शनिवार, 5 जून 2010

हमारा पर्यावरण हमारी चिन्ताएं ....हमारी नदिया ...(विश्व पर्यावरण दिवस पर...) //-


ये चित्र और स्लोगन अहिल्या बाई होलकर की पूर्व राजधानी महेश्वर घाट से करीब छ माह पूर्व लिया गया था ....नर्मदा किनारे स्थित इस घाट तक पहुँचने वाली एक संकरी सड़क पर दोनों तरफ की दीवारों पर पर्यावरण जागरूकता को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है ..पश्चमी मध्यप्रदेश के निमाड़ जिला खरगोन का यह सुप्रसिद्ध पौराणिक एवं धार्मिक स्थल आज शासन की उपेक्षा का शिकार हो कर रह गया है वर्ष १९९१ को जब पर्यटन वर्ष घोषित किया गया था, तब म.प्र राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा अनेक प्रसिद्ध स्थलों को विकसित करने और उनके रखरखाव की मह्त्वाकांची योजनायें हाथ में ली गई ...उसके अमली करण का लेखा -जोखा तो एक दूसरा विषय है ,फिर भी अहिल्या बाई का खूबसूरत किला आज भी नर्मदा के बीचों बीच से देखने पर अकेला उपेक्षित दिखाई पड़ता है,किले के अन्दर जरूर चहल-पहल है जहाँ रेवा सोसायटी द्वारा जग प्रसिद्ध साड़ियों का निर्माण पावर लूम पर होता दिखाई देता है ....समय-समय पर नर्मदा शुध्धि करण योजनाओं के तहत लाखों रुपया स्वीकृत होता है ,लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात की तरह पर्यावरण की दिशा में ना ही नियमित कोई काम होता है, और ना ही कोई ठोस पहल....
मानवीय पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र समेलन में स्व. इंदिरा गांधी जी ने कहा था की जीवन एक है और विश्व एक है और ये सभी प्रश्न परस्पर सम्बंधित है .जनसंख्या विस्फोट गरीबी ,ज्ञान तथा रोग हमारे परिवेश का प्रदूषण ,परमाणु हथियारों का जमाव तथा विनाश के जैविकीय तथा रासायनिक साधन से सभी एक दूसरे के दुष्चक्र के हिस्से हैं जिनमे से प्रत्येक बात महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है किन्तु उनमे से एक एक करके निपटना बेकार होगा .भूतकाल को गले को लगाए रखना या दूसरों को दोषी बताना व्यर्थ है ,क्योंकि हम में से कोई भी निर्दोष नहीं है.यदि कुछ लोग दूसरों पर प्रभुत्व जमा लेते हेँ तो ऐसा कम से कम अंशत दूसरों की कमजोरी एकता की कमी या कुछ लाभ पाने की लालच के कारण होता है .यह समर्धि शील लोग जरूरतमंद लोगों का शोषण करते हेँ ..तो क्या हम इमानदारी के साथ यह कह सकतें हेँ कि हमारे स्वयं के समाजों में लोग कमजोरों कि कम जोरी से फायदा या लाभ नहीं उठाते,हमें उन् मूलभूत सिधान्तों का जिन पर हमारा समाज आधारित है और उन आदर्शों का जिन पर वे टिके हेँ ...पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए यदि ह्रदय परिवर्तन ,दिशा परिवर्तन, और कार्य प्रणालियों का परिवर्तन होता है तो कोई एक संगठन या एक देश ,चाहे उसका आशय कितना भी अच्छा हो ऐसा नहीं कर सकता .प्रत्येक देश को समस्या के उस पहलु को हल करना चाहिए जो कि उसके लिए सर्वाधिक संगत हो. फिर भी ये सपष्ट है कि सभी देशों को एक समग्र प्रयास से एक जुट होकर कार्य करने चाहिए और हमारी ग्लोबल समस्याओं कि सम्पूर्ण व्याप्ति के प्रति पैमाने के आधार पर सहयोग पूर्ण द्रष्टिकोण अपनाने के अलावा कोई चारा हमारे पास नही है ...

अकेली चट्टान ने ,हर क्षण टूटने पर भी ,नर्मदा में खड़े रहकर ,रोकना चाहा ''रेवा '' वेग को ..ओ यशश्वी नदी वह में हूँ .....आज ना सही कल में इस भय को वैसे ही पीछे छोड़ कर आगे बढ़ जाउंगा ,जिस प्रकार नर्मदा का यशश्वी जल सब कुछ छोड़ता हुआ प्रवाहमान है ....श्री नरेश मेहता के उपन्यास ''नदी यशश्वी है '' से ...

दिसंबर २००९ में महेश्वर [इंदौर ] यात्रा के दौरान लिए गये चित्र...

शुक्रवार, 28 मई 2010

पलाश के जंगल की तरफ देखो तो मानो आग लग गई हो ,पलाश फूलता है तो खूब दुःख देता है दर्द के साथ ,सारे फूल झड कर जमीन पर गिर बिखर जाने में अपना माथा धुनक कर रह जाते हेँ,.पलाश का जंगल अब घना नहीं रहता //-


बहुत दिनों तक हलके नीले आसमान से उसे चिढ होती रही ..जब थी तब थी लेकिन अब नही ,ठीक जिसके नीचे एक पलाश का एक जंगल था उसका ...और स्मृतियों में अंटती हुई एक उनींदी शाम तेजी से घनी होती हुई ,जहाँ से दिल दिमाग उसे जंगल की पथरीली राहों संग झुलसा देने वाली गर्मी के साथ गुजारता -हर दिन रेशा-रेशा रीतता हुआ -दिनों दिन उन दिनों अनगिन चेहरों की भीड़ लगातार घटती बढती रहती जंगल कुम्हला रहे थे वहां दुनिया कगार पर थी एक निचाट में सब कुछ छूटा हुआ हाथ से हाथ भी .
भाषा की कशीदाकारी उसे खूब आती है,फिर भी सीधे से जवाब नहीं मिलता ,उसे उब होती,ग्लानी और कभी-कभी वितृष्णा भी ऐसे में हमेशा एक निर्णायक स्थिति में पहुँच जाना लेकिन जाने क्यों फिर पीछे लौटना होता वो ,एक अहम् पल होता..जिन्दगी तेजी से बदलती है गोल-गोल चक्कर घिन्नी खा कर,लडखडाते पांवों को यहाँ वहां रोकते-रोकते स्थिर करना ..घूमते हुए सर को दोनों हाथों से थामना तब कुछ भी अख्तियार कर पाने की स्थिति देर तक नहीं बन पाती ..लम्बी-लम्बी फूली हुई साँसों के साथ ..एक नीले फूलों वाली घेरदार फ्रौक का घेरा देर तक आँखों में घूमता है ,तब खेल था अब नहीं ..तब सच था ,अब झूट ...एक अजीबों गरीब तरह के तेवर दिमाग को उलझाए रहते .....पलाश के जंगल की तरफ देखो तो मानो आग लग गई हो ,पलाश फूलता है तो खूब दुःख देता है दर्द के साथ ,सारे फूल झड कर जमीन पर गिर बिखर जाने में अपना माथा धुनक कर रह जाते हेँ,.पलाश का जंगल अब घना नहीं रहता ,और स्मर्तियाँ साफ होती जाती है,दूर के द्रश्यों से गठजोड़ करती सी कई शब्द,कई स्पर्श ,छूकर लौटते हेँ ....शहद में घुलते..रंगों में डूबते इतने मीठे इतने गहरे की यकीन ही नहीं होता ---रेशमी चाँद की पीली रौशनी लगातार समानांतर चलती और यकायक भूत की तरह गायब हो जाती. हम पूछ्तें हेँ एक सादा सा सवाल,कहाँ है हमारी जगह और उसकी नजरें सिमट जाती है .उसी के चेहरे पर,ये क्या ? हठात ..आलतू-फालतू सोच ले बैठी--सोच का बोझिल उहापोह -वो इसमे लथड़ना नहीं चाहती ..कुछ पल को कुछ चेतावनिया ..असाध्य को साधने की कोशिशें करती है ,और एक असमंजस से बाहर निकलने में सहायक भी जो जुड़ाव था ,आकर्षण था ,आदर्श था ,प्राप्य था, प्रिय था ----भीतरी -भीतर को उलट देना चाहता है रत्ती-रत्ती खुरच देना नहीं उससे ऐसी या यूँ उम्मीद नहीं थी नहीं ऐसे में भला कोई उम्मीद हो भी कैसे सकती है ....कितना कुछ आँखों में महकता है ,छलकता है..खोया हुआ समय मुठ्ठी में आजाता है, इस आद्रता में निजता देख पाना और भी मुश्किल ...एक परफेक्शनिस्ट अहंकार की मौजूदगी में अनगिन इक्छाओं की प्रत्याशा में दिन रात का घुलते जाना ..पानी में नमक सा ..ऐसा कैसे चलेगा ...इश्वर जानता है पाप-पुण्य.सच झूट बीते -आते समय के साथ एक नितांत अतार्किक यथार्थ बच जाता है वर्तमान तो बीत ही जाता है,जिसके साथ उचाट हो कुछ और भी बीतता है ,बहुत कुछ दरकिनार होता है अस्थिर चाल से एक फीके चेहरे से बनावटी मीठी हंसी उसे उस घनीभूत आयात में कसती है दम घुटता है इतने बड़े झूट से ....एक निर्विकार -आकार में बदलता है मनुष्य के भीतर देवता व्यर्थ होता है समीकरण गड़बडाते हेँ ,एक तस्वीर में दिन रात, आसमान ,तारे चाँद और एक पल गैरहाजिर होतें हेँ बहस ख़त्म बस,अब अदालत मुल्तिबा की जाती है ...

बहुत पहले एक कहानी का प्रारूप लिखा था, कोशिशों के बाद भी पूरी नहीं हो पाई ...कभी हो शायद ये कहानी की शुरुआत नहीं ,कहीं बीच का टुकडा है शुरू और अंत अभी सूझा ही नहीं ..दुःख तो पकड़ में आता है लेकिन सुख नहीं यदि अंत सुखद नहीं हुआ तो जीवन तो व्यर्थ गया ना ..बस इसी लिए ... ...लेकिन अभी ज्यो की त्यों ..


सोमवार, 17 मई 2010

जलती-बुझती रोशनियों का एकालाप... एक माँ के दिल से... //-



ये एक बात बचपन से सुनती आई हूँ, मेरी नानी कहा करती थी, फिर माँ और जब में खुद एक 18 साल की बेटी की माँ हूँ तो अनायास मेरे मुँह से भी कभी-कभार ये निकल ही जाता है - "तुम (ये) लड़की क्या निहाल करेगी..!!"... लड़कियों से माँ को ही सबसे अधिक अपेक्षा होती है, वो सोचती हैं लड़कियां खाना बनाये दूसरे इतर काम भी करें, यदि छोटे भाई-बहन हो तो उनकी देखभाल और साथ ही उनकी दूसरी ज़रूरतें भी पूरी करें, और यदि लड़की थोड़ी बड़ी हो तो पिता-भाई के हुक्म पर भी दौड़ी-दौड़ी फिरे... मेरी माँ और नानी दोनों एक ही सुर में कहती थी - "एक औरत को एक पल भी होश खोये बगैर जीना चाहिए... चाहे वो सो रही हो, हर पल चौकन्ना और चौकस उसे होना ही चाहिए..."... और भी न जाने किस-किस तरह की हिदायतें... ये पहनो, वो खाओ, ऐसे नहीं वैसे, वो नहीं ये, यूँ नहीं इस तरह... और ऐसी कई बातें जो प्रसंगों की तरह जीवन में जुडती गयी, और जो आज भी याद हैं... कुछ बातें सुनते थे, कभी बगावत भी करते थे - ये बात अलग थी की हमारी बगावतों का वहां कोई असर नहीं होता था! परिवार में उनके हुकूमतों के साथ ही उनके छोटे-बड़े संघर्षों की हिस्सेदार अनायास बेटियां भी होती जाती हैं. नानी अनपढ़ थी किन्तु दुनिया-दारी के पाठ में अव्वल और पारंगत... माँ उस ज़माने की graduate , मेरी नानी 12 घंटे रसोई में खपती थी, माँ आठ घंटे - जिसमे उनके पूजा-पाठ और नोवेल्स पढना भी शामिल था और में अपने किचिन को बमुश्किल सुबह-शाम मिलाकर चार घंटे भी नहीं दे पाती हूँ, अब अपनी बेटी से क्या उम्मीद रखूं? एक हद तक उसकी नूडल्स, बर्गर, पिज्जा की दुनिया है, जिसमे कंप्यूटर, चैटिंग, कॉमिक्स, नोवेल, म्यूजिक (इंडियन / वेस्टर्न दोनों), दोस्त, पढाई भी शामिल है... यह सही है वो रोजाना काम में हाथ नई बंटा पाती लेकिन आकस्मिकता में पूरी तौर पर किचिन में साथ होती है... अक्सर मेरे पति भी कहते है - "तुमने इसे कुछ नहीं सिखाया!". हमारे दूसरे परिवारों में माँ के साथ फुल-टाइम काम करने वाली लड़कियों के उदाहरण और ताने भी सुनने पड़ते हैं... "वो देखो , इतनी पढाई कर रही है, तुम्हारी लाडली सो रही है!".. अब में उनसे क्या कहूँ? एक लड़की की लाखों बेचैनियाँ हो सकती हैं... उसे खुद अपनी तरह से बड़ा होना और इस दुनिया में अपने कायदे करीने से जीना भी तो ज़रूरी है. मन ही मन कहती हूँ, "सुनो! कई चीज़ें है जो लड़कियों के जीवन में बदलनी है.", लेकिन इस बदलाव में कई ताकतें रोड़ा बन जाती हैं... सबसे पहले घर से ही इसकी शुरुआत होती है और उसे हम अनदेखा किये जाते हैं.
अभी जैसे कल की ही तो बात है, छोटी सी थी.. गोद में लिए न जाने कितने काम निपटा लेती थी मैं, कई बार ज़िन्दगी तेजी से बदल जाती है, इतनी कि अजीब किस्म का डर लगता है और हम भौंचक रह जाते है - एक अपराधबोध में घिर जाते हैं... क्या वाकई एक अच्छी माँ बनना मुश्किल है? अपने आप से प्रश्न होता है... अपने बचपन की ओर पलटती हूँ तो कोई बंधन नहीं था बस हिदायतें मिलती थी, ज़बरदस्ती नहीं होती थी... लेकिन नानी, माँ,पिता, बड़े भाई की निगरानी में उनकी मर्जी से सबकुछ सटीक हो जाता था, लेकिन अब हम अपनी कई इच्छाओं की तरह किसी दूसरी इच्छा को भी असंभव मान लेते हैं और इसी असंभव में खो या डूब जाने तक अपने सच को नैस्तानाबूत करके ही दम लेते हैं... और ये सच है अब भी हमारे परिवारों में, समाज में जिस लड़की/स्त्री को रोटी-खाना बनाना ना आता हो वो सुघड़ नहीं मानी जाती. अक्सर जब मेरी बेटी की तुलना परिवार वाले उसकी कज़िन बहनों से करते हैं, मुझे खुद यह सब ठीक नहीं लगता क्योंकि मेरी बेटी वक़्त ज़रूरत खाना तो बना ही लेती है लेकिन साथ ही वह कंप्यूटर संबंधी, बैंक, बाजार, बिल्स आदि कामो के भुगतान के साथ ही दुःख, बीमारी और दूसरे अन्य तकनिकी कामों में भी मेरी मदद कर पाती है... इस मायनो में वो अन्य लड़कियों से तो प्लस हुई,लेकिन उसे मान्यता नहीं मिलती... हमारे यहाँ औसत भारतीय पढ़े -लिखे परिवारों में भी खाना बनाना ही सब कुछ माना जाता है...
स्त्रियों के जीवन में कुछ काम नैसर्गिक होते हैं और मुझे लगता है उन्हें सीखने में कोई तुक नहीं. मेरी माँ ने हमेशा पढने पर जोर दिया, बुनाई-कढाई सीखने के विषय में उनका कहना था - "ये सब यूँ ही पैसों में मिल जाता है.. पर समय नहीं मिलेगा, इसीलिए पढो!".. सच ही है अशिक्षा ही स्त्री के दुखों का कारण है, स्त्री को यदि स्टैंड करना होगा तो उसे पढना ही होगा.. थ्योरी / प्रक्टिकल/ टेक्नीकल सभी कुछ... अपनी बेहतरी के लिए स्त्री को एक बार चीन की तरफ देखना होगा, वहां स्त्री व्यक्ति रूप में जीवित है और अपने स्त्री होने की सीमा तक स्वतंत्र भी है.
शक्ति, सत्ता और वैभव की इस दुनिया में कोई लड़की बाद में स्त्री बनी एक औरत इस दुनिया द्वारा पहले से रूढ़ बना दिए गए निष्कर्षों में ही आखिर क्यूँ जिये -मरे? ताकि उसे खुद लगने लगे की संतुलन बिगड़ा की सब कुछ बिखरा... परम्पराओं से जड़े कट्टर लोग ही नहीं अपितु पढ़ा-लिखा प्रबुद्ध वर्ग भी, आज भी लड़कियों को स्केल, तौल या मीटर से नापते हैं... जैसे उनकी ज़िन्दगी जीने के पैमाने होते हैं, और आप पर भी आसानी से ऊँगली उठा देते हैं, आखिर क्या सिखाया अपने अपनी बेटी को. लेकिन कोई नहीं समझता एक लड़की की आकांशा स्वप्न और उसके भय को स्वीकार करना भी तो ज़रूरी है... कौन जानेगा माँ के पुराने दिल में,बेटी के दिल की ताज़ी धड़कन... क्या ज़रूरी है वो इस समाज-परिवार की मूक प्रतिछाया बनी रहे, बिना कोई प्रतिकार के, पर- दुःखकातरता को सहेजे रहे, एक निशब्द समर्पण जीवन जिये.
मुझे कभी-कभी तेजी से हिचकी आने लगती है... कहते हैं कोई याद करता है तो ऐसा होता है, सात घूँट पानी पी लेने पर हिचकियाँ आप ही बंद हो जाती है, तो कौन याद करता है? किसने याद किया होगा? पिता, भाई, माँ, बहन, छूटा हुआ कोई, कोई दोस्त, कोई परमप्रिय... जाने कौन? एक बार घर-बार छूटा तो बस छूटा, लड़कियों का... बस ऐसा ही झूठा सच जीना होता है, फिर ऐसे में क्या ज़रूरी है ताउम्र, अपनी बेटी के लिए माँ से बेहतर कौन जान सकता है..? अपनी नियति उसे खुद बदलना और निर्धारित करना सिखाना, दुःख के निराकरण के लिए सिर्फ आंसू बहाने की बजाये किसी आपात स्थिति में अपने हिसाब से द्रढ़-हो नियम बनाना, बेशक कोई नियम गड़-बड़ भी हो जाये तो हर्ज क्या है? इतनी बड़ी ज़िन्दगी में दस-बारह फैसले गलत भी हो जाएँ तो आगे आने वाली बड़ी मुश्किलों में वो सहायक ही होगी, एक अच्छे के निमित. मुझे लगता है मेरी बेटी ही नहीं हर लड़की परिवेश की गहरायी में ईमानदार बने रहने मात्र से ही सब कुछ सीख सकती है साथ ही कोरी भावुकता की बजाय प्रेम के घनत्व का महत्व भी समझ सके, बस इसके लिए थोड़ी सी कोशिश करनी ज़रूरी है, अच्छे और बुरे की पहचान करना सीखना भी... आज हर दिन बदलती और नई आयातीत तकनीक और उपभोगतावाद के खतरों और हादसों में जीने-मरने की आदत डालना भी ज़रूरी है, और अपने सामाजिक सरोकारों को भी सुनियोजित करना ज़रूरी है.
मेरी माँ जो व्यंजन बनती थी उनसे बेहतर चाहे मैं नहीं बना पाती हूँ लेकिन उन जैसा मैं भी बना लेती हूँ, घर की साज-संवार, देख-रेख... एक जरुरत और जिम्मेदारी के साथ निभाती हूँ... मेरी बेटी मेरे से बेहतर चायनीज/थाई फ़ूड बना लेती है, तो इसमें कमाल क्या है... मैंने अपनी माँ से सीखा और आज मैं अपनी बेटी से थोड़ी बहुत नहीं, ढेर सी चीज़ें सीखती हूँ, वो कहती है - "सब कुछ आसान है 'माँ'... नेट खोलो, रेसेपी नोट करो, सब कुछ तैयार फटा-फट...", यही सही है, जब चित्त हो; समय हो; कोई मुश्किल ना हो, तभी कुछ बने तो स्वादिष्ट बनता है, और फिर दो माह बाद वो इंजीनियरिंग के लिए अमेरिका चली जायेगी.. जीवन की एक संतुष्ट हंसी और बेफिक्री की दुनिया से दूर तो उसके लिए क्या ये ज़रूरी नहीं है की जो उसे पसंद नहीं- उसका वो मुखर प्रतिरोध कर सके.. आज वो अपने लिए जीना सीखेगी तभी तो कल दूसरों के लिए जीना सीख पायेगी...

बुधवार, 12 मई 2010

काश कोई महसूस करता, मेरे शहर के तालाब की फैली....//-

काश कोई महसूस करता ,
मेरे शहर के तालाब की फैली ,
सीमातीत थरथराहट ,
और मरी हुई -बेजान पत्तियों की ,
लगातार कसमसाहट .
डोंगियाँ चली जाती है ,
इस पार से उस पार ,
अपने विकृत अस्तित्व तले ,
मरी हुई पत्तियों को ओर मारते हुए ,
और छोड़ जाती है ,मौन तालाब के अंतर पर ,
क्षण दो क्षण की हलचल ,
काश कोई महसूस करता ,
फिर वही लम्बी चुप्पी ,
और परत दर परत चढ़ती सी ,
प्रकम्पित उदासी ,
काश कोई महसूस करता .....
अपने कॉलेज की पत्रिका ''अभिव्यक्ति'' में प्रकाशित [१९८०]भोपाल के बड़े तालाब के किनारे बेहद खूबसूरत जगह बना एम्.एल बी कन्या महाविधालय जहाँ हम सभी दोस्त बैठकर ग़प- शप्प करते थे ...जिसके दूसरे छोर पर गर्ल्स होस्टल था ...और वहां रहने वाली ..लड़कियां
क्लासेस ख़त्म होने के बाद ..कॉलेज की बोट से ही उस पार जाया करती थी ...बेहद सरल और खूबसूरत उन दिनों की बात ही निराली थी ...

शनिवार, 8 मई 2010

उदास गीत नहीं था उनके पास... जब्बार ढ़ाकवाला... एक श्रद्धांजलि... //-

कल जब inside news से खबर आई, जब्बार ढ़ाकवाला नहीं रहे, उनकी गाडी एक खाई में गिर गई... यह महज खबर नहीं थी मेरे लिए, कभी कभी शब्द भी दुखों को पकड़ नहीं पाते हैं, यकीन नहीं हुआ... अपना अकेलापन खोये बगैर जो व्यक्ति अपनी कविता में बना रहा, जीवन के राग-विराग में एक साथ डूबे हुए उनसे परिचय मध्यप्रदेश के वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी होने के नाते ही नहीं रहा... दो वर्ष पूर्व दुबई में समकालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन में उन्हें अधिक जानने का मौका मिला... जीवन के प्रति गहरी आस्था के साथ जीने वाले ढ़ाकवाला जी बस एकाध साल बाद अपने होने वाले रिटायरमेंट के बाद कविताओं और पेंटिंग पर काम करना चाहते थे ,एक सार्थक कल के लिए जीना चाहते थे .
उन्होंने मुझे कहा था ...इस नौकरी और इसके ताम-झाम में, मैं अपने को अजनबी सा लगता हूँ एक अध्यात्म का अनासक्त भाव था उनमे ..फिर दो चार मुलाकातें हुई ...हाल ही में उनका विभाग बदला ,शायद परिवर्तन उन्हें रास नहीं आया -पूरी दुनिया घूमने की चाहना रखने वाले भाई जब्बार जी जब हमारे साथ दुबई की एक गोल्ड शाप से बाहर निकले तो मैंने पूछा..क्या खरीददारी की आपने ...तो उन्होंने अपनी कलाई को मोड़ कर हाथ में पहनी हुई चमचमाती घडी को दिखा कर कहा ...समय को निरंतर पीछे छोड़ने वाली --टिक-टिक, और वे जोरों से खिलखिलाए ---उनकी हंसी उनके व्यक्तित्व की शान थी, दुबई-अबुधापी में उनके साथ बिताये दिन अविस्मरनीय है बाद में भोपाल में उनके आवास - चार इमली पर कविता और चित्रकला पर चर्चाएं, लेकिन लम्बे सफ़र में, मील की पत्थर सी छूटी उनकी बातें... यादें... लगता तो है, वह लौटेंगे... लेकिन चाहने - सोचने से सब कहाँ संभव होता है?...
"उदास गीत नहीं हैं उनके पास" - उनका पहला कविता संग्रह जिसके प्रथम पेज पर उन्होंने लिखा है - "प्रिय विधुल्लता को सप्रेम - जब्बार"... फिर उनके हस्ताक्षर हैं, यक़ीनन ये लिखा हुआ, पढते हुए आज दुःख व्यक्त करने के लिए मेरे पास कोई सटीक शब्द भी नहीं है... अगले पेज पर उन्होंने किताब को अपनी पत्नी - "तनु" को समर्पित किया है... दो शब्द जो मुद्रित हैं, वह लिखा है - " तनु जी , जो जीवन के साथ जुडी हुई हैं... मादक संगीत की तरह..." नियति ने बड़ी तटहस्थता में सहज उन्हें मृत्यु के साथ भी जोड़ दिया... इस संग्रह में बस्तर और बस्तर के जंगल, और लोक संस्कृति के बारीकी से आत्मसात किये गए अनुभव हैं... "कविता को वे स्वयं को संवेदनशील और अच्छा इन्सान बनाये रखने वाला औजार और जीवन के प्रति विस्श्वास बनाये रखने की कला मानते रहे हैं..."
रायपुर - मध्यप्रदेश में 15 दिसम्बर 1955 को जन्मे जब्बार जी मूलतः गुजरात के कठियावाढ़ के मेनन .. पूर्वजों के गाँव - "ढांक" के नाम पर "ढांकवाला" कहलाये... आरंभिक शिक्षा गुजरात में, बाद में रायपुर - रविशंकर विश्विद्यालय से, एम.ऐ. राजनीती शास्त्र में तथा एल.एल.बी. दोनों में स्वर्ण पदक प्राप्त... 1976-1980 राजनीती के व्याख्याता रहे, 1980 में राज्य प्राश्निक सेवा में चयन, पूर्व में अपर कलेक्टर - भोपाल, 1991 से व्यंग्य एवं कविता में लेखन, 1995 में व्यंग्य संग्रह - "बादलों का तबादला" जो की राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित..
ज्ञान चतुर्वेदी जी ने उनके विषय में लिखा है - "एक प्रशासनिक अधिकारी को जीवन का नरक और सुविधाओं का स्वर्ग एक साथ देखने, महसूसने और भोगने का अवसर मिलता है... उनकी कविताओं में एक संवेदनशील अफसर की तड़फ नज़र आती है...जो हाथ में तथा कथित हथियार होते हुए भी इस धरती पर पल रहे जीवन को बदल नहीं पाता."
और यह सच है, कविताओं में सहजता उनके व्यक्तित्व का सच है... शायर डॉक्टर बशीर बद्र ने, नकी पुस्तक के फ्लेप पर लिखा है - "वे मनुष्यता के विरोधियों पर जिस तेजाबी ढंग से आक्रमण करते हैं, उससे उन पर फ़िदा हो जाने को दिल करता है... उनकी शैली दिलफरेब है... आस्था और विश्वास से रची-बसी उनकी नज्मों की तहरीर की आत्मा ज़िन्दगी का एहतराम है... उनकी नज़मो में एक साथ फूलों की ताजगी, गहरा तीखा तंज और करुना का अथाह दरिया है."
उनकी एक बेहत चर्चित रही कविता - "इरान में औरत अब गाना गा सकेगी..." , जिसे उन्होंने मेरी पत्रिका "औरत" में प्रकाशित करने को कहा था, और मैंने कहा था मध्यप्रदेश के लेखक-कवि आई.एस. अधिकारीयों की रचनाओं पर एक विशेषांक निकलने का मेरा इरादा है, जिसमे इसे प्रकाशित करुँगी. जिसकी अंतिम पंक्तियाँ इस तरह है - "चलिए इरान की नस्रीम बेगम का गाना सुनने... औरत का गाना, खुदा की बेहतरीन नेमतों में से एक है..." उनकी पूरी कविता फिर कभी, लेकिन अब हम उन्हें कभी नहीं सुन पाएंगे... अक्सर किसी के चले जाने के बाद कहे जाने वाले शब्द... वाकई वो याद आएंगे... हाँ जरुर,... तहे दिल सेयही दुआ है खुदा उनकी रूह को सुकून दे.

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

वो चीजें जिनके बीच ठिकाने बनाए गए उन चीजों के बीच चीजें द्रश्य रचती है, और पिघलती है .इक्छाओं के उच्त्तम तापमान पर , मौसम यूँ चीजों की शिनाख्त करता है//-



वो चीजें जिनके बीच ठिकाने बनाए गए
उन चीजों के बीच चीजें द्रश्य रचती है,
और पिघलती है .इक्छाओं के उच्त्तम तापमान पर ,
मौसम यूँ चीजों की शिनाख्त करता है ,
और बुरा है यूँ उनकी पवित्रता भंग करना ,
दुर्दिनो में बेतरतीब सा है चीजों का चरित्र ,
बेमतलब रुझानो में बदलता, बेवजह जगह घेरता ,
अकल्पनीय-अविश्वसनीय ,अपनी अनुपस्थिति में भी ...
चीजों के बीच निर्विकार चुपचाप बैठा वक्त ,...
एक मुकम्मिल ग्राफ पूरा करता है ,
और पार करता है अपना वक़्त चीजों के बीच ,
सतह से उठता ,नीचे गिरता, बढ़ता..अंत में जिग -जैग सा,
कभी-कभी मियादी बुखार सा
कभी -कभी चीजें एक दूसरे की तमाशाई हो जाती हेँ
और हंसी आ जाती है एक सुनहरी बूँद आंसू भी,
कुछ बातें रुकते-रुकते भी हो जाती है
जब कुछ नहीं था हमारे पास तुम्हे देने को, सिवाय अपने,
.किसी नदी के गहरे जीवन में उतर जाने की मानिंद
चीजों के बीच बहुत सी चीजें जमती जाती है, पर्त दर पर्त,
जिनमे शामिल है, उस छोर तक चलना-आकाश को छूना
चीजों से संवाद---चीजों से प्रेम,
सिर्फ वहाँ चीजें नहीं है ,ना थी
घर ,टेबिल दीवान कुशन पर्दे दीवार से सटी मूर्तियाँ ,
हवा में तैरता एक अहसास
हाय- ब्रीड चम्पा के सफेद फूलों से भरा गुलदान,
चाय के खाली कप ,मुग़ल पेंटिंग,और वो चौकोर आइना ,
जिसमे ठीक पीछे कोई दूसरी शक्ल उभर कर ठिठक गई है
संवाद की अंतिम सीढ़ी पर
अनुभव हीन ,वहाँ सिर्फ चीजें नहीं थी ,
आजकल इंस्टेंट --जहाँ ..वो चीजें लगातार ,
जल्दी-जल्दी खानाबदोश शक्लों में बदलती जा रही है

जब कोई मिलता है तो अपना पता पूछता हूँ .. में तेरी खोज में तुझसे भी परे जा निकला... (मुज्जफर वार्सी)

रविवार, 28 मार्च 2010

देखना लौटती डोंगियों को जिनके आवारा मस्तूलों पर हवा के थपेड़ों ने जर्जर शब्दों में कुछ लिख दिया है .इस मायावी-दुनियावी का शायद कोई गीत ...

पतझर कि उमस भरी सुबह में एकाध दिन ऐसा भी होता है ,...यही की एक छोटी सी जगह में दो तीन शब्दों से बना एक नाम अपने तपे हुए रंग में घटित होता हुआ दिखाई देता है,एकदम अनुतरित ,गुपचुप अपने मौन में ,अपनी यात्रा से उबा हुआ,थका सा ,आरोह-अवरोह में लेकिन किसी पूर्व राग के अनहद में गूंजता हुआ.उन्मुक्त इक्छाओं के आकर्षण से विमुक्त -----बंद खिडकियों के खुलने का इन्तजार करता सा मानो एक भी खिड़की खुली नहीं की वो झट से चोंच में तिनका लिए चिरैया की तरह खिड़की की मुंडेर पर जा बैठेगा ....सोच ही काफी है ,थोड़ा ठंडी हवा,थोड़ा ख़ुशी का कतरा नजदीक होकर गुजरता है तारीखें बदलती है ,दस्तकें देती है ,कुछ पल को, पल भर का सन्नाटा अपनी जद में लेने की जिद्द करता है ..निजी वजहों से बिछुड़ते पल तहखानो/तिलिस्म में कैद हो जाते हेँ, एक इतिहास की यात्रा में ,स्मृति में एक हंसी गूंजती है... ढेर से खिलने वाले फूलों के दिन मामूली ख़ुशी दे पातें हेँ पीले फूलों की भव्यता के साथ लदा-फदा तेबुआइन खिलखिलाता है ...खुशियों के समानांतर और स्मृतियाँ मथती हेँ ,आम के कच्चे पत्तों की तूरी सी खुशबू पोर-पोर में बजती सी सन्नाटे को चीरती है बेखौफ चटकता है बहत कुछ,और कुछ घुलता भी है,कुछ मिलता भी है कुछ निरस्त तो कुछ को विलोपित करना होता है .....हाथों की नमी लकीरों में छिपने का ठिकाना ढूँढ लेती है आद्रता की लम्बी लकीर सी उनींदी प्रार्थना सुन ली जाती है ...खुशी कुछ पल को ठहर जाती है ...तट पर बंधी डोंगियाँ कसमसाती है तट छोड़ लहर संग बीच भंवर डूब जाने को आतुर अब ये जानना जरूरी तो नहीं की कुछ मिल जाए तो कुछ ना कुछ छूट भी जाएगा ...अपनी ही जिरह मुश्किल में डालती है --सच और सच के सिवा कुछ नहीं ....स्मृतियों के भरोसे यातना शिविर से बाहर आना ..वर्जित क्षेत्र में अपनी पहचान खोना --एक हठ भरी कोशिश जीत के भरोसे हारी गई लड़ाई ..एक पार्थिवता गलती ही जाती है,पहुंचाती है भीतरी हदों तक, सुनो कहती हूँ,बची हूँ बेछोर आसमान में -बियाँबान जंगलों में, हर, सुनवाई स्थगित है एक राग, एक रंग, एक प्रियता हरदम बुलाती रहती है फूले-खिले टेसू के रंगों में ...जहाँ अभी-अभी पेड़ों की टहनियों पर थोड़ा कोमल नन्हे पत्ते उगना शुरू हुए हेँ कुनमुनाती इक्छाओं से एक रूंधता हुआ शब्द बाहर आता है ,जिससे दूर है बहुत कुछ मसलन मन्त्र -म्रत्यु तर्पण हार जीत स्मर्ति और बहुत कुछ टूटना-जुड़ना अचिन्हित ...कोई स्मृति भूलती नहीं, कोई स्पर्श छूटता नहीं.. बिना सलवटों सारा क्रम टूटता जाता है एक दस्तावेजी द्वैत भाव अक्सर जिला देता है, इस उमस में भी कोई खिला फूल देखना किसी भीगी चिड़िया को बार-बार पंख झाड़ते हुए देखना स्मृति कक्ष में दर्ज हो जाता है, ढेर से तर्कों के उष्मा भरे उजलेपन के साथ , बावजूद ये मौसम बीतेगा जरूर अपने एकांत और बाहरी शौर से उपजी एक तरंग एक घटना जिसके तारतम्य में विनिर्माण को गूंथना ,और देखना लौटती डोंगियों को जिनके आवारा मस्तूलों पर हवा के थपेड़ों ने जर्जर शब्दों में कुछ लिख दिया है .इस मायावी-दुनियावी का शायद कोई गीत...

अक्स ऐ खुशबू हूँ बिखरने से ना रोके कोई,और बिखर जाऊं तो मुझको ना समेटे कोई
यह क्या की में तेरी खुशबू का जिक्र सुनू,तू अक्स ऐ मौजे गुल है तो जिस्म ओ जाँ में उतर ...
(स्व.परवीन शाकिर मेरी पसंदीदा मशहूर शायरा)

बुधवार, 17 मार्च 2010

इन दिनों सेमल के पेड़ पर ... //-


वो अपनी चुप्पी में मगन है,
अपने दुःख में सुखी, -गर्वोंमुक्त,
अपनी जीत में हार की ख़ुशी लिए ,
अपने सच के झूट से चमत्कृत ...
वक्त से आगे जाना चाहता है ,
सितारों के पार ,
ना जाने किस-किस में व्यक्त होना चाहता है ,
उसका सुख....
इन दिनों सेमल के पेड़ पर ,
लाल सुर्ख फूलों की नियति में ,..
टंका हुआ ,
अकेला अलग -थलग.

दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका के अक्तूबर २००७ के ''अहा जिन्दगी'' में प्रकाशित

सोमवार, 8 मार्च 2010

// काशी बाई का सूरज....मुश्किलें चाहे जीतना आदमी को मजबूत बना कर जीना आसान बना दे लेकिन मुश्किल हालात में जीना आसान काम नहीं है ...//

काशी बाई का नाम सूरज बाई होना था दिनभर तपने के बाद दूसरों को गर्माहट और रौशनी की खुशी दे कर डूब जाने वाला ...मुश्किलें चाहे जितना आदमी को मजबूत बना कर जीना आसान बना दे लेकिन मुश्किल हालात में जीना आसान काम नहीं है, हालांकि नई प्रौधोकियाँ ,भ्रूण ह्त्या आर्थिक चुनौतियां और नए-नए व्यवसायों की तरफ महिलाओं का रुझान ,अपराध का अन्तराष्ट्रीय करण,विश्व स्तर पर बढ़ता निरंतर देह व्यपार और गरीबी जैसी समस्याएं लगातार स्त्री के सामने है तिस पर सबसे गरीब औरत की बेतरतीब जिन्दगी का अंदाजा तो आम आदमी लगा ही नहीं सकता.
आज अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस है अभी अभी..काशी बाई से मुलाक़ात कर के लौटी हूँ ...काशी बाई को वैसे तो में पिछले आठ सालों से जानती हूँ और उसकी कर्मठता की कायल भी हूँ,भोपाल शहर के ठीक बीच से होकर गुजरने वाली शाहपुरा लेक की और जाने वाली सड़क किनारे है बांस खेडी जिसके चौराहे पर सड़क के किनारे पर आप काशीबाई से रूबरू हो सकतें हेँ ..जिसके धूप में तपे ताम्बई रंग के बूढ़े शरीर पर झक्क सफेद बाल के साथ धूप हवा सर्दी गर्मी हर मौसम को आत्मसात किये एक स्वाभिमानी चेहरा मिलेगा ....काशीबाई अपने सधे हुए हाथों से बांस की कलात्मक टोकनियाँ बुनती हुई मिल जायेगी ...काशी बाई हिन्दुस्तान की उन तमाम औरतों का प्रतिनिधितत्व करती है जो शहरों में तो है लेकिन शहरी सुविधाओं से वंचित हुनरमंद है लेकिन भूखों मरने को मजबूर रहने को यूँ तो उसके पास एक अदद झोपडी है लेकिन सडक पर रहने को मजबूर ....काशीबाई के दोनों हाथ बांस का काम करते बहुत ही कट -फट गए हेँ ,बांस के नुकीले रेशे और खपच्ची को निकालने में छिली हुई अँगुलियों -हथेलियों में से खून रिसने लगता है हालांकि दरार भरने में दो चार दिन का समय लगता है लेकिन फिर नया घाव ,नई टोकनीयां और ये सिलसिला चलता रहता है ..काशीबाई का सूरज रोज निकलता है और रोज डूब जाता है उसकी जिन्दगी में कोई बदलाव नहीं होता ,कुछ नया नहीं होता ,बिना थके बिना रुके काम तो करना होता है .लेकिन फिर भी मन माफिक पेट भरने लायक पैसा नहीं मिलता महंगाई बढ़ गई है बांस महंगा है उसका कहना है .....ललितपुर से साठसाल पहले भोपाल आई काशी बाई, जिन्दगी के अंतिम पड़ाव पर बिलकुल अकेली है लेकिन उसका होंसला बुलंद है उसकी बड़ी कल्पना में एक छोटी इक्छा है की उसकी अपनी दूकान होती और वो ठाठ की जिन्दगी जीती ....जिन्दगी अब बची ही कितनी है काशी बाई और उस जैसी औरतों की ......इस बिखरे हुए समाज की सबसे गरीब और अंतिम स्त्री की छवि हमें आपको फिर से गढना पड़े उसकी बेतरतीब होती जिन्दगी को समेटना और उसे मजबूत करना,...भाषा और लेखन इस निमित्त साधन मात्र है हम एक नयी स्त्री का सुन्दर भविष्य गढ़ सकें -हमें आपको कोशिश तो करना ही होगी लेकिन ईमान दार ......
आज विश्व महिला दिवस पर माखन लाल चतुर्वेदी विश्विद्यालय में महिला पत्रकारों का दायित्व विषय पर एक परिचर्चा /संगोष्ठी में भाग लेने की बजाय मुझे लगा ..काशीबाई पर कुछ लिखा जाय ...क्योंकि हर साल की तरह रेशमी साड़ियों की फरफराहट खुशबुओं और कुछ निरर्थक तालियों ,भाषणों कैमरों की चकचौंध ,झूटी मुस्कराहटों की बजाय काशीबाई से आपको रूबरू कराया जाये ...आमीन

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

मध्यप्रदेश की बाघ कला के ये हुनरमंद कलाकार... "अब इन्हें अपनी जिन्दगी में कोई बड़े चमत्कार की दरकार भी नहीं" //-



यूं तो हर दिन महीनो सालों दर साल वो काम करते रह्ते हेँ,कपड़ों को रंगना धुलाई करना उन पर भिन्न आकार-प्रकार के छोटे बड़े पारंपरिक फूलों या अन्य डिजाइन की छपाई करना उनका पेशा है...और उनकी आजीविका का एक मात्र साधन भी अपने पेशे में पारंगत होने के बावजूद उन्हें वे सुविधाएं -खुशियाँ हांसिल नहीं है जिसके वो ज्यादा से ज्यादा हकदार है..मुश्किल हालातों में रात-दिन खटते हुए अपना काम करना इनकी आदत में शुमार हो चुका है ,और अब इन्हें अपनी जिन्दगी में कोई बड़े चमत्कार की दरकार भी नहीं रही दूसरों के चेहरे पर रंगत लाने की खातिर खुद इनके चेहरे बेनूर हो चले हैं जब किसी खरीददार को अपने हाथ की छपाई की तारीफ करते देखतें हैं तो उनकी ख़ुशी से चौड़ी होती आँखों में आप सातों आसमान झिलमिलाते हुए पा सकतें हैं
इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा की..पूंजीवादी ताकतें हमेशा से ही ज़रा से फेर बदल के साथ सही और मेहनतकश व्यक्ति के जीवन मूल्यों से खिलवाड़ करती रही है बावजूद कलाकार की अपनी एक नैतिक जिद्द होती है जो किसी भी हालात में घुटने नहीं टेकती
मध्यप्रदेश के पश्चिमी निमाड़ के जिला खरगोन में तथा महेश्वर जिला धार के कुक्षी सहित अनेक गांवों में तकरीबन पूरा का पूरा परिवार रंगाई,छपाई और बुनाई का काम करता है जिनमे अधिकतर खत्री,बलाई और मोमिन समाज के लोग हैं ....मध्यप्रदेश के वस्त्र उधोग में अब तो पारंपरिक महेश्वरी और चंदेरी के सिल्क सूती वस्त्रों पर भी बाघ प्रिंट का तेजी से प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है ,देश के हर हिस्से में ही नहीं वरन विदेशों में भी इन भारतीय पारम्परिक डिजाइन के वस्त्र लोकप्रिय है ,बाघप्रिंट भी एक कला है जिसमे पहले कपड़ों को रंगना फिर धोना और फिर मन मुताबिक़ उन पर बाघ प्रिंट करना ...बाद इसके उन्हें सहकारी समितियों के माध्यम से बाजार में बिक्री के लिए उतारना ...बाघ प्रिंट की छपाई में उपयोग आने वाले रंग वेजी टेबिल्स डाय होते हैं..इसलिए ये सिंथेटिक डाय के मुकाबले ये महत्वपूर्ण और महंगे होते हैंये एक कठिन और धैर्य से इजाद करने वाली कला है .. ये छपाई सिल्क-खादी और पौली वस्त्रों में भी उतने ही मनमोहक और लुभावने लगते हैं जितने की सूती वस्त्रों पर.वर्तमान में साड़ियों ,ड्रेस मटेरियल ,चादरें,रनिंग मटेरियल ,और अब दरियां भी इस प्रिंट में बतौर फैशन में प्रचलन में है
बाघ नामक स्थान इंदौर [म प्र ] के नजदीक अहिल्या बाई होलकर की राजधानी महेश्वर से करीब ११० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.बाघ में इस वक़्त रंगाई-छपाई के २४ कारखाने है ...ये सही है की म. प्र.सरकार ने पिछले १० सालों में इन पारम्परिक वस्त्रों को निर्यात करने और उनकी लोकप्रियता में इजाफा करने के लिए भरसक प्रयास किये हैं ..जहाँ-जहां ये काम हो रहा है वहाँ सहकारी समितियों के माध्यम से इनकी बिक्री की व्यवस्था है उन्हें कच्चा माल, सूत, जरी, रंग भी मुहैया होता है लेकिन इस काम में सर्वाधिक पानी का इस्तेमाल होता है .हम रूबरू होते हैं यहाँ के निवासी नूर मोहमद खत्री और उनकी पत्नी जुबैदा और बेटे इदरिस से .....उनका कहना है यहाँ से ५ किलोमीटर की दूरी पर'' मनावर '' में पानी है लेकिन बाघ में पानी की कमी है साथ ही उनका ये भी कहना है की काम के लिए ऋण नहीं मिलता...खुद अपना ही पैसा बैंक से लेने में मुश्किलें आती है...किराए की जगह लेकर काम करते हैं कहने को सरकार सब कुछ कर रही है लेकिन सब कुछ सब के लिए नहीं है दूसरी और मोहमद हुसैन मूसाजी खत्री और जमाल उद्दीन खत्री'' कुक्षी'''रहवासी जिला धार म .प्र....इनका पूरा परिवार मिलकर बाघ प्रिंट का काम करता है करीब ५० हजार की आबादी वाली इस तहसील ''कुक्षी '' में भी पानी की कमी है उनकी तो मांग ही यही है की यदि नजदीक के फाटा डेम का पानी यदि कुक्षी में छोड़ दिया जाय तो हमारी थोड़ी मुश्किलें कम हो जायेंगी ,,,चूँकि जो भी पानी हने मिलता है वो अधि कांश त सिंचाई के काम में खर्च हो जाता है जो भी हमें मिलता है उससे काम ठीक से नहीं हो पाता है ....इसके अलावा भी इतर मुश्किलें इन कलाकारों के जीवन में है ...लेकिन बुनियादी मुश्किलों को दूर किये बिना इन लोगों के चेहरे पर कोई रंग नहीं आ पायेगा ..सरकार को इसमें पहल करने की जरूरत है ....

मध्यप्रदेश में रंगाई-छपाई और बुनाई, कला और कलाकार पर केन्द्रित शीघ्र प्रकाशित अपनी पुस्तक - "रंगारा" से एक अंश...

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

जो कहा जाना है -वो जो कहने से छूट जाता है ... अक्सर वही सब कुछ कह देने को... जहां दहकने शुरू हुए हेँ अभी-अभी पलाश..//


यूं तो वसंत आया है
कहने को ---
ठिठुरते शिशिर की शीत के बाद ,
इस बार थोडा जल्दी ,
लेकिन यकीन है ..इस-बार खराब मौसम ,
और इतने खराब वक़्त में भी ,
उस छोर से बंधा होगा कोई गुनगुना पल
जैसे नाव बंधी होती है ,एक गहरी आश्व्शति में ,
दिखने वाली शांत सी सतह पर ,
बावजूद पानी पर डोलती ...
बार-बार शुरू करती हूँ सोचना ,
शुरू कहाँ से हुआ ,जिसका कोई अंत नहीं ,
चाहे जीतना छूटे पीछे.. उतना ही आगे भी ,
उलट कर ''अपनापन'' ताज़ी निलाई से लिखता है,
लिख-लिख फैलाता है कोई हुनरमंद हाथों से ....
उसके निरंकुश फैसले पढ़े नहीं जाते ,
घिस-घिस बीत ही जाते हेँ हजार दिन ,
कुछ रेशमी दिन पीछे और धूल सने दिन-रात आगे खड़े मिलतें हेँ
कितना झूटा है ये ,रोने-रोने को हो आता अभिमान बार-बार
और सुरक्षित रहतें हेँ अभाव के तकादे ,
सिरजा दिया वो सब...बूँद-बूँद छींट-छींट हरहरा आये थे जो,
निस्संग मन इन धूसर पीले दिनों से पूछ बैठता है..
कहाँ जाना था तुम्हे ?उस पहाड़ी पर ,
या किसी जंगल में --जहां दहकने शुरू हुए हेँ अभी-अभी पलाश
या वहां जहां सीखा तुमने ,
निपट अंधेरों से ऊपर आने का सफल अभ्यास,
सच एक-एक सीढ़ी ,
द्रश्य का बदलना
सवेंदी सूचकांक सूचित करता है ,
चीजों के लुढकने के संकेत ...
धैर्य खोता है ,धारणाएं टूटती है...
कुछ पल्ले नहीं पड़ता ,
कितना छोटा था मेरा सुख
इस बड़ी और गोल सी दुनिया में
बस समा जाए इस मौसम इस वक़्त में
उगते सूरज की रौशनी में, लहरों में पछाड़ खाता समंदर और ज़रा सा प्रेम
बंधा होगा उस छोर से जरूर बहुत कुछ अब भी ...
ताकि ,जो कहा जाना है -वो जो कहने से छूट जाता है ...
अक्सर वही सब कुछ कह देने को,
इस वसंत में ...

कहाँ से ढूँढ के लायें हम फन की सनद, तू अपने शब्द के पत्थर मेरे हिसाब में रख..! (-जमील कुरैशी)

शनिवार, 16 जनवरी 2010

शहर में जंगल, जंगल में एकांत पार्क, पार्क में सफ़ेद सिरस का पेड़... "Don't leave anything except your footprints"...

नए साल की पहली सुबह ,सड़क के दोनों ओर कोहरे में ढंके पेड़ अधमुंदी आँखों से सुबह की सैर पर निकले लोगों की धीमी पदचाप की आवाजों के साथ आगे बढ़ते क़दमों का स्वागत करते हैं, घास और पत्तियों पर से गुजरते एक ख़ास आवाज़,एक ख़ास खुशबू के साथ, सुबह होती ही जाती है... रेशमी और नम उजाले के साथ. देखे गए तमाम अनुभव भी कभी-कभी झूटे हो जाते हैं, सच क्या है दिल भी नहीं जान पाता .....सात महाद्वीपों का संसार मिलकर ....दिल पर ठक-ठक करता है लगातार ...चाहे ई.सी.जी. की रिपोर्ट ठीक-ठाक ही क्यों ना हो, और ठंडी ओस मानो हवा में तैरती ..."खुश रहो" कहती, गालों को थपथपाती हुई पीछे छूटती जाती है, रात भर सोई हुई,अलसाई पत्तियों को छूना शब्दातीत होता है. जिन्दगी में कुछ सलीकें दूसरों के लिए भी सीखना पड़ता है, यक़ीनन इस सलीकेदार सच के साथ जीना आसान होता जाता है... पाले हुए मुगालते बेघर करना... और चलते जाना... वही राग, वही जगह, वही रास्ता... अकादमी के चारों ओर रोजाना सैर पर निकल जाना... अपनी आदत में शामिल करना, कभी ना जाओ तो? - हालांकि ऐसा कम ही होता है, तो अपना ही अवज्ञा भाव चिंता में डालता है, बड़ा हुआ कोलोस्ट्रोल कम कैसे हो?... किश्तों में जमा बड़ी खुशियाँ --- रोजाना थोड़ा-थोड़ा सा खर्च करना होता है. अनश्वर अभिलाषा में कुछ सोचना, कुछ छोड़ना, कुछ तह लगाकर अलग रख देना, चिरंतन प्रवाह में जब सब कुछ छूटता ही जाता है और सूर्योदय के थोड़ा देर बाद तक घर लौटना, सजीली सैर सुकून देती है, सुन्दर छोटे-बड़े रास्ते डाल पर खिले, अबीर-गुलाल से फूल पुकारते हैं, कहते ही रहते हैं, "लौट आओ" . पलट कर देखो तो लगता है एक उदास भाव से निहार रहे हों और संवाद ख़त्म नहीं होता उनसे, जन्म-जन्मान्तर तक रहेगा ये तय है... कोई बात बीच में ही छोड़ दिए जाने की अकुलाहट में खोजना भीतरी एकांत को...
शहर के एकांत पार्क में... दस एकड़ से ज्यादा में फैला 'एकांत पार्क' भोपाल शहर के बीचों बीच में सैरगाहों के लिए विकसित किये गये दूसरे पार्कों से सबसे अधिक मनमोहक उत्कृष्ट है, इसकी विशेषता ही ये है की ये एक तरह से शहर में जंगल है और इस जंगल में अवस्थित मेरा एकांत पार्क... राजधानी परियोजना वालों ने इसकी प्राकृतिक ख़ूबसूरती को बिना छेड़-छाड़ के विकसित किया है, हर किस्म के जंगली पेड़ों के बीच से छोटी बड़ी पगडण्डी तो कहीं छोटे बड़े टीले हैं, कहीं बांसों के झुरमुट तो कहीं आकाश में छितराए सर उठाये देवदारु के पेड़ों का पूरा कुनबा मिल जाएगा और कहीं वनस्पतियों-औषधियों के पौधो-पेड़ों को गोलाकार बैठे हुए बतियाते हुए देखा जा सकता है... अद्भूत लगता है यहाँ आकर, शहर के इस जंगल में. सुबह की सैर करने वाले हर उम्र के लोग मिल जायेंगे यहाँ, पार्किंग में खडी भारी भरकम गाड़ियों से लेकर साईकिल तक से अंदाजा बखूबी लगया जा सकता है कि लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर कितना सतर्क हो चले हैं... अलग अलग जाती, वर्ण, रंग, किस्म के पेड़, ऊँचे-नीचे पथरीले गहरे समतल रास्तों पर खड़े हर पल आपसे गुफ्तगू करने को तैयार मिलेंगे, आप उनके सीने से लग कर रो सकतें हैं, उनसे अपनी खुशियाँ बाँट सकतें हैं, उनके साथ खिलखिला सकतें हैं, उनकी टहनियों को छू कर-छेड़ कर उत्फुल्ल भी और बड़े-बूढ़े पीपल बरगद को प्रणाम कर आशीर्वाद भी ले सकते हैं.
एकांत पार्क में चारों ओर फैली निर्जनता सरसराती हुई हल्की हवा की लहरे एक शान्ति राग आलापती सुनाई देती है... जब सब साथ छोड़ देतें हैं यहाँ तक की शब्द भी और आप बाहरी दुनिया के साथ अपने संबंधों के खुरदरेपन के दौरान दयनीय निरीह हो जातें हैं, उसी क्षण अपनी सम्पूर्ण गरिमा के साथ वो आपको थाम लेतें हैं. एक तसल्ली, एक विस्मित, एक उल्लासित भाव लिए जब आप उन्हें छूतें हैं... उनमें एकात्म होतें हैं तभी,
आप एकांत पार्क की भूल-भुलईया में खो भी सकतें हो, लेकिन चौड़ी हो या संकरी हर पगडण्डी थोड़ा आगे जाकर एक घुमाव के बाद या दूर तक ले जाने के बाद आपको मुख्य द्वार तक लौटा ही लाती है. आपको अनवरत कोमल बनाने, आपमें हरदम सदेक्षा-सदभाव उपजाने का प्रयास, ऐसा ही अप्रतिम कौशल है शहर के इस जंगल में... जिसमें हर पल विपुल हो विस्तार लेता है... मेरा रास्ता ठीक ४५ मिनिट बाद मेनगेट पर ख़त्म होता है, जिन्दगी हर पल व्यस्त होती ही जाती है, हर दिन वो नहीं होता जो पिछला था, पार्क के अंतिम छोर पर अनगिन घुमावों दर्श्यों उबड़-खाबड़, समतल रास्तों के बाद मिलता है-- 'सफेद सिरस का पेड़' -- अपनी कोमल काया के साथ, जिसके नीचे ओस भीगी,बिछी, काली बजरी पर पड़ी छोटी नुकीली हरी पीली पत्तियां नक्काशी की तरह जड़ी दिखाई देती हैं. 'सफेद सिरस' के चारों ओर गोलाकार राह से प्रदक्षिणा के साथ आगे बढ़ते ही सूरज की कच्ची हंसी सर पर आ बिखरती है... तभी 'सफेद सिरस' खिलखिला उठता है, उलीचता है सुख... कई-कई रिश्तें, घटनाओं का साथ छोड़कर स्मृति में बदलते हैं और समृतियों के संविधान में कोई रद्दो-बदल नहीं होता, एक गाढ़ी आद्रता भयंकर सर्दी में अन्दर तक जम कर रह जाती है, खरोचों तब भी नहीं पिघलती... दिल धडकता है... ज़ोरों से, और लम्बी साँस के साथ फिर सामान्य स्थिति में आ जाता है. मन मुख्य द्वार के भीतरी प्रवेश के साथ ही बूढ़े कचनार के सीने पर टंगी तख्ती पर लिखा टटोलता है, "डोंट लीव एनिथिंग्स एक्सेप्ट युवर फूट प्रिंट्स"-- यही सच है अपने ही वाक्य का रिक्त स्थान मन ही मन भरने की भरसक कोशिश करते हुए लौटना... "कल फिर मिलेंगे"... उनकी खुशआमदी की दुआ करते...

तुम्हारा आंचल कन्धों से खिसकता है, फासले तय होतें है... महज शब्द से शब्द तक, होटों पर उभरता है चुम्बन...
नदी ठिठकती है, पेंड़ो से गिरती पत्ती दम लेती है... जुबान में बदलता शब्द, खो जाता है प्राश्चित में...
(- कवि सुदीप बनर्जी, "आइने दर आइने" संग्रह से...)

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

गीत को उसके ही माध्यम से जानना और नमित हो जाना... विरक्ति के बाद अनुरक्त होना, फिर जीवन खपाना... जहाँ से हम फिर देखना शुरू करते हैं, तसल्ली से किसी इल्ली द्वारा खाया गया टेड़ा-मेढ़ा आधा -अधुरा पत्ता पूरे जीवन की मानिंद


कुछ गीतों के पास हम जाते हेँ ,और कुछ हमें बुलातें हेँ ,जिनकी आद्रता हमारे मन प्राण और आँखों में बस जाती है उन गीतों की सच्चाई और संवेदना हमारी चेतना को छूती ही नहीं, हमारी आत्मा को थाम भी लेती है. दुःख जैसे शाश्वत सच को सुख में तब्दील करने वाला संगीत, ऐसे गीतों में किसी दुनिया को, उसके इंसान को, और इस दुनिया के अभिशप्त चरित्रों को बदलने का कोई दावा नहीं होता, एक गुज़ारिश होती है... एक धीमी दस्तक... और आहिस्ता से किसी गीत का बन जाना. इन गीतों के द्वारा न ज़िन्दगी के कोई नियम टूटते हैं, ना क्रांतियाँ होती हैं... बस कुछ स्वर लहरियां होती हैं, जिसमे बहुत कुछ हमारा भी घुला-मिला होता है. इन गीतों का सूनसान चाहे जितना हमें बोझिल करे, लेकिन कुछ अनसुनी पदचापें कई नए आयामों को रचती आहटें हमारे करीब होती हैं. देश काल से परे जहाँ कुछ भी हो सकता है, एक सम्मोहन; छूटे हुए प्रिय; प्रिय चीज़ों; घटनाओं; प्रिय शब्दों;प्रिय कविताओं; और इत्मीनान से की गयी, अचाही विदा के बाद लौटते - लौटाते कुछ सुर, कुछ गीले बिम्ब, दूसरों के द्वारा नहीं... गीत को उसके ही माध्यम से जानना और नमित हो जाना... विरक्ति के बाद अनुरक्त होना, फिर जीवन खपाना... जहाँ से हम फिर देखना शुरू करते हैं, तसल्ली से किसी इल्ली द्वारा खाया गया टेड़ा-मेढ़ा आधा -अधुरा पत्ता पूरे जीवन की मानिंद .

फिल्म "बेनजीर" - १७ जून १९६४ को रिलीज़ हुई थी, इसके प्रोडूसर- "विमल रॉय" और संगीतकार - "एस .डी.बर्मन", गीतकार - "शकील ब्दायुनी" जी हैं. फिल्म के मुख्या किरदार - मीना कुमारी, अशोक कुमार, शशि कपूर, तनूजा इत्यादि थे... इसमें एक गीत तनूजा पे फिल्माया गया था. ब्लैक एंड व्हाइट में बनी इस फिल्म में खासकर इस गीत में तनूजा ने कशिश्भरी अदाकारी की है... लता मंगेशकर द्वारा गाया ये गीत, राग तिलक कामोद केदार पर आधारित है... गीत के पहले अंतरे में "तू" पर जोर देकर, लय को तोड़कर आगे बढता स्वर और अंत में "आ sss मेरी राहों को जगमगा दे sss " (अवग्र के साथ). गीत के पैरा का अंत एक विनम्र गुज़ारिश के साथ आपको सम्मोहित किये बिना नहीं रहता.
इसी तरह दूसरे अंतरे में "जी चाहता है तुझपर सदके बहार कर दूँ " और अंत तक आते - आते एक आर्त चीत्कार.. एक ऐसा उदास भाव हठात आपमें घर करता है बावजूद एक अतिरिक्त उर्जा वातावरण में अनायास पनप उठती है... इस गीत में ऐसा ज़रूर है जो मंत्र मुग्ध करता है, सुख और दुःख को एकाकार भी... शास्त्रीय संगीत में थोड़ी भी रूचि रखने वालों ने तो इसे सुना होगा लेकिन जिन्होंने नहीं सुना उन्हें इसे सुनना चाहिए... लता जी के अद्भूत स्वर में इस गीत को सुनने के बाद. आप अपनी आत्मा; देह;और स्वर को एकसाथ चमत्कृत कर अनंत और शाश्वत को छूकर लौटते हैं...

"मिल जा रे, जाने जाना... मिल जा रे...
आँखों का नूर तू है, दिल का करार तू है...
अपमा तुझे बना लूँ, मेरी ये आरजू है...
आ मेरी ज़िन्दगी की राहों को जगमग दे,
वल्लाह कदम-कदम पर, तेरी ही जुस्तजू है...
मिल जा रे..."
"जी चाहता है तुझपर, सदके बहार कर दूँ...
तेरी खुशी पे अपनी, दुनिया निसार कर दूँ...
वो प्यार की घडी जो, तेरे हुज़ूर गुज़रे,
उसको कसम खुदा की, में याद गार कर दूँ...
मिल जा रे ...."

सोमवार, 23 नवंबर 2009

//-जो बार-बार मिलता-बिछड़ता है , -मन रूक सा जाता है.. उसका बोलना पानी के बीच घुलता जाता है.-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है...

लगातार होती बेमौसमी बारिश से आँगन की दीवारों से प्लास्टर छोटे-बड़े टुकड़ों की शक्ल में झड रहा-था,जिस दीवार से सटकर दोपहर की हलकी अप्रत्याशित धूप में थोड़ी देर बैठकर वो कुछ पढ़ना चाहती थी.लेकिन उसे इरादा बदलना पडा,खिड़की से आती मामूली धूप के लकीर नुमा टुकडे के साथ बाहर देखते हुए,---बारिश,धुंद,धूप,कोहरे की मिली-जुली ढलती दोपहर में पेड़ों के पत्ते नीले-नीले से दिखाई पड़ते हें ....अभी-अभी धूप थी ओर बस अभी बूंदा-बांदी शुरू ---पानी की हल्की बूंदों के पार खूबसूरत अंदाज में पिघलती कुछ सपाट आकृतियाँ आकार लेती है शाम की शुरुआत होना ही चाहती है,अध् पढ़ी कहानी का पृष्ट बिन मोड़े ही वो गोद में उलट देती है ..तुरंत ही गलती का अहसास ,अब फिर सिरा ढूँढना होगा दुबारा शुरू करने के पहले,-कहाँ छोड़ा था,क्या ये मुमकिन होगा शुरुआत से पहले छूटे हुए कथा सूत्र को पकड़ पाना,एक ख्याल गाथा नया सिरा पकड़ लेती है , उधेड़बुन के साथ -सच कुछ भ्रम भी जरूरी है अच्छे से जीने के लिए ..पर मन की तरह मौसम भी बेहद खराब है,यहाँ ..ओर वहां ?इस सवाल का जवाब उसे नहीं मिलना था जो नहीं होगा उस इक्छा की तरह ..मन की खिन्नता के बावजूद उसका इन्टेस चेहरा खिल उठा शायद मोबाईल के साइलेंट मोड़ में रौशनी जल-बुझ उठेगी बिन आहट सोचना ....लेकिन उम्मीद से थोड़ा ज्यादा किसी भी नतीजों पर ना पहुँचने वाले फैसले एक झिझके हुए दिन के साथ अनुनय करते समय के बरक्स .. उदास-निराश होकर रह जाते हेँ,ताज़ी यात्रा में देखे सागौन के पेड़ों पर कच्चे -हरे फल पिछली यात्रा की जरूरी घटनाओं की तरह याद आतें हेँ ...फिर नया कुछ ,पानी में निथरा हुआ -आधा तर -एक साफ चेहरा ओर कई रंगों की बे शुमार भीड़ में फबता सा उस पर काला रंग.. देखी -सोची चीजें आहिस्ता से करवटें लेती -धीरे-धीरे जागती है ,एक लम्बी खामोशी में पढ़ना- जीना ज्यादा सोचना ,कितना सजीव हो उठता है -जब परिंदे घर लौटने की तैयारी में होतें हेँ बिन भूले अपने ठौर -ठिकाने .ओर अपनी नन्ही आँखों से आकाश से नीचे छूटते घर ,पेड़ पत्तियां पहाड़ --चोंच में दबाये मूल्यवान स्मृतियाँ -ओर जोखिम भरी इक्छायें वैसी ही जो हमारी जरूरतों की तरह ठोस थी-सच थी,यकायक सुखों का फूलों में खिलना,दुखों का द्रश्य में तब्दील होना ...वो दायें हाथ को बाएं कंधे पर ओर बाएं हाथ को दायें कंधे पर रख ,दोनों को एक साथ मोड़कर उसमें अपना चेहरा धंसा लेती है वो समय कैसे तय हुआ वो समझ नहीं पाती ,कुछ जिद्दी पल कोहनी से टकराते हुए -झांकते से उसका चेहरा टटोलने की कोशिश करते हेँ ...बारिश की नमी वहां तब तक अपनी मौजूदगी दर्ज कर चुकी होती है, किसी खेल में सावधानी के बावजूद पिट जाना, भाग्य का खेल, नहीं...हानि -लाभ ,जीवन-मरण ,यश-अपयश ,जीत -हार,बिन बोला भी सच रह जाता है, ओर ज्यादा सच डायरी में दर्ज.प्रवंचनाये टूटती है ,समेटी खुशबू उड़ जाती है मौसम के रंग फीके पड जातें हेँ,स्मृतियाँ धुन्द में खोती जाती है ,चाँद से मन अघा जाता है गीतों का शौर कानो को रास नहीं आता, अविकल बहती हुई , किसी इबारत में ना समा पाने वाली इच्छाएं किसी अनासक्त लय का पीछा करती हेँ ओर निरंतर बदलती अपनी दुनिया के आकाश की निसीमता में नक्षत्रों के शब्द बनाना और मेहँदी भरी खुशबू की हथेलियों से उसका नाम लिखना ...दुखों के ढेर में एक बड़ा, असीम सुख ,एक अर्थ के करीब पहुँचते -पहुँचते दूसरे अर्थ का सामने आजाना --झुके -तने पेड़ों के बीच अवस्थित खपरैल के छत्त वाली झोपड़ियाँ काश की वहां दो क्षण सुस्ता पाते ,ओर नीले गुलाबी रेशमी बादलों के टुकड़े कार के शीशे के परे पीछे छूटते और इच्छाओं की प्रबलताओं ओर निर्बलताओं के के बीच बार-बार पढ़े गये दुर्लभ प्रसंग की तरह सामने आते हेँ जीवन के गाढे उन्माद - में रोज उग आने वाले नए दुखों के बीच ----जो नहीं कहा ,सुन लिया गया उधर ये क्या कम है, वो सर उठाती है बीच नर्मदा से महेश्वर घाट देखना ,घाट की सतह पर किला ,किले की सतह पर पत्थरों के बीच हरी नर्म घास ओर उसका चेहरा हर जगह यहाँ-वहां सुपर इम्पोज हो जाता है हमेशा यही चाहना क्यों जो सबसे अच्छा पल है सबसे मीठा -सबसे अधिक सुखद सबसे विस्मयकारी कोई और भी देखे ,सुने,संग संग ओर ये जो फूल दिन भर आँगन में गिरते रहते हेँ इनकी आहट भी,उनके रंगों के साथ पर ..-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है आजकल नवम्बर में भारी वर्षा ओर तूफान की चेतावनी ... अनेकों सुर्योदयों -सूर्यास्तों के बीच जो बार-बार मिलता-बिछड़ता है , -मन रूक सा जाता है उसका बोलना पानी के बीच घुलता जाता है.-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है आजकल नवम्बर में भारी वर्षा ओर तूफान की चेतावनी... बारिश में चेखव को पढ़ना ....ओर इस मौसम में जब ना ठंडक है ना गर्माहट - दुःख है ना सुख ,दोस्तोव्यस्की को ....दोस्तोव्यस्की की एक लम्बी कहानी ''दिल का कमजोर -कल ही ख़त्म की है वे कहतें हेँ जीवन की चेतना जीवन से बढ़कर है ओर सुख के नियमों की जानकारी सुखों से बढ़कर है ..शाम का अन्धेरा कमरे में इकठा होता है ,दरवाजे पर कुछ पल ठिठके हुए -एक धनात्मक उम्मीद के साथ ,गीतों किताबों ओर उनकी रौशनी में ......देर रात उसने न्यूज़ चेनल पर देखा समुद्र तटीय राज्यों महाराष्ट्र ओर गुजरात से फयान गुजार गया ,ख़तरा टल गया ..
कोई देता है दर -ए दिल से मुसल्सल आवाज,और फिर अपनी ही आवाज से घबराता है...अपने बदले हुए अंदाज का अहसास नहीं उसको ,मेरे बहके हुए अंदाज से घबराता है ..(- कैफी आजमी)

रविवार, 15 नवंबर 2009

मणिपुर की लोह स्त्री शर्मीला की कहानी - शर्मीला समय की उचाइयों पर...




मणिपुर की रहने वाली शर्मिला इरोम की ९ साल पहले एक सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार के रूप मैं पहचान थी ,वो स्थानीय समाचार पत्र मैं महिला मुद्दों पर बेबाक लिखा करती थी,लेकिन शर्मिला से जब मैं ७ मार्च २००९ को मिली तब वो एक कैदी थी और उसी दिन उसे मणिपुर के स्थानीय जवाहरलाल नेहरु अस्पताल के उच्च सुरक्षा वार्ड से रिहा किया जा रहा था दरअसल ११सितम्बर १९५८ मैं बने ए ऍफ़ एस पी ए [आर्म्स फोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट ]जिसे पूर्वोतर राज्यों अरुणाचल मेघालय असम मणिपुर नागालेंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों मैं सेना को विशेष ताकत देने के लिए पारित किया गया था ]शर्मिला ने इस एक्ट के खिलाफ अकेले आवाज उठाई ,वर्तमान मैं शर्मिला के हक और पक्ष मैं सैकडों आवाजें मणिपुर की घाटियों मैं लगातार गूंज रही हें ...अपने राज्य मैं ए ऍफ़ एस पी ए की क्रूरता ,भ्रष्टचार और अमानवीयता के खिलाफ और इस एक्ट को समाप्त करने एवं अपने राज्य मैं शान्ति स्थापित करने के लिए उसने पिछले तकरीबन .9 सालों से मुँह से पानी की ना तो एक बूँद ग्रहण की है ना भोजन किया है ...उसे जबरदस्ती नाक से नली [ट्यूब ]द्वारा भोजन -पानी दिया जाता है ,साल मैं वो एक बार रिहा होती है और दुसरे दिन पुनः गिरफ्तार कर ली जाती है उसके रिहा और गिरफ्तार होने का सिलसिला पिछले 9 वर्षों से लगातार बदस्तूर जारी है,शर्मिला आज बेशक समय की ऊँचाइयों पर है ,कोई मिसाल उस जैसी फिलवक्त देश भर मैं नहीं, लेकिन इन बीते वर्षों मैं उसकी आवाज केंद्र सरकार तक नहीं पहुँच पाई यह अफ़सोस जनक है..हाल ही मैं युवा सांसद अगाथा संगमा ने १८ जून को शर्मिला से जेल मैं मुलाक़ात कर उसकी मांग को सरकार के सामने रखने का आश्वासन दिया है और कहा की वो इस काले कानून को रद्द करने के लिए केंद्र सरकार से मांग करेंगी और इस मुद्दे को प्राथमिकता देंगी उन्होंने एक लिखित ज्ञापन देकर प्रधान मंत्री से इस मामले पर मुलाक़ात कर अनशन पर बैठी शर्मिला के जीवन को बचाने की अपील भी की है
शर्मिला का संघर्ष .9 वर्ष पूर्व 2 नवम्बर 2000 मैं तब शुरू हुआ जब वो इम्फाल से १५ किलोमीटर की दूरी पर सालोम नामक एक छोटे से गाँव मैं एक शान्ति मार्च की तैयारी कर रही थी ,उसी वक़्त आसाम रायफल्स द्वारा बेहद क्रूरता के साथ १० सिविलियंस को मार डाला गया,जिनमें एक ६५ वर्षीय बूढी औरत के साथ राष्ट्रीय बहादुरी पुरूस्कार प्राप्त बालक भी था शर्मिला ने उसी वक़्त निर्णय लिया,की कुछ अर्थ पूर्ण करना होगा अपनी माँ से आर्शीवाद लेकर उसने उसी जगह से भूख हस्ताल शुरू की जहाँ उन १० निर्दोषों को मारा गया था लेकिन दुसरे दिन ही अंडर क्रिमिनल लों-आई .पी सी ,की धारा ३०९ के तहत उसे गिरफ्तार कर लिया गया ....सबसे शर्मनाक पहलु ये है की इन 9 वर्षों मैं शर्मिला के रिहा और गिरफ्तार होने के बीच मणिपुर मैं कही कोई तबदीली नहीं हुई -लोग बेघर होते रहें बच्चे अनाथ,औरतें, विधवा, और निर्दोष मारे जाते रहें ...और ये सिलसिला आज भी जारी है ,इसी वर्ष जन-फरबरी के मध्य ९० लोगों को बेक़सूर मार डाला गया इस अंतहीन क्रूरता के कारण ही यहाँ [यु जी एस] अंडर ग्राउंड ग्रुप्स का दबदबा बढ़ता ही जारहा है एक अनुमान के अनुसार ५५ हजार सिक्युरिटी फोर्स ढाई करोड़ जनसंख्या के ऊपर है मिलेट्री का इतना बड़ा भाग शायद ही दुनिया के किसी हिस्से पर हो ...पिछले १० सालों में यहाँ मानव अधिकारों के लिए सक्रिय संगठन बढ़ते ही जा रहें हें इनलोगों के लिए ये एक मुश्किल भरी चुनौती भी है
शर्मिला इरोम के पक्ष मैं घाटियों मैं रहने वाला [शर्मिला कनबा लूप]..सेव शर्मिला कैम्पेन ...ने शर्मिला के पक्ष मैं संगठात्मक क्रमिक भूख हड़ताल के साथ गोष्ठी भी लागतार की हें यहाँ ये बता देना जरूरी है की शर्मिला कनबा लूप दरअसल मायरा पेबी ग्रुप का एक भाग है और मायरा पेबी ग्रुप औरतों का एक पारम्परिक जमीनी नेट वर्क है .ये औरतें माइती औरतें कहलाती हें ,जो गावों- शहरों और मणिपुर की घाटियों मैं कार्यरत हैं ,ये शराब-ड्रग्स और स्त्री के प्रति अमानवीयता के खिलाफ रैलियाँ निकालती हें इनके साथ नागा वूमेन यूनियन संगठन भी जुड़ा हुआ है ,जो की वहां की १६ जनजातियों को मिला कर बनाया गया है ये पहाडियों घाटियों मैं अथक काम कर रहें हें और इस वक़्त शर्मिला के संघर्ष मैं हमकदम होने के साथ-साथ ए ऍफ़ एस पी ए विरोध मैं भी है
ए ऍफ़ एस पी ए[स्पेशल आर्म्स फोर्स पॉवरएक्ट ]१९५८-से जमू कश्मीर और उतर पश्चिम राज्यों मैं कई सालों से लागू है ये एक्ट इंडियन मिलेट्री और पैरा मिलेट्री फोर्सेस को ये पॉवर देती है की वो कोई भी ढांचा नष्ट या ख़त्म कर सकती है चाहे कारण छोटा ही क्यों ना हो ,साथ ही किसी को भी शूट या गिरफ्तार भी जो की अपराधिक श्रेणी मैं नहीं आता. जिसके फलस्वरूप निर्दोषों को लगातार मारा जाता रहा है ..हालांकि इस एक्ट के खिलाफ री-अपील की जब मांग जोर शोर से उठी तब भारत सरकार ने एक कमेटी के प्रमुख के रूप मैं रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट के जज और फारमर चेयर ऑफ़ द ला कमीशन -जीवन रेड्डी को परिक्षण हेतु नियुक्त भी किया, बाद मैं अनेक मुश्किलों के चलते २००५ मैं एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमे अलग अलग राज्यों के लोगों और आर्म्स फोर्स के नजरिये से युक्ति-युक्त तरीके से इसे समझना था --ये रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर तो पेश नहीं की गई किन्तु एक नेशनल डेली-[द हिन्दू ]के जरिये सामने जरूर आई जिसमे इस री-अपील का समर्थन किया गया था
बाद मैं [स्पेशल आर्म्स फोर्स पॉवरएक्ट के जुल्मों के खिलाफ विश्व इतिहास मैं एक एसा मामला दर्ज हुआ जो रोंगटे खडे कर देने के लिए काफी था और ये सच भी है की कांगला फोर्ट के उस गुम्बद के नीचे से गुजरते हुए हम उन औरतों की मुश्किलों- मजबूरियों -उनके जज्बे -होंसले को अपने अन्दर भी जज्ब और महसूस कर पा रहे थे...वो काला किस्सा ये था की ११जुलाइ २००९ को जब थंगजम मनोरमा नामक एक युवा लड़की को उसके घर से उठाकर उससे बलात्कार और प्रताड़ना के बाद आसाम रायफल्स द्वारा मार डाला गया परिणाम स्वरूप मायरा पेबी संगठन की १२ औरतों [युवा इमा -माताओं ने आसाम रायफल्स हेड क्वाटर्स इम्फाल के एतिहासिक कांगला फोर्ट पर नग्न मार्च परेड निकाली उनके हाथों पर पर बैनर्स पर लिखा हुआ था "इंडियन आर्मी रेप अस" ,उस वक़्त मानव अधिकारों के लिए लड़ रहे कई औरतों के संगठनों ने अपने अपने तरीकों से विरोध
किया ये लोग वही थे जो शर्मिला को मजबूती से सहयोग कर रहे थे
अक्टूबर २००६ मैं शर्मिला जब रिहा हुई तब वो चुपचाप दो तीन संगठनों के साथ देहली आगई..देहली मैं जंतर-मंतर पार्लियामेन्ट स्ट्रीट पर उसने धरना दिया और अपनी आवाज बुलंद की पुनः उसे गिरफ्तार किया गया और एम्स मैं भर्ती कर दिया गया कुछ दिनों बाद फिर उसे मणिपुर जेल भेज दिया गया शर्मिला मणिपुर की जेल मैं आज भी जिंदा है उसका जीवन ख़त्म हो रहा है ,और उस जैसी सैकडों लड़कियों -औरतों आदमियों को अन्याय का शिकार होना पड रहा है, मणिपुर की स्थानीय पत्रकार अंजुलिका ..ने हमें ३० मिनिट की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बताई जिसमें अन्याय की शिकारविधवा और उनके परिवार महिलाओं की व्यथा दर्ज है.
जब ७मार्च २००९ को शर्मिला को रिहा किया जा रहा था तब अलग -अलग राज्यों से मौजूद महिला पत्रकारों की भारी तादाद मौजूद थी ..शर्मिला अपने समर्थकों और नेकेड प्रोटेस्ट की कुछ औरतों के साथ अस्पताल के भीतर ही बने एक किलोमीटर की दूरी पर बने शिविर तक पैदल चलकर पहुंची,उसका चेहरा शांत और झक्क सफेद था शर्मिला के पक्ष मैं १० दिसम्बर २००८ से मायरा पेबी की औरतें भूख हड़ताल पर हें शर्मिला साफ और धीमे बोलने वाली स्त्री है हर दिन योगा करती उसके भाई सिंघजीत इरोम ने बताया शर्मिला से हमें मिलने मैं दिक्कत आती है ... उसने मीडिया से चंदबातें मणिपुरी में जो कही थी वो यह की "आप लोगो ने जो यहाँ मेरा इंतज़ार किया उसके लिए धन्यवाद जैसे शब्द छोटे हैं, मेरी शक्ति द्विगुणित हुई है... मैं अपना ये कैम्पेन लगातार जारी रखूंगी, मेरे राज्य की घाटियों में सुन्दर फूल खिलते हैं, जल है और नैसर्गिक सुन्दरता है लेकिन जहाँ औरतों को कैद में रखा जाता है. मैं उम्मीद करती हूँ की सभी बहने मेरे राज्य की कहानी अपने साथ ले जाएँ, मेरी आवाज़ बने, मुझे जिंदा रखने में सरकार अपनी बोहोत सी शक्ति और धन खर्च कर रही है..." क्या ये ठीक है?
शर्मीला आश्वस्त है की सरकार इस तरफ देखेगी, इस अन्याय के खिलाफ उसके राज्य को न्याय मिलेगा. शर्मीला का कहना है की कमल के पत्ते पर ओस की बूंद की तरह वह हवा में नहीं बहना चाहती जिसका कोई उद्देश्य न हो.
(मणिपुर से लौटकर)
इसी वर्ष ७ मार्च को मेरी मुलाकात शर्मीला इरोम से इम्फाल में हुई थी, जब उसे इम्फाल के एक स्थानीय "जवाहरलाल नेहरु" अस्पताल के उच्च सुरक्षा वार्ड से रिहा किया जा रहा था, तब मैंने उसे बेहद नज़दीक से देखा जाना और सुना था... उसके साथ उसके समर्थकों की भारी भीड़ थी. मणिपुर की यह लोह स्त्री - iron women, सही मायनो में इस बात को सच साबित करती है.
शर्मीला की यह कथा वैसे तो देश के एक बड़े हिन्दी अखबार में प्रकाशित होनी थी जो मुझे ना छपने पर लौटाई नहीं गयी, जिसे मैंने CD (compact disk) में दिया था, अतः उसे मुझे ज्यों का त्यों अपने ब्लॉग पर देना पड रहा है, जिसे आज से आठ माह पहले लिख चुकी हूँ... और आज प्रकाशित कर रही हूँ. जैसा की मैंने पूर्व में प्रकाशित अपने लेख "इम्फाल में मानवीय अधिकारों के हनन का सिलसिला जारी" में उल्लेख किया है... (औरत संगठन फॉर पावर सोसायटी की ओर से...)
शर्मीला इरोम के पक्ष में सारी दुनिया से अपील करते हुए,..... इसी नवम्बर में जिसे 9 साल पूरे हो गए हैं, जेल की सीखचों के पीछे...