  जागी रहती है --अपनी ही धड़कन प्रत्यारोपित दिल सी अजनबी सी --एक धुकधुकी अक्सर कलेजें में --हथेलियाँ थाम  लेती है --नाप लेती है धड़कनो में बसी आवाजों को ---नदियों बियाबानो पहाड़ों  कचरों में घूम घूम कर अपने अर्थ खोजो तो अर्थ भरे रंग मिल ही जाते हैं ----जी लेते हैं --अपनी मिटटी अपनी वनस्पति से भर लेते हैं खुद को, शुक्रगुजार हो जाती हूँ तुम्हारे साथ जाने किस किस की, धूप  हवा पानी आकाश इस उदासी इस प्रेम की भी ऐसे जीना कि  दिन महीना साल दर साल प्रेम की अबोध प्रार्थनाओं  में --बीत जाना फिर याद आता है छीजना भी --अपना आप ---जैसे कोई   पोखर गर्मियां आते आते कैसे छीजता  जाता है 
 किनारों की मिटटी से सूखता दरकता वैसे ही --और वहीँ किनारे पीले पड़ते पत्तों  से लदे  अमरक के
पेड़ों से  कुछ पत्ते गिरते सूखी जमीन की दरारों में धंसते  ही जाते हैं  आगे आकर चीजें पीछे रहती हैं --पीछा नहीं छोड़ती---बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती है अपनी उपस्थिति दर्ज करने से बाज नहीं आती  टूटकर गिरते पत्तों की उदासी में से एक पल ख़ुशी  का जब एक नाम उभरता हैमोबाईल की  नियॉन लाइट में ,एक साधारण से दिन और  निरुपाय दिन में, खोई ख़ुशी  मिलने की ख़ुशी शामिल हो जाती है 

  •    उम्रे     --रफ़्त --पे  अश्कबार     न  हो 
  • अह्दे -गम  की हिकायतें मत पूछ [फ़ैज़ ]