मंगलवार, 31 मार्च 2009

यूँ किसी को हाथ पकड़ कर इस दुनिया के कबाड़ से अलग किसी ऊंचाई पर बैठा देना.....और एक मुकम्मल सच में बासी होते दिन... उससे ना पूछिए...

क्या अपने तर्कों से दूसरो के दुखों की शिनाख्त की जा सकती है नए होने के लिए प्रतिपल मरना जरूरी था .और अपने दुःख को रूक कर देखना भी इसलिए अनिवार्य हो गया ..तर्क के नियमों का अतिक्रमण किए बगैर ,औरकुछ ऐसा जानना -खोजना भीतर से बाहर की तरफ जो उसके सुख का कारण होता अपनी सामर्थ्य पर उसे भरोसा था ,ये एक तर्क ही था अपने आप से....आखी र नए मौसमों की खुमारी भी तो उतरती ,वो खुश थी या नही ये ठीक से जान पाना मुश्किल था ,लम्बी यात्राओं पर जाने और लौटने के बाद ताजगी के साथ शामिल दुखों का नए सिरे से खुल जाना ....सावधान आगे खतरनाक मोड़ है.के हर आधा किलोमीटर की दूरी पर लिखे बोर्ड को पढ़ते-डरते पोर्ट पर पहुँच ही गई ...मौसम की खराबी की वजह से फ्लाईट चार घंटे लेट थी ...मुश्किल यही की पिछली मुश्किलों और स्म्रतियों मैं जाने का मतलब ...आसान नही था बाद मैं लौटना .....कई दिनों तक दुनिया दारी के बीच इंटेंसिव केयर से उबर पाया मन ,तब घर के पेड़ पौधों के पत्तों पर खिली धुप मैं धूल की पर्त थी बोनसाई की जड़ें हद से बाहर जारही थी ,छंटाई की जरूरत थी ,नए सिरे से घर की सफाई की भी, -किताबों को करीने से रखना विषय नुसार रखना, टेग लगाना,चलता रहा फिश टैंक में मछलियां लगातार मर रही थी हर दिन एक मरी मछली को किसी पेड़ की जड़ में रखना और उनकी चमकीली देह को चींटियों को खाते हुए देखना बर्दाश्त के बाहर हो चला था ,एक पसंदीदा ब्लेक फिश बची थी ...जल्द ही और रंगीन मछलियाँ खरीदना तय था ,वार्ड रौब मैं सब कुछ उलट-पुलट था काटन -सिल्क साडियां बेतरतीब तरीके से मिक्स हो चुकी थी उन्हें छांटना ड्राई क्लीन को देना -किचिन मैं इकठ्ठा हुए डिब्बे बोतलें, जार, रद्दी को फेकना ,परदों को बदलना सब कुछ चलता रहा ....उसके बाद कुछ दिन सूकून रहा ग्रीन टी वाली खुशबु ...से दिल दिमाग तरोताजा रहा ,लेकिन एक स्थाई अंतरा मन में खुश मिजाज होने का ढोंग रचता रहा ....ये भी जल्दी ही समझ आ गया, सर्दियों के दिनों में ढेरों मौलश्री के फूल बटोरना फिर उन्हें हथेलियों में भर जोरों से साँस लेना ...छोटे और तेज खुशबू वाले मौलश्री एक अज्ञात खुशी में भीग जाने वाले अहसास को लिए होते थे,एक नर्म आहट ,चाशनी जल में भीगती आवाजें ..तो क्या सब कुछ झूट था वो मैत्री वात्सल्य ,वो यूँ किसीका हाथ पकड़ कर इस दुनिया के कबाड़ से अलग -थलग किसी ऊंचाई पर बैठा देना ...कुछ गुमने-पाने का अहसास स्थिर हो जाए ....ऊंचाई से उसका डर ही शायद उसे किसी गहरी खाई मैं फ़ेंक गया, शिलोंग की सबसे ऊँची पहाडी से नीचे अतल में अपने को देखना जिन्दगी खुश है आग से भरी नदी को पार कर लेना बिना झुलसे ...और फिर ठेल दिया जाना की देखें फिर झुलसती हो या नही वो आँखे बंद कर लेती है ...होल्ड मी टाईट...उसी गर्माहट में ..देखते -देखते चटख -पलाश खिलने का मौसम आपहुंचा .धीरे-धीरे पलाश भी मुरझा गए --रंग उड़ गया उनका तेज धूप में, पेड़ों के नीचेबिखर कर, मौसम की क्रूरता बे आवाज़ ...एक्सक्लूसिव होकर रह गई.....उसने एक लय ईजाद कर कर ली थी इस बीच ,एक चक्कर घिन्नी में इक्च्छा,इर्द-गिर्द सपनों के, जिनका कोई सिरा नही था ,और सारी गड्ड-मड्ड यहीं से शुरू होती थी ,अपने को लानत भेजने के अलावा कोई चारा नही बचता ..एक मुकम्मल सच में बासी होते दिन, फिर भी उन दिनों की ताजगी में लौटना -मायूस होना जरूरी हो जाता उससे शिकायत थी, लंबे अरसे से ख़त ना लिखने की -यूँ ख़त तो उसने कभी लिखा भी नही जो कहा वो ही बस ख़त की शक्ल में अमिट-अक्षय था ..सीने में, करिश्मे के इन्तजार में उम्र का बीतना इलियट की कोफी के चमच्चों के साथ वो सोचती रह गई जो झूट था.. सामने था, सच था तिलस्मी ...घर दूर बहुत पीछे छूट गया ,बातें टल गई,ख़त्म नही हुई ...उसकी हथेलियों में सौ प्रतिशत सन्यासी हो जाने के चांस थे...जब पूछा तो यही कहा सच कोई हाथ-वाथ देखना नही आता ,अंक ज्योतिष पर तो भरोसा है लेकिन लकीरों का फरेब....एक हँसी ...आंखों मैं मुक्ति की पीडा के साथ छटपटाहट ,रुलाई ना फूटे और रोना आए तो... साथ चलते ना कोई काँटा गडा ना तो..कोई तिनका आँख तले अडा..ना कोई चोट लगी ना ठोकर ..हर चीज को शब्द दे देने में माहिर जल में घुलते हुए शब्द ...डूबते हुए ,उससे ना पूछिये अपने साहिल की दूरियां ....बुद्ध के शब्द... एक साँस ,एक शब्द ,एक वाक्य ,के बाद हम वो नही हो सकते जो उसके पहले थे,हर क्षण अलग....कोई हाथ हिला कर बिदा देता है...खीचकर माथा चूम लेता है आंखों की नमी माथे पर देर तक ठंडक देती ,असुआई आंखों से पीछे, सब कुछ धुंधला जाता है ..उसकी फलाईट का नंबर अनाउंस होता है... ।
कैसे-कैसे मरहले सर तेरी खातिर से किए ,कैसे-कैसे लोग तेरे नाम पर अच्छे लगे...शैदा रोमानी .चित्र एलिफेंट फाल्स ..शिलोंग,

शनिवार, 21 मार्च 2009

मणिपुर-इम्फाल मैं मानव अधिकारों के हनन का सिलसिला कई सालों से लगातार,कई संगठनों ने आवाज़ बुलंद की है


होली के दुसरे दिन इम्फाल -मणिपुर -मेघालय से लौटना करीब १० दिनी यात्रा के बाद....इ मेल बॉक्स मैं ढेरों होली की शभ कामनाएं ,शुभकामनाएं स्वीकार करने और देने का कोई ओचित्य नजर नही आता ,यकीं माने रंग और खुशियाँ बेमानी लगतेंहैं जब हमारे ही देश के किसी दूसरे राज्य मैं हर दिन दो पॉँच लोग खून के रंग से रंग दिए जातें हैं तो रंगों का ये त्यौहार एक अपराध बोध की तरह दिल-दिमाग को परेशान और दुखी करता है .मणिपुर के बीते और वर्तमान हाल को हर आदमी को उतने ही गहरे से सुनने ,समझने और चिंतन करने की जरूरत है जितना की वो अपनी व्यक्तिगत मुश्किलों से निजात पाने की कोशिश करता है ....हम अपने आप से सवाल करें ...क्या हमें अपने राज्य मैं अपने ढंग से शान्ति पूर्वक जीने -रहने का हक है या नही? क्या समान कानून का प्रावधान हमारे लिए है या नही ,साथही क्या हमारा सविधान हमें जीने का मौलिक अधिकार देता है या नही ---ये सवाल इस लिए भी की बेहद खूबसूरत घाटियों -वादियों से घिरा फूलों से खिला हुआ ,सुंदर और कर्मठ लोगों की आबादी वाला मणिपुर -जहाँ की संस्कृति ,परम्परा वेशभूषा- खान पान हमें लुभाता है,क्या वहां के लोग ,हम आप कीतरह सामान्य जीवन जी पा रहें हैं ,उनके मानवीय और मौलिक अधिकारों का हनन क्यों और किस बिना पर क्या जा रहा है,इस संदर्भ मैं सरकार के अपने तर्क होंगे/हो सकतें हैं,मणिपुर की जनसंख्या इस वक्त लगभग २३ लाख है ,जब हम आप अपने राज्य मैं चैन की नींद स्वतंत्रता पूर्वक सोते हैं ,तभी मणिपुर की घाटियों मैं कोई ना कोई निर्दोष मार दिया जाता है ...दर असल कई सालों से यहाँ हिंसा क्रूरता भ्रष्टाचार और बलात्कार का जो तांडव चल रहा है,उसके लिए [ऐ ऍफ़ एस पी ऐ ]आर्म्स फोर्स स्पेशल पावर एक्ट -१९५८ को जिमेदार ठहराया गया है.और इस एक्ट के विरोध मैं यहाँ के स्थानीय पीड़ित व्यक्ति -संगठनों,ने अब एक जुटहोकर रिअपिल की मांग की है चूँकि [ऐ एफएस पी ऐ ]कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट के अनेक राज्यों मैं कई सालों से लागू है, ये एक्ट इंडियन मिलेट्री और पैरा मिलेट्री फोर्सेस को ये अधिकार और शक्ति प्रदान करता है की ,जिसके तहत वो किसी को भी शूट करसकता है या गिरफ्तार या बिना वारंट के सर्च या किसी भी ढांचे को ख़तम कर सकता है या शक के बिना पर मारने का उसे अधिकार है ..जोकि आपराधिक श्रेणी मैं नही आता ...जब ऐ ऍफ़ एसपी ऐ के लिए रिअपील के समर्थन मैं अधिका धिक् मांग उठने लगी तबभारत सरकार ने एक कमेटी का गठन इस पुनर्विचार हेतु किया, जिसमे कमेटी के प्रमुख के रूप मैं रिटायर्ड सुप्रीम कौर्ट के जज और फार्मर चेयर ऑफ़ दा ला कमीशन जीवन रेड्डी को परिक्षण हेतु निउक्त किया इसी के चलते २००५ मैं जो रिपोर्ट पेश की गई ...उसमे आर्म्स फोर्स और अलग-अलग लोगों के नजरिये को युक्ति-युक्त तरीके से समझना था ...जो आधिकारिक रूप से तो पेश नही की जा सकी लेकिन नेशनल डेली हिंदू के जरिये सामने जरूर आई ..रिपोर्ट ने ऐ ऍफ़ एस पी ऐ के सन्दर्भ में रिअपील का समर्थन किया ..जो की अमल मैं नही लाइ जा सकी , फल स्वरुप मणिपुर और घाटियों में साथ आस-पास के जन जीवन मैं मानव अधिकारों का हनन तेजी से और भी बढ़ता गया ,,जिसमें शक के आधार पर निर्दोषों के मार डालने , औरतों के साथ बद सलूकी और बलात्कार जैसी अमानवीय घटनाएं शामिल होती रही,मणिपुर नॉर्थ ईस्ट मैं भारतकी सीमा मायंमार से जुदा है यहाँ की साम्राज्य का इतिहास परम्परा और समृद्ध है ,१९४९ से १९५० मैं मणिपुर मैं प्रथक नागा संगठन का विद्रोह सामने आया और साथ ही कई मिलते जुलते संगठन मणिपुर मैं बने ,क्योकि तब उनके राज्य को इंडियन यूनियन से जोड़ा गया ..ऐ ऍफ़ एस पी ऐ के लागू होते ही वहां की औरतों की जिन्दगी पर बुरा असर पड़ने लगा अपनी शक्ति और विशेष ताकत के बल पर उन्हें उत्पीडित करना, मार डालना जैसी घटनाएं रोजमर्रा की जिन्दगी मैं आम हो गई है ..मणिपुर मात्रसत्तात्मक समाज की अगुआई करता है अपने आर्थिक जीवन यापन के लिए अधिकाँश औरतें जंगलों में कठिन परिस्थितियों में इंधन-पानीके लिए घूमते ..घाटियों में ऐ ऍफ़ एस पी ऐ के हाथों हिंसा का शिकार हो जाती हैं ,हाल ही मैं जन - फर मैं ९० लोगों को मार डाला गया ...और ये अमानवीय व्यवहार घाटी में आज भी बदस्तूर जारी है ...जो बेहद शर्मनाक भी है ,एक अनुमान के अनुसार इन्ही कारणों के चलते यहाँ यु जी स अंडर ग्राउंड ग्रुप्स] का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है ,एक अनुमान के अनुसार घाटी मैं फिलवक्त ३० युइ जी स सक्रीय हैं और ५५हजार सिकुरिटीफोर्स ढाई करोर जनसंख्या के ऊपर है मणिपुर के लोगों के लिए यह एक चुनौती है जिसमे पहाडियों पर रहने वाला जनसमुदाय का एक बहुत बढ़ा हिस्सा फँस गया है ...इसी कारण मानवीय अधिकारों के लिए जागरूक और सक्रीय संगठन बढ़ते ही जा रहे हैं,इस वक्त वहां महिलाओं के पक्ष में पारम्परिक और जमीनी नेट वर्क है मायरापेबी...इस संगठन में माइतीऔरतें हैं जो गावों -शहरों और मणिपुर की घाटियों में कार्यरत हैं ये लोग शाराब -ड्रग्स और हर तरह के अन्याय के खिलाफ रैली यां निकाल्तें हैं और अपने तरीकें से लड़तें हैं ,इनके साथ ही नागा वूमेन यूनियन मणिपुर[एन डब्लू यु एम् ]एक एसा संगठन है जो वहां की १६ जनजातियों को मिला कर बनाया गया ये पहाडी जिलों मैं अथक-और सतत काम कर रहा है इनका विरोध भी ऐ ऍफ़ एस पी ऐ के खिलाफ है
इस पूरी कहानी मणिपुर की स्त्रियों का एक पक्ष यह भी है की वह किस तरह लाम बध्द होकर अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है,बतौर उदाहरण ...एक युवा लड़की थंगजम मनोरम को ११जुलै २००४ को उसके घर से रात के वक्त उठा लिया गया बाद मैं बलात्कार एवं प्रताड़ना के बाद आसाम राइफल्स द्वारा मार दिया गया,परिणाम स्वरूप मायरापेबी की १२ औरतों -युवा इमा [माताओं]ने आसाम राइफल्स हेड क्वाटर्स -इम्फाल के एतिहासिक कांगला फौर्ट पर नग्न परेडनिकाली उनके हाथों पर बैनर्स पर लिखा था ..इंडियन आर्मी रेप अस ...ये एतिहासिक कदम शायद दुनिया मैं पहला एसा कदम था जिस के लिए एक होंसले के साथ ही अपनी बिरादरी के लिए कुछ करने का जज्बा उन औरतों मैं था, और आज भी है उस वक्त जो संगठन वहां अपने हक के लिए लड़ रहे थे वो भी सकते मैं आगये...तब से अबतक वालीवाल मेच के दौरान १४ मार्च १९८४ को सी आर पी ऍफ़ की फायरिंग से १४ लोगों की मौत ,१० जुलाई १९८७ को ओपरेशन ब्लू बर्ड के समय,१४ सिविलियंस को मारना,२५ मार्च १९९३ को तेरा बाजार कैल्थल -इम्फाल मैं ७ लोगों की ह्त्या, ७जुलाइ १९९५ मैं इंफालमेडिकल कालेज मैं ९ स्टूडेंट्स का खून करना,२ नवम्बर २००० को मालोम मैं १० लोगों के साथ एक बूढे आदमी की हत्या, -[जहाँ से शर्मिला नामक ३८ वर्षीय युवती ने हंगर स्ट्राइक शुरू की ,इसकी कहानी अगली पोस्ट मैं ]उपरोक्त विवरण के अनुसार थांग-जम मनोरम की कस्टोडियल मौत....जिसके परिणाम मैं कांगला फौर्ट पर नग्न प्रदर्शन ]ये उदाहरण एक इसे सच से रूबरू करातें हैं की सोचने पर मजबूर होना पड़ता है की क्या हम आजाद हिन्दुस्तान मैं रह रहें है,या बर्बर युग मैं...देश भर की महिला पत्रकारों का एक बड़ा दल देश के भिन्न भागों से ,मार्च के पहले हफ्ते मणिपुर मैं मौजूद था ...और भी कई कारक तत्व इस वक्त इंफाल मैं काम कर रहें की वहां के लोग सामान्य जीवन भी नही जी पा रहें हैं ...मणिपुर के लोगों के मुश्किल हालातों और जन जीवन मैं आए इस बिखराव-तनाव ..के कारण सबसे अधिक मुश्किलों का सामना महिलाओं को करना पड़ रहा है ,लेकिन हालत मैं बदलाव आयेगा जरूर ...सरकार को समझना होगा,सुनना होगा, और तुंरत उचित कारर्वाई भी करनी होगी,...मणिपुर की हमारी साथी पत्रकार अंजुलिका थिन्गम जिसके भाई को ३माह पूर्व आसाम राइफल्स वालों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी ,ने जब मुझे एयर पोर्ट छोड़ते वक्त कहादेश मैं कहीं भी कोई छोटी सी घटना होती ही छोटे-बड़े अखबारों मैं छपता है ...यहाँ जीवन कीडे-मकोडों के समान है हर दिन लोग मारे जा रहें है औरतें विधवा जीवन जी रही हैं ...उनके घर बर्बाद होगये हैं ...कहीं कोई हलचल नही होती,ये अन्याय नही है क्या?मेरा संदेश हिन्दी पाठको तक पहुंचे ..हमारे दुःख को वो भी समझेगे मुझे यकीन है पिछले कई दिनों से ये पोस्ट चित्रों के कारण पोस्ट नही हो पाई है...फोटो अपलोड होने मैं मुश्किल आरही है इसलिए फिलहाल सिर्फ रिपोर्ट...अगली पोस्ट मैं दूसरे चित्र भी ...होंगे.आमीन,

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

पतझर मैं बारिश- हालाँकि मौसम के टूटकर गिरते पत्तों में पुरानी उदासियाँ जज्ब है... प्रेम करते हुए चुप रहने की तरह...


कोई भीड़ मैं आसानी से कैसे गुम हो सकता है ,वो भी तब-जब प्रेम एक जरूरी ताक़त की तरह मौजूदा चीजों को नए सिरे से देख रहा हो चाहे ये रह रहकर खो जाना या मिलना कितना ही मुश्किल या आसन हो और,साथ ही अच्छी पुरानी से शुरुआत करना ,ये वक्त खुश होने के निर्णय लिए जाने की ही तरह था... अपनी नाव तूफान से बचा कर ले आने की मानिंद,और निराशा- उदासियों की तह लगा कर गठरी बनाकर सिरहाने रख दिए जाने की कठिन मेहनत...फिर भी रात गहराते जाने के साथ गठाने खुलती जाती है ,जाने कितने वसंत-पतझर झरते ही जाते है, एकाध सूखे पत्ते का नुकीला रेशा-तिनका आंखों मैं कुडमुडाता है ---तुम रो रही हो ,नही तो ,रोया तो अकेले मैं जाता है --वो गीला पन सूखे-पीले और कुछ-कुछ लाल ताम्बई रंग में पड़ गए पत्तों की खडखडाहट के साथ अनन्त मैं उड़ता ही जाता है, कोई कितना और कहाँ तक समेटे,-कोई पता -घर-ठिकाना तो मिले---रास्ते भी तो निरापद हो जातें हैं अक्सर जिन पर चलते-चलते सुनाई देते शब्द -दिल के जाने किस हिस्से में दब जातें हैं -दरारें भरने लगती हैं ,लेकिन एक बारिश होते ही उनसे फिर नई कोंपलें उमीदों से झाँकने लगती हैं ...वो मोड़ आज भी हर शाम मिल ही जाता है ,जब ऐसे ही किसी मौसम में उसके शहर में बारिश हुई थी मोबाइल पर गुनगुनी आवाज़ लहराई...जानती हो आज मेरे शहर में बारिश हुई,अभी भी हो रही है बारिश में भीगी खुशी...बारिश और खुशी दोनों उसकी आवाज़ में किस्से की तरह थी,उसके बाद सांवली मिटटी की सौंधी खुशबू सा ही घुलने-मिलने वाला असीम, कभी ना ख़त्म होने वाला आकाश था---एक वक्त होता है जब अपने में बदलाव की सारी गुंजाइशें ख़त्म हो जाती है चेहरे पर एक अचाही बेचारगी और एक लंबा फासला साफ दिखाई पड़ जाता है ,कभी उसी चेहरे पर नीला बादल शिद्दत से उतर आता था,साधारण और विशिष्ट को मजबूती से थाम लेने वाली आँखें ---दिमाग के दायरे से एक लम्बी सुरंग गुजरती है,अन्धेरें में इत्मीनान से पडा इन्तजार रौशनी की पतली लकीर सा झांकता है ।यूँ तो सारी चीजें अपनी जगह ठिकाने पर रहती थी॥फिर भी जाने कैसे ठोकर लगी और जरूरी चीजें बेठिकाने होकर रह गई जो कुछ बीच राह मिला --बीच राह इधर-उधर हो गया आई .एस आई मार्का रिश्ते भी प्रमाणित होने की सूचि की प्रतीक्षा में दर्ज हो कर रह गए ...अपने ही निंदक और प्रशंसक होते-होते एक असंगत समय की और लौटा ले चलने की कोशिश कभी सफल तो कभी असफल हो जाती है ,दिकत्त यही नही -उसके ना होने पर भी होने की है और जाने क्या हुआ ,कितने बादल गरजे ,कितनी बिजली चमकी ,कितनी बे मौसमी बारिश हुई ,नाजाने कितने नदी -ताल भर गएँ होंगे उस साल नही पता ,सारे सूखे पत्ते गीले होकर ,सिमट कर ,टूटकर ,तार-तार बह गए ...क्या ये याद दिलाना होगा अब ,अपने आप को कभी -कभी सहूलियत भी देना होता है ,जो आसान नहीहोता चीजों के प्रति आस्थाओं को पैना करना,मन ही मन तकलीफों और उमीदों को जहाँ जैसा हो वहीँ छोड़ना -पकड़ना... ये वसंत भी फीका ही गुजरेगा मान लेती हूँ ,कुछ सूखे पत्ते जिन्दगी में दर्ज हो-हर्ज ही क्या है ...जिन्दगी चाहे जितनी हरी हो,हालांकि मौसम के टूटकर गिरते पत्तों में पुरानी उदासियाँ जज्ब है प्रेम करते हुए चुप रहने की तरह जो हर शाम जरूरत -बेजरूरत गमकती ख़स की खुशबु के साथ तनी चली आती है,एक नीली उदासी सिरहाने फिर भी बची रहती है, उसकी गठान नही खुलती शायद किसी और जनम में खुले..मियाँ मल्लहार में निबद्ध बेगम अख्तर की पुरअसर आवाज़ मन ही मन सीमेंट गारे रेत की ईंट दर ईंट जमाती है ....छत से दिखलाई पड़ते पार्क में खडा सिंदूरी फूलों से टंका अलग -थलग नुकीला सेमल का पेड़ -पेड़ के तने पर नाखूनों से लिखा जाने किसका नाम ...सपर्श की बुनावट में हरा ही रहता है,क्रिकेट खेलते बच्चों की गेंद उपरी शाखाओं से टकरा कर नीचे आती है पेड़ की इक्का -दुक्का बची-खुची पत्तियां झडती हुई जमीन पर बिछती जाती है ,शायद अब- अभी इन पर कोई आहट हो उसके आने की .....
जो नही है उसके इन्तजार की तरह /जो नही/होगा उसकी /उमीदों की तरह........मंगलेश डबराल

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

मर्दों की इस तानाशाह दुनिया मैं,


मर्दों की इस तानाशाह दुनिया मैं
मर्दों की इस तानाशाह दुनिया मैं,
दरवाजे खोलो और
दूर तक देखो खुली हवा मैं ,औरतें
जहाँ भी हैं ,जैसी भी हैं
पुरी शिद्दत के साथ मौजूद हैं
-वे हमारे बीच अन्धेरें मैं रौशनी की तरह हैं
औरतें हंसती हैं खिलखिलाती हैं
खुशियाँ बरसाती .....छोटे-छोटे उत्सव बन जाती हैं औरतें
औरतें रोती हैं सिसक-सिसक कर जब कभी,
अज्ञात दारुण दुःख मैं भीग जाती है ये धरती,
औरतें हमारा सुख है-औरतें हमारा दुःख हैं
हमारे दुःख-सुख की गहरी अनुभूति हैं
ये औरतें,जड़ से फल तक,
-डाल से छाल तक
वृक्षों -सी परमार्थ मैं लगी हैं -ये औरतें,
युगों से कूटी,पीसी,छीली-सूखी और सहेजी जा रही हैं
असाध्य रोगों की दवाओं की तरह
सौ-सौ खटरागों मैं खटती हुई,
रसोईघरों की हदों मैं
औरतें गम गमाती हैं मीट-मसलों -की तरह
सिलबत्तों पर खुशी-खुशी पोदीना प्याज सी
पिस जाती है औरतें
चूल्हे पर रोटी होती है औरतें
यह क्या कम बड़ी बात है
लाखों-करोड़ों की भूख-प्यास हैं औरतें
प्रथ्वी सी बिछी हैं औरतें
आकाश सी तनी हैं औरतें,
जरूरी चिठियों की तरह रोज पढ़ी जाती हैं औरतें,
तार मैं पिरो दी जाती हैं आज भी औरतें,
वक्त जरूरत इस तरह,बहुत काम आती हैं औरतें,
शोर होता हैं जब
औरतें चुपचाप सहती हैं ताप को
औरतें चिल्लातीं हैं जब कभी
बहुत कुछ कहती हैं आपको,
औरतों को समझने के लिए ताना शाहों
पहले दरवाजें खोलों
और दूर तक देखो खुली हवा मैं,
.अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर ....थोडा देर से ...किंतु शुभकामनाओं के साथ...भाई अजामिल की कविता ...जो बानगी की सरलता के कारण मेरी पसंदीदा है ....इम्फाल- शिलोंग से लौटकर....

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

वसंत के इन दिनों मैं,


वसंत के इन दिनों में

कभी तो मिलो ,कहीं तो मिलो /कुछ बातें हों गिले शिकवें दूर हों /तुम्हे भी तो पता लगे /कितना अच्छा होता है /कभी-कभी पुल पार करना.....

अपनी डायरी से ----कवि अनाम

रविवार, 25 जनवरी 2009

गुमी हुई चीजें मिल जाती हैं, कभी नही ,और कभी अप्रत्याशित खुशियों की तरह सामने आ जाती है..



अक्सर ही हम अपनी जिन्दगी मैं चीजें खो देतें हैं ,.कभी लापरवाही से और कभी भाग्य से वो हमारी हो करभी.... नही होती,कभी चोरी तो कभी नष्ट हो जाती है लेकिन हम उन्हें वहीँ तलाश नही करते जहाँ मिलने की उम्मीद होती है ,वरन एक सीमा तक हमारा मन चीजों की तलाश उन ठिकानो पर भी करता रहता है ,जहाँ से लौटने की उनकी कोई गुंजाइश नही होती... फिर भी चीजें कभी लौटती है और कभी स्मर्तियाँ ...और कभी ता उम्र नही ,पिंजरे से उड़ गए पाखी की तरह...गये हुए माता-पिता,भाई-बहन या किसी प्रिय की मानिंद.चाहे जितनी सतर्कताएँ हम बरतें निष्कपट सत्य यही है एक अजब संत्रास मैं कभी लिखकर,गा कर ,सुनकर,अन्य की कविता मैं खोजकर,कभी अपने ही आंसुओं मैं भीग कर ,तो भी....और हम वहीँ बाजी हार जातें हैं जहाँ हमारा सब कुछ दावं पर ,लगा होता है चीजें....भ्रामक सिद्ध होजाती है ..एक अचाहा नर्कभोगने की मजबूरी होती है ..खोई चीजों को चाहे ,पूरीनिष्ठा ,पूरीइमानदारी,,पूरे,विश्वाश के साथआव्हान किया गया हो तोभी क्या कोई लौटेगा ...कुछ वाकये हमारी जिन्दगी से ताल मेल बैठा लेतें हैं उनकी नियति बस हमारी ही होती है...बेटी के ६-७ वर्ष की उमर होने तक करीब ६०७० पुस्तकें इकठा हो गई थी जो उसे उपहार मैं मिलती रही थी...बचपन से ही किताबें पढने का उसे शौक भी था,सीलन से बचानेकी खातिर मैंने उन्हें एक दिन छत पर धूप मैं फैला दिया शाम उन्हें समेटने के वक्त देखा तो वो चोरी हो गई थी ...शायद कोई रद्दी -बेचने खरीदने वाला उन्हें ले गया था ,बेटी का रो,रो कर बुरा हाल हो गया,मैंने भरसक उन जगहों पर उन्हें तलाशा जहाँ वो मिल सकती थी ..कोई सुराग नही ,किताबें गुमने का दुःख एक सदमे की तरह था ..और उबरना मुश्किल ,जिन किताबों के नाम हमें याद थे और जो-जो मिल पाई हमने खरीद ली कुछ यहाँ वहाँ से इकठा की लेकिन बेटी संतुस्ट नही हुईउसकी अपनी किताबों से कुछ अलग तरह की आत्मीयता थी ..समय बीता और इस बात को तेरह साल हो गए,....अभी हाल ही मैं भोपाल पुस्तक मेला लगा था बेटी की जिद्द थी कुछ किताबें खरीदी जाएँ, उसके अपनी बचत के दो हजार रुपयों से ...हालांकि किताबों को देख कर जो एक लालच हावी हो जाता है दिल-दिमाग पर उस पर भी काबू पाना था ..सोचा शुरुआत पुरानी किताबों की किसी स्टाल से की,जाए ...एक जगह बेटी अपनी पसंद की किताबें उलट-पुलट कर उनके इंट्रो दक्शन पढ़कर और उनकी कीमत देख कर सलेक्ट कर थी ..अचानक एक पुस्तक पर मेरी नजर पढ़ गई मैंने कहा ये तो तुम बचपन मैं पढ़ चुकी हो,तुम्हारे पास थी यकायक हम दोनों के दिमाग मैं गुमी हुई किताबों के ढेर का ख्याल तेजी से एक साथ कौंधा किताब का नाम था ,स्वीट वैली ट्विन्स ..उसने किताब का फ्रंट पेज खोला,बचपन की स्म्रतियों के साथ ..इनर पेज पर नजर पढ़ते ही वो चीख पड़ीj यह किताब मेरी ही है,उसकी आँखेंअचरज और खुशी से फैल गई थी ये उसी की लिखावट थी जिस पर

पेंसिल से टेढे -मेढ़े तरिके से हैवन लिखा हुआ था यकीनन ये उसी की हेंड लिखावट थी .जिसमे लिखे स्वर्ग शब्द के लिए उसे बचपन मैं एक झापड़ पडा था ,क्योंकि उसे बताया गया था की किताबें स्वर्ग का रास्ता होती है ,,,उसे गंदा नही करना चाहिए,उसने किताब को सीने मैं भींच लिया क्या यह कोई इंसिडेंट था? क्या चीजें लौटती हैं? सालों बाद भी?कभी शक्ल बदल कर लेकिन लौटतीहै , मुझे तो कम स कम यही अनुभव हुआ है ,अभी इसी मकर संक्रांत पर माँ की दी हुई साड़ी पहनने का मन हुआ ..तह खोली तो २१०० रूपये फर्श पर गिर पड़े उन्होंने साड़ी के साथ दिए थे रख कर भूल गई थी ..समझ नही आया रो पडूं या आंसू जब्त कर लूँ माँ के बिना बेरौनक और फीके पड़ते जाते त्यौहार ...लगा माँ लौट आई है, उन्हें मैंने खोते हुए देखा ,म्रत्यु के १० घंटे पहले तक ..तीन साल पहले ..विष्णु सहस्त्र नाम ,महा म्रत्युन्जय का पाठ,गणपति अथर्व शीर्ष का पाठ सतत सुनते चली गई ..कहा करती थी वो...सूर्य मन्त्र का पाठ प्रति दिन किया करो ..किसी दिन सूरज नही निकले तो क्या करोगे ?.मोगरे के फूलों की खुशबू मे,उनकी सुगंध,किसी पुस्तक की पंक्तियों में उनकी जीवन द्रष्टि का साम्य जिन्दगी की जीत-हार में आशीर्वाद और आश्वाशन की तरह वो अक्सर दिखाई देती है बस मुश्किलों से यूही पार पा जाती हूँ जब जब आस-पास बनावटीपन में सधी हुई बेईमानियाँ और षड्यंत्री चुप्पियाँ पाती हूँ तब -तब...मीठी घाटी में बेटी की खोई किताब कीतरह.....

माँ मिल ही जाती है अप्रत्याशित खुशियों कीतरह...

बुधवार, 21 जनवरी 2009

शब्द- अर्थों मैं बदले ,या अर्थों के पहाड़ बने,

शब्द अर्थों में बदले या अर्थों के पहाड़ बने ,
फर्क नही पड़ता,
कभी - कभी शब्दों अर्थों की बात,
फिजूल लगती है
शिखर पर नही जाना मुझे....
आओ ढूँढ निकालें महा समुद्र,
सीपियों,शंखों सुनहरी मछलियों,मोतियों वाला...
(उस दिन कितने पत्ते झड़े थे, जब जाते हुए देखा था -तुम्हे मैंने मोड़ से मुड़ते हुए ...
अपनी ही कविता का एक अंश)

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

कुछ ईमानदारियां दिलों मैं सुरक्षित रहती है,वक्त-जरूरत दुनिया के नियम कायदों से अलग भी निभाना होता है



उसके हाथों से तेजी से साबुन, पीठ से होते हुए फिसला और नाजाने किस कोने मैं चला गया ,टब में गरम पानी की वजह से पूरे बाथरूम मैं भाप थी उसने सर उठा कर तौलिये के साथ लिपटा अपना चेहरा आईने मैं देखा -चेहरा नदारत था,आइना भाप से ढँक चुका था और शकल दिखाने से भी इनकार करचुका था अब वो क्या करे?उसने एक अंगुली से पूरेआईने में आडी-तिरछी लकीरें खीँच दी ,वैसे ही जैसे कोई छोटा बच्चा कोरे कागज़ या स्लेट पर अनगढ़ हाथोंसे पेन-पेंसिल चलाता है,लकीरों से बची असंतुलित जगह मैं उसको अब अपना चेहरा विभक्त नजर आया ,क्या वो हमेशा से ऐसा ही था ये प्रशन अपने आप से था जवाब भी ठीक-ठाक नही मिला शायद हाँ -शायद ना,ये थोडा डिप्लोमेटिक लगा उसे -मन उसे खुश करना चाहता था,उसने अपनी मुग्धा आँखे सिर्फ अपने पर टिका दी उसकी आँखे सुंदर है सच --विचारों के एक नही कई सैलाब गरम पानी मैं बह गए जब दिन की शुरुआत ऐसे हादसों से होतो उसे घबराहट होती है ,जहाँ साबुन फिसल जाए,दूध उफन जाए,मोबाइल बेडरूम मैं रह जाए,आप जबतक उठाएं बंद होजाए ,ऊपर से वो नम्बर आपकी कोंटेक्ट लिस्ट मैं ही ना हो ,काम ख़त्म किए बगैर बिजली कटौती का काम शुरू हो जाए ,बेमौसमी बारिश हो,प्याज के आंसू अंगुली काटने का सबब बन जाए ,कहीं पहुँचने की जल्दी मैं कार के दरवाजे मैं हाथ दब जाए,चप्पलों के कारण साड़ी फाल अटक कर उधड जाए और किसी सुबह अपनी बोनसाई मैं शिद्दत से खिला कोई फल-फूल टूट कर मुरझाया पडा मिले ----तो भी वक्त तो सरकता है आगे,आप चाहे रुके रहें ...वो उसे समझाना चाहती थी कि हमारे पास पहलेसे ही बहुत से भय थे उनसे मुक्त होकर ही तो जीने कि कामना थी-साथ- झूट से भरी इस दुनिया में सच..की दरकार कि तरह-उसकी मारक उत्तेजना ,उसकी भी आँखे,और त्वचा पवित्र और पार दर्शी थी कोई शर्तनही थी उनके साथ होने की ...लेकिन उसकी शुमारी- बेशुमार रही उसकी भटकनों में ..फिर कुछ ईमानदारियां दिलों में सुरक्षित रहती हैं जिन्हें वक्त जरूरत दुनिया के नियम कायदों से अलग भी निभाना होता है,बाद में वो यही मनाती रही ..काश वो झूट होता तो जिन्दगी आसान हो जाती ,लेकिन वो सच था सब कुछ ...उसे अपने इश्वर को मनाना पड़ता अन्दर की गठान को ढील देना होता चीजों को थोडा विस्तार भी,शायद ये या वो ,और कोई क्रूरता आत्मा को आहात भी नही करती रात अध् बीचकोई ना जाने कितने सिल सीने पर रखे बादलों की तरह गहरा गई आवाज में कह बैठे भुला दो सब कुछ..आधी रात तो सितारे भी नही टूटते -गर टूटे तो झोली या आंखों में समेट लेना पड़ता है और एक खुश फहमी के साथउदास, खुशबुएँ अपनी आखरी हांफती साँसों के साथ एक सून -सान कों मुक्कमिल बनाने दौड़ लगाती है और अपने लिए जगह बनाकर ही साँस लेती है,ना भूलने वाली बांसुरी की तान सर उठाती है, आवर ग्लास मैं कैद रेत समय की गिरफ्त मैं आजाती है जिसे मन मुताबिक उलटा-पुल्टा कर इन्तजार किया जा सके -अँधेरा घना था उन दिनों भी ''प्लीज फॉर गोड सेक, खुश करने की मन की पहल कारगार होती है ,उसे तेज भूख लग आती है ..फ्रिज खोला मनपसंद कुछ दिखाई नही दिया सिवाय एक डिब्बे के जिसमें गाजर का हलवा था बहुत दिनों से मीठा बंद कर रखा था उसने थोडा सा एक बॉअल मैं डाला और ओवन मैं रीहीट कर पुश किया-वेट लिया और स्टार्ट कर दिया ९०० डिग्री सेल्शियश अन्दरतक धंसा होकोई उसके होने का मतलब..बस २० सेकंड एक सौंधी सुगंध किचिन मैं फैल गई ,उसने ओवन आफ किया बिना गलब्स पहने बॉअल बाहर निकाला जिसका ताप उसके हाथ बर्दाश्त कर रहे थे ,उसकी हथेलियाँ भीग रही थी एक दर्ज नाम के साथ .
उमर भर का किया जो मीजान मैंने जब ,वज़न खुशियों का मिरे गम के बराबर निकला, तालिब जैदी

सोमवार, 12 जनवरी 2009

भोपाल ताल कोहरे मैं ...जिन्दगी क्या है हमसे मिलकर देखो...कहते हुए...इस पोस्ट पर आए सभी मेहरबान मित्रों से मुखातिब


सभी का धन्यवाद ...सबसे पहले स्वप्न जी ने कहा मनमोहक उन्हें बधाई की उन्होंने भोपाल ताल का लुत्फ उठाया पारुल ने भी इस सुंदर शाम को आंखों से दिल मैं सहेजा ताऊ जी ने मौके के हिसाब से खींचे गए चित्रों की तारीफ की ..कल की शाम वाकई खुबसूरत थी ..दिन भर कम्बल मैं दुबके रहने एक घंटा एक नावल को ख़त्म करने,दो घंटे गहरी नींद ले लेने के बाद जाकर कहीं दिन ख़त्म हुआ,...पति ने कहा चलो थोडा घूम आयें बस और कोई दिन होता तो ना भी जाती ...अपना डिजिटिल रखा ,मूंग दाल के मंगोडे ,हरे धनिये की चटनी का स्वाद लेते हुए ये भोपाल की खुबसूरत श्यामला हिल्स से लिए गए चित्र हैं,,,यहीं होटल अशोक [अशोक ग्रुप]का पीछे का हिस्सा है, आगे की तरफ एक रास्ता सी एम् हाउस और दूसरा होटल अशोक से आगे होटल जहाँ नुमा नवाबी शासन काल का एक बेजोड़ होटल है जिससे थोडा आगे चलकर अंसल हाऊसिंग सोसायटी के बहुमंजिला और सिंगल बंगलों की शानदार श्रंखला है इन्ही मैं जया भादुडी की मां का भी एक फलेट है और पतिदेव का ऑफिस भी ...यहाँ शाम रूमानी होती है बच्चे -बड़े पतंग उडाते और तालाब की सतह से लगी चट्टानों मैं फिशिंग करते और कारों मैं /झाडियों मैं चोरी छिपे युगल ...किस्सिंग करते हुए भी दिखाई पड़ जातें हैं इसे मौसम की मेहरबानी कहें या अपनी नजरों का बड़प्पन कहें आपकी मर्जी...मेरे ब्लॉग हेड पर एक बड़ा सा बड नुमा पेड़ है जो दुबई से करीब ६०-७० मील दूर प्रसिद्ध फुजैरा नामक स्थान का है ..यहाँ समुद्र मैं तेल शोधक कारखाने लगये गएँ हैं ..वहीँ ये पिक्चर ली थी, मेरी पत्रिका के ८५ वें अंक के लोकार्परण के समय मेरा दुबई जुलाइ मैं जाना हुआ था दुबई के कई संस्मरण फिर कभी ...विनय जी ने चित को शांत कर देने वाले ,मनोरम ...और वाकई भोपाल अपने आप मैं नायाब है ...नवाबी विरासत को सहेजने सरकार और पुरातत्व वालों ने मशकत्त तो की है, मुझे ताजुब्ब होता है भोपाल छोड़ चुके मेरे कई परिचित कैसे भूल पायें होंगे इन द्रश्यों को,अनिल कान्त जी आपका विशेष आभार और बहादुर पटेल जी आप का भी आप लोग एक बार भोपाल अवश्य आयें ...आशीष जी ने कहा खूबसूरत और यही झील आज पानी के लिए प्यासी है...बिल्कुल सही.आशीष हम लोग इसे बचाने का प्रयास तो कर रहें हैं ...मुझे अभी कल ही नगर-निगम भोपाल द्वारा बड़े तालाब का गहरीकरण एवं साफ सफाई अभियान के सम्बन्ध मैं १४ जन को एक बैठकमैं उपस्थित रहने हेतु कलेक्ट्रेट सभाग्रह मैं आयुक्त भोपाल संभाग ने पत्र ...भेजा है ..देखतें हैं सरकार की क्या मंशा है ...अंत मैं मुकेश तिवारी और रंजना जी काभी आभार , वास्तव मैं भोपाल इन तालाबों की वजह से ही भोपाल है लेकिन यहाँ के बाशिंदे जानते हैं फिलवक्त तालाब के चारों और फैली गंदगी पोलीथिन कचरा ,किनारों पर अतिक्रमण जैसी समस्या के कारण इस खूबसूरती मैं कमी आई है ,कुछ दिन पहले ही प्रदेश के मुख्य मंत्री महोदय ने श्रम दान करके इसके सौन्दर्यकरण की दिशा मैं पहला कदम उठाया है ...इस पोस्ट पर राज भाटिया जी समीर जी और भाई अनुराग जी की उपस्थिति भी मैं मानकर चल रही हूँ..... आमीन

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

समुद्र पकड़ना चाहना और मुठियों मैं रेत भर जाए...प्रार्थनाएं बचा लेती हैं ,क्या ग्यानी हो जाने से संताप मिट जाता है ?


मौसम मैं तेज नमी के बावजूद गर्मी थी,उमस भरी अलसुबह मैं धीरे-धीरे धरती से ऊपर उठता हुआ प्लेन ..और दूर तक एक अंधड़ चक्रावात की तरह कागज़ तिनके रंग-बिरंगी पालीथिन,रेशे-धागे,एक जगह सिमटकर ऊपर की और बढ़ते उसके साथ,ये एक गुबार होता है जो हर यात्रा मैं उसके साथ आ जाता है, जिसमे एक चेहरा कई-कई संबंधों को अन्दर समेटे ...तोल्स्तोय याद आतें हैं,वे कहतें हैं जब हम किसी सुदूर यात्रा पर जातें है आधी यात्रा पर पीछे छूटगए शहर की स्मर्तियाँ मंडराती है केवल आधा फासला पार करने के बाद ही हम उस स्थान के बारें मैं सोच पातें हैं ...जहाँ हम जा रहें होतें है ---बिल्कुल सच ऐसा ही होता है हर बार ,अतीत का कोई टुकडा ललचाता है ,और तुंरत यादों के दायरे मैं आ जाता है,सम्बन्धों की उष्मा -गहराई को जानने के बाद भी अमानवीय हुआ जा सकता है ,मन नही मानता आत्मीयता कोई सूत्र जोड़ती है ,उसकी बातों और यादों से बनी और बसी दुनिया मैं,.....समुद्र की फेनिली लहरें सागर से टकरा कर लौटती हैं, संवेदनाओं के घनीभूत क्षण मैं थोडा नीला-हरा रंग मोहता है, फिर भी इक्चाओं के साथ कितना कुछ ख़त्म हो गया,नही लड़ा गया युद्ध, पार नही किया गया पहाड़ ,कुछ चीजें कितने काम की होती हैं जैसे रुमाल ,खिड़कियाँ,बतियाँ बंद करके या जरूरत मुताबिक,कितने आराम से कुछ भी सोचा जा सके ..उसकी बाजू वाली सीट पर नानवेज बर्गर खाता युवक ,उसने रुमाल की तह खोली और विंडो साइड चेहरा करके नाक पर फेला ली, हम शारजहाँ पहुँच ही रहे थे ....बडा सा बंजरी मैदान बस मेरा और dपीछे छूट गया हरा भरा खेत उसका मीलों दूर तक ...बस वक्त वहीँ से ओझल होता जाता है ...सीट बेल्ट बाँधने का आदेश,जिस दिन नागपुर से दुबई के लिए उसकी फ्लाईट थी उसी दिन एक मेसेज उसने कर दिया था की वो अब बारह दिनों तक अरब कंट्री मैं होगी ,ये बात अलग थी की उसके यहाँ रहने ना रहने से कोई फर्क नही पड़ने वाला था और ये महज इतेफाक ही था की वो मेसेज फेल होकर लौट आया था, सारी चीजें उसकी जिन्दगी मैं सही चलते-चलते किसी वक्त विशेष पर ही जाकर ना जाने क्यों इतनी दुसाह्सी हो जाती हैं की हेल्पलेस होकर बैठने के अलावा कुछ नही किया जा सकता ...कौडियों के मोल का प्रेम...पैसा हाथ का मेल तो कतई नही होता...जिन्दगी की, जीवन की, सलामती की ग्यारंटी जरूर है..एक फीकी मुस्कान आकर लुप्त होजाती है,समुद्र पकड़ना चाहना और मुठियों मैं रेत भर जाए यत्न से सहेजी यादें और जतन से सिरहाने रखा अकेलापन चाहे जितना अच्छा लगे ---आत्मा छीजती है ..तार-तार अर्थ कई अर्थ मैं खो जातें हैं ,इतने दबाव के बावजूद प्रार्थनाएं बचा लेती है जैसे सब उसमें जाकर सच मैं बदलता है ---क्या ग्यानी हो जाने से संताप मिट जाता है ,नदिया ,बियाबान,पहाडों कछारों आकाश मैं उड़ते बादलों ,हवा धुप का शुक्रगुजार होना होता है और मुस्तफा का भी, एक दूसरी धरती तक लेजाने वाला ...एक स्मार्ट पायलेट जिसके चेहरे पर चस्पां था एक मौसम ..हुबहू वही सर से पाँव तक छेह माह बाद भी कोई याद आ जाए तो, .आज कडाके की ठण्ड है ...उसे मौसम विभाग की चेतावनी पर भरोसा नही ,किसी बूढे से पूछना होगा पिछली बार इतनी तेज ठण्ड कब पड़ी थी ...वो अपनी ब्लेक पश्मीना शाल को इर्द-गिर्द कस कर लपेटती है,जिसमें उसके कई उजले दिन बुने हुए थे ....
"एक ही शख्स था एहसास के आइने में, कभी शबनम; कभी खुशबु... कभी पत्थर निकला...-नजीर अहमद "

बुधवार, 31 दिसंबर 2008

गहराती जाती शाम ,कांपते रंगों के बीच से गुजर जाती है,तमाम चीजों,लोगों,रिश्तों,प्रेम की तरह बिछुड़ ता है फिर एक साल

वो दो सीढियां नीचे उतरी पानी ठंडा,शांत,और ठहरा हुआ था पार दर्शी पानी की सतह पर दो-तीन सीढियां और दिखाई दे रही थी ,उसका जी चाहा थोडा और नीचे उतरा जाए,उसने पैरों को मजबूती से चौथी सीढ़ी की टोह लेते हुए जमा दिया जहाँ हरी काई भरी फिसलन थी,एक हाथ से पहनी हुई पैरट ग्रीन -पर्पल कलर की ढाकाई जाम दानी साढी की चुन्नटों को समेटते हुए,और थोडा झुकते हुए घुटनों से थोडा नीचे तक उठा लिया, पानी के नीचे छोटी-छोटी मछलियां आवा-जाही कर रही थी ,उसके पैरों मैं गुदगुदी सी करती,उसे अच्छा लगा भीतर कुछ ठंडा ,साड़ी किनारों से ऊपर तक भीग गई थी ,बीच दोपहर का समय था,और सूरज की रौशनी से छन्नकर साड़ी का हरा -जामुनी रंग पानी की सतह पर बिखर गया था वो फिर झुकी ,पीठ मैं दर्दके बावजूद,साड़ी को दोनों हाथों से निचोडा और हलके से छितरा कर फैला दिया और संभल कर तालाब किनारे बैठ गई, जाने कितने रंग थे ना जाने कितने सुख थे जो संग-साथ हाथों से बटोरने थे उन आंखों से देखने थे ...दूर तक फैला तालाब आनंद से हिलोरें ले रहा था,,चीजें देर से मिले और जल्दी खो जाएँ कुछ पल भीग जाएँ ,कुछ सूख जाएँ कई बेश्किमती पल चोरी हो जाएँ कहीं कोई सुनवाई ना हो ,एक असहाय वक्त मैं ...क्या यहाँ आकर यही सोचना था ,सोचती है, सर्च लाईट सी रौशनी दिमाग मैं जलती बुझती है,एक जिन्दगी यू ही ख़त्म हो जाती है क्या? साल पर साल बीत जातें हैं ...कल किसी का डिनर आज कहीं लंच क्या और कौन सी साड़ी पहनी जाए,बेटी के प्रीबोर्ड ,बोनसाई की मिटटी बदलनी है, मटर की कचोरियाँ ,अहमदाबादी पुलाव भी बना पाओ तो ,,,पति की आवाज उभरती है ,एक दो ट्रेडिशनल डिश,चटनियाँ सिल पर पिसवा लेना--रूक कर --शोभा से,एकाध स्वीट डिश मार्केट से ,--बना सको तो थोडा बहुत आज कल खाता ही कौन है सभी लोग तो हेल्थ कांशस है, फिर भी घर की बनी हो तो, अरे हाँ तुम्हारी वो दोस्त डाक्टर है ,ठीक से चेकप क्यों नही करवाती ,शायद केल्शियम दिफिशिंसी ही हो ,मन ही मन सोचती है,किसी कडुवे केप्सूल कोई इंजेक्शन या पेन रिलीफ ट्यूब से थोडी देर को राहत ,आदत मैं शुमार ,,दूसरे दिन दिल- दिमाग शरीर के किस हिस्से मैं दर्द शुरू हो जायेगा इसका इन्तजार करना होता है परिवर्तन के बिना ,पानी मैं पैर सिकुड़ने लगतें हैं भीतर कोई भीत राग बजने लगता है, जैसे अन्दर कोई रिमोट लेकर बैठ गया हो बार- बार वही सुनाता है ॥राग पुरिया धना श्री सबसे पसंदीदा राग ..थोडा बचना होता है आत्मा से मुल्ल्में उतरने जैसा कुछ,एक खरे अहसास के लिए जगह बनाना होती है ,किनारे बने शिवालय पर चढे मुरझाये फूल पानी मैं बहते हैं ,मछलियां उन्हें कुतरती,एक पल मैं गहरे चली जाती है शिवालय सीढियां ,सर्द मौसम, अनुभूति ,मछलियां निशब्द देखतें हैं ,उस यात्रा मैं उस गंतव्य तक पहुंचना जहाँ कभी जाना ही नही था ।कितनी शेष चीजों के साथ वहीँ रह गई जहाँ उन्हें देखा था,स्तब्ध हवाओं के साथ गीली देह को सुखाते कोई घुलता है उकेरे हुए नाम के साथ अन्दर, हर पल ..यकीन करना,फूलों को अलसाने से बचाना , पत्तों की हरियाली बनाय रखना ,एक आदिम स्मरती को अपनी दिव्यता मैं संजोय रखना,मछुआरे लौट रहें है खुले बदन,डोंगियों मैं मरी हुई मछलियां लिए,गहराती जाती शाम कांप तें रंगों के बीच से गुजर जाती है,तमाम,चीजों, लोगों, रिश्तों, प्रेम कीतरह बिछुड़ ता है फिर एक साल।
"और कुछ देर न गुजरें; शबे फुर्खत से कहो... दिल भी कम दुखता है; वो याद भी कम आते हैं..." - फैज़।
नव वर्ष की शुभकामनाएं ...!

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

मेरे कुरते का टूटा बटन...खोजती अपनी अँगुलियों के साथ ..

मेरे कुरते का टूटा बटन ... नरेन्द्र गौड़,की ये कविता मेरी डायरी मैं सुरक्षित रही जो अपनी बानगी,सम्प्रेश्निय्ता मैं इतनी सरल और अद्भुत है की अभिव्यक्ति के अर्थों मैं भी द्रवित करती है और एक भाव कवि के दुःख मैं आपको साझा करता है ये दुःख आपको जिलाता है जिसके सुख से भी आप रोमांचित हुए बिना नही रह पायेंगे...ये भोपाल से प्रकाशित साक्षात्कार पत्रिका के फरवरी ९७ अंक में प्रकाशित हुई थी,इसी क्रम मैं एक और सुंदर कविता है ...जिसे फिर कभी......

मेरे कुरते का,टूटा बटन

टांकने के लिए आख़िर उसे

सुई धागा नही मिला

समय नही ठहरा,कुरते के टूटे बटन के लिए

अपनी जगह रही मेरी तसल्ली,

सुई धागा,तलाशती वह,

गहरे संताप मैं वहीँ छूट गई,

बिना बटन के ही

वो कुर्ता पहना, पहना इतना,

आगे पहनने लायक नही रहा

मेरे पास वोही एक कुर्ता था,

जिसकी जेब मैं तमाम दुनिया को रखे घूमता था,

रात को मेरे सीने पर वह,

सर टिकाये रहती है,

टूटा बटन खोजती,अपनी अँगुलियों के साथ,

वो शाम के रंगों की तरह था,आया और चला गया,किसको अँधेरा खोजता ,आया और चला गया,[शरद रंजन ]

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

जंगल की याद मैं,चट्टानों के प्रेम मैं ..जहाँ से लौटकर गैर मामूली इच्छाएं विस्मित करती है एक रिपोतार्ज यात्रा चित्र..

उस मोड़ पर आकर /खुलता है रास्ता/जहाँ से आगे सारे रास्ते/बीहड़ जंगलों की ओर लौट तें हैं/भीम बेठिका मैं/जिसकी पगडण्डी बनी है /पथरीली चट्टानों के बीच से /जहाँ पहुंचकर फिर कई छोटे रास्ते मिलते हैं /भीम बैठिका कोई मिथ है /या कोई सूत्र जरूर है /कहा भी ओर माना भी जाता है/वीतरागी भीम ने यहाँ तपस्या की थी /जिसकी अनिवार्य उपस्थिति यहाँ दर्ज ओर चिन्हित है/छोटे-छोटे रास्ते धीरे-धीरे ऊपर उठते है/आकाश की ऊंचाई मैं बाहें फेलाए /आतुर/ऊंचाई पर जाकरएक तरफ/ज्यादा हरा थोडा कम सूखा/समतल मैदान मिलता है /पहाडियों के नीचे आराम से पसरा-फैला /दूर तक /जिसके सामने हैं/नुकीली-दरकी हुई ठोस चट्टाने/जिन्हें छूकर लौट तें हैं बार-बार/महुए ओर शाल वृक्ष के तार-तार हुए पत्तों की /जंगली हवाओं की कसैली गंध/जिनके साथ-समग्र-सघन/कहीं दूर अधूरे सपने कौंध जाते हैं/ बिछुडी स्म्रतियों मैं /चट्टानों के शिखर पर /भीम काय तपस्वी भीम कदाचित आपको रोमांचित करे/पौराणिक कथा नायिका द्रोपदी-पांचाली/चट्टानों के पीछे से /झांकती/इतिहास पलटती /पत्तों के मौन मैं /कभी खड़ ख्डातीतो कभी सुबकती है /दो ऊँची चट्टानों के बीच /झांकते नीले आकाश से/लौटती एक जंगली कबूतरी/चट्टानों के खोह से /अपने नन्हे बच्चों के साथ /दुःख-सुख भोर-अन्धकार के सच मैं/ एक विषम मैं /समय करवटें बदलता है/जहाँ से लौटकर गैर मामूली इच्छाएं विस्मित करती हैं/चट्टानों का बेबाक खरापन भी अभिभूत करता है /पलाश के गठीले खुरदरे तने वालें पेडों पर/ठहरे हुए मौसम /टेसू चटकने का अनंत से बाट जोह्ते/आंखों मैं भरता समूचा जंगल/जंगली फलों से लदे पेड़/बारम्बार/खामोशी से खड़े हो जातें हैं/संवेदनाये बदलती हैं/आकारों मैं/शेल चित्रों से बाहर निकल /यात्राओं के अंत ओर मोडों वाले रास्तों पर/कोई तो है /जो मुनादी करता है/सुनो- रुको,रुको-सुनो/चट्टानों के सीने से लिपटे पेड़/बेशक सघन एकांत मैं/प्रेम की तल्लीनता मैं /थोडा सकुचाते-शर्माते हुए /बेमानी लगती है /जाने क्यों सारी दुनिया /चट्टान के आखरी सिरे पर बिना मिटटी के पनपा पेड़/ सच कितना द्रवित किया होगा/इन पत्थरों को /सोचती हूँ/रास्ते लौटा तें हैं /सार्थक उदासी मैं /घर की तरफ/धानी दुपट्टे के कोने मैं लिपटा चला आता है/ कोई जंगली फूल/आत्मा उड़ान भरती है/पहुँचती है/जहाँ दुबके बैठे है /पंखों के नीचे /कबूतरी के बच्चे /सुखद गर्माहट मैं/
श्री वाकणकर प्रसिद्ध पुरात्तव वेत्ता की याद मैं ..जिन्होंने भीम बैठिका के दुर्लभ शेल चित्रों की खोज की ...भोपाल से ४० किलोमीटर की दूरी पर स्थित ,वर्ल्ड हेरिटेज दर्जा प्राप्त भीम बैठिका से लौट कर....

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

देला वाढी के जंगलों से गुजरते हुए और जंगल बेखबर....


देला वाढी के जंगलों से गुजरते हुए देखती हूँ
घुमाव दार सड़कें ,बेनाम पेड़ ,
जंगली हवा तिलिस्मी धूप... ,
मुरझाये बूढे सूखे,लाल और पीले पत्ते ,
कांपती जुबाने लिए बतियाते,इन जंगलों मैं
अट जातें हैं ,किसी जादुई गिरफ्त से
आते-जाते आंखों मैं ,ओझल होता है ,
शाम का सूरज ,पहाडियों के पार,
इन जंगलों से शायद कल फिर गुजरना पड़े ,
तो भी रहेंगे जंगल बेखबर,

दुनिया कहेगी मुझे उजालों का देवता,मैं उस मुकाम पर हूँ जहाँ रौशनी सी है जफर सिरोंजवी
भोपाल से ६५ किलोमीटर दूर एक पिकनिक स्पॉट ,देला वाढी से लौटकर..

रविवार, 14 दिसंबर 2008

रस्टीशील्ड-गोल्डन पीला गुलमोहर... एक शुरुआत, स्मृति के सुख-दुःख से परे...

अनुभूतियों और शब्दों के बीच खोजते हुए वह अपने को उस शाम करीब छ माह बाद उसी सड़क पर लौटा लाई जो उसकी पसंदीदा भी थी और गवाह भी.सड़क दूर तक खुदी हुई थी ,उसके किनारे ढेरों कंकरीली काली मिटटी पड़ी हुई थी.ना वहां रस्टी शील्ड -पीला गुलमोहर था और ना ही दुरान्ता रिपेन्स की हरे पीले पत्तों की झाडियाँ मौजूद थी जिसमे सितम्बर से दिसम्बर तक भर पूर पीले फूल आतें हैं,धीरे-धीरे पुरानी पत्तियां झडती रहती है नई चमकीली पत्तियां आने तक . और मार्च तक हरी भूरी फलियों से पेड़ लद जाता है जो बाद मैं पेड़ के नीचे बिछ जाती है जिन्हें चुनना अच्छा लगता है ,उस निरापद और निष्टुर रास्ते पर चलते-सुनते शब्द चीत्कारों से अब लगातार मर रहे थे ,पलट कर देखने का मोह छोडा भी तो नही जाता पिछले सब का जायजा लेने का एक मौका ही तो था ,निपट अकेले मैं खासे भरे-पेडों की शाखाओं से गिरते पीले मुरझाये पत्ते हवा के साथ बजते हुए सुनने का,परन्तु पत्ते उतरे,पेडों की नुकीली शाखाएँ बेतरतीब सी आकाश की छाती पर चुभती सी दिखलाई पड़ती ,बस इसीलिए उसे दिसम्बर नही भाता ,रस रूप ,गंध,शब्द और स्पर्श से बंधा मंगल मुहूर्त और उस चेहरे का वैभव जिसके सहारे कोई अँधेरा दरअँधेरा पार करता ,वो ट्रांसपेरेंट हो गया सब कुछ की जिसके पार सेकडों मील दूर तक भी बहुत कुछ देखा जा सकता था,फिर कौन परवाह करता किसी के जीने मरने की ...उसने तो वायदा किया था जो कुछ पाउँगा उसे अकेले नही देखूंगा ,हाथ पकड़ कर तुम्हे भी दिखाउंगा ,किसी तकलीफ से गुजरना -ताकि जिन्दगी को करीब से देखा जाय ,ताकि अपने करीबी लोगों को और अधिक प्यार किया जा सके, कला का सार तत्व उसका निचोड़ जानने ,जीने की एक अच्छी कोशिश,लिखने की शुरुआत ,दुनिया के आम सुख -दुःख से ऊपर उठने को वो सप्रयास सीखने लगे ....उसने फिर भी एक जोरों से साँस ली और भीतर ही भीतर उसकी अद्रश्य पीठ पर सर टिका दिया ..और एक अंगुली से लिखा दुनिया के सबसे गहरे अर्थों वाला शब्द---स्लेटी रंग से उसे चिड थी पर उस सिलेटी शाम का क्या करे,देर रात तक उस खुले अंत का, उसने फिर भी सपना देखा गुलमोहर खिल उठा है जिसके तले वो अपने सेल पर कविता के कुछ शब्दों को सुनते...
"कहानियाँ उस वक्त पैदा होती हैं जब वक्त गुज़र जाता है, लोग जुदा हो जाते हैं, इन्सान बूढा हो जाता है "- पीटर बख्सल - जर्मनी कथाकार।

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

एक ख़त बेनामी भाई के नाम...कल एक पोस्ट ..फिर सत्ता मैं शिव सरकार,जिस बेनामी से सम्बंधित हो उसके लिए...


भाई बेनामी जी ...मैं चाहती तो इस बेनामी ऑप्शन या टिपण्णी को हटा सकती थी पर कोई फायदा नही होता,...जवाब सुने, यदि एक लेख लिखने से पाँच -दस साल का बंदोबस्त हो जाता है तो बेरोजगारी के इस युग मैं बड़ी बात है ,तो कयोना दस-बीस लेख लिख लिये जाएँ पूरे कुनबे का जिन्दगी भर की दूध-मलाई का इंतजाम हो जायेगा,...अफसोस आपके -पीछे -पीछे बिना पढ़े दो नामी भाई और आगये ...जवाब देने का मन तो नही था,लेकिन आज फिर आपने किसी ब्लॉग पर टिपण्णी की ये दुघ मलाई वाली कुठा क्यों है आपको किसी के बारे मैं विचार बनाने और उस पर लिखने से पहले उसे जानना होता है आप लिखिए ना ,,,भला -बुरा,मख्खन मलाई, गुड -इमली ,...अंगूर खट्टे हों खम्बा उंचा हो तो सर नोचने से कोई फायदा?स्याही को नसीब बना लेंगेतो आगे की जिन्दगी का क्या होगा,लड़ना पेशा नही, मेरा लिखना है ,मेरी समझ नही आता मौसम बदलते ही कुछ लोगों को बुखार क्यों आजाता है छींके क्यों आने लगती है ,हर जगह वो अपशुकन करने लगते हैं,थोडा भी बर्दास्त नही करते, क्या औरतें बस उलुल-जुलूल कविता-कहानी प्रेम पर ही लिखती रहें राजनेतिक सामजिक सरोकारों पर उनकी दखल से आपके अहं को चोट पहुँचती है और वह आपकी ,हाँ मैं हाँ मिलाती जिधर हांक दे चली जाएँ नकवी की भाषा मैं लिपस्टिक दूध-मलाई आयं-बायं जो मन आए कह जाए ...आप जैसे लोग ही स्त्री-पुरूष समानता मैं एक पहाड़ हैं .आपको उन गरीबों पर ज़रा भी दया नही आती जिनकी मुश्किलें दूर करने मैं पहली बार ये सरकार कामयाब रही है ..खासकर स्त्री के चेहरे पर एक मुस्कान तो आई है ,थोडा अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचें अपने मैं तबदीली लायें भरम और झूट से बचें,जिन्दगी मैं कामयाब लोगों से कामयाबी के गुर सीखें सब्र करना और आत्मविश्लेषण करना भी ...१३ को शिव सरकार शपथ लेगी तब भी एक पोस्ट लिखूंगी ,,,इमानदारी से नामी-गिरामी होकर टिपण्णी देन,ताकि शुभकामनाओं के साथ कटोरा भर दूध-मलाई भी पोस्ट की जा सके.

सोमवार, 8 दिसंबर 2008

मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार फ़िर सत्ता में... आत्मविश्वास, चुनौतियाँ और शिद्धत्त से किए काम जीत का सेहरा बने...

मध्यप्रदेश के इन चुनावों मैं भा पा ने ना केवल एतिहासिक जीत दर्ज की है वरन सम्मान जनक स्थिति भी हांसिल कर ली है खूबी यही है के टिकिट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार ,प्रत्याशियों का मनोबल बढ़ाना,पत्रकारों से तालमेल बैठाना,अपोजिशन को फेस करना-जवाब देना और अपने आत्म विशवास को बनाय रखना,जेसे कारक तत्वों के चलते एक साफ चेहरे वाला व्यक्ति ,और उसकी कोशिशें अन्तत लक्ष्य पूर्ति मैं सफल रही ,जिस इमानदारी,सादगी और कर्मठता से गरीब की रोटी-पानी की चिंता शिवराज सिंह चौहान ने की ....ये जीत का सेहरा उसी का परिणाम है,कुछ वर्षों पूर्व देनिकभासकर के लिए जब मैंने शिवराज सिंह जी का इंटर व्यू किया था तब पाटी मैं उनकी कोई ख़ास पहचान नही थी ,तब भी वो चमक-धमक से दूर सादगी से नाता जोड़े हुए पैदल या सायकिल से घूम-घूम कर कार्य करते थे ,..तब ना उनके पास भीड़ थी ना पत्रकारों का हुजूम ,उसके बाद जब उन्होंने सत्ता संभाली तब भी वे सादगी से भरे हुए थे ,चुनौतियां भी थी ,तब इस कम अनुभवी किंतु आम आदमी से जुड़े नेता ने जल्द ही गरीबों की समस्याओं से साक्षात्कार कर उनकी मुश्किलों का तुंरत निदान और उपेक्षित वर्ग को आत्म विशवास दिलाने मैं जो दिलचस्पी और सच्चाई बरती,साथ ही शासन और आम जन के बीच सेतु बनकर काम करने के अपने अंदाज को जिस तरह बखूबी अमली जामा पहनाया काबिले तारीफ है,हर जागरूक आदमी जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचता है उनकी जीत के प्रति आश्वस्त था,आंकडों पर ना जाएँ कुछ मुद्दे छोड़ भी दे तो पिछले तीन सालों मैं विशेषकर महिलाओं को संबल देने हेतु जो व्यवहारिक काम किए वो देश भर मैं किसी राज्य के खातें मैं नही होंगे, ३० जुलाइ २००२ को मुख्यमंत्री निवास पर महिला पंचायत और फिर समाज के कमजोर दलित तबके के लिए पंचायतों का सिलसिला,उनके प्रकरण ,समस्या, निदान ,सरक्षण, कानून ,उनकी मुश्किलों को सुनना ,जानना,ये सब किर्यान्वित होता रहा परिणाम सामने है लोगों ने उन्हें चुना,लाडली लक्ष्मी जैसी अनूठी योजना,ने गरीब स्त्री मैं एक ऊर्जा और आत्म विशवास का संचार किया,ये योजना थी भी इसलिए ,ताकि स्त्री के चेहरे पर गरीबी ना दिखे महिला सशक्तिकरण ,गुणात्मक स्वास्थ्य सेवायें,क्षमता भर विकास,रोजगार एवं आय बढाने के अवसर बढाना,जेंडर आधारित बजट व्यवस्था ,श्रमिक महिलाओं के हितों का संरक्षण यौन प्रतारणा की रोकथाम ,वन जल पर्यावरण, इनमें भागीदारी को ख़ास अहमियत दी गई एवं कठिन स्थिति वाली महिलाओं को सुविधाऔर उनके लिए संसाधन मुह्हिया करना ,सुचना संसार मैं तकनिकी भागीदारी,नीतिगत प्रावधानों की मोनिटरिंग मूल्यांकन प्रतिवेदन महिला निति के लिए कार्ययोजना मैं विभागों की जिम्मेदारी को शामिल किया गया, साथ ही कई पुरुस्कारों कोदेने के साथ आदिवासी निशाक्त्जानो मेधावी छात्रों ,किसान महापंचायतों के माध्यम किसानो को बिजली माफीदेश मैं पहला मत्स्य निति बनाने वाला राज्य बनाकर शिव सरकार ने मध्यप्रदेश की राजनीति मैं एक एतिहासिक मोड़ दिया है ,लेकिन अपने घोषणा पत्र मैं सरकार ने जो कहा है ..पानी बिजली जैसे मुद्दे उन्हें पूरा करने के लिए अब सरकार को जी-जान से जुटना होगा ,जहाँ -जहाँ असंतोष है वहां चौकसी के साथ काम करना होगा,सरकार से अब उम्मीदें और बढ़ जायेंगी लेकिन अब उनके पास मौका भी है, और समय भी ,यही नही ये चुनाव एतिहासिक ही नही आगामी लोकसभा चुनावों के लिए निर्णायक भी सिद्ध होंगे कबीर द्वारा परिभाषित जोगी ,[सब सिद्ध्ही सहज पाइये ,जो मन जोगी होई ]शिव राज सिंह को फिर भी याद रखना होगा सच्चाई से की अन्तिम आदमी कोयाद रखना अपने अन्दर के विचार को और अपनी मनुष्यता को बचा कर रखना है नही तो सत्ता मैं रह करभ्रष्ट तो होना ही होता है सता की अपनी मजबूरियाँ होती है और मतदाता की भी ,....आमीन ,जिसको चाहे शोहरत दे ये करम उसी का है

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

प्रेम में दर्ज चीजें अनुपस्थिति मैं,उपस्थित प्रवासी परिंदों की उड़ान के साथ जब वो एक तंग गली से गुजर रही थी


एक थरथराती गंध के साथ हथेलियों से आंखों तक फैली हेरानी,उतेजनाओं के साथ वो मुलाक़ात पहली ,फिर तो मुलाकातों के कई शेड्स....नई आस्थाओं के साथ पुराने लड़े गए युद्ध ,मुक्ति की प्रार्थना तक,इतिहास मैं शामिल होने को तैयार उन क्षणों पर आत्म मुग्ध..दग्ध..हताश होने के अलावा कुछ हो ही नही सकता था उसकी निश्छल साफगोई का कायल होना जरूरी हो गया था ,लेकिन चीजों को तह करना उसे खूब आता था,एक ऊंचाई पर जाकर अपने को नीचे गिरते हुए देखना वहम ही होगा, लेकिन लाइलाज ,जैसे लिफ्ट मैं अकेले होना लन्दन आय मैं बेठना ..हो या हंस प्लाजा की अठाहरवीं फ्लोर पर होना, एक मूर्खता भरी सोच देहली की उस बे मौसमी बारिश मैं किसी का याद आना,उसकी मुश्किलों से बेखबर ,उसकी रूममेट का ही प्रस्ताव था रूफ टॉप पर जाकर टहला जाए ,एक वर्कशॉप अटेंड करने एक ही शहर से दोनों साथ थी जहाँ उनके साथ हमपेशा कई विदेशी महिलायें भी थी प्रोग्राम कोआर्दिनेटर ने वैसे तो डिनर प्रगति मैदान के होटल बलूची मैं रखा था,लौटते वक्त भी हलकी बारिश थी सड़कें गीली और नम थी ,थोडी ठंडक भी थी ,,,उस सनातन मूर्खता भरे प्रेम का कोई सिरा क्या अब खोजने पर भी मिलेगा ?उसे काल करना ,उत्तर मिला निस्संग व्यस्त हूँ कई क्षण आए किसी की जिन्दगी मैं बिना दखल दिए उसे लगा उसकी हेसियत सिफर है ....बाद मैं कई तार्किक शिकायतों का रिजल्ट भी सिफर ही रहा ,एक भरथरी गायकी का विलाप अन्दर ही अन्दर गूंजता रहा ..देर रात शौक से पहनी पोचमपल्ली सिल्क की गहरी नीली कथई हरे ,काले और मस्टर्ड ,मिक्स रंगों वाली वो खुबसूरत साड़ी सलवटों भरी उस शाम के बाद फिर ना पहनी जा सकी ,एहसास की गहराई का इतना उथला होना बुलंद सोच का भरभरा कर गिरना और मुग्धा होने के कारण ...केया गंध मैं गुथा हुआ साथ जरूर था जाने क्या हुआ , उन दिनों ....कई दफे सोच और समय समाप्त हो जाता है फिर भी रास्ते बाकी रहतें हैं, एक चुप्पी के साथ उदासी वहीँ आकर ठहर जाती है ,निशब्द चीजें इतनी तरतीबी से कैसे रह सकती है , जी सकती हैं बावजूद अपमानित -आहात होने के इतने कारण उसके हिस्से ही क्यों आए ?कोई निहत्था हो तो भीतरी आस्था ही तो बचेगी दूसरी लडाइयों के लिए, दर्ज चीजे अनुपस्थिति मैं उपस्थित ,किनारों से पानी सूखने की कगार के साथ मौसम बदलने और प्रवासी परिंदों की उड़ान के साथ भी एक इनटूशं न रहा होगा जब वो एक तंग गली से गुज़र रही थी...

उन्होंने चिंदी -चिंदी किया प्रेम ,ताकि सुख से नफरत कर सके उन्होंने धज्जियाँ उडाई जीवन की ताकि सुख से मर सके

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

मेरे शहर मैं २ दिसम्बर १९८४,सूरज पे हमें विशवास है


बोलों पे जड़ दिए ताले
सूरज कैद कर लिया था किसीने
सन्नाटा था ,हवाए नाराज ,पेड़ उदास ,
मेरे शहर मैं ख़ास अर्थ होता है
धूपऔर हवा के निकलने बिखरने का
सिमट गए थे , तालाब,समीक्षित हो गया आकाश,
बदल गई थी जिंदगियां हिरोशिमा और नागासाकी के ढेर मैं
बीत गए साल दर साल,
बदलने- सँवारने-निखारने की तयारियों मैं ,
परछाइयां पकडती व्यवस्था घटा टौप अंधेरों मैं
रचती हर दिन एक नया षड़यंत्र ......
उन दिनों ,मेरे दोस्त
सुबह का इन्तजार बेहद जरूरी था
और मैं अपने शहर के तालाब पर फैली
सिर्फ स्याह काई देखती रही
सोचती रही
अपनी गोद से उछाल देगा आकाश
यकायक पीला सुनहरा सूरज
सूरज पे हमें विशवास है

गैस त्रासदी पे लिखने के लिए जो शब्द हो ,मेरे पास नही ,ये उसी वक्त लिखी और प्रकाशित एक लम्बी कविता थी जो थोड़े से बदलाव के साथ है...