
सख्ती-नरमी और तुम्हारे निश्चल प्रेम की सौगातों में ,
------ कई बार जो मन कहता है ,कहना चाहता है --उसके लिए शब्द दुर्लभ हो जाते हैं भाषा नहीं मिलती सिफर होकर भाव गुम हो जाते हैं,जो लिखा होता है,उस हर लिखे शब्द के चेहरे पर सफेदी पुत जाती है-साक्षी भी कोई नहीं होता सिवाय अपने,कुछ --मनश्चेतना की गहराई से नए सिरे से सोचती हूँ जतन से फिर लिखे को सोचती, छूती और जीती हूँ अपने लिखे को जीना ही मेरे लिए सार्थक लिखना होता है 'ताना-बाना' इसी रूप में रूबरू होता रहेगा...



शब्द अर्थों में बदले या अर्थों के पहाड़ बने ,

मेरे कुरते का टूटा बटन ... नरेन्द्र गौड़,की ये कविता मेरी डायरी मैं सुरक्षित रही जो अपनी बानगी,सम्प्रेश्निय्ता मैं इतनी सरल और अद्भुत है की अभिव्यक्ति के अर्थों मैं भी द्रवित करती है और एक भाव कवि के दुःख मैं आपको साझा करता है ये दुःख आपको जिलाता है जिसके सुख से भी आप रोमांचित हुए बिना नही रह पायेंगे...ये भोपाल से प्रकाशित साक्षात्कार पत्रिका के फरवरी ९७ अंक में प्रकाशित हुई थी,इसी क्रम मैं एक और सुंदर कविता है ...जिसे फिर कभी......मेरे कुरते का,टूटा बटन
टांकने के लिए आख़िर उसे
सुई धागा नही मिला
समय नही ठहरा,कुरते के टूटे बटन के लिए
अपनी जगह रही मेरी तसल्ली,
सुई धागा,तलाशती वह,
गहरे संताप मैं वहीँ छूट गई,
बिना बटन के ही
वो कुर्ता पहना, पहना इतना,
आगे पहनने लायक नही रहा
मेरे पास वोही एक कुर्ता था,
जिसकी जेब मैं तमाम दुनिया को रखे घूमता था,
रात को मेरे सीने पर वह,
सर टिकाये रहती है,
टूटा बटन खोजती,अपनी अँगुलियों के साथ,
वो शाम के रंगों की तरह था,आया और चला गया,किसको अँधेरा खोजता ,आया और चला गया,[शरद रंजन ]

अनुभूतियों और शब्दों के बीच खोजते हुए वह अपने को उस शाम करीब छ माह बाद उसी सड़क पर लौटा लाई जो उसकी पसंदीदा भी थी और गवाह भी.सड़क दूर तक खुदी हुई थी ,उसके किनारे ढेरों कंकरीली काली मिटटी पड़ी हुई थी.ना वहां रस्टी शील्ड -पीला गुलमोहर था और ना ही दुरान्ता रिपेन्स की हरे पीले पत्तों की झाडियाँ मौजूद थी जिसमे सितम्बर से दिसम्बर तक भर पूर पीले फूल आतें हैं,धीरे-धीरे पुरानी पत्तियां झडती रहती है नई चमकीली पत्तियां आने तक . और मार्च तक हरी भूरी फलियों से पेड़ लद जाता है जो बाद मैं पेड़ के नीचे बिछ जाती है जिन्हें चुनना अच्छा लगता है ,उस निरापद और निष्टुर रास्ते पर चलते-सुनते शब्द चीत्कारों से अब लगातार मर रहे थे ,पलट कर देखने का मोह छोडा भी तो नही जाता पिछले सब का जायजा लेने का एक मौका ही तो था ,निपट अकेले मैं खासे भरे-पेडों की शाखाओं से गिरते पीले मुरझाये पत्ते हवा के साथ बजते हुए सुनने का,परन्तु पत्ते उतरे,पेडों की नुकीली शाखाएँ बेतरतीब सी आकाश की छाती पर चुभती सी दिखलाई पड़ती ,बस इसीलिए उसे दिसम्बर नही भाता ,रस रूप ,गंध,शब्द और स्पर्श से बंधा मंगल मुहूर्त और उस चेहरे का वैभव जिसके सहारे कोई अँधेरा दरअँधेरा पार करता ,वो ट्रांसपेरेंट हो गया सब कुछ की जिसके पार सेकडों मील दूर तक भी बहुत कुछ देखा जा सकता था,फिर कौन परवाह करता किसी के जीने मरने की ...उसने तो वायदा किया था जो कुछ पाउँगा उसे अकेले नही देखूंगा ,हाथ पकड़ कर तुम्हे भी दिखाउंगा ,किसी तकलीफ से गुजरना -ताकि जिन्दगी को करीब से देखा जाय ,ताकि अपने करीबी लोगों को और अधिक प्यार किया जा सके, कला का सार तत्व उसका निचोड़ जानने ,जीने की एक अच्छी कोशिश,लिखने की शुरुआत ,दुनिया के आम सुख -दुःख से ऊपर उठने को वो सप्रयास सीखने लगे ....उसने फिर भी एक जोरों से साँस ली और भीतर ही भीतर उसकी अद्रश्य पीठ पर सर टिका दिया ..और एक अंगुली से लिखा दुनिया के सबसे गहरे अर्थों वाला शब्द---स्लेटी रंग से उसे चिड थी पर उस सिलेटी शाम का क्या करे,देर रात तक उस खुले अंत का, उसने फिर भी सपना देखा गुलमोहर खिल उठा है जिसके तले वो अपने सेल पर कविता के कुछ शब्दों को सुनते...
मध्यप्रदेश के इन चुनावों मैं भा ज पा ने ना केवल एतिहासिक जीत दर्ज की है वरन सम्मान जनक स्थिति भी हांसिल कर ली है खूबी यही है के टिकिट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार ,प्रत्याशियों का मनोबल बढ़ाना,पत्रकारों से तालमेल बैठाना,अपोजिशन को फेस करना-जवाब देना और अपने आत्म विशवास को बनाय रखना,जेसे कारक तत्वों के चलते एक साफ चेहरे वाला व्यक्ति ,और उसकी कोशिशें अन्तत लक्ष्य पूर्ति मैं सफल रही ,जिस इमानदारी,सादगी और कर्मठता से गरीब की रोटी-पानी की चिंता शिवराज सिंह चौहान ने की ....ये जीत का सेहरा उसी का परिणाम है,कुछ वर्षों पूर्व देनिकभासकर के लिए जब मैंने शिवराज सिंह जी का इंटर व्यू किया था तब पाटी मैं उनकी कोई ख़ास पहचान नही थी ,तब भी वो चमक-धमक से दूर सादगी से नाता जोड़े हुए पैदल या सायकिल से घूम-घूम कर कार्य करते थे ,..तब ना उनके पास भीड़ थी ना पत्रकारों का हुजूम ,उसके बाद जब उन्होंने सत्ता संभाली तब भी वे सादगी से भरे हुए थे ,चुनौतियां भी थी ,तब इस कम अनुभवी किंतु आम आदमी से जुड़े नेता ने जल्द ही गरीबों की समस्याओं से साक्षात्कार कर उनकी मुश्किलों का तुंरत निदान और उपेक्षित वर्ग को आत्म विशवास दिलाने मैं जो दिलचस्पी और सच्चाई बरती,साथ ही शासन और आम जन के बीच सेतु बनकर काम करने के अपने अंदाज को जिस तरह बखूबी अमली जामा पहनाया काबिले तारीफ है,हर जागरूक आदमी जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचता है उनकी जीत के प्रति आश्वस्त था,आंकडों पर ना जाएँ कुछ मुद्दे छोड़ भी दे तो पिछले तीन सालों मैं विशेषकर महिलाओं को संबल देने हेतु जो व्यवहारिक काम किए वो देश भर मैं किसी राज्य के खातें मैं नही होंगे, ३० जुलाइ २००२ को मुख्यमंत्री निवास पर महिला पंचायत और फिर समाज के कमजोर दलित तबके के लिए पंचायतों का सिलसिला,उनके प्रकरण ,समस्या, निदान ,सरक्षण, कानून ,उनकी मुश्किलों को सुनना ,जानना,ये सब किर्यान्वित होता रहा परिणाम सामने है लोगों ने उन्हें चुना,लाडली लक्ष्मी जैसी अनूठी योजना,ने गरीब स्त्री मैं एक ऊर्जा और आत्म विशवास का संचार किया,ये योजना थी भी इसलिए ,ताकि स्त्री के चेहरे पर गरीबी ना दिखे महिला सशक्तिकरण ,गुणात्मक स्वास्थ्य सेवायें,क्षमता भर विकास,रोजगार एवं आय बढाने के अवसर बढाना,जेंडर आधारित बजट व्यवस्था ,श्रमिक महिलाओं के हितों का संरक्षण यौन प्रतारणा की रोकथाम ,वन जल पर्यावरण, इनमें भागीदारी को ख़ास अहमियत दी गई एवं कठिन स्थिति वाली महिलाओं को सुविधाऔर उनके लिए संसाधन मुह्हिया करना ,सुचना संसार मैं तकनिकी भागीदारी,नीतिगत प्रावधानों की मोनिटरिंग मूल्यांकन प्रतिवेदन महिला निति के लिए कार्ययोजना मैं विभागों की जिम्मेदारी को शामिल किया गया, साथ ही कई पुरुस्कारों कोदेने के साथ आदिवासी निशाक्त्जानो मेधावी छात्रों ,किसान महापंचायतों के माध्यम किसानो को बिजली माफीदेश मैं पहला मत्स्य निति बनाने वाला राज्य बनाकर शिव सरकार ने मध्यप्रदेश की राजनीति मैं एक एतिहासिक मोड़ दिया है ,लेकिन अपने घोषणा पत्र मैं सरकार ने जो कहा है ..पानी बिजली जैसे मुद्दे उन्हें पूरा करने के लिए अब सरकार को जी-जान से जुटना होगा ,जहाँ -जहाँ असंतोष है वहां चौकसी के साथ काम करना होगा,सरकार से अब उम्मीदें और बढ़ जायेंगी लेकिन अब उनके पास मौका भी है, और समय भी ,यही नही ये चुनाव एतिहासिक ही नही आगामी लोकसभा चुनावों के लिए निर्णायक भी सिद्ध होंगे कबीर द्वारा परिभाषित जोगी ,[सब सिद्ध्ही सहज पाइये ,जो मन जोगी होई ]शिव राज सिंह को फिर भी याद रखना होगा सच्चाई से की अन्तिम आदमी कोयाद रखना अपने अन्दर के विचार को और अपनी मनुष्यता को बचा कर रखना है नही तो सत्ता मैं रह करभ्रष्ट तो होना ही होता है सता की अपनी मजबूरियाँ होती है और मतदाता की भी ,....आमीन ,जिसको चाहे शोहरत दे ये करम उसी का है 
उन्होंने चिंदी -चिंदी किया प्रेम ,ताकि सुख से नफरत कर सके उन्होंने धज्जियाँ उडाई जीवन की ताकि सुख से मर सके